महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1988)
एकाशीतितमोऽध्यायः
उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुनः अश्वके पीछे जाना
अर्जुन उवाच
किमागमनकृत्यं ते कौरव्यकुलनन्दिनि ।
मणिपूरपतेर्मातुस्तथैव च रणाजिरे ॥ १ ॥
**अर्जुन बोले—**कौरव्य नामके कुलको आनन्दित करनेवाली उलूपी! इस रणभूमिमें तुम्हारे और मणिपुरनरेश बभ्रुवाहनकी माता चित्रांगदाके आनेका क्या कारण है? ॥ १ ॥
कच्चित् कुशलकामासि राज्ञोऽस्य भुजगात्मजे ।
मम वा चपलापाङ्गि कच्चित् त्वं शुभमिच्छसि ॥ २ ॥
नागकुमारी! तुम इस राजा बभ्रुवाहनका कुशल-मंगल तो चाहती हो न? चंचल कटाक्षवाली सुन्दरी! तुम मेरे कल्याणकी भी इच्छा रखती हो न? ॥ २ ॥
कच्चित् ते पृथुलश्रोणि नाप्रियं प्रियदर्शने ।
अकार्षमहमज्ञानादयं वा बभ्रुवाहनः ॥ ३ ॥
स्थूल नितम्बवाली प्रियदर्शने! मैंने या इस बभ्रुवाहनने अनजानमें तुम्हारा कोई अप्रिय तो नहीं किया है? ॥ ३ ॥
कच्चिन्नु राजपुत्री ते सपत्नी चैत्रवाहनी ।
चित्राङ्गदा वरारोहा नापराध्यति किंचन ॥ ४ ॥
तुम्हारी सौत चित्रवाहनकुमारी वरारोहा राजपुत्री चित्रांगदाने तो तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया है? ॥ ४ ॥
तमुवाचोरगपतेर्दुहिता प्रहसन्निव ।
न मे त्वमपराध्दोऽसि न हि मे बभ्रुवाहनः ॥ ५ ॥
न जनित्री तथास्येयं मम या प्रेष्यवत् स्थिता ।
श्रूयतां यद् यथा चेदं मया सर्वं विचेष्टितम् ॥ ६ ॥
अर्जुनका यह प्रश्न सुनकर नागराजकन्या उलूपी हँसती हुई-सी बोली—‘प्राणवल्लभ! आपने या बभ्रुवाहनने मेरा कोई अपराध नहीं किया है। बभ्रुवाहनकी माताने भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा है। यह तो सदा दासीकी भाँति मेरी आज्ञाके अधीन रहती है। यहाँ आकर मैंने जो-जो जिस प्रकार काम किया है, वह बतलाती हूँ; सुनिये ॥ ५-६ ॥
न मे कोपस्त्वया कार्यः शिरसा त्वां प्रसादये ।
त्वत्प्रीत्यर्थं हि कौरव्य कृतमेतन्मया विभो ॥ ७ ॥
'प्रभो! कुरुनन्दन! पहले तो मैं आपके चरणोंमें सिर रखकर आपको प्रसन्न करना चाहती हूँ। यदि मुझसे कोई दोष बन गया हो तो भी उसके लिये आप मुझपर क्रोध न करें; क्योंकि मैंने जो कुछ किया है, वह आपकी प्रसन्नताके लिये ही किया है ॥ ७ ॥
यत्तच्छृणु महाबाहो निखिलेन धनंजय ।
महाभारतयुद्धे यत् त्वया शान्तनवो नृपः ॥ ८ ॥
अधर्मेण हतः पार्थ तस्यैषा निष्कृतिः कृता ।
'महाबाहु धनंजय! आप मेरी कही हुई सारी बातें ध्यान देकर सुनिये। पार्थ! महाभारत-युद्धमें आपने जो शान्तनुकुमार महाराज भीष्मको अधर्मपूर्वक मारा है, उस पापका यह प्रायश्चित्त कर दिया गया ॥ ८१/२॥
न हि भीष्मस्त्वया वीर युध्यमानो हि पातितः ॥ ९ ॥
शिखण्डिना तु संयुक्तस्तमाश्रित्य हतस्त्वया ।
'वीर! आपने अपने साथ जूझते हुए भीष्मजीको नहीं मारा है, वे शिखण्डीके साथ उलझे हुए थे। उस दशामें शिखण्डीकी आड़ लेकर आपने उनका वध किया था ॥ ९१/२॥
तस्य शान्तिमकृत्वा त्वं त्यजेथा यदि जीवितम् ॥ १० ॥
कर्मणा तेन पापेन पतेथा निरये ध्रुवम् ।
'उसकी शान्ति किये बिना ही यदि आप प्राणोंका परित्याग करते तो उस पापकर्मके प्रभावसे निश्चय ही नरकमें पड़ते ॥ १०१/२॥
एषा तु विहिता शान्तिः पुत्राद् यां प्राप्तवानसि ।
वसुभिर्वसुधापाल गङ्गया च महामते ॥ ११ ॥
'महामते! पृथ्वीपाल! पूर्वकालमें वसुओं तथा गङ्गाजीने इसी रूपमें उस पापकी शान्ति निश्चित की थी; जिसे आपने अपने पुत्रसे पराजयके रूपमें प्राप्त किया है ॥ ११ ॥
पुरा हि श्रुतमेतत् ते वसुभिः कथितं मया ।
गङ्गायास्तीरमाश्रित्य हते शान्तनवे नृप ॥ १२ ॥
'पहलेकी बात है, एक दिन मैं गङ्गाजीके तटपर गयी थी। नरेश्वर! वहाँ शान्तनुनन्दन भीष्मजीके मारे जानेके बाद वसुओंने गङ्गातटपर आकर आपके सम्बन्धमें जो यह बात कही थी, उसे मैंने अपने कानों सुना था ॥ १२ ॥
आप्लुत्य देवा वसवः समेत्य च महानदीम् ।
इदमूचुर्वचो घोरं भागीरथ्या मते तदा ॥ १३ ॥
'वसु नामक देवता महानदी गङ्गाके तटपर एकत्र हो स्नान करके भागीरथीकी सम्मतिसे यह भयानक वचन बोले— ॥ १३ ॥
एष शान्तनवो भीष्मो निहतः सव्यसाचिना ।
अयुध्यमानः संग्रामे संसक्तोऽन्येन भाविनि ।
तदनेनानुषङ्गेण वयमद्य धनंजयम् ।। १४ ।।
शापेन योजयामेति तथास्त्विति च साब्रवीत् ।
“भाविनि! ये शान्तनुनन्दन भीष्म संग्राममें दूसरेके साथ उलझे हुए थे। अर्जुनके साथ युद्ध नहीं कर रहे थे तो भी सव्यसाची अर्जुनने इनका वध किया है। इस अपराधके कारण हमलोग आज अर्जुनको शाप देना चाहते हैं।” यह सुनकर गंगाजीने कहा—‘हाँ, ऐसा ही होना चाहिये’ ।।
तदहं पितुरावेद्य प्रविश्य व्यथितेन्द्रिया ।। १५ ।।
अभवं स च तच्छ्रुत्वा विषादमगमत् परम् ।