महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1079)
इन्द्रका भगवान् विष्णुके साथ प्रश्नोत्तर
इस तरह इन सबकी पूजा करनेसे मैं महामना मनुष्योंपर संतुष्ट होता हूँ। जो मेरी पूजा करेंगे, उनका कभी पराभव नहीं होगा ॥ १३ ॥
अपि वा ब्राह्मणं दृष्ट्वा ब्रह्मचारिणमागतम् ।
ब्राह्मणाग्र्याहुतिं दत्त्वा अमृतं तस्य भोजनम् ॥ १४ ॥
'ब्रह्मचारी ब्राह्मणको घरपर आया देख गृहस्थ पुरुष ब्राह्मणको प्रथम भोजन कराये, तत्पश्चात् स्वयं अवशिष्ट अन्नको ग्रहण करे तो उसका वह भोजन अमृतके समान माना गया है ॥ १४ ॥
ऐन्द्रीं संध्यामुपासित्वा आदित्याभिमुखः स्थितः ।
सर्वतीर्थेषु स स्नातो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ १५ ॥
'जो प्रातःकालकी संध्या करके सूर्यके सम्मुख खड़ा होता है, उसे समस्त तीर्थोंमें स्नानका फल मिलता है और वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ १५ ॥
एतद् वः कथितं गुह्यमखिलेन तपोधनाः ।
संशयं पृच्छमानानां किं भूयः कथयाम्यहम् ॥ १६ ॥
'तपोधनो! तुमलोगोंने जो संशय पूछा है, उसके समाधानके लिये मैंने यह सारा गूढ़ रहस्य तुम्हें बताया है। बताओ और क्या कहूँ' ॥ १६ ॥
बलदेव उवाच
श्रूयतां परमं गुह्यं मानुषाणां सुखावहम् ।
अजानन्तो यदबुधाः क्लिश्यन्ते भूतपीडिताः ॥ १७ ॥
**बलदेवजीने कहा—**जो मनुष्योंको सुख देनेवाला है तथा मूर्ख मानव जिसे न जाननेके कारण भूतोंसे पीड़ित हो नाना प्रकारके कष्ट उठाते रहते हैं, वह परम गोपनीय विषय मैं बता रहा हूँ; उसे सुनो ॥ १७ ॥
कल्य उत्थाय यो मर्त्यः स्पृशेद् गां वै घृतं दधि ।
सर्षपं च प्रियङ्गुं च कल्मषात् प्रतिमुच्यते ॥ १८ ॥
जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर गाय, घी, दही, सरसों और राईका स्पर्श करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है ॥ १८ ॥
भूतानि चैव सर्वाणि अग्रतः पृष्ठतोऽपि वा ।
उच्छिष्टं वापि छिद्रेषु वर्जयन्ति तपोधनाः ॥ १९ ॥
तपस्वी पुरुष आगे या पीछेसे आनेवाले सभी हिंसक जन्तुओंको त्याग देते—उन्हें छोड़कर दूर हट जाते हैं। इसी प्रकार संकटके समय भी वे उच्छिष्ट वस्तुका सदा परित्याग ही करते हैं ॥ १९ ॥
देवा ऊचुः
प्रगृह्यौदुम्बरं पात्रं तोयपूर्णमुदङ्मुखः ।
उपवासं तु गृह्णीयाद् यद् वा संकल्पयेद् व्रतम् ॥ २० ॥
देवता बोले— मनुष्य जलसे भरा हुआ ताँबेका पात्र लेकर उत्तराभिमुख हो उपवासका नियम ले अथवा और किसी व्रतका संकल्प करे ॥ २० ॥
देवतास्तस्य तुष्यन्ति कामिकं चापि सिध्यति ।
अन्यथा हि वृथा मर्त्याः कुर्वते स्वल्पबुद्धयः ॥ २१ ॥
जो ऐसा करता है, उसके ऊपर देवता संतुष्ट होते हैं और उसकी सारी मनोवांछा सिद्ध हो जाती है; परन्तु मंदबुद्धि मानव ऐसा न करके व्यर्थ दूसरे-दूसरे कार्य किया करते हैं ॥ २१ ॥
उपवासे बलौ चापि ताम्रपात्रं विशिष्यते ।
बलिर्भिक्षा तथार्घ्यं च पितॄणां च तिलोदकम् ॥ २२ ॥
ताम्रपात्रेण दातव्यमन्यथाल्पफलं भवेत् ।
