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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

वायुके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन

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अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

वायुके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन

वायुरुवाच

किंचिद् धर्मं प्रवक्ष्यामि मानुषाणां सुखावहम् ।
सरहस्यांश्च ये दोषास्तान् शृणुध्वं समाहिताः ॥ १ ॥
वायुदेवने कहा— मैं मनुष्योंके लिये सुखदायक धर्मका किंचित् वर्णन करता हूँ और रहस्यसहित जो दोष हैं, उन्हें भी बतलाता हूँ। तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ १ ॥

अग्निकार्यं च कर्तव्यं परमान्नेन भोजनम् ।
दीपकश्चापि कर्तव्यः पितॄणां सतिलोदकः ॥ २ ॥
प्रतिदिन अग्निहोत्र करना चाहिये। श्राद्धके दिन उत्तम अन्नके द्वारा ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। पितरोंके लिये दीप-दान तथा तिलमिश्रित जलसे तर्पण करना चाहिये ॥ २ ॥

एतेन विधिना मर्त्यः श्रद्धानः समाहितः ।
चतुरो वार्षिकान् मासान् यो ददाति तिलोदकम् ॥ ३ ॥
भोजनं च यथाशक्त्या ब्राह्मणे वेदपारगे ।
पशुबन्धशतस्येह फलं प्राप्नोति पुष्कलम् ॥ ४ ॥
जो मनुष्य श्रद्धा और एकाग्रताके साथ इस विधिसे वर्षाके चार महीनोंतक पितरोंको तिलमिश्रित जलकी अंजलि देता है और वेद-शास्त्रके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको यथाशक्ति भोजन कराता है, वह सौ यज्ञोंका पूरा फल प्राप्त कर लेता है ॥ ३-४ ॥

इदं चैवापरं गुह्यमप्रशस्तं निबोधत ।
अग्नेस्तु वृषलो नेता हविर्मूढाश्च योषितः ॥ ५ ॥
मन्यते धर्म एवेति स चाधर्मेण लिप्यते ।
अग्नयस्तस्य कुप्यन्ति शूद्रयोनिं स गच्छति ॥ ६ ॥
अब यह दूसरी उस गोपनीय बातको सुनो, जो उत्तम नहीं है अर्थात् निन्दनीय है। यदि शूद्र किसी द्विजके अग्निहोत्रकी अग्निको एक स्थानसे दूसरे स्थानको ले जाता है तथा मूर्ख स्त्रियाँ यज्ञ-सम्बन्धी हविष्यको ले जाती हैं—इस कार्यको जो धर्म ही समझता है, वह अधर्मसे लिप्त होता है। उसके ऊपर अग्नियोंका कोप होता है और वह शूद्रयोनिमें जन्म लेता है ॥ ५-६ ॥

पितरश्च न तुष्यन्ति सह देवैर्विशेषतः ।
प्रायश्चित्तं तु यत् तत्र ब्रुवतस्तन्निबोध मे ॥ ७ ॥

उसके ऊपर देवताओंसहित पितर भी विशेष संतुष्ट नहीं होते हैं। ऐसे स्थलोंपर जो प्रायश्चित्तका विधान है, उसे बताता हूँ, सुनो ।। ७ ।।

यत् कृत्वा तु नरः सम्यक् सुखी भवति विज्वरः ।
गवां मूत्रपुरीषेण पयसा च घृतेन च ।। ८ ।।
अग्निकार्यं त्र्यहं कुर्यान्निराहारः समाहितः ।
ततः संवत्सरे पूर्णे प्रतिगृह्णन्ति देवताः ।। ९ ।।
हृष्यन्ति पितरश्चास्य श्राद्धकाल उपस्थिते ।

उसका भलीभाँति अनुष्ठान करके मनुष्य सुखी और निश्चिन्त हो जाता है। द्विजको चाहिये कि वह निराहार एवं एकाग्रचित्त होकर तीन दिनोंतक गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध और गोघृतसे अग्निमें आहुति दे। तत्पश्चात् एक वर्ष पूर्ण होनेपर देवता उसकी पूजा ग्रहण करते हैं और पितर भी उसके यहाँ श्राद्धकाल उपस्थित होनेपर प्रसन्न होते हैं ।। ८-९½ ।।

एष ह्यधर्मो धर्मश्च सरहस्यः प्रकीर्तितः ।। १० ।।
मर्त्यानां स्वर्गकामानां प्रेत्य स्वर्गसुखावहः ।। ११ ।।

इस प्रकार मैंने रहस्यसहित धर्म और अधर्मका वर्णन किया। यह स्वर्गकी कामनावाले मनुष्योंको मृत्युके पश्चात् स्वर्गीय सुखकी प्राप्ति करानेवाला है ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि देवरहस्ये
अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवताओंका रहस्यविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२८ ।।