सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2248)

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वितीयोऽध्यायः

पाण्डवोंका धृतराष्ट्र और गान्धारीके अनुकूल बर्ताव

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्पूजितो राजा पाण्डवैरम्बिकासुतः ।
विजहार यथापूर्वमृषिभिः पर्युपासितः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार पाण्डवोंसे भलीभाँति सम्मानित हो अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र पूर्ववत् ऋषियोंके साथ गोष्ठी-सुखका अनुभव करते हुए वहाँ सानन्द निवास करने लगे ॥ १ ॥

ब्रह्मदेयाग्रहारांश्च प्रददौ स कुरूद्वहः ।
तच्च कुन्तीसुतो राजा सर्वमेवान्वपद्यत ॥ २ ॥
कुरुकुलके स्वामी महाराज धृतराष्ट्र ब्राह्मणोंको देनेयोग्य अग्रहार (माफी जमीन) देते थे और कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर सभी कार्योंमें उन्हें सहयोग देते थे ॥ २ ॥

आनृशंस्यपरो राजा प्रीयमाणो युधिष्ठिरः ।
उवाच स तदा भ्रातॄनमात्यांश्च महीपतिः ॥ ३ ॥
मया चैव भवद्भिश्च मान्य एष नराधिपः ।
निदेशे धृतराष्ट्रस्य यस्तिष्ठति स मे सुहृत् ॥ ४ ॥
विपरीतश्च मे शत्रुर्नियम्यश्च भवेन्नरः ।
राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि ‘ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है। विपरीत आचरण करनेवाला मेरा शत्रु है। वह मेरे दण्डका भागी होगा ॥ ३-४ १/२ ॥

पितृवृत्तेषु चाहःसु पुत्राणां श्राद्धकर्मणि ॥ ५ ॥
सुहृदां चैव सर्वेषां यावदस्य चिकीर्षितम् ।
‘पिता आदिकी क्षयाह तिथियोंपर तथा पुत्रों और समस्त सुहृदोंके श्राद्धकर्ममें राजा धृतराष्ट्र जितना धन खर्च करना चाहें, वह सब इन्हें मिलना चाहिये’ ॥ ५ १/२ ॥

ततः स राजा कौरव्यो धृतराष्ट्रो महामनाः ॥ ६ ॥
ब्राह्मणेभ्यो यथार्हेभ्यो ददौ वित्तान्यनेकशः ।
धर्मराजश्च भीमश्च सव्यसाची यमावपि ॥ ७ ॥
तत् सर्वमन्ववर्तन्त तस्य प्रियचिकीर्षया ।
तदनन्तर महामना कुरुकुलनन्दन राजा धृतराष्ट्र उक्त अवसरोंपर सुयोग्य ब्राह्मणोंको बारम्बार प्रचुर धनका दान करते थे। धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, सव्यसाची अर्जुन और

