महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मात्मन् धर्माः प्रोक्ता यथा त्वया ।
सप्ताशीतितमोऽध्यायः
विविध तिथियोंमें श्राद्ध करनेका फल
युधिष्ठिर उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मात्मन् धर्माः प्रोक्ता यथा त्वया ।
तथैव मे श्राद्धविधिं कृत्स्नं प्रब्रूहि पार्थिव ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— धर्मात्मन्! पृथ्वीनाथ! आपने जैसे चारों वर्णोंके धर्म बताये हैं, उसी प्रकार अब मेरे लिये श्राद्ध-विधिका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरेणैवमुक्तो भीष्मः शान्तनवस्तदा ।
इमं श्राद्धविधिं कृत्स्नं वक्तुं समुपचक्रमे ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— (जनमेजय!) राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार अनुरोध करनेपर उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने इस सम्पूर्ण श्राद्धविधिका इस प्रकार वर्णन आरम्भ किया ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् श्राद्धकर्मविधिं शुभम् ।
धन्यं यशस्यं पुत्र्यं पितृयज्ञं परंतप ॥ ३ ॥
भीष्मजी बोले— शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! तुम श्राद्ध-कर्मके शुभ विधिको सावधान, होकर सुनो। यह धन, यश और पुत्रकी प्राप्ति करानेवाला है। इसे पितृयज्ञ कहते हैं ॥ ३ ॥
देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
पिशाचकिन्नराणां च पूज्या वै पितरः सदा ॥ ४ ॥
देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, पिशाच और किन्नर—इन सबके लिये पितर सदा ही पूज्य हैं ॥ ४ ॥
पितॄन् पूज्यादितः पश्चाद्देवतास्तर्पयन्ति वै ।
तस्मात् तान् सर्वयज्ञेन पुरुषः पूजयेत् सदा ॥ ५ ॥
मनीषी पुरुष पहले पितरोंकी पूजा करके पीछे देवताओंकी पूजा करते हैं। इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह सदा सम्पूर्ण यज्ञोंके द्वारा पितरोंकी पूजा करे ॥ ५ ॥
अन्वाहार्यं महाराज पितॄणां श्राद्धमुच्यते ।
तस्माद् विशेषविधिना विधिः प्रथमकल्पितः ॥ ६ ॥
महाराज! पितरोंके श्राद्धको अन्वाहार्य कहते हैं। अतः विशेष विधिके द्वारा उसका अनुष्ठान पहले करना चाहिये ।। ६ ।।
सर्वेष्वहःसु प्रीयन्ते कृते श्राद्धे पितामहाः ।
प्रवक्ष्यामि तु ते सर्वांस्तिथ्यातिथ्यगुणागुणान् ।। ७ ।।
सभी दिनोंमें श्राद्ध करनेसे पितर प्रसन्न रहते हैं। अब मैं तिथि और अतिथिके सब गुणागुणका वर्णन करूँगा ।। ७ ।।
येष्वहःसु कृतैः श्राद्धैर्यत् फलं प्राप्यतेऽनघ ।
तत् सर्वं कीर्तयिष्यामि यथावत् तन्निबोध मे ।। ८ ।।
निष्पाप नरेश! जिन दिनोंमें श्राद्ध करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब मैं यथार्थरूपसे बताऊँगा, ध्यान देकर सुनो ।। ८ ।।
पितॄनर्च्य प्रतिपदि प्राप्नुयात् सुगृहे स्त्रियः ।
अभिरूपप्रजायिन्यो दर्शनीया बहुप्रजाः ।। ९ ।।
प्रतिपदा तिथिको पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य अपने उत्तम गृहमें मनके अनुरूप सुन्दर एवं बहुसंख्यक संतानोंको जन्म देनेवाली दर्शनीय भार्या प्राप्त करता है ।।
स्त्रियो द्वितीयां जायन्ते तृतीयायां तु वाजिनः ।
चतुर्थ्यां क्षुद्रपशवो भवन्ति बहवो गृहे ।। १० ।।
द्वितीयाको श्राद्ध करनेसे कन्याओंका जन्म होता है। तृतीयाके श्राद्धसे घोड़ोंकी प्राप्ति होती है, चतुर्थीको पितरोंका श्राद्ध किया जाय तो घरमें बहुत-से छोटे-छोटे पशुओंकी संख्या बढ़ती है ।। १० ।।
