महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान्को दान देनेका विशेष फल
षष्टितमोऽध्यायः
श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान्को दान देनेका विशेष फल
युधिष्ठिर उवाच
यौ च स्यातां चरणेनोपपन्नौ
यौ विद्यया सदृशौ जन्मना च ।
ताभ्यां दानं कतमस्मै विशिष्ट-
मयाचमानाय च याचते च ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! उत्तम आचरण, विद्या और कुलमें एक समान प्रतीत होनेवाले दो ब्राह्मणोंमेंसे यदि एक याचक हो और दूसरा अयाचक तो किसको दान देनेसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
श्रेयो वै याचतः पार्थ दानमाहुरयाचते ।
अर्हत्तमो वै धृतिमान् कृपणादधृतात्मनः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! याचना करनेवालेकी अपेक्षा याचना न करनेवालेको दिया हुआ दान ही श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी बताया गया है तथा अधीर हृदयवाले कृपण मनुष्यकी अपेक्षा धैर्य धारण करनेवाला ही विशेष सम्मानका पात्र है ॥ २ ॥
क्षत्रियो रक्षणधृतिर्ब्राह्मणोऽनर्थनाधृतिः ।
ब्राह्मणो धृतिमान् विद्वान् देवान् प्रीणाति तुष्टिमान् ॥ ३ ॥
रक्षाके कार्यमें धैर्य धारण करनेवाला क्षत्रिय और याचना न करनेमें दृढ़ता रखनेवाला ब्राह्मण श्रेष्ठ है। जो ब्राह्मण धीर, विद्वान् और संतोषी होता है, वह देवताओंको अपने व्यवहारसे संतुष्ट करता है ॥ ३ ॥
याच्यमाहुरनीशस्य अभिहारं च भारत ।
उद्वेजयन्ति याचन्ति सदा भूतानि दस्युवत् ॥ ४ ॥
भारत! दरिद्रकी याचना उसके लिये तिरस्कारका कारण मानी गयी है; क्योंकि याचक प्राणी लुटेरोंकी भाँति सदा लोगोंको उद्विग्न करते रहते हैं ॥ ४ ॥
म्रियते याचमानो वै न जातु म्रियते ददत् ।
ददत् संजीवयत्येनमात्मानं च युधिष्ठिर ॥ ५ ॥
याचक मर जाता है, किंतु दाता कभी नहीं मरता। युधिष्ठिर! दाता इस याचकको और अपनेको भी जीवित रखता है ॥ ५ ॥
आनृशंस्यं परो धर्मो याचते यत् प्रदीयते ।
अयाचतः सीदमानान् सर्वोपायैर्निमन्त्रयेत् ॥ ६ ॥
याचकको जो दान दिया जाता है, वह दयारूप परम धर्म है, परंतु जो लोग क्लेश उठाकर भी याचना नहीं करते, उन ब्राह्मणोंको प्रत्येक उपायसे अपने पास बुलाकर दान देना चाहिये ॥ ६ ॥
यदि वै तादृशा राष्ट्रान् वसेयुस्ते द्विजोत्तमाः ।
भस्मच्छन्नानिवाग्नींस्तान् बुध्येथास्त्वं प्रयत्नतः ॥ ७ ॥
यदि तुम्हारे राज्यके भीतर वैसे श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते हों तो वे राखमें छिपी हुई आगके समान हैं। तुम्हें प्रयत्नपूर्वक ऐसे ब्राह्मणोंका पता लगाना चाहिये ॥ ७ ॥
तपसा दीप्यमानास्ते दहेयुः पृथिवीमपि ।
अपूज्यमानाः कौरव्य पूजार्हास्तु तथाविधाः ॥ ८ ॥
कुरुनन्दन! तपस्यासे देदीप्यमान होनेवाले वे ब्राह्मण पूजित न होनेपर यदि चाहें तो सारी पृथ्वीको भी भस्म कर सकते हैं; अतः वैसे ब्राह्मण सदा ही पूजा करनेके योग्य हैं ॥ ८ ॥
पूज्या हि ज्ञानविज्ञानतपोयोगसमन्विताः ।
तेभ्य पूजां प्रयुञ्जीथा ब्राह्मणेभ्यः परंतप ॥ ९ ॥
परंतप! जो ब्राह्मण ज्ञान-विज्ञान, तपस्या और योगसे युक्त हैं, वे पूजनीय होते हैं। उन ब्राह्मणोंकी तुम्हें सदा पूजा करनी चाहिये ॥ ९ ॥
ददद् बहुविधान् दायानुपागच्छन्नयाचताम् ।
यदग्निहोत्रे सुहुते सायंप्रातर्भवेत् फलम् ॥ १० ॥
विद्यावेदव्रतवति तद्दानफलमुच्यते ।