नकुल-सहदेव भी उनका प्रिय करनेकी इच्छासे सब कार्योंमें उनका साथ देते थे ॥
कथं नु राजा वृद्धः स पुत्रपौत्रवधार्दितः ॥ ८ ॥
शोकमस्मत्कृतं प्राप्य न म्रियेतेति चिन्त्यते ।
उन्हें सदा इस बातकी चिन्ता बनी रहती थी कि पुत्र-पौत्रोंके वधसे पीड़ित हुए बूढ़े राजा धृतराष्ट्र हमारी ओरसे शोक पाकर कहीं अपने प्राण न त्याग दें ॥ ८ ½ ॥
यावद्धि कुरुवीरस्य जीवत्पुत्रस्य वै सुखम् ॥ ९ ॥
बभूव तदवाप्नोति भोगांश्चेति व्यवस्थिताः ।
अपने पुत्रोंकी जीवितावस्थामें कुरुवीर धृतराष्ट्रको जितने सुख और भोग प्राप्त थे, वे अब भी उन्हें मिलते रहें—इसके लिये पाण्डवोंने पूरी व्यवस्था की थी ॥ ९ ½ ॥
ततस्ते सहिताः पञ्च भ्रातरः पाण्डुनन्दनाः ॥ १० ॥
तथाशीलाः समातस्थुर्धृतराष्ट्रस्य शासने ।
इस प्रकारके शील और बर्तावसे युक्त होकर वे पाँचों भाई पाण्डव एक साथ धृतराष्ट्रकी आज्ञाके अधीन रहते थे ॥ १० ½ ॥
धृतराष्ट्रश्च तान् सर्वान् विनीतान् नियमे स्थितान् ॥ ११ ॥
शिष्यवृत्तिं समापन्नान् गुरुवत् प्रत्यपद्यत ।
धृतराष्ट्र भी उन सबको परम विनीत, अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले और शिष्य-भावसे सेवामें संलग्न जानकर पिताकी भाँति उनसे स्नेह रखते थे ॥
गान्धारी चैव पुत्राणां विविधैः श्राद्धकर्मभिः ॥ १२ ॥
आनृण्यमगमत् कामान् विप्रेभ्यः प्रतिपाद्य सा ।
गान्धारी देवीने भी अपने पुत्रोंके निमित्त नाना प्रकारके श्राद्धकर्मका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन दान किया और ऐसा करके वे पुत्रोंके ऋणसे मुक्त हो गयीं ॥ १२ ½ ॥
एवं धर्मभृतां श्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १३ ॥
भ्रातृभिः सहितो धीमान् पूजयामास तं नृपम् ।
इस प्रकार धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ रहकर सदा राजा धृतराष्ट्रका आदर-सत्कार करते रहते थे ॥ १३ ½ ॥
स राजा सुमहातेजा वृद्धः कुरुकुलोद्वहः ॥ १४ ॥
न ददर्श तदा किंचिदप्रियं पाण्डुनन्दने ।
कुरुकुलशिरोमणि महातेजस्वी बूढ़े राजा धृतराष्ट्रने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका कोई ऐसा बर्ताव नहीं देखा, जो उनके मनको अप्रिय लगनेवाला हो ॥ १४ ½ ॥
वर्तमानेषु सद्वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु ॥ १५ ॥
प्रीतिमानभवद् राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।

महात्मा पाण्डव सदा अच्छा बर्ताव करते थे; इसलिये अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र उनके ऊपर बहुत प्रसन्न रहते थे ॥ १५ १/२ ॥
सौबलेयी च गान्धारी पुत्रशोकमपास्य तम् ॥ १६ ॥
सदैव प्रीतिमत्यासीत् तनयेषु निजेष्विव ।
सुबलपुत्री गान्धारी भी अपने पुत्रोंका शोक छोड़कर पाण्डवोंपर सदा अपने सगे पुत्रोंके समान प्रेम करती थीं ॥ १६ १/२ ॥
प्रियाण्येव तु कौरव्यो नाप्रियाणि कुरूद्वहः ॥ १७ ॥
वैचित्रवीर्ये नृपतौ समाचरत वीर्यवान् ।
पराक्रमी कुरुकुलतिलक राजा युधिष्ठिर महाराज धृतराष्ट्रका सदा प्रिय ही करते थे, अप्रिय नहीं करते थे ॥ १७ १/२ ॥
यद् यद् ब्रूते च किंचित् स धृतराष्ट्रो जनाधिपः ॥ १८ ॥
गुरु वा लघु वा कार्यं गान्धारी च तपस्विनी ।
तं स राजा महाराज पाण्डवानां धुरंधरः ॥ १९ ॥
पूजयित्वा वचस्तत् तदकार्षीत् परवीरहा ।
महाराज! राजा धृतराष्ट्र और तपस्विनी गान्धारी देवी ये दोनों जो कोई भी छोटा या बड़ा कार्य करनेके लिये कहते, पाण्डवधुरन्धर शत्रुसूदन राजा युधिष्ठिर उनके उस आदेशको सादर शिरोधार्य करके वह सारा कार्य पूर्ण करते थे ॥ १८-१९ १/२ ॥
तेन तस्याभवत् प्रीतो वृत्तेन स नराधिपः ॥ २० ॥
अन्वतप्यत संस्मृत्य पुत्रं तं मन्दचेतसम् ।
उनके उस बर्तावसे राजा धृतराष्ट्र सदा प्रसन्न रहते और अपने उस मन्दबुद्धि दुर्योधनको याद करके पछताया करते थे ॥ २० १/२ ॥
सदा च प्रातरुत्थाय कृतजप्यः शुचिर्नृपः ॥ २१ ॥
आशास्ते पाण्डुपुत्राणां समरेष्वपराजयम् ।
प्रतिदिन सबेरे उठकर स्नान-संध्या एवं गायत्रीजप कर लेनेके पश्चात् पवित्र हुए राजा धृतराष्ट्र सदा पाण्डवोंको समरविजयी होनेका आशीर्वाद देते थे ॥
ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्याथ हुत्वा चैव हुताशनम् ॥ २२ ॥
आयूंषि पाण्डुपुत्राणामाशंसत नराधिपः ।
ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अग्निमें हवन करनेके पश्चात् राजा धृतराष्ट्र सदा यह शुभकामना करते थे कि पाण्डवोंकी आयु बढ़े ॥ २२ १/२ ॥
न तां प्रीतिं परामाप पुत्रेभ्यः स कुरूद्वहः ॥ २३ ॥
यां प्रीतिं पाण्डुपुत्रेभ्यः सदावाप नराधिपः ।

