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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2160, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2160

नवमी पाटला ज्ञेया दशमी पुच्छपिङ्गला ।
दशैताः कपिलाः प्रोक्तास्तारयन्ति नरान् सदा ॥
‘ब्रह्माजीने कपिला गौके दस भेद बतलाये हैं। पहली स्वर्णकपिला१, दूसरी गौरपिंगला२, तीसरी आरक्तपिंगाक्षी३, चौथी गलपिंगला४, पाँचवीं बभ्रुवर्णाभा५, छठी श्वेतपिंगला६, सातवीं रक्तपिंगाक्षी७, आठवीं खुरपिंगला८, नवीं पाटला९ और दसवीं पुच्छपिंगला१०—ये दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी गयी हैं, जो सदा मनुष्योंका उद्धार करती हैं ।।
मङ्गल्याश्च पवित्राश्च सर्वपापप्रणाशनाः ।
एवमेव ह्यनड्वाहो दश प्रोक्ता नरेश्वर ॥
‘नरेश्वर! वे मंगलमयी, पवित्र और सब पापोंको नष्ट करनेवाली हैं। गाड़ी खींचनेवाले बैलोंके भी ऐसे ही दस भेद बताये गये हैं ।।
ब्राह्मणो वाहयेत् तांस्तु नान्यो वर्णः कथंचन ।
न वाहयेच्च कपिलां क्षेत्रे वाध्वनि वा द्विजः ॥
‘उन बैलोंको ब्राह्मण ही अपनी सवारीमें जोते। दूसरे वर्णका मनुष्य उनसे सवारीका काम किसी प्रकार भी न ले। ब्राह्मण भी कपिला गौको खेतमें या रास्तेमें न जोते ।।
वाहयेद् हुङ्कृतेनैव शाखया वा सपत्नया ।
न दण्डेन न वा यष्ट्या न पाशेन न वा पुनः ॥
‘गाड़ीमें जुते रहनेपर उन बैलोंको हुंकारकी आवाज देकर अथवा पत्तेवाली टहनीसे हाँके। डंडेसे, छड़ीसे और रस्सीसे मारकर न हाँके ।।
न क्षुत्तृष्णाश्रमश्रान्तान् वाहयेद् विकलेन्द्रियान् ।
अतृप्तेषु न भुञ्जीयात् पिबेत् पीतेषु चोदकम् ॥
‘जब बैल भूख-प्यास और परिश्रमसे थके हुए हों तथा उनकी इन्द्रियाँ घबरायी हुई हों, तब उन्हें गाड़ीमें न जोते। जबतक बैलोंको खिलाकर तृप्त न कर ले तबतक स्वयं भी भोजन न करे। उन्हें पानी पिलाकर ही स्वयं जलपान करे ।।
शुश्रूषोर्मातरश्चैताः पितरस्ते प्रकीर्तिताः ।
अहं पूर्वत्र भागे च धुर्याणां वाहनं स्मृतम् ॥
‘सेवा करनेवाले पुरुषकी कपिला गौएँ माता और बैल पिता हैं। दिनके पहले भागमें ही भार ढोनेवाले बैलोंको सवारीमें जोतना उचित माना गया है ।। ’
विश्रामेन्मध्यमे भागे भागे चान्ते यथासुखम् ।
यत्र च त्वरया कृत्यं संशयो यत्र वाध्वनि ।
वाहयेत् तत्र धुर्यांस्तु न स पापेन लिप्यते ॥