गुह्यमेतत् समुद्दिष्टं यथा तुष्यन्ति देवताः ॥ २३ ॥
उपवासका संकल्प लेने और पूजाका उपचार समर्पित करनेमें ताम्रपात्रको उत्तम माना गया है। पूजन-सामग्री, भिक्षा, अर्घ्य तथा पितरोंके लिये तिल-मिश्रित जल ताम्रपात्रके द्वारा देने चाहिये अन्यथा उनका फल बहुत थोड़ा होता है। यह अत्यन्त गोपनीय बात बतायी गयी है। इसके अनुसार कार्य करनेसे देवता संतुष्ट होते हैं ॥ २२-२३ ॥
धर्म उवाच
राजपौरुषिके विप्रे घण्टिके परिचारिके ।
गोरक्षके वाणिजके तथा कारुकुशीलवे ॥ २४ ॥
मित्रद्रुह्यनधीयाने यश्च स्याद् वृषलीपतिः ।
एतेषु दैवं पित्र्यं वा न देयं स्यात् कथंचन ॥ २५ ॥
पिण्डदास्तस्य हीयन्ते न च प्रीणाति वै पितॄन् ।
धर्मने कहा— ब्राह्मण यदि राजाका कर्मचारी हो, वेतन लेकर घण्टा बजानेका काम करता हो, दूसरोंका सेवक हो, गोरक्षा एवं वाणिज्यका व्यवसाय करता हो, शिल्पी या नट हो, मित्रद्रोही हो, वेद न पढ़ा हो अथवा शूद्र जातिकी स्त्रीका पति हो, ऐसे लोगोंको किसी तरह भी देवकार्य (यज्ञ) और पितृकार्य (श्राद्ध) का अन्न आदि नहीं देना चाहिये। जो इन्हें पिण्ड या अन्न देते हैं, उनकी अवनति होती है तथा उनके पितरोंको भी तृप्ति नहीं होती ॥ २४-२५½ ॥
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते ॥ २६ ॥
पितरस्तस्य देवाश्च अग्नयश्च तथैव हि ।
निराशाः प्रतिगच्छन्ति अतिथेरप्रतिग्रहात् ॥ २७ ॥
जिसके घरसे अतिथि निराश लौट जाता है, उसके यहाँसे अतिथिका सत्कार न होनेके कारण देवता, पितर तथा अग्नि भी निराश लौट जाते हैं ।। २६-२७ ।।
स्त्रीघ्नैर्गोघ्नैः कृतघ्नैश्च ब्रह्मघ्नैर्गुरुतल्पगैः ।
तुल्यदोषो भवत्येभिर्यस्यातिथिर्नार्चितः ।। २८ ।।
जिसके यहाँ अतिथिका सत्कार नहीं होता, उस पुरुषको स्त्रीहत्यारों, गोघातकों, कृतघ्नों, ब्रह्मघातियों और गुरुपत्नीगामियोंके समान पाप लगता है ।। २८ ।।
अग्निरुवाच
पादमुद्यम्य यो मर्त्यः स्पृशेद् गाश्च सुदुर्मतिः ।
ब्राह्मणं वा महाभागं दीप्यमानं तथानलम् ।। २९ ।।
तस्य दोषान् प्रवक्ष्यामि तच्छृणुध्वं समाहिताः ।
अग्नि बोले— जो दुर्बुद्धि मनुष्य लात उठाकर उससे गौका, महाभाग ब्राह्मणका अथवा प्रज्वलित अग्निका स्पर्श करता है, उसके दोष बता रहा हूँ, सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। २९ १/२ ।।
दिवं स्पृशत्यशब्दोऽस्य त्रस्यन्ति पितरश्च वै ।। ३० ।।
वैमनस्यं च देवानां कृतं भवति पुष्कलम् ।
पावकश्च महातेजा हव्यं न प्रतिगृह्णति ।। ३१ ।।
ऐसे मनुष्यकी अपकीर्ति स्वर्गतक फैल जाती है। उसके पितर भयभीत हो उठते हैं। देवताओंमें भी उसके प्रति भारी वैमनस्य हो जाता है तथा महातेजस्वी पावक उसके दिये हुए हविष्यको नहीं ग्रहण करते हैं ।। ३०-३१ ।।
आजन्मनां शतं चैव नरके पच्यते तु सः ।
निष्कृतिं च न तस्यापि अनुमन्यन्ति कर्हिचित् ।। ३२ ।।
वह सौ जन्मोंतक नरकमें पकाया जाता है। ऋषिगण कभी उसके उद्धारका अनुमोदन नहीं करते हैं ।।
तस्माद् गावो न पादेन स्प्रष्टव्या वै कदाचन ।