पञ्चम्यां बहवः पुत्रा जायन्ते कुर्वतां नृप ।
कुर्वाणास्तु नराः षष्ठ्यां भवन्ति द्युतिभागिनः ।। ११ ।।
नरेश्वर! पंचमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषोंके बहुत-से पुत्र होते हैं। षष्ठीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्य कान्तिके भागी होते हैं ।। ११ ।।
कृषिभागी भवेच्छ्राद्धं कुर्वाणः सप्तमीं नृप ।
अष्टम्यां तु प्रकुर्वाणो वाणिज्ये लाभमाप्नुयात् ।। १२ ।।
राजन्! सप्तमीको श्राद्ध करनेवाला मनुष्य कृषिकर्ममें लाभ उठाता है और अष्टमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषको व्यापारमें लाभ होता है ।। १२ ।।
नवम्यां कुर्वतः श्राद्धं भवत्येकशफं बहु ।
विवर्धन्ते तु दशमीं गावः श्राद्धान् विकुर्वतः ।। १३ ।।
नवमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषके यहाँ एक खुरवाले घोड़े आदि पशुओंकी बहुतायत होती है और दशमीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्यके घरमें गौओंको वृद्धि होती है ।।
कुप्यभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन्नेकादशीं नृप ।
ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते तस्य वेश्मनि ।। १४ ।।
महाराज! एकादशीको श्राद्ध करनेवाला मानव सोने-चाँदीको छोड़कर शेष सभी प्रकारके धनका भागी होता है। उसके घरमें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र जन्म लेते हैं ॥ १४ ॥
द्वादश्यामीहमानस्य नित्यमेव प्रदृश्यते ।
रजतं बहुवित्तं च सुवर्णं च मनोरमम् ॥ १५ ॥
द्वादशीको श्राद्धके लिये प्रयत्न करनेवाले पुरुषको सदा ही मनोरम सुवर्ण, चाँदी तथा बहुत-से धनकी प्राप्ति होती देखी जाती है ॥ १५ ॥
ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठः कुर्वन् श्राद्धं त्रयोदशीम् ।
अवश्यं तु युवानोऽस्य प्रमीयन्ते नरा गृहे ॥ १६ ॥
युद्धभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन् श्राद्धं चतुर्दशीम् ।
अमावास्यां तु निर्वापात् सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ १७ ॥
त्रयोदशीको श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने कुटुम्बी-जनोंमें श्रेष्ठ होता है; परंतु जो चतुर्दशीको श्राद्ध करता है, उसके घरमें नवयुवकोंकी मृत्यु अवश्य होती है तथा श्राद्ध करनेवाला मनुष्य स्वयं भी युद्धका भागी होता है (इसलिये चतुर्दशीको श्राद्ध नहीं करना चाहिये)। अमावास्याको श्राद्ध करनेसे वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ १६-१७ ॥
कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम् ।
श्राद्धकर्मणि तिथ्यस्तु प्रशस्ता न तथेतराः ॥ १८ ॥
कृष्ण-पक्षमें केवल चतुर्दशीको छोड़कर दशमीसे लेकर अमावास्यातककी सभी तिथियाँ श्राद्धकर्ममें जैसे प्रशस्त मानी गयी हैं, वैसे दूसरी प्रतिपदासे नवमीतक नहीं ॥ १८ ॥
यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद् विशिष्यते ।
तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्नादपराह्नो विशिष्यते ॥ १९ ॥
जैसे पूर्व (शुक्ल) पक्षकी अपेक्षा अपर (कृष्ण) पक्ष श्राद्धके लिये श्रेष्ठ माना है, उसी प्रकार पूर्वाह्नकी अपेक्षा अपराह्न उत्तम माना जाता है ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