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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2161, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2161

'दिनके मध्य भागमें—दुपहरीके समय उन्हें विश्राम देना चाहिये; किंतु दिनके अन्तिम भागमें अपनी रुचिके अनुसार बर्ताव करना चाहिये अर्थात् आवश्यकता हो तो उनसे काम ले और न हो तो न ले। जहाँ जल्दीका काम हो अथवा जहाँ मार्गमें किसी प्रकारका भय आनेवाला हो, वहाँ विश्रामके समय भी यदि बैलोंको सवारीमें जोते तो पाप नहीं लगता ।।

भ्रूणहत्यासमं पापं तस्य स्यात् पाण्डुनन्दन ।
अन्यथा वाहयन् राजन् निरयं याति रौरवम् ।।
'पाण्डुनन्दन! परंतु जो विशेष आवश्यकता न होनेपर भी ऐसे समयमें बैलोंको गाड़ीमें जोतता है, उसे भ्रूण-हत्याके समान पाप लगता है और वह रौरव नरकमें पड़ता है ।।

रुधिरं पातयेत् तेषां यस्तु मोहान्नराधिप ।
तेन पापेन पापात्मा नरकं यात्यसंशयम् ।।
'नराधिप! जो मोहवश बैलोंके शरीरसे रक्त निकाल देता है, वह पापात्मा उस पापके प्रभावसे निःसंदेह नरकमें गिरता है ।।

नरकेषु च सर्वेषु समाः स्थित्वा शतं शतम् ।
इह मानुष्यके लोके बलीवर्दो भविष्यति ।।
'वह सभी नरकोंमें सौ-सौ वर्ष रहकर इस मनुष्यलोकमें बैलका जन्म पाता है ।।

तस्मात् तु मुक्तिमन्विच्छन् दद्यात् तु कपिलां नरः ।।
'अतः जो मनुष्य संसारसे मुक्त होना चाहता हो, उसे कपिला गौका दान करना चाहिये ।।

कपिला सर्वयज्ञेषु दक्षिणार्थं विधीयते ।
तस्मात् तद्दक्षिणा देया यज्ञेष्वेव द्विजातिभिः ।।
'सब प्रकारके यज्ञोंमें दक्षिणा देनेके लिये कपिला गौकी सृष्टि हुई है, इसलिये द्विजातियोंको यज्ञमें उनकी दक्षिणा अवश्य देनी चाहिये ।।

होमार्थं चाग्निहोत्रस्य यां प्रयच्छेत् प्रयत्नतः ।
श्रोत्रियाय दरिद्राय श्रान्तायामिततेजसे ।
तेन दानेन पूतात्मा मम लोके महीयते ।।
'जो मनुष्य अग्निहोत्रके होमके लिये अमिततेजस्वी एवं धनहीन श्रोत्रिय ब्राह्मणको प्रयत्नपूर्वक कपिला गौ दानमें देता है, वह उस दानसे शुद्धचित्त होकर मेरे परमधाममें प्रतिष्ठित होता है ।।

सुवर्णखुरशृङ्गीं च कपिलां यः प्रयच्छति ।
विषुवे चायने चापि सोऽश्वमेधफलं लभेत् ।
तेनाश्वमेधतुल्येन मम लोकं स गच्छति ।।
'जो मनुष्य कपिलाके सींग और खुरोंमें सोना मढ़ाकर उसे विषुवयोगमें अथवा उत्तरायण-दक्षिणायनके आरम्भमें दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है तथा