महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा
द्विनवतितमोऽध्यायः
महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा
जनमेजय उवाच
धर्मागतेन त्यागेन भगवन् स्वर्गमस्ति चेत् ।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि भाषितुम् ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा— भगवन्! धर्मके द्वारा प्राप्त हुए धनका दान करनेसे यदि स्वर्ग मिलता है तो यह सब विषय मुझे स्पष्टरूपसे बताइये; क्योंकि आप प्रवचन करनेमें कुशल हैं ॥ १ ॥
तस्योञ्छवृत्तेर्यद् वृत्तं सक्तुदाने फलं महत् ।
कथितं तु मम ब्रह्मंस्तथ्यमेतदसंशयम् ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! उञ्छवृत्ति धारण करनेवाले ब्राह्मणको न्यायतः प्राप्त हुए सत्तूका दान करनेसे जिस महान् फलकी प्राप्ति हुई, उसका आपने मुझसे वर्णन किया। निस्संदेह यह सब ठीक है ॥ २ ॥
कथं हि सर्वयज्ञेषु निश्चयः परमोऽभवत् ।
एतदर्हसि मे वक्तुं निखिलेन द्विजर्षभ ॥ ३ ॥
परंतु सभी यज्ञोंमें यह उत्तम निश्चय कैसे कार्यान्वित किया जा सकता है। द्विजश्रेष्ठ! इस विषयका मुझसे पूर्णतः प्रतिपादन कीजिये ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अगस्त्यस्य महायज्ञे पुरावृत्तमरिंदम ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! इस विषयमें पहले अगस्त्य मुनिके महान् यज्ञमें जो घटना घटित हुई थी, उस प्राचीन इतिहासका जानकार मनुष्य उदाहरण दिया करते हैं ॥ ४ ॥
पुरागस्त्यो महातेजा दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।
प्रविवेश महाराज सर्वभूतहिते रतः ॥ ५ ॥
महाराज! पहलेकी बात है, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेवाले महातेजस्वी अगस्त्य मुनिने एक समय बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाले यज्ञकी दीक्षा ली ॥ ५ ॥
तत्राग्निकल्पा होतार आसन् सत्रे महात्मनः ।
मूलाहाराः फलाहाराः साश्मकुट्टा मरीचिपाः ॥ ६ ॥
परिपृष्टिका वैघसिकाः प्रसंख्यानास्तथैव च ।
यतयो भिक्षवश्चात्र बभूवुः पर्यवस्थिताः ॥ ७ ॥
उन महात्माके यज्ञमें अग्निके समान तेजस्वी होता थे। जिनमें फल, मूलका आहार करनेवाले, अश्मकुट्ट^१, मरीचिप^२, परिपृष्टिक^३, वैघसिक^४ और प्रसंख्याने^५ आदि अनेक प्रकारके यति एवं भिक्षु उपस्थित थे ॥ ६-७ ॥
सर्वे प्रत्यक्षधर्माणो जितक्रोधा जितेन्द्रियाः ।
दमे स्थिताश्च सर्वे ते हिंसादम्भविवर्जिताः ॥ ८ ॥
वृत्ते शुद्धे स्थिता नित्यमिन्द्रियैश्चाप्यबाधिताः ।
उपातिष्ठन्त तं यज्ञं यजन्तस्ते महर्षयः ॥ ९ ॥
वे सब-के-सब प्रत्यक्ष धर्मका पालन करनेवाले, क्रोध-विजयी, जितेन्द्रिय, मनोनिग्रहपरायण, हिंसा और दम्भसे रहित तथा सदा शुद्ध सदाचारमें स्थित रहनेवाले थे। उन्हें किसी भी इन्द्रियके द्वारा कभी बाधा नहीं पहुँचती थी। ऐसे-ऐसे महर्षि वह यज्ञ करानेके लिये वहाँ उपस्थित थे ॥ ८-९ ॥
यथाशक्त्या भगवता तदन्नं समुपार्जितम् ।
तस्मिन् सत्रे तु यद् वृत्तं यद् योग्यं च तदाभवत् ॥ १० ॥
भगवान् अगस्त्य मुनिने उस यज्ञके लिये यथाशक्ति विशुद्ध अन्नका संग्रह किया था। उस समय उस यज्ञमें वही हुआ, जो उसके योग्य था ॥ १० ॥
तथा ह्यनेकैर्मुनिभिर्महान्तः क्रतवः कृताः ।
एवंविधे त्वगस्त्यस्य वर्तमाने तथाध्वरे ।
न ववर्ष सहस्राक्षस्तदा भरतसत्तम ॥ ११ ॥
उनके सिवा और भी अनेक मुनियोंने बड़े-बड़े यज्ञ किये थे। भरतश्रेष्ठ! महर्षि अगस्त्यका ऐसा यज्ञ जब चालू हो गया, तब देवराज इन्द्रने वहाँ वर्षा बंद कर दी ॥ ११ ॥
ततः कर्मान्तरे राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः ।
कथेयमभिनिर्वृत्ता मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥
