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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2516)

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देवदूतका युधिष्ठिरको मायामय नरकका दर्शन कराना

स तं दुर्गन्धमालक्ष्य देवदूतमुवाच ह ।
कियदध्वानमस्माभिर्गन्तव्यमिदमीदृशम् ॥ २६ ॥
क्व च ते भ्रातरो मह्यं तन्ममाख्यातुमर्हसि ।
देशोऽयं कश्च देवानामेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ २७ ॥
वहाँकी दुर्गन्धका अनुभव करके उन्होंने देवदूतसे पूछा—‘भैया! ऐसे रास्तेपर अभी हमलोगोंको कितनी दूर और चलना है? तथा मेरे वे भाई कहाँ हैं? यह तुम्हें मुझे बता देना चाहिये। देवताओंका यह कौन-सा देश है, इस बातको मैं जानना चाहता हूँ’ ॥ २६-२७ ॥

स संनिवृत्ते श्रुत्वा धर्मराजस्य भाषितम् ।
देवदूतोऽब्रवीच्चैनमेतावद् गमनं तव ॥ २८ ॥
धर्मराजकी यह बात सुनकर देवदूत लौट पड़ा और बोला—‘बस, यहींतक आपको आना था ॥ २८ ॥

निवर्तितव्यो हि मया तथास्म्युक्तो दिवौकसैः ।
यदि श्रान्तोऽसि राजेन्द्र त्वमथागन्तुमर्हसि ॥ २९ ॥
‘महाराज! देवताओंने मुझसे कहा है कि जब युधिष्ठिर थक जायँ तब उन्हें वापस लौटा लाना; अतः अब मुझे आपको लौटा ले चलना है। यदि आप थक गये हों तो मेरे साथ आइये’ ॥ २९ ॥

युधिष्ठिरस्तु निर्विण्णस्तेन गन्धेन मूर्च्छितः ।
निवर्तने धृतमनाः पर्यावर्तत भारत ॥ ३० ॥
भरतनन्दन! युधिष्ठिर वहाँकी दुर्गन्धसे घबरा गये थे। उन्हें मूर्च्छा-सी आने लगी थी। इसलिये उन्होंने मनमें लौट जानेका ही निश्चय किया और उस निश्चयके अनुसार वे लौट पड़े ॥ ३० ॥

स संनिवृत्तो धर्मात्मा दुःखशोकसमाहतः ।
शुश्राव तत्र वदतां दीना वाचः समन्ततः ॥ ३१ ॥
दुःख और शोकसे पीड़ित हुए धर्मात्मा युधिष्ठिर ज्यों ही वहाँसे लौटने लगे त्यों ही उन्हें चारों ओरसे पुकारनेवाले आर्त मनुष्योंकी दीन वाणी सुनायी पड़ी— ॥ ३१ ॥

भो भो धर्मज राजर्षे पुण्याभिजन पाण्डव ।
अनुग्रहार्थमस्माकं तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ॥ ३२ ॥
‘हे धर्मनन्दन! हे राजर्षे! हे पवित्र कुलमें उत्पन्न पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर! आप हमलोगोंपर कृपा करनेके लिये दो घड़ीतक यहीं ठहरिये ॥ ३२ ॥

आयाति त्वयि दुर्धर्षे वाति पुण्यः समीरणः ।
तव गन्धानुगस्तात येनास्मान् सुखमागमत् ॥ ३३ ॥
‘आप दुर्धर्ष महापुरुषके आते ही परम पवित्र हवा चलने लगी है। तात! वह हवा आपके शरीरकी सुगन्ध लेकर आ रही है जिससे हमलोगोंको बड़ा सुख मिला है ॥ ३३ ॥

ते वयं पार्थ दीर्घस्य कालस्य पुरुषर्षभ ।
सुखमासादयिष्यामस्त्वां दृष्ट्वा राजसत्तम ॥ ३४ ॥
‘पुरुषप्रवर! कुन्तीकुमार! नृपश्रेष्ठ! आज दीर्घकालके पश्चात् आपका दर्शन पाकर हम सुखका अनुभव करेंगे ॥ ३४ ॥

संतिष्ठस्व महाबाहो मुहूर्तपि भारत ।
त्वयि तिष्ठति कौरव्य यातानास्मान् न बाधते ॥ ३५ ॥
‘महाबाहु भरतनन्दन! हो सके तो दो घड़ी भी ठहर जाइये । कुरुनन्दन! आपके रहनेसे यहाँकी यातना हमें कष्ट नहीं दे रही है’ ॥ ३५ ॥

