महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
बृहस्पतेश्च संवादं मरुत्तस्य च धीमतः ॥ १ ॥
षष्ठोऽध्यायः
नारदजीकी आज्ञासे मरुत्तका उनकी बतायी हुई युक्तिके अनुसार संवर्तसे भेंट करना
व्यास उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
बृहस्पतेश्च संवादं मरुत्तस्य च धीमतः ॥ १ ॥
**व्यासजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रसंगमें बुद्धिमान् राजा मरुत्त और बृहस्पतिके इस पुरातन संवादविषयक इतिहासका उल्लेख किया जाता है ॥ १ ॥
देवराजस्य समयं कृतमाङ्गिरसेन ह ।
श्रुत्वा मरुत्तो नृपतिर्यज्ञमाहारयत् परम् ॥ २ ॥
राजा मरुत्तने जब यह सुना कि अंगिराके पुत्र बृहस्पतिजीने मनुष्यके यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा कर ली है, तब उन्होंने एक महान् यज्ञका आयोजन किया ॥ २ ॥
संकल्प्य मनसा यज्ञं करन्धमसुतात्मजः ।
बृहस्पतिमुपागम्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥
बातचीत करनेमें कुशल करन्धमपौत्र मरुत्तने मन-ही-मन यज्ञका संकल्प करके बृहस्पतिजीके पास जाकर उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३ ॥
भगवन् यन्मया पूर्वमभिगम्य तपोधन ।
कृतोऽभिसंधिर्यज्ञस्य भवतो वचनाद् गुरो ॥ ४ ॥
तमहं यष्टुमिच्छामि सम्भाराः सम्भृताश्च मे ।
याज्योऽस्मि भवतः साधो तत् प्राप्नुहि विधत्स्व च ॥ ५ ॥
‘भगवन्! तपोधन! गुरुदेव! मैंने पहले एक बार आकर जो आपसे यज्ञके विषयमें सलाह ली थी और आपने जिसके लिये मुझे आज्ञा दी थी, उस यज्ञको अब मैं प्रारम्भ करना चाहता हूँ। आपके कथनानुसार मैंने सब सामग्री एकत्र कर ली है। साधु पुरुष! मैं आपका पुराना यजमान भी हूँ। इसलिये चलिये, मेरा यज्ञ करा दीजिये’ ॥ ४-५ ॥
बृहस्पतिरुवाच
न कामये याजयितुं त्वामहं पृथिवीपते ।
वृतोऽस्मि देवराजेन प्रतिज्ञातं च तस्य मे ॥ ६ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**राजन्! अब मैं तुम्हारा यज्ञ कराना नहीं चाहता। देवराज इन्द्रने मुझे अपना पुरोहित बना लिया है और मैंने भी उनके सामने यह प्रतिज्ञा कर ली है ॥ ६ ॥
मरुत्त उवाच
पित्र्यमस्मि तव क्षेत्रं बहु मन्ये च ते भृशम् ।
तवास्मि याज्यतां प्राप्तो भजमानं भजस्व माम् ॥ ७ ॥
**मरुत्त बोले—**विप्रवर! मैं आपके पिताके समयसे ही आपका यजमान हूँ तथा विशेष सम्मान करता हूँ। आपका शिष्य हूँ और आपकी सेवामें तत्पर रहता हूँ। अतः मुझे अपनाइये ॥ ७ ॥
बृहस्पतिरुवाच
अमर्त्यं याजयित्वाहं याजयिष्ये कथं नरम् ।
मरुत्त गच्छ वा मा वा निवृत्तोऽस्म्यद्य याजनात् ॥ ८ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**मरुत्त! अमरोंका यज्ञ करानेके बाद मैं मरणधर्मा मनुष्योंका यज्ञ कैसे कराऊँगा? तुम जाओ या रहो। अब मैं मनुष्योंका यज्ञकार्य करानेसे निवृत्त हो गया हूँ ॥ ८ ॥
न त्वां याजयितास्म्यद्य वृणु यं त्वमिहेच्छसि ।
उपाध्यायं महाबाहो यस्ते यज्ञं करिष्यति ॥ ९ ॥
महाबाहो! मैं तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊँगा। तुम दूसरे जिसको चाहो उसीको अपना पुरोहित बना लो। जो तुम्हारा यज्ञ करायेगा ॥ ९ ॥
व्यास उवाच
एवमुक्तस्तु नृपतिर्मरुत्तो व्रीडितोऽभवत् ।
प्रत्यागच्छन् सुसंविग्नो ददर्श पथि नारदम् ॥ १० ॥
**व्यासजी कहते हैं—**राजन्! बृहस्पतिजीसे ऐसा उत्तर पाकर महाराज मरुत्तको बड़ा संकोच हुआ। वे बहुत खिन्न होकर लौटे जा रहे थे, उसी समय मार्गमें उन्हें देवर्षि नारदजीका दर्शन हुआ ॥ १० ॥
देवर्षिणा समागम्य नारदेन स पार्थिवः ।
विधिवत् प्राञ्जलिस्तस्थावथैनं नारदोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥
देवर्षि नारदके साथ समागम होनेपर राजा मरुत्त यथाविधि हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब नारदजीने उनसे कहा— ॥ ११ ॥