राजन्! तब यज्ञकर्मके बीचमें अवकाश मिलनेपर जब विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुनि एक-दूसरेसे मिलकर एक स्थानपर बैठे, तब उनमें महात्मा अगस्त्यजीके सम्बन्धमें इस प्रकार चर्चा होने लगी— ॥ १२ ॥
अगस्त्यो यजमानोऽसौ ददात्यन्नं विमत्सरः ।
न च वर्षति पर्जन्यः कथमन्नं भविष्यति ॥ १३ ॥
'महर्षियो! सुप्रसिद्ध अगस्त्य मुनि हमारे यजमान हैं। वे ईर्ष्यारहित हो श्रद्धापूर्वक सबको अन्न देते हैं। परंतु इधर मेघ जलकी वर्षा नहीं कर रहा है। तब भविष्यमें अन्न कैसे पैदा होगा? ॥ १३ ॥
सत्रं चेदं महत् विप्रा मुनेर्द्वादशवार्षिकम् ।
न वर्षिष्यति देवश्च वर्षाण्येतानि द्वादश ॥ १४ ॥
'ब्राह्मणो! मुनिका यह महान् सत्र बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाला है; परंतु इन्द्रदेव इन बारह वर्षोंमें वर्षा नहीं करेंगे ।। १४ ।।
एतद् भवन्तः संचिन्त्य महर्षेरस्य धीमतः ।
अगस्त्यस्यातितपसः कर्तुमर्हन्त्यनुग्रहम् ।। १५ ।।
'यह सोचकर आपलोग इन अत्यन्त तपस्वी बुद्धिमान् महर्षि अगस्त्यपर अनुग्रह करें (जिससे इनका यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो जाय)' ।। १५ ।।
इत्येवमुक्ते वचने ततोऽगस्त्यः प्रतापवान् ।। १६ ।।
प्रोवाच वाक्यं स तदा प्रसाद्य शिरसा मुनीन् ।
उनके ऐसा कहनेपर प्रतापी अगस्त्य उन मुनियोंको सिरसे प्रणाम करके उन्हें राजी करते हुए इस प्रकार बोले— ।। १६ १/२ ।।
यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १७ ।।
चिन्तायज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः ।
'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं चिन्तनमात्रके द्वारा मानसिक यज्ञ करूँगा। यह यज्ञकी सनातन विधि है ।। १७ १/२ ।।
यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १८ ।।
स्पर्शयज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः ।
'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं स्पर्शयज्ञ* करूँगा। यह भी यज्ञकी सनातन विधि है' ।। १८ १/२ ।।
यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १९ ।।
ध्येयात्मना हरिष्यामि यज्ञानेतान् यतव्रतः ।
'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं व्रत-नियमोंका पालन करता हुआ ध्यानद्वारा ध्येयरूपसे स्थित हो इन यज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा ।। १९ १/२ ।।
बीजयज्ञो मयायं वै बहुवर्षसमाचितः ।। २० ।।
बीजैर्हि तं करिष्यामि नात्र विघ्नो भविष्यति ।
'यह बीज-यज्ञ मैंने बहुत वर्षोंसे संचित कर रखा है। उन बीजोंसे ही मैं अपना यज्ञ पूरा कर लूँगा। इसमें कोई विघ्न नहीं होगा ।। २० १/२ ।।
नेदं शक्यं वृथा कर्तुं मम सत्रं कथंचन ।। २१ ।।
वर्षिष्यतीह वा देवो न वा वर्षं भविष्यति ।
'इन्द्रदेव यहाँ वर्षा करें अथवा यहाँ वर्षा न हो, इसकी मुझे परवा नहीं है, मेरे इस यज्ञको किसी तरह व्यर्थ नहीं किया जा सकता ।। २१ १/२ ।।
अथवाभ्यर्थनामिन्द्रो न करिष्यति कामतः ।। २२ ।।
स्वयमिन्द्रो भविष्यामि जीवयिष्यामि च प्रजाः ।
‘अथवा यदि इन्द्र इच्छानुसार जल बरसानेके लिये की हुई मेरी प्रार्थना पूर्ण नहीं करेंगे तो मैं स्वयं इन्द्र हो जाऊँगा और समस्त प्रजाके जीवनकी रक्षा करूँगा।।
यो यदाहारजातश्च स तथैव भविष्यति ॥ २३ ॥
विशेषं चैव कर्तास्मि पुनः पुनरतीव हि ।
‘जो जिस आहारसे उत्पन्न हुआ है, उसे वही प्राप्त होगा तथा मैं बारंबार अधिक मात्रामें विशेष आहारकी भी व्यवस्था करूँगा ।। २३ १/२ ।।
अद्येह स्वर्णमभ्येतु यच्चान्यद् वसु किंचन ॥ २४ ॥
त्रिषु लोकेषु यच्चास्ति तदिहागम्यतां स्वयम् ।
‘तीनों लोकोंमें जो सुवर्ण या दूसरा कोई धन है, वह सब आज यहाँ स्वतः आ जाय ।। २४ १/२ ।।
दिव्याश्चाप्सरसां संघा गन्धर्वाश्च सकिन्नराः ॥ २५ ॥
विश्वावसुश्च ये चान्ये तेऽप्युपासन्तु मे मखम् ।