राजा धृतराष्ट्रको सदा पाण्डवोंके बर्तावसे जितनी प्रसन्नता होती थी, उतनी उत्कृष्ट प्रीति उन्हें अपने पुत्रोंसे भी कभी प्राप्त नहीं हुई थी ॥ २३ १/२ ॥
ब्राह्मणानां यथावृत्तः क्षत्रियाणां यथाविधिः ॥ २४ ॥
तथा विट्शूद्रसंघानामभवत् स प्रियस्तदा ।
युधिष्ठिर ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके साथ जैसा सद्बर्ताव करते थे, वैसा ही वैश्यों और शूद्रोंके साथ भी करते थे। इसलिये वे उन दिनों सबके प्रिय हो गये थे ॥
यच्च किंचित् तदा पापं धृतराष्ट्रसुतैः कृतम् ॥ २५ ॥
अकृत्वा हृदि तत् पापं तं नृपं सोऽन्ववर्तत ।
धृतराष्ट्रके पुत्रोंने उनके साथ जो कुछ बुराई की थी, उसे अपने हृदयमें स्थान न देकर वे युधिष्ठिर राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें संलग्न रहते थे ॥ २५ १/२ ॥
यश्च कश्चिन्नरः किंचिदप्रियं वाम्बिकासुते ॥ २६ ॥
कुरुते द्वेष्यतामेति स कौन्तेयस्य धीमतः ।
जो कोई मनुष्य राजा धृतराष्ट्रका थोड़ा-सा भी अप्रिय कर देता, वह बुद्धिमान् कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके द्वेषका पात्र बन जाता था ॥ २६ १/२ ॥
न राज्ञो धृतराष्ट्रस्य न च दुर्योधनस्य वै ॥ २७ ॥
उवाच दुष्कृतं कश्चिद् युधिष्ठिरभयान्नरः ।
युधिष्ठिरके भयसे कोई भी मनुष्य कभी राजा धृतराष्ट्र और दुर्योधनके कुकृत्योंकी चर्चा नहीं करता था ॥
धृत्या तुष्टो नरेन्द्रः स गान्धारी विदुरस्तथा ॥ २८ ॥
शौचेन चाजातशत्रोर्न तु भीमस्य शत्रुहन् ।
शत्रुसूदन जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुरजी अजातशत्रु युधिष्ठिरके धैर्य और शुद्ध व्यवहारसे विशेष प्रसन्न थे, किंतु भीमसेनके बर्तावसे उन्हें संतोष नहीं था ॥ २८ १/२ ॥
अन्ववर्तत भीमोऽपि निश्चितो धर्मजं नृपम् ॥ २९ ॥
धृतराष्ट्रं च सम्प्रेक्ष्य सदा भवति दुर्मनाः ।
यद्यपि भीमसेन भी दृढ़ निश्चयके साथ युधिष्ठिरके ही पथका अनुसरण करते थे, तथापि धृतराष्ट्रको देखकर उनके मनमें सदा ही दुर्भावना जाग उठती थी ॥ २९ १/२ ॥
राजानमनुवर्तन्तं धर्मपुत्रममित्रहा ।
अन्ववर्तत कौरव्यो हृदयेन पराङ्मुखः ॥ ३० ॥
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके अनुकूल बर्ताव करते देख शत्रुसूदन कुरुनन्दन भीमसेन स्वयं भी ऊपरसे उनका अनुसरण ही करते थे, तथापि उनका हृदय धृतराष्ट्रसे विमुख ही रहता था ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