महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2359)
षड्विंशोऽध्यायः
धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश
धृतराष्ट्र उवाच
युधिष्ठिर महाबाहो कच्चित् त्वं कुशली ह्यसि ।
सहितो भ्रातृभिः सर्वैः पौरजानपदैस्तथा ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—महाबाहो युधिष्ठिर! तुम नगर तथा जनपदकी समस्त प्रजाओं और भाइयोंसहित कुशलसे तो हो न? ॥ १ ॥
ये च त्वामनुजीवन्ति कच्चित् तेऽपि निरामयाः ।
सचिवा भृत्यवर्गाश्च गुरवश्चैव ते नृप ॥ २ ॥
नरेश्वर! जो तुम्हारे आश्रित रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे मन्त्री, भृत्यवर्ग और गुरुजन भी सुखी और स्वस्थ तो हैं न? ॥ २ ॥
कच्चित् तेऽपि निरातङ्का वसन्ति विषये तव ।
कच्चिद् वर्तसि पौराणीं वृत्तिं राजर्षिसेविताम् ॥ ३ ॥
क्या वे भी तुम्हारे राज्यमें निर्भय होकर रहते हैं? क्या तुम प्राचीन राजर्षियोंसे सेवित पुरानी रीति-नीतिका पालन करते हो? ॥ ३ ॥
कच्चिन्न्यायाननुच्छिद्य कोशस्तेऽभिप्रपूर्यते ।
अरिमध्यस्थमित्रेषु वर्तसे चानुरूपतः ॥ ४ ॥
क्या तुम्हारा खजाना न्यायमार्गका उल्लंघन किये बिना ही भरा जाता है। क्या तुम शत्रु, मित्र और उदासीन पुरुषोंके प्रति यथायोग्य बर्ताव करते हो? ॥ ४ ॥
ब्राह्मणानग्रहारैर्वा यथावदनुपश्यसि ।
कच्चित् ते परितुष्यन्ति शीलेन भरतर्षभ ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! क्या तुम ब्राह्मणोंको माफी जमीन देकर उनपर यथोचित दृष्टि रखते हो? क्या तुम्हारे शील-स्वभावसे वे संतुष्ट रहते हैं? ॥ ५ ॥
शत्रवोऽपि कुतः पौरा भृत्या वा स्वजनोऽपि वा ।
कच्चिद् यजसि राजेन्द्र श्रद्धावान् पितृदेवताः ॥ ६ ॥
राजेन्द्र! पुरवासी स्वजनों और सेवकोंकी तो बात ही क्या है, क्या शत्रु भी तुम्हारे बर्तावसे संतुष्ट रहते हैं? क्या तुम श्रद्धापूर्वक देवताओं और पितरोंका यजन करते हो? ॥ ६ ॥
अतिथीनन्नपानेन कच्चिदर्चसि भारत ।
कच्चिन्न्यायपथे विप्राः स्वकर्मनिरतास्तव ॥ ७ ॥
क्षत्रिया वैश्यवर्गा वा शूद्रा वापि कुटुम्बिनः ।
भारत! क्या तुम अन्न और जलके द्वारा अतिथियोंका सत्कार करते हो? क्या तुम्हारे राज्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा कुटुम्बीजन न्याय-मार्गका अवलम्बन करते हुए अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहते हैं? ॥ ७ १/२ ॥
कच्चित् स्त्रीबालवृद्धं ते न शोचति न याचते ॥ ८ ॥
जामयः पूजिताः कच्चित् तव गेहे नरर्षभ ।
नरश्रेष्ठ! तुम्हारे राज्यमें स्त्रियों, बालकों और वृद्धोंको दुःख तो नहीं भोगना पड़ता? वे जीविकाके लिये भीख तो नहीं माँगते हैं? तुम्हारे घरमें सौभाग्यवती बहू-बेटियोंका आदर-सत्कार तो होता है न? ॥ ८ १/२ ॥
कच्चिद् राजर्षिवंशोऽयं त्वामासाद्य महीपतिम् ॥ ९ ॥
यथोचितं महाराज यशसा नावसीदति ।
महाराज! राजर्षियोंका यह वंश तुम-जैसे राजाको पाकर यथोचित प्रतिष्ठाको प्राप्त होता है न? इसे यशसे वंचित होकर अपयशका भागी तो नहीं होना पड़ता है? ॥ ९ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्येवंवादिनं तं स न्यायवित् प्रत्यभाषत ॥ १० ॥
कुशलप्रश्नसंयुक्तं कुशलो वाक्यकर्मणि ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धृतराष्ट्रके इस प्रकार कुशल-समाचार पूछनेपर बातचीत करनेमें कुशल न्याय-वेत्ता राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा— ॥ १० १/२ ॥