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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2162, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2162

उस पुण्यके प्रभावसे वह मेरे लोकमें जाता है ।।
अग्निष्टोमसहस्रस्य वाजपेयं च तत्समम् ।
वाजपेयसहस्रस्य अश्वमेधं च तत्समम् ।
अश्वमेधसहस्रस्य राजसूयं च तत्समम् ।।
‘एक हजार अग्निष्टोमके समान एक वाजपेय-यज्ञ होता है। एक हजार वाजपेयके समान एक अश्वमेध होता है और एक हजार अश्वमेधके समान एक राजसूय-यज्ञ होता है ।।
कपिलानां सहस्रेण विधिदत्तेन पाण्डव ।
राजसूयफलं प्राप्य मम लोके महीयते ।
न तस्य पुनरावृत्तिर्विद्यते कुरुपुङ्गव ।।
‘कुरुश्रेष्ठ पाण्डव! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे एक हजार कपिला गौओंका दान करता है, वह राजसूय-यज्ञका फल पाकर मेरे परमधाममें प्रतिष्ठित होता है; उसे पुनः इस लोकमें नहीं लौटना पड़ता ।।
तैस्तैर्गुणैः कामदुधा च भूत्वा
नरं प्रदातारमुपैति सा गौः ।
स्वकर्मभिश्चाप्यनुबध्यमानं
तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम् ।
महार्णवे नौरिव वायुनीता
दत्ता हि गौस्तारयते मनुष्यम् ।।
‘दानमें दी हुई गौ अपने विभिन्न गुणोंद्वारा कामधेनु बनकर परलोकमें दाताके पास पहुँचती है। वह अपने कर्मोंसे बँधकर घोर अन्धकारपूर्ण नरकमें गिरते हुए मनुष्यका उसी प्रकार उद्धार कर देती है, जैसे वायुके सहारेसे चलती हुई नाव मनुष्यको महासागरमें डूबनेसे बचाती है ।।
यथौषधं मन्त्रकृतं नरस्य
प्रयुक्तमात्रं विनिहन्ति रोगान् ।
तथैव दत्ता कपिला सुपात्रे
पापं नरस्याशु निहन्ति सर्वम् ।।
‘जैसे मन्त्रके साथ दी हुई ओषधि प्रयोग करते ही मनुष्यके रोगोंका नाश कर देती है, उसी प्रकार सुपात्रको दी हुई कपिला गौ मनुष्यके सब पापोंको तत्काल नष्ट कर डालती है ।।
यथा त्वचं वै भुजगो विहाय
पुनर्नवं रूपमुपैति पुण्यम् ।
तथैव मुक्तः पुरुषः स्वपापै-
र्विरज्यते वै कपिलाप्रदानात् ।।