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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2018)

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सप्ताशीतितमोऽध्यायः

अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्राङ्गदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन

युधिष्ठिर उवाच

श्रुतं प्रियमिदं कृष्ण यत् त्वमर्हसि भाषितुम् ।
तन्मेऽमृतरसं पुण्यं मनो ह्लादयति प्रभो ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— प्रभो! श्रीकृष्ण! मैंने यह प्रिय संदेश सुना, जिसे आप ही कहने या सुनानेके योग्य हैं। आपका यह अमृतरससे परिपूर्ण पवित्र वचन मेरे मनको आनन्दमग्न किये देता है ॥ १ ॥

बहूनि किल युद्धानि विजयस्य नराधिपैः ।
पुनरासन् हृषीकेश तत्र तत्र च मे श्रुतम् ॥ २ ॥
हृषीकेश! मेरे सुननेमें आया है कि भिन्न-भिन्न देशोंमें वहाँके राजाओंके साथ अर्जुनको कई बार युद्ध करने पड़े हैं ॥ २ ॥

किं निमित्तं स नित्यं हि पार्थः सुखविवर्जितः ।
अतीव विजयो धीमन्निति मे दूयते मनः ॥ ३ ॥
संचिन्तयामि कौन्तेयं रहो जिष्णुं जनार्दन ।
अतीव दुःखभागी स सततं पाण्डुनन्दनः ॥ ४ ॥
इसका क्या कारण है? बुद्धिमान् जनार्दन! जब मैं एकान्तमें बैठकर अर्जुनके बारेमें विचार करता हूँ, तब यह जानकर मेरा मन खिन्न हो जाता है कि हमलोगोंमें वे ही सदा सबसे अधिक दुःखके भागी रहे हैं। पाण्डुनन्दन अर्जुन सुखसे वंचित क्यों रहते हैं? यह समझमें नहीं आता ॥ ३-४ ॥

किं नु तस्य शरीरेऽस्ति सर्वलक्षणपूजिते ।
अनिष्टं लक्षणं कृष्ण येन दुःखान्युपाश्नुते ॥ ५ ॥
श्रीकृष्ण! उनका शरीर तो सभी शुभलक्षणोंसे सम्पन्न है। फिर उसमें अशुभ लक्षण कौन-सा है, जिससे उन्हें अधिक दुःख उठाना पड़ता है? ॥ ५ ॥

अतीवासुखभोगी स सततं कुन्तिनन्दनः ।
न हि पश्यामि बीभत्सोर्निन्द्यं गात्रेषु किंचन ।
श्रोतव्यं चेन्मयैतद् वै तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ६ ॥

