महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2325)
सप्तदशोऽध्यायः
कुन्तीका पाण्डवोंको उनके अनुरोधका उत्तर
कुन्त्युवाच
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि पाण्डव ।
कृतमुद्धर्षणं पूर्वं मया वः सीदतां नृपाः ॥ १ ॥
**कुन्ती बोली—**महाबाहु पाण्डुनन्दन! तुम जैसा कहते हो, वही ठीक है। राजाओ! पूर्वकालमें तुम नाना प्रकारके कष्ट उठाकर शिथिल हो गये थे, इसलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साहित किया था ॥ १ ॥
द्यूतापहृतराज्यानां पतितानां सुखादपि ।
ज्ञातिभिः परिभूतानां कृतमुद्धर्षणं मया ॥ २ ॥
जूएमें तुम्हारा राज्य छीन लिया गया था। तुम सुखसे भ्रष्ट हो चुके थे और तुम्हारे ही बन्धु-बान्धव तुम्हारा तिरस्कार करते थे, इसलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साह प्रदान किया था ॥ २ ॥
कथं पाण्डोर्न नश्येत संततिः पुरुषर्षभाः ।
यशश्च वो न नश्येत इति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ३ ॥
श्रेष्ठ पुरुषो! मैं चाहती थी कि पाण्डुकी संतान किसी तरह नष्ट न हो और तुम्हारे यशका भी नाश न होने पाये। इसलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साहित किया था ॥ ३ ॥
यूयमिन्द्रसमाः सर्वे देवतुल्यपराक्रमाः ।
मा परेषां मुखप्रेक्षाः स्थेत्येवं तत् कृतं मया ॥ ४ ॥
तुम सब लोग इन्द्रके समान शक्तिशाली और देवताओंके तुल्य पराक्रमी होकर जीविकाके लिये दूसरोंका मुँह न देखो, इसलिये मैंने वह सब किया था ॥ ४ ॥
कथं धर्मभृतां श्रेष्ठो राजा त्वं वासवोपमः ।
पुनर्वने न दुःखी स्या इति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ५ ॥
तुम धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ और इन्द्रके समान ऐश्वर्यशाली राजा होकर पुनः वनवासका कष्ट न भोगो, इसी उद्देश्यसे मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साहित किया था ॥ ५ ॥
नागायुतसमप्राणः ख्यातविक्रमपौरुषः ।
नायं भीमोऽत्ययं गच्छेदिति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ६ ॥
ये दस हजार हाथियोंके समान बलशाली और विख्यात बल-पराक्रमसे सम्पन्न भीमसेन पराजयको न प्राप्त हों; इसीलिये मैंने युद्धके हेतु उत्साह दिलाया था ॥
भीमसेनादवरजस्तथायं वासवोपमः ।
विजयो नावसीदेत इति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ७ ॥
भीमसेनके छोटे भाई ये इन्द्रतुल्य पराक्रमी विजय-शील अर्जुन शिथिल होकर न बैठ जायँ, इसीलिये मैंने उत्साह दिलाया था ॥ ७ ॥
नकुलः सहदेवश्च तथैमौ गुरुवर्तिनौ ।
क्षुधा कथं न सीदेतामिति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ८ ॥
गुरुजनोंकी आज्ञाके पालनमें लगे रहनेवाले ये दोनों भाई नकुल और सहदेव भूखका कष्ट न उठावें, इसके लिये मैंने तुम्हें उत्साह दिलाया था ॥ ८ ॥
इयं च बृहती श्यामा तथात्यायतलोचना ।
वृथा सभातले क्लिष्टा मा भूदिति च तत् कृतम् ॥ ९ ॥
यह ऊँचे कदवाली श्यामवर्णा विशाललोचना मेरी बहू भरी सभामें पुनः व्यर्थ अपमानित होनेका कष्ट न भोगे, इसी उद्देश्यसे मैंने वह सब किया था ॥ ९ ॥
प्रेक्षतामेव वो भीम वेपन्तीं कदलीमिव ।
स्त्रीधर्मिणीमरिष्टाङ्गीं तथा द्यूतपराजिताम् ॥ १० ॥
दुःशासनो यदा मौर्ख्याद् दासीवत् पर्यकर्षत ।
तदैव विदितं मह्यं पराभूतमिदं कुलम् ॥ ११ ॥
भीमसेन! तुