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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2393)

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व्यासजीके द्वारा कौरव-पाण्डव-पक्षके मरे हुए सम्बन्धियोंका सेनासहित परलोकसे आवाहन

विराटद्रुपदौ चैव सहपुत्रौ ससैनिकौ।
द्रौपदेयाश्च सौभद्रो राक्षसश्च घटोत्कचः॥ ८॥
पुत्रों और सैनिकोंसहित विराट और द्रुपद पानीसे बाहर आये। द्रौपदीके पाँचों पुत्र, अभिमन्यु तथा राक्षस घटोत्कच—ये सभी जलसे प्रकट हो गये॥ ८॥
कर्णदुर्योधनौ चैव शकुनिश्च महारथः।
दुःशासनादयश्चैव धार्तराष्ट्रा महाबलाः॥ ९॥
जारासंधिर्भगदत्तो जलसंधश्च वीर्यवान्।
भूरिश्रवाः शलः शल्यो वृषसेनश्च सानुजः॥ १०॥
लक्ष्मणो राजपुत्रश्च धृष्टद्युम्नस्य चात्मजाः।
शिखण्डिपुत्राः सर्वे च धृष्टकेतुश्च सानुजः॥ ११॥
अचलो वृषकश्चैव राक्षसश्चाप्यलायुधः।
बाह्लिकः सोमदत्तश्च चेकितानश्च पार्थिवः॥ १२॥
एते चान्ये च बहवो बहुत्वाद् ये न कीर्तिताः।
सर्वे भासुरदेहास्ते समुत्तस्थुर्जलात्ततः॥ १३॥
कर्ण, दुर्योधन, महारथी शकुनि, धृतराष्ट्रके पुत्र महाबली दुःशासन आदि, जरासन्धकुमार सहदेव, भगदत्त, पराक्रमी जलसन्ध, भूरिश्रवा, शल, शल्य, भाइयोंसहित वृषसेन, राजकुमार लक्ष्मण, धृष्टद्युम्नके पुत्र, शिखण्डीके सभी पुत्र, भाइयोंसहित धृष्टकेतु, अचल, वृषक, राक्षस अलायुध, राजा बाह्लिक, सोमदत्त और चेकितान—ये तथा दूसरे बहुत-से क्षत्रियवीर, जो संख्यामें अधिक होनेके कारण नाम लेकर नहीं बताये गये हैं, सभी देदीप्यमान शरीर धारण करके उस जलसे प्रकट हुए॥ ९—१३॥
यस्य वीरस्य यो वेषो यो ध्वजो यच्च वाहनम्।
तेन तेन व्यदृश्यन्त समुपेता नराधिपाः॥ १४॥
दिव्याम्बरधराः सर्वे सर्वे भ्राजिष्णुकुण्डलाः।
निर्वैरा निरहंकारा विगतक्रोधमत्सराः॥ १५॥
जिस वीरका जैसा वेष, जैसी ध्वजा और जैसा वाहन था, वह उसीसे युक्त दिखायी दिया। वहाँ प्रकट हुए सभी नरेश दिव्य वस्त्र धारण किये हुए थे। सबके कानोंमें चमकीले कुण्डल शोभा पाते थे। उस समय वे वैर, अहंकार, क्रोध और मात्सर्य छोड़ चुके थे॥ १४-१५॥
गन्धर्वैरुपगीयन्तः स्तूयमानाश्च वन्दिभिः।
दिव्यमाल्याम्बरधरा वृताश्चाप्सरसां गणैः॥ १६॥
गन्धर्व उनके गुण गाते और बन्दीजन स्तुति करते थे। उन सबने दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे और सभी अप्सराओंसे घिरे हुए थे॥ १६॥
धृतराष्ट्रस्य च तदा दिव्यं चक्षुर्नराधिप।

मुनिः सत्यवतीपुत्रः प्रीतः प्रादात् तपोबलात् ॥ १७ ॥
नरेश्वर! उस समय सत्यवतीनन्दन मुनिवर व्यासने प्रसन्न होकर अपने तपोबलसे धृतराष्ट्रको दिव्य नेत्र प्रदान किये ॥ १७ ॥

दिव्यज्ञानबलोपेता गान्धारी च यशस्विनी ।
ददर्श पुत्रांस्तान् सर्वान् ये चान्येऽपि मृधे हताः ॥ १८ ॥
यशस्विनी गान्धारी भी दिव्य ज्ञानबलसे सम्पन्न हो गयी थीं। उन दोनोंने युद्धमें मारे गये अपने पुत्रों तथा अन्य सब सम्बन्धियोंको देखा ॥ १८ ॥

तदद्भुतमचिन्त्यं च सुमहल्लोमहर्षणम् ।
विस्मितः स जनः सर्वो ददर्शानिमिषेक्षणः ॥ १९ ॥
वहाँ आये हुए सब लोग आश्चर्यचकित हो एकटक दृष्टिसे उस अद्भुत, अचिन्त्य एवं अत्यन्त रोमांचकारी दृश्यको देख रहे थे ॥ १९ ॥

तदुत्सवमहोदग्रं हृष्टनारीनराकुलम् ।
आश्चर्यभूतं ददृशे चित्रं पटगतं यथा ॥ २० ॥
वह हर्षोत्फुल्ल नर-नारियोंसे भरा हुआ महान् आश्चर्यजनक उत्सव कपड़ेपर अंकित किये गये चित्रकी भाँति दिखायी देता था ॥ २० ॥

धृतराष्ट्रस्तु तान् सर्वान् पश्यन् दिव्येन चक्षुषा ।
मुमुदे भरतश्रेष्ठ प्रसादात् तस्य वै मुनेः ॥ २१ ॥
भरतश्रेष्ठ! राजा धृतराष्ट्र मुनिवर व्यासकी कृपासे मिले हुए दिव्य नेत्रोंद्वारा अपने समस्त पुत्रों और सम्बन्धियोंको देखते हुए आनन्दमग्न हो गये ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि भीष्मादिदर्शने
द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें भीष्म आदिका दर्शनविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