कुन्तीनन्दन अर्जुन सदा अधिक कष्ट भोगते हैं; परंतु उनके अंगोंमें कहीं कोई निन्दनीय दोष नहीं दिखायी देता है। ऐसी दशामें उन्हें कष्ट भोगनेका कारण क्या है? यह मैं सुनना चाहता हूँ। आप मुझे विस्तारपूर्वक यह बात बतावें ।। ६ ।।
इत्युक्तः स हृषीकेशो ध्यात्वा सुमहदुत्तरम् ।
राजानं भोजराजन्यवर्धनो विष्णुरब्रवीत् ।। ७ ।।
युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भोजवंशी क्षत्रियोंकी वृद्धि करनेवाले भगवान् हृषीकेश विष्णुने बहुत देरतक उत्तम रीतिसे चिन्तन करनेके बाद राजा युधिष्ठिरसे यों कहा — ।। ७ ।।
न ह्यस्य नृपते किंचित् संश्लिष्टमुपलक्षये ।
ऋते पुरुषसिंहस्य पिण्डिकेऽस्याधिके यतः ।। ८ ।।
‘नरेश्वर! पुरुषसिंह अर्जुनकी पिण्डलियाँ (फिल्लियाँ) औसतसे कुछ अधिक मोटी हैं। इसके सिवा और कोई अशुभ लक्षण उनके शरीरमें मुझे भी नहीं दिखायी देता है’ ।। ८ ।।
स ताभ्यां पुरुषव्याघ्रो नित्यमध्वसु वर्तते ।
न चान्यदनुपश्यामि येनासौ दुःखभाजनम् ।। ९ ।।
‘उन मोटी फिल्लियोंके कारण ही पुरुषसिंह अर्जुनको सदा रास्ता चलना पड़ता है। और कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता, जिससे उन्हें दुःख झेलना पड़े’ ।। ९ ।।
इत्युक्तः पुरुषश्रेष्ठस्तदा कृष्णेन धीमता ।
प्रोवाच वृष्णिशार्दूलमेवमेतदिति प्रभो ।। १० ।।
प्रभो! बुद्धिमान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उन वृष्णिसिंहसे कहा —‘भगवन्! आपका कहना ठीक है’ ।। १० ।।
कृष्णा तु द्रौपदी कृष्णं तिर्यक् सासूयमैक्षत ।
प्रतिजग्राह तस्यास्तं प्रणयं चापि केशहा ।। ११ ।।
सख्युः सखा हृषीकेशः साक्षादिव धनंजयः ।
उस समय द्रुपदकुमारी कृष्णाने भगवान् श्रीकृष्णकी ओर तिरछी चितवनसे ईर्ष्यापूर्वक देखा। केशिहन्ता श्रीकृष्णने द्रौपदीके उस प्रेमपूर्ण उपालम्भको सानन्द ग्रहण किया; क्योंकि उसकी दृष्टिमें सखा अर्जुनके मित्र भगवान् हृषीकेश साक्षात् अर्जुनके ही समान थे ।। ११ ½ ।।
तत्र भीमादयस्ते तु कुरवो याजकाश्च ये ।। १२ ।।
रेमुः श्रुत्वा विचित्रां तां धनंजयकथां शुभाम् ।
उस समय भीमसेन आदि कौरव और यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणलोग अर्जुनके सम्बन्धमें यह शुभ एवं विचित्र बात सुनकर बहुत प्रसन्न हो रहे थे ।। १२ ½ ।।
तेषां कथयतामेव पुरुषोऽर्जुनसंकथाः ।। १३ ।।
उपायाद् वचनाद् दूतो विजयस्य महात्मनः ।

उन लोगोंमें अर्जुनके सम्बन्धमें इस तरहकी बातें हो ही रही थीं कि महात्मा अर्जुनका भेजा हुआ दूत वहाँ आ पहुँचा ॥ १३ १/२ ॥
सोऽभिगम्य कुरुश्रेष्ठं नमस्कृत्य च बुद्धिमान् ॥ १४ ॥
उपायातं नरव्याघ्रं फाल्गुनं प्रत्यवेदयत् ।
वह बुद्धिमान् दूत कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके पास जा उन्हें नमस्कार करके बोला—‘पुरुषसिंह अर्जुन निकट आ गये हैं’ ॥ १४ १/२ ॥
तच्छ्रुत्वा नृपतिस्तस्य हर्षबाष्पाकुलेक्षणः ॥ १५ ॥
प्रियाख्याननिमित्तं वै ददौ बहुधनं तदा ।
यह शुभ समाचार सुनकर राजा युधिष्ठिरकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक आये और यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करनेके कारण उस दूतको पुरस्काररूपमें उन्होंने बहुत-सा धन दिया ॥ १५ १/२ ॥
ततो द्वितीये दिवसे महान् शब्दो व्यवर्धत ॥ १६ ॥
आगच्छति नरव्याघ्रे कौरवाणां धुरंधरे ।
तदनन्तर दूसरे दिन कौरव-धुरंधर नरव्याघ्र अर्जुनके आते समय नगरमें महान् कोलाहल बढ़ गया ॥ १६ १/२ ॥
ततो रेणुः समुद्भूतो विबभौ तस्य वाजिनः ॥ १७ ॥
अभितो वर्तमानस्य यथोच्चैःश्रवसस्तथा ।
उच्चैःश्रवाके समान वेगवान् और पास ही विद्यमान उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेकी टापसे उड़ी हुई धूल आकाशमें अद्भुत शोभा पा रही थी ॥ १७ १/२ ॥
तत्र हर्षकरी वाचो नराणां शुश्रुवेऽर्जुनः ॥ १८ ॥
दिष्ट्यासि पार्थ कुशली धन्यो राजा युधिष्ठिरः ।
वहाँ अर्जुनने लोगोंके मुँहसे हर्ष बढ़ानेवाली बातें इस प्रकार सुनीं—‘पार्थ! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम सकुशल लौट आये। राजा युधिष्ठिर धन्य हैं ॥
कोऽन्यो हि पृथिवीं कृत्स्नां जित्वा हि युधि पार्थिवान् ॥ १९ ॥
चारयित्वा हयश्रेष्ठमुपागच्छेदृतेऽर्जुनात् ।
‘अर्जुनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर पुरुष है जो समूची पृथिवीको जीतकर युद्धमें राजाओंको परास्त करके और अपने श्रेष्ठ अश्वको सर्वत्र घुमाकर उसके साथ सकुशल लौट आ सके ॥ १९ १/२ ॥
ये व्यतीता महात्मानो राजानः सगरादयः ॥ २० ॥
तेषामपीदृशं कर्म न कदाचन शुश्रुम ।
‘अतीतकालमें जो सगर आदि महामनस्वी राजा हो गये हैं, उनका भी कभी ऐसा पराक्रम हमारे सुननेमें नहीं आया था ॥ २० १/२ ॥