एवं बहुविधा वाचः कृपणा वेदनावताम् ।
तस्मिन् देशे स शुश्राव समन्ताद् वदतां नृप ॥ ३६ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार वहाँ कष्ट पानेवाले दुखी प्राणियोंके भाँति-भाँतिके दीन वचन उस प्रदेशमें उन्हें चारों ओरसे सुनायी देने लगे ॥ ३६ ॥

तेषां तु वचनं श्रुत्वा दयावान् दीनभाषिणाम् ।
अहो कृच्छ्रमिति प्राह तस्थौ स च युधिष्ठिरः ॥ ३७ ॥
दीनतापूर्ण वचन कहनेवाले उन प्राणियोंकी बातें सुनकर दयालु राजा युधिष्ठिर वहाँ खड़े हो गये। उनके मुँहसे सहसा निकल पड़ा—‘अहो! इन बेचारोंको बड़ा कष्ट है’ ॥ ३७ ॥

स ता गिरः पुरस्ताद् वै श्रुतपूर्वा पुनः पुनः ।
ग्लानानां दुःखितानां च नाभ्यजानात् पाण्डवः ॥ ३८ ॥
महान् कष्ट और दुःखमें पड़े हुए प्राणियोंकी वे ही पहलेकी सुनी हुई करुणाजनक बातें सामनेकी ओरसे बारंबार उनके कानोंमें पड़ने लगीं तो भी वे पाण्डुकुमार उन्हें पहचान न सके ॥ ३८ ॥

अबुध्यमानस्ता वाचो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
उवाच के भवन्तो वै किमर्थमिह तिष्ठथ ॥ ३९ ॥
उनकी वे बातें पूर्णरूपसे न समझकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने पूछा—‘आपलोग कौन हैं और किसलिये यहाँ रहते हैं?’ ॥ ३९ ॥

इत्युक्तास्ते ततः सर्वे समन्तादवभाषिरे ।
कर्णोऽहं भीमसेनोऽहमर्जुनोऽहमिति प्रभो ॥ ४० ॥
नकुलः सहदेवोऽहं धृष्टद्युम्नोऽहमित्युत ।
द्रौपदी द्रौपदेयाश्च इत्येवं ते विचुक्रुशुः ॥ ४१ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर वे सब चारों ओरसे बोलने लगे—‘प्रभो! मैं कर्ण हूँ। मैं भीमसेन हूँ। मैं अर्जुन हूँ। मैं नकुल हूँ। मैं सहदेव हूँ। मैं धृष्टद्युम्न हूँ। मैं द्रौपदी हूँ और

हमलोग द्रौपदीके पुत्र हैं।' इस प्रकार वे सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर अपना-अपना नाम

बताने लगे ।। ४०-४१ ।।

ता वाचः स तदा श्रुत्वा तद्देशसदृशीर्नृप ।

ततो विममृशे राजा किं त्विदं दैवकारितम् ।। ४२ ।।

नरेश्वर! उस देशके अनुरूप उन बातोंको सुनकर राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन विचार

करने लगे कि दैव-का यह कैसा विधान है ।। ४२ ।।

किं तु तत् कलुषं कर्म कृतमेभिर्महात्मभिः ।

कर्णेन द्रौपदेयैर्वा पाञ्चाल्या वा सुमध्यया ।। ४३ ।।

य इमे पापगन्धेऽस्मिन् देशे सन्ति सुदारुणे ।

नाहं जानामि सर्वेषां दुष्कृतं पुण्यकर्मणाम् ।। ४४ ।।

'मेरे इन महामना भाइयोंने, कर्णने, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंने अथवा स्वयं सुमध्यमा

