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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2159, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2159

त्रिंशद् वर्षकृतात् पापान्मुच्यते नात्र संशयः ॥
'जो मनुष्य कपिलाका मूत्र लेकर अपनी नेत्र आदि इन्द्रियोंमें लगाता तथा उससे स्नान करता है, वह उस स्नानके पुण्यसे निष्पाप हो जाता है। उसके तीस जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है ।।
प्रातरुत्थाय यो भक्त्या प्रयच्छेत् तृणमुष्टिकम् ।
तस्य नश्यति तत् पापं त्रिंशद्रात्रकृतं नृप ॥
'नरपते! जो प्रातःकाल उठकर भक्तिके साथ कपिला गौको घासकी मुट्ठी अर्पण करता है, उसके एक महीनेके पापोंका नाश हो जाता है ।।
प्रातरुत्थाय यद्भक्त्या कुर्याद् यस्मात् प्रदक्षिणम् ।
प्रदक्षिणीकृता तेन पृथिवी नात्र संशयः ।।
'जो सबेरे शयनसे उठकर भक्तिपूर्वक कपिला गौकी परिक्रमा करता है, उसके द्वारा समूची पृथिवीकी परिक्रमा हो जाती है, इसमें संशय नहीं है' ।।
कपिलापञ्चगव्येन यः स्नायात् तु शुचिर्नरः ।
स गङ्गाद्येषु तीर्थेषु स्नातो भवति पाण्डव ॥
'पाण्डुनन्दन! जो पुरुष कपिला गौके पञ्चगव्यसे नहाकर शुद्ध होता है, वह मानो गंगा आदि समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लेता है ।।
दृष्ट्वा तु कपिलां भक्त्या श्रुत्वा हुंकारनिःस्वनम् ।
व्यपोहति नरः पापमहोरात्रकृतं नृप ।।
'राजन्! भक्तिपूर्वक कपिला गौका दर्शन करके तथा उसके रँभानेकी आवाज सुनकर मनुष्य एक दिन-रातके पापोंको नष्ट कर डालता है ।।
गोसहस्रं तु यो दद्यादेकां च कपिलां नरः ।
समं तस्य फलं प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः ।।
'एक मनुष्य एक हजार गौओंका दान करे और दूसरा एक ही कपिला गौको दानमें दे तो लोकपितामह ब्रह्माजीने उन दोनोंका फल बराबर बतलाया है ।।
यस्त्वेवं कपिलां हन्यान्नरः कश्चित् प्रमादतः ।
गोसहस्रं हतं तेन भवेन्नात्र विचारणा ।।
'इसी प्रकार कोई मनुष्य प्रमादवश यदि एक ही कपिला गौकी हत्या कर डाले तो उसे एक हजार गौओंके वधका पाप लगता है, इसमें संशय नहीं है ।।
दश वै कपिलाः प्रोक्ताः स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
प्रथमा स्वर्णकपिला द्वितीया गौरपिङ्गला ।
तृतीया रक्तपिङ्गाक्षी चतुर्थी गलपिङ्गला ।।
पञ्चमी बभ्रुवर्णाभा षष्ठी च श्वेतपिङ्गला ।
सप्तमी रक्तपिङ्गाक्षी त्वष्टमी खुरपिङ्गला ।।