नैतदन्ये करिष्यन्ति भविष्या वसुधाधिपाः ।। २१ ।।
यत् त्वं कुरुकुलश्रेष्ठ दुष्करं कृतवानसि ।
'कुरुकुलश्रेष्ठ! आपने जो दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है, उसे भविष्यमें होनेवाले दूसरे भूपाल नहीं कर सकेंगे' ।। २१ १/२ ।।

इत्येवं वदतां तेषां पुंसां कर्णसुखा गिरः ।। २२ ।।
शृण्वन् विवेश धर्मात्मा फाल्गुनो यज्ञसंस्तरम् ।
इस प्रकार कहते हुए लोगोंकी श्रवणसुखद बातें सुनते हुए धर्मात्मा अर्जुनने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया ।। २२ १/२ ।।

ततो राजा सहामात्यः कृष्णश्च यदुनन्दनः ।। २३ ।।
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य तं प्रत्युद्ययुस्तदा ।
उस समय मन्त्रियोंसहित राजा युधिष्ठिर तथा यदुनन्दन श्रीकृष्ण धृतराष्ट्रको आगे करके उनकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये थे ।। २३ १/२ ।।

सोऽभिवाद्य पितुः पादौ धर्मराजस्य धीमतः ।। २४ ।।
भीमादींश्चापि सम्पूज्य पर्यष्वजत केशवम् ।
अर्जुनने पिता धृतराष्ट्र और बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके चरणोंमें प्रणाम करके भीमसेन आदिका भी पूजन किया और श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया ।। २४ १/२ ।।

तैः समेत्यार्चितस्तांश्च प्रत्यर्च्यथ यथाविधि ।। २५ ।।
विशश्राम महाबाहुस्तीरं लब्ध्वेव पारगः ।
उन सबने मिलकर अर्जुनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। महाबाहु अर्जुनने भी उनका विधिपूर्वक आदर-सत्कार करके उसी तरह विश्राम किया, जैसे समुद्रके पार जानेकी इच्छावाला पुरुष किनारेपर पहुँचकर विश्राम करता है ।। २५ १/२ ।।

एतस्मिन्नेव काले तु स राजा बभ्रुवाहनः ।। २६ ।।
मातृभ्यां सहितो धीमान् कुरूनेव जगाम ह ।
इसी समय बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहन अपनी दोनों माताओंके साथ कुरुदेशमें जा पहुँचा ।। २६ १/२ ।।

तत्र वृद्धान् यथावत् स कुरूनन्यांश्च पार्थिवान् ।। २७ ।।
अभिवाद्य महबाहुस्तैश्चापि प्रतिनन्दितः ।
प्रविवेश पितामह्याः कुन्त्या भवनमुत्तमम् ।। २८ ।।
वहाँ पहुँचकर वह महाबाहु नरेश कुरुकुलके वृद्ध पुरुषों तथा अन्य राजाओंको विधिवत् प्रणाम करके स्वयं भी उनके द्वारा सत्कार पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद वह अपनी पितामही कुन्तीके सुन्दर महलमें गया ।। २७-२८ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अर्जुनप्रत्यागमने
सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुनका प्रत्यागमनविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