जो याचना नहीं करते, उनके पास तुम्हें स्वयं जाकर नाना प्रकारके पदार्थ देने चाहिये। सायं और प्रातःकाल विधिपूर्वक अग्निहोत्र करनेसे जो फल मिलता है, वही वेदके विद्वान् और व्रतधारी ब्राह्मणको दान देनेसे भी मिलता है ॥ १० १/२ ॥
विद्यावेदव्रतस्नातानव्यपाश्रयजीविनः ॥ ११ ॥
गूढस्वाध्यायतपसो ब्राह्मणान् संशितव्रतान् ।
कृतैरावसथैर्हृद्यैः सप्रेष्यैः सपरिच्छदैः ॥ १२ ॥
निमन्त्रयेथाः कौरव्य कामैश्चान्यैर्द्विजोत्तमान् ।
कुरुनन्दन! जो विद्या और वेदव्रतमें निष्णात हैं, जो किसीके आश्रित होकर जीविका नहीं चलाते, जिनका स्वाध्याय और तपस्या गुप्त है तथा जो कठोर व्रतका पालन करनेवाले हैं, ऐसे उत्तम ब्राह्मणोंको तुम अपने यहाँ निमन्त्रित करो और उन्हें सेवक, आवश्यक सामग्री तथा अन्यान्य उपभोगकी वस्तुओंसे सम्पन्न मनोरम गृह बनवाकर दो ॥ ११-१२ १/२ ॥
अपि ते प्रतिगृह्णीयुः श्रद्धोपेतं युधिष्ठिर ॥ १३ ॥
कार्यमित्येव मन्वाना धर्मज्ञाः सूक्ष्मदर्शिनः ।
युधिष्ठिर! वे धर्मज्ञ तथा सूक्ष्मदर्शी ब्राह्मण तुम्हारे श्रद्धायुक्त दानको कर्तव्यबुद्धिसे किया हुआ मानकर अवश्य स्वीकार करेंगे ॥ १३ १/२ ॥
अपि ते ब्राह्मणा भुक्त्वा गताः सोद्धरणान् गृहान् ॥ १४ ॥
येषां दाराः प्रतीक्षन्ते पर्जन्यमिव कर्षकाः ।
जैसे किसान वर्षाकी बाट जोहते रहते हैं, उसी प्रकार जिनके घरकी स्त्रियाँ अन्नकी प्रतीक्षामें बैठी हों और बालकोंको यह कहकर बहला रही हों कि 'अब तुम्हारे बाबूजी भोजन लेकर आते ही होंगे'; क्या ऐसे ब्राह्मण तुम्हारे यहाँ भोजन करके अपने घरोंको गये हैं? ॥ १४ १/२ ॥
अन्नानि प्रातःसवने नियता ब्रह्मचारिणः ॥ १५ ॥
ब्राह्मणास्तात भुञ्जानास्त्रेताग्निं प्रीणयन्त्युत ।
तात! नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण यदि प्रातःकाल घरमें भोजन करते हैं तो तीनों अग्नियोंको तृप्त कर देते हैं ॥ १५ १/२ ॥
माध्यन्दिनं ते सवनं ददतस्तात वर्तताम् ॥ १६ ॥
गोहिरण्यानि वासांसि तेनेन्द्रः प्रीयतां तव ।
बेटा! दोपहरके समय जो तुम ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें गौ, सुवर्ण और वस्त्र प्रदान करते हो, इससे तुम्हारे ऊपर इन्द्रदेव प्रसन्न हों ॥ १६ १/२ ॥
तृतीयं सवनं ते वै वैश्वदेवं युधिष्ठिर ॥ १७ ॥
यद् देवेभ्यः पितृभ्यश्च विप्रेभ्यश्च प्रयच्छसि ।
युधिष्ठिर! तीसरे समयमें जो तुम देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंके उद्देश्यसे दान करते हो, वह विश्वेदेवोंको संतुष्ट करनेवाला होता है ॥ १७ १/२ ॥
अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः ॥ १८ ॥
दमस्त्यागो धृतिः सत्यं भवत्यवभृथाय ते ।
सब प्राणियोंके प्रति अहिंसाका भाव रखना, सबको यथायोग्य भाग अर्पण करना, इन्द्रियसंयम, त्याग, धैर्य और सत्य—ये सब गुण तुम्हें यज्ञान्तमें किये जानेवाले अवभृथ-स्नानका फल देंगे ॥ १८ १/२ ॥
एष ते विततो यज्ञः श्रद्धापूतः सदक्षिणः ॥ १९ ॥
विशिष्टः सर्वयज्ञानां नित्यं तात प्रवर्तताम् ॥ २० ॥
इस प्रकार जो तुम्हारे श्रद्धासे पवित्र एवं दक्षिणायुक्त यज्ञका विस्तार हो रहा है; यह सभी यज्ञोंसे बढ़कर है। तात युधिष्ठिर! तुम्हारा यह यज्ञ सदा चालू रहना चाहिये ॥ १९-२० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें साठवाँ अध्याय पूरा
हुआ ॥ ६० ॥