राजर्षे नातिहृष्टोऽसि कच्चित् क्षेमं तवानघ ।
क्व गतोऽसि कुतश्चेदमप्रीतिस्थानमागतम् ॥ १२ ॥
'राजर्षे! तुम अधिक प्रसन्न नहीं दिखायी देते हो। निष्पाप नरेश! तुम्हारे यहाँ कुशल तो है न? कहाँ गये थे और किस कारण तुम्हें यह खेदका अवसर प्राप्त हुआ है? ॥ १२ ॥
श्रोतव्यं चेन्मया राजन् ब्रूहि मे पार्थिवर्षभ ।
व्यपनेष्यामि ते मन्युं सर्वयत्नैर्नराधिप ॥ १३ ॥
'राजन्! नृपश्रेष्ठ! यदि मेरे सुनने योग्य हो तो बताओ। नरेश्वर! मैं पूर्ण यत्न करके तुम्हारा दुःख दूर करूँगा' ।। १३ ।।
एवमुक्तो मरुत्तः स नारदेन महर्षिणा ।
विप्रलम्भमुपाध्यायात् सर्वमेव न्यवेदयत् ।। १४ ।।
महर्षि नारदके ऐसा कहनेपर राजा मरुत्तने उपाध्याय (पुरोहित)-से बिछोह होनेका सारा समाचार उन्हें कह सुनाया ।। १४ ।।
मरुत्त उवाच
गतोऽस्म्यङ्गिरसः पुत्रं देवाचार्यं बृहस्पतिम् ।
यज्ञार्थमृत्विजं द्रष्टुं स च मां नाभ्यनन्दत ।। १५ ।।
मरुत्तने कहा—नारदजी! मैं अंगिराके पुत्र देवगुरु बृहस्पतिके पास गया था। मेरी यात्राका उद्देश्य यह था कि उन्हें अपना यज्ञ करानेके लिये ऋत्विज्के रूपमें देखूँ; किंतु उन्होंने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की ।। १५ ।।
प्रत्याख्यातश्च तेनाहं जीवितुं नाद्य कामये ।
परित्यक्तश्च गुरुणा दूषितश्चास्मि नारद ।। १६ ।।
नारदजी! मेरे गुरुने मुझपर मरणधर्मा मनुष्य होनेका दोष लगाकर मुझे त्याग दिया। उनके द्वारा इस प्रकार अस्वीकार किये जानेके कारण अब मैं जीवित रहना नहीं चाहता ।। १६ ।।
व्यास उवाच
एवमुक्तस्तु राज्ञा स नारदः प्रत्युवाच ह ।
आविक्षितं महाराज वाचा संजीवयन्निव ।। १७ ।।
व्यासजी कहते हैं—महाराज! राजा मरुत्तके ऐसा कहनेपर देवर्षि नारदने अपनी अमृतमयी वाणीके द्वारा अविक्षित्कुमारको जीवन प्रदान करते हुए-से कहा ।। १७ ।।
नारद उवाच
राजन्नङ्गिरसः पुत्रः संवर्तो नाम धार्मिकः ।
चङ्क्रमीति दिशः सर्वा दिग्वासा मोहयन् प्रजाः ।। १८ ।।
तं गच्छ यदि याज्यं त्वां न वाञ्छति बृहस्पतिः ।
प्रसन्नस्त्वां महातेजाः संवर्तो याजयिष्यति ।। १९ ।।
नारदजी बोले—राजन्! अंगिराके दूसरे पुत्र संवर्त बड़े धार्मिक हैं। वे दिगम्बर होकर प्रजाको मोहमें डालते हुए अर्थात् सबसे छिपे रहकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते रहते हैं। यदि बृहस्पति तुम्हें अपना यजमान बनाना नहीं चाहते तो तुम संवर्तके ही पास चले जाओ। संवर्त बड़े तेजस्वी हैं, वे प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा यज्ञ करा देंगे ।। १८-१९ ।।
मरुत्त उवाच
संजीवितोऽहं भवता वाक्येनानेन नारद ।
पश्येयं क्व नु संवर्तं शंस मे वदतां वर ॥ २० ॥
कथं च तस्मै वर्तेयं कथं मां न परित्यजेत् ।
प्रत्याख्यातश्च तेनापि नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ २१ ॥
**मरुत्त बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजी! आपने यह बात बताकर मुझे जिला दिया। अब यह बताइये कि मैं संवर्त मुनिका दर्शन कहाँ कर सकूँगा? मुझे उनके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये? मैं कैसा व्यवहार करूँ, जिससे वे मेरा परित्याग न करें। यदि उन्होंने भी मेरी प्रार्थना ठुकरा दी तब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा ॥ २०-२१ ॥
नारद उवाच
उन्मत्तवेषं बिभ्रत् स चङ्क्रमीति यथासुखम् ।
वाराणस्यां महाराज दर्शनेप्सुर्महेश्वरम् ॥ २२ ॥
**नारदजीने कहा—**महाराज! वे इस समय वाराणसीमें महेश्वर विश्वनाथके दर्शनकी इच्छासे पागलका-सा वेष धारण किये अपनी मौजसे घूम रहे हैं ॥ २२ ॥
तस्या द्वारं समासाद्य न्यसेथाः कुणपं क्वचित् ।
तं दृष्ट्वा यो निवर्तेत संवर्तः स महीपते ॥ २३ ॥