द्रौपदीने भी कौन-सा ऐसा पाप किया था जिससे ये लोग इस दुर्गन्धपूर्ण भयंकर स्थानमें

निवास करते हैं। इन समस्त पुण्यात्मा पुरुषोंने कभी कोई पाप किया था, इसे मैं नहीं

जानता ।। ४३-४४ ।।

किं कृत्वा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो राजा सुयोधनः ।

तथा श्रिया युतः पापैः सह सर्वैः पदानुगैः ।। ४५ ।।

'धृतराष्ट्रका पुत्र राजा सुयोधन कौन-सा पुण्यकर्म करके अपने समस्त पापी सेवकोंके

साथ वैसी अद्भुत शोभा और सम्पत्तिसे संयुक्त हुआ है? ।। ४५ ।।

महेन्द्र इव लक्ष्मीवानास्ते परमपूजितः ।

कस्येदानीं विकारोऽयं य इमे नरकं गताः ।। ४६ ।।

'वह तो यहाँ अत्यन्त सम्मानित होकर महेन्द्रके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न हुआ है।

इधर यह किस कर्मका फल है कि मेरे सगे-सम्बन्धी नरकमें पड़े हुए हैं? ।।

सर्वधर्मविदः शूराः सत्यागमपरायणाः ।

क्षत्रधर्मरताः सन्तो यज्वानो भूरिदक्षिणाः ।। ४७ ।।

'मेरे भाई सम्पूर्ण धर्मके ज्ञाता, शूरवीर, सत्यवादी तथा शास्त्रके अनुकूल चलनेवाले थे।

इन्होंने क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहकर बड़े-बड़े यज्ञ किये और बहुत-सी दक्षिणाएँ दी हैं (तथापि

इनकी ऐसी दुर्गति क्यों हुई)? ।। ४७ ।।

किं नु सुप्तोऽस्मि जागर्मि चेतयामि न चेतये ।

अहो चित्तविकारोऽयं स्याद् वा मे चित्तविभ्रमः ।। ४८ ।।

'क्या मैं सोता हूँ या जागता हूँ? मुझे चेत है या नहीं? अहो! यह मेरे चित्तका विकार तो

नहीं है, अथवा हो सकता है यह मेरे मनका भ्रम हो' ।। ४८ ।।

एवं बहुविधं राजा विममर्श युधिष्ठिरः ।

दुःखशोकसमाविष्टश्चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियः ।। ४९ ।।

दुःख और शोकके आवेशसे युक्त हो राजा युधिष्ठिर इस तरह नाना प्रकारसे विचार करने लगे। उस समय उनकी सारी इन्द्रियाँ चिन्तासे व्याकुल हो गयी थीं ॥ ४९ ॥

क्रोधमाहारयच्चैव तीव्रं धर्मसुतो नृपः ।
देवांश्च गर्हयामास धर्मं चैव युधिष्ठिरः ॥ ५० ॥
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके मनमें तीव्र रोष जाग उठा। वे देवताओं और धर्मको कोसने लगे ॥ ५० ॥

स तीव्रगन्धसंतप्तो देवदूतमुवाच ह ।
गम्यतां तत्र येषां त्वं दूतस्तेषामुपान्तिकम् ॥ ५१ ॥
न ह्यहं तत्र यास्यामि स्थितोऽस्मीति निवेद्यताम् ।
मत्संश्रयादिमे दूताः सुखिनो भ्रातरो हि मे ॥ ५२ ॥
उन्होंने वहाँकी दुःसह दुर्गन्धसे संतप्त होकर देवदूतसे कहा—'तुम जिनके दूत हो उनके पास लौट जाओ। मैं वहाँ नहीं चलूँगा। यहीं ठहर गया हूँ, अपने मालिकोंको इसकी सूचना दे देना। यहाँ ठहरनेका कारण यह है कि मेरे निकट रहनेसे यहाँ मेरे इन दुखी भाई-बन्धुओंको सुख मिलता है' ॥ ५१-५२ ॥

इत्युक्तः स तदा दूतः पाण्डुपुत्रेण धीमता ।
जगाम तत्र यत्रास्ते देवराजः शतक्रतुः ॥ ५३ ॥
बुद्धिमान् पाण्डुपुत्रके ऐसा कहनेपर देवदूत उस समय उस स्थानको चला गया जहाँ सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्र विराजमान थे ॥ ५३ ॥

निवेदयामास च तद् धर्मराजचिकीर्षितम् ।
यथोक्तं धर्मपुत्रेण सर्वमेव जनाधिप ॥ ५४ ॥
नरेश्वर! दूतने वहाँ धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं और यह भी निवेदन कर दिया कि वे क्या करना चाहते हैं ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि युधिष्ठिरनरकदर्शने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्वर्गारोहणपर्वमें युधिष्ठिरको नरकका दर्शनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