ब्राह्मणश्च महातेजा दीप्यमानस्तथानलः ।। ३३ ।।
श्रद्दधानेन मर्त्येन आत्मनो हितमिच्छता ।
एते दोषा मया प्रोक्तास्त्रिषु यः पादमुत्सृजेत् ।। ३४ ।।
इसलिये अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु पुरुषको गौओंका, महातेजस्वी ब्राह्मणका तथा प्रज्वलित अग्निका भी कभी पैरसे स्पर्श नहीं करना चाहिये। जो इन तीनोंपर पैर उठाता है, उसे प्राप्त होनेवाले इन दोषोंका मैंने वर्णन किया है ।। ३३-३४ ।।
विश्वामित्र उवाच
श्रूयतां परमं गुह्यं रहस्यं धर्मसंहितम् ।
परमान्नेन यो दद्यात् पितॄणामौपहारिकम् ॥ ३५ ॥
गजच्छायायां पूर्वस्यां कुतपे दक्षिणामुखः ।
यदा भाद्रपदे मासि भवते बहुले मघा ॥ ३६ ॥
श्रूयतां तस्य दानस्य यादृशो गुणविस्तरः ।
कृतं तेन महच्छ्राद्धं वर्षाणीह त्रयोदश ॥ ३७ ॥
**विश्वामित्र बोले—**देवताओ! यह धर्मसम्बन्धी परम गोपनीय रहस्य सुनो, जब भाद्रपदमासके कृष्णपक्षमें त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रका योग हो, उस समय जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख हो कुतप कालमें (मध्याह्नके बाद आठवें मुहूर्तमें) जब कि हाथीकी छाया पूर्व दिशाकी ओर पड़ रही हो, उस छायामें ही स्थित हो पितरोंके निमित्त उपहारके रूपमें उत्तम अन्नका दान करता है, उस दानका जैसा विस्तृत फल बताया गया है, वह सुनो। दान करनेवाले उस पुरुषने इस जगत्में तेरह वर्षोंके लिये पितरोंका महान् श्राद्ध सम्पन्न कर दिया, ऐसा जानना चाहिये ॥ ३५—३७ ॥
गाव ऊचुः
बहुले समंगे ह्यकुतोऽभये च
क्षेमे च सख्येव हि भूयसी च ।
यथा पुरा ब्रह्मपुरे सवत्सा
शतक्रतोर्वज्रधरस्य यज्ञे ॥ ३८ ॥
भूयश्च या विष्णुपदे स्थिता या
विभावसोश्चापि पथे स्थिता या ।
देवाश्च सर्वे सह नारदेन
प्रकुर्वते सर्वसहेति नाम ॥ ३९ ॥
**गौओंने कहा—**पूर्वकालमें ब्रह्मलोकके भीतर वज्रधारी इन्द्रके यज्ञमें 'बहुले! समंगे! अकुतोभये! क्षेमे! सखी, भूयसी' इन नामोंका उच्चारण करके बछड़ोंसहित गौओंकी स्तुति की गयी थी, फिर जो-जो गौएँ आकाशमें स्थित थीं और जो सूर्यके मार्गमें विद्यमान थीं, नारदसहित सम्पूर्ण देवताओंने उनका 'सर्वसहा' नाम रख दिया ॥ ३८-३९ ॥
मन्त्रेणैतेनाभिवन्देत यो वै
विमुच्यते पापकृतेन कर्मणा ।
लोकानवाप्नोति पुरंदरस्य
गवां फलं चन्द्रमसो द्युतिं च ॥ ४० ॥
ये दोनों श्लोक मिलकर एक मन्त्र है। उस मन्त्रसे जो गौओंकी वन्दना करता है, वह पापकर्मसे मुक्त हो जाता है। गोसेवाके फलस्वरूप उसे इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है तथा वह चन्द्रमाके समान कान्तिलाभ करता है ॥ ४० ॥
एतं हि मन्त्रं त्रिदशाभिजुष्टं
पठेत् यः पर्वसु गोष्ठमध्ये ।
न तस्य पापं न भयं न शोकः
सहस्रनेत्रस्य च याति लोकम् ॥ ४१ ॥
जो पर्वके दिन गोशालामें इस देवसेवित मन्त्रका पाठ करता है, उसे न पाप होता है, न भय होता है और न शोक ही प्राप्त होता है। वह सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके लोकमें जाता है ॥ ४१ ॥
