महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1840)
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
मार्गमें श्रीकृष्णसे कौरवोंके विनाशकी बात सुनकर उत्तङ्क मुनिका कुपित होना और श्रीकृष्णका उन्हें शान्त करना
वैशम्पायन उवाच
तथा प्रयान्तं वार्ष्णेयं द्वारकां भरतर्षभाः ।
परिष्वज्य न्यवर्तन्त सानुयात्राः परंतपाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार द्वारका जाते हुए भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाकर भरतवंशके श्रेष्ठ वीर शत्रुसंतापी पाण्डव अपने सेवकों-सहित पीछे लौटे ॥ १ ॥
पुनः पुनश्च वार्ष्णेयं पर्यष्वजत फाल्गुनः ।
आ चक्षुर्विषयाच्चैनं स ददर्श पुनः पुनः ॥ २ ॥
अर्जुनने वृष्णिवंशी प्यारे सखा श्रीकृष्णको बारंबार छातीसे लगाया और जबतक वे आँखोंसे ओझल नहीं हुए, तबतक उन्हींकी ओर वे बारंबार देखते रहे ॥ २ ॥
कृच्छ्रेणैव तु तां पार्थो गोविन्दे विनिवेशिताम् ।
संजहार ततो दृष्टिं कृष्णश्चाप्यपराजितः ॥ ३ ॥
जब रथ दूर चला गया, तब पार्थने बड़े कष्टसे श्रीकृष्णकी ओर लगी हुई अपनी दृष्टिको पीछे लौटाया। किसीसे पराजित न होनेवाले श्रीकृष्णकी भी यही दशा थी ॥ ३ ॥
तस्य प्रयाणे यान्यासन् निमित्तानि महात्मनः ।
बहून्यद्भुतरूपाणि तानि मे गदतः शृणु ॥ ४ ॥
महामना भगवान्की यात्राके समय जो बहुत-से अद्भुत शकुन प्रकट हुए, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
वायुर्वेगेन महता रथस्य पुरतो ववौ ।
कुर्वन्निःशर्करं मार्गं विरजस्कमकण्टकम् ॥ ५ ॥
उनके रथके आगे बड़े वेगसे हवा आती और रास्तेकी धूल, कंकण तथा काँटोंको उड़ाकर अलग कर देती थी ॥ ५ ॥
ववर्ष वासवश्चैव तोयं शुचि सुगन्धि च ।
दिव्यानि चैव पुष्पाणि पुरतः शार्ङ्गधन्वनः ॥ ६ ॥
इन्द्र श्रीकृष्णके सामने पवित्र एवं सुगन्धित जल तथा दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करते थे ॥ ६ ॥
स प्रयातो महाबाहुः समेषु मरुधन्वसु ।
ददर्शार्थ मुनिश्रेष्ठमुत्तङ्कममितौजसम् ॥ ७ ॥
इस प्रकार मरुभूमिके समतल प्रदेशमें पहुँचकर महाबाहु श्रीकृष्णने अमिततेजस्वी मुनिश्रेष्ठ उत्तंकका दर्शन किया ॥ ७ ॥
स तं सम्पूज्य तेजस्वी मुनिं पृथुललोचनः ।
पूजितस्तेन च तदा पर्यपृच्छदनामयम् ॥ ८ ॥
विशाल नेत्रोंवाले तेजस्वी श्रीकृष्ण उत्तंक मुनिकी पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा पूजित हुए। तत्पश्चात् उन्होंने मुनिका कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ ॥
स पृष्टः कुशलं तेन सम्पूज्य मधुसूदनम् ।
उत्तङ्को ब्राह्मणश्रेष्ठस्ततः पप्रच्छ माधवम् ॥ ९ ॥
उनके कुशल-मंगल पूछनेपर विप्रवर उत्तंकने भी मधुसूदन माधवकी पूजा करके उनसे इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ ९ ॥
कच्चिच्छौरै त्वया गत्वा कुरुपाण्डवसद्म तत् ।
कृतं सौभ्रात्रमचलं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १० ॥
'शूरनन्दन! क्या तुम कौरवों और पाण्डवोंके घर जाकर उनमें अविचल भ्रातृभाव स्थापित कर आये? यह बात मुझे विस्तारके साथ बताओ ॥ १० ॥
अपि संधाय तान् वीरानुपवृत्तोऽसि केशव ।
सम्बन्धिनः स्वदयितान् सततं वृष्णिपुङ्गव ॥ ११ ॥
केशव! क्या तुम उन वीरोंमें संधि कराकर ही लौट रहे हो? वृष्णिपुंगव! वे कौरव, पाण्डव तुम्हारे सम्बन्धी तथा तुम्हें सदा ही परम प्रिय रहे हैं ॥ ११ ॥
कच्चित् पाण्डुसुताः पञ्च धृतराष्ट्रस्य चात्मजाः ।
लोकेषु विहरिष्यन्ति त्वया सह परंतप ॥ १२ ॥
'परंतप! क्या पाण्डुके पाँचों पुत्र और धृतराष्ट्रके भी सभी आत्मज संसारमें तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचर सकेंगे? ॥
स्वराष्ट्रे ते च राजानः कच्चित् प्राप्स्यन्ति वै सुखम् ।
कौरवेषु प्रशान्तेषु त्वया नाथेन केशव ॥ १३ ॥
'केशव! तुम-जैसे रक्षक एवं स्वामीके द्वारा कौरवोंके शान्त कर दिये जानेपर अब पाण्डवनरेशोंको अपने राज्यमें सुख तो मिलेगा न? ॥ १३ ॥
या मे सम्भावना तात त्वयि नित्यमवर्तत ।
अपि सा सफला तात कृता ते भरतान् प्रति ॥ १४ ॥
'तात! मैं सदा तुमसे इस बातकी सम्भावना करता था कि तुम्हारे प्रयत्नसे कौरव-पाण्डवोंमें मेल हो जायगा। मेरी जो वह सम्भावना थी, भरतवंशियोंके सम्बन्धमें तुमने वह सफल तो किया है न?' ॥ १४ ॥
श्रीभगवानुवाच
कृतो यत्नो मया पूर्वं सौशाम्ये कौरवान् प्रति ।
नाशक्यन्त यदा साम्ये ते स्थापयितुमञ्जसा ।। १५ ।।
ततस्ते निधनं प्राप्ताः सर्वे ससुतबान्धवाः ।
श्रीभगवान्ने कहा— महर्षे! मैंने पहले कौरवोंके पास जाकर उन्हें शान्त करनेके लिये बड़ा प्रयत्न किया, परंतु वे किसी तरह संधिके लिये तैयार न किये जा सके। जब उन्हें समतापूर्ण मार्गमें स्थापित करना असम्भव हो गया, तब वे सब-के-सब अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित युद्धमें मारे गये ।। १५ १/२ ।।
न दिष्टमप्यतिक्रान्तुं शक्यं बुद्ध्या बलेन वा ।। १६ ।।
महर्षे विदितं भूयः सर्वमेतत् तवानघ ।
तेऽत्यक्रामन् मतिं मह्यं भीष्मस्य विदुरस्य च ।। १७ ।।
महर्षे! प्रारब्धके विधानको कोई बुद्धि अथवा बलसे नहीं मिटा सकता। अनघ! आपको तो ये सब बातें मालूम ही होंगी कि कौरवोंने मेरी, भीष्मजीकी तथा विदुरजीकी सम्मतिको भी ठुकरा दिया ।। १६-१७ ।।
ततो यमक्षयं जग्मुः समासाद्येतरेतरम् ।
पञ्चैव पाण्डवाः शिष्टा हतामित्रा हतात्मजाः ।
धार्तराष्ट्राश्च निहताः सर्वे ससुतबान्धवाः ।। १८ ।।
इसीलिये वे आपसमें लड़-भिड़कर यमलोक जा पहुँचे। इस युद्धमें केवल पाँच पाण्डव ही अपने शत्रुओंको मारकर जीवित बच गये हैं। उनके पुत्र भी मार डाले गये हैं। धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जो गान्धारीके पेटसे पैदा हुए थे, अपने पुत्र और बान्धवोंसहित नष्ट हो गये ।। १८ ।।
इत्युक्तवचने कृष्णे भृशं क्रोधसमन्वितः ।
उत्तङ्क इत्युवाचैनं रोषादुत्फुल्ललोचनः ।। १९ ।।
भगवान् श्रीकृष्णके इतना कहते ही उत्तंक मुनि अत्यन्त क्रोधसे जल उठे और रोषसे आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे। उन्होंने श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा ।। १९ ।।
उत्तङ्क उवाच
यस्माच्छक्तेन ते कृष्ण न त्राताः कुरुपुङ्गवाः ।
सम्बन्धिनः प्रियास्तस्माच्छप्स्येऽहं त्वामसंशयम् ।। २० ।।
उत्तंक बोले— श्रीकृष्ण! कौरव तुम्हारे प्रिय सम्बन्धी थे, तथापि शक्ति रखते हुए भी तुमने उनकी रक्षा न की। इसलिये मैं तुम्हें अवश्य शाप दूँगा ।। २० ।।
न च ते प्रसभां यस्मात् ते निगृह्य निवारिताः ।
तस्मान्मन्युपरीतस्त्वां शप्स्यामि मधुसूदन ।। २१ ।।
मधुसूदन! तुम उन्हें जबर्दस्ती पकड़कर रोक सकते थे, पर ऐसा नहीं किया। इसलिये मैं क्रोधमें भरकर तुम्हें शाप दूँगा॥ २१॥
त्वया शक्तेन हि सता मिथ्याचारेण माधव।
ते परीताः कुरुश्रेष्ठा नश्यन्तः स्म ह्युपेक्षिताः॥ २२॥
माधव! कितने खेदकी बात है, तुमने समर्थ होते हुए भी मिथ्याचारका आश्रय लिया। युद्धमें सब ओरसे आये हुए वे श्रेष्ठ कुरुवंशी नष्ट हो गये और तुमने उनकी उपेक्षा कर दी॥ २२॥
वासुदेव उवाच
शृणु मे विस्तरेणेदं यद् वक्ष्ये भृगुनन्दन।
गृहाणानुनयं चापि तपस्वी ह्यसि भार्गव॥ २३॥
श्रीकृष्णने कहा— भृगुनन्दन! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे विस्तारपूर्वक सुनिये। भार्गव! आप तपस्वी हैं, इसलिये मेरी अनुनय-विनय स्वीकार कीजिये॥ २३॥
श्रुत्वा च मे तदध्यात्मं मुञ्चेथाः शापमद्य वै।
न च मां तपसाल्पेन शक्तोऽभिभवितुं पुमान्॥ २४॥
न च ते तपसो नाशमिच्छामि तपतां वर।
मैं आपको अध्यात्मतत्त्व सुना रहा हूँ। उसे सुननेके पश्चात् यदि आपकी इच्छा हो तो आज मुझे शाप दीजियेगा। तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ महर्षे! आप यह याद रखिये कि कोई भी पुरुष थोड़ी-सी तपस्याके बलपर मेरा तिरस्कार नहीं कर सकता। मैं नहीं चाहता कि आपकी तपस्या नष्ट हो जाय॥ २४½॥
तपस्ते सुमहद्दीप्तं गुरवश्चापि तोषिताः॥ २५॥
कौमारं ब्रह्मचर्यं ते जानामि द्विजसत्तम।
दुःखार्जितस्य तपसस्तस्मान्नेच्छामि ते व्ययम्॥ २६॥
आपका तप और तेज बहुत बढ़ा हुआ है। आपने गुरुजनोंको भी सेवासे संतुष्ट किया है। द्विजश्रेष्ठ! आपने बाल्यावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन किया है। ये सारी बातें मुझे अच्छी तरह ज्ञात हैं। इसलिये अत्यन्त कष्ट सहकर संचित किये हुए आपके तपका मैं नाश कराना नहीं चाहता हूँ॥ २५-२६॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने
कृष्णोत्तङ्कसमागमे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तङ्कके उपाख्यानमें श्रीकृष्ण और उत्तङ्कका समागमविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५३॥