भीष्म उवाच
अथ सप्त महाभागा ऋषयो लोकविश्रुताः ।
वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे ब्रह्माणं पद्मसम्भवम् ॥ ४२ ॥
प्रदक्षिणमभिक्रम्य सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः ।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर महान् सौभाग्यशाली विश्वविख्यात वसिष्ठ आदि सभी सप्तर्षियोंने कमलयोनि ब्रह्माजीकी प्रदक्षिणा की और सब-के-सब हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गये ॥ ४२ १/२ ॥
उवाच वचनं तेषां वसिष्ठो ब्रह्मवित्तमः ॥ ४३ ॥
सर्वप्राणिहितं प्रश्नं ब्रह्मक्षत्रे विशेषतः ।
उनमेंसे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिने समस्त प्राणियोंके लिये हितकर तथा विशेषतः ब्राह्मण और क्षत्रियजातिके लिये लाभदायक प्रश्न उपस्थित किया— ॥ ४३ १/२ ॥
द्रव्यहीनाः कथं मर्त्या दरिद्राः साधुवर्तिनः ॥ ४४ ॥
प्राप्नुवन्तीह यज्ञस्य फलं केन च कर्मणा ।
एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ ४५ ॥
‘भगवन्! इस संसारमें सदाचारी मनुष्य प्रायः दरिद्र एवं द्रव्यहीन हैं। वे किस कर्मसे किस तरह यहाँ यज्ञका फल पा सकते हैं?’ उनकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा ॥ ४४-४५ ॥
ब्रह्मोवाच
अहो प्रश्नो महाभागा गूढार्थः परमः शुभः ।
सूक्ष्मः श्रेयांश्च मर्त्यानां भवद्भिः समुदाहृतः ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजी बोले—महान् भाग्यशाली सप्तर्षियो! तुम लोगोंने परम शुभकारक, गूढ़ अर्थसे युक्त, सूक्ष्म एवं मनुष्योंके लिये कल्याणकारी प्रश्न सामने रखा है ॥
श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये निखिलेन तपोधनाः ।
यथा यज्ञफलं मर्त्यो लभते नात्र संशयः ॥ ४७ ॥
तपोधनो! मनुष्य जिस प्रकार बिना किसी संशयके यज्ञका फल पाता है, वह सब पूर्णरूपसे बताऊँगा, सुनो ।।
पौषमासस्य शुक्ले वै यदा युज्येत रोहिणी ।
तेन नक्षत्रयोगेन आकाशशयनो भवेत् ।। ४८ ।।
एकवस्त्रः शुचिः स्नातः श्रद्दधानः समाहितः ।
सोमस्य रश्मयः पीत्वा महायज्ञफलं लभेत् ।। ४९ ।।
पौषमासके शुक्ल पक्षमें जिस दिन रोहिणी नक्षत्रका योग हो, उस दिनकी रातमें मनुष्य स्नान आदिसे शुद्ध हो एक वस्त्र धारण करके श्रद्धा और एकाग्रताके साथ खुले मैदानमें आकाशके नीचे शयन करे और चन्द्रमाकी किरणोंका ही पान करता रहे। ऐसा करनेसे उसको महान् यज्ञका फल मिलता है ।। ४८-४९ ।।
एतद् वः परमं गुह्यं कथितं द्विजसत्तमाः ।
यन्मां भवन्तः पृच्छन्ति सूक्ष्मतत्त्वार्थदर्शिनः ।। ५० ।।
विप्रवरो! तुमलोग सूक्ष्मतत्त्व एवं अर्थके ज्ञाता हो। तुमने मुझसे जो कुछ पूछा है, उसके अनुसार मैंने तुम्हें यह परम गूढ़ रहस्य बताया है ।। ५० ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि देवरहस्ये
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवताओंका रहस्यविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२६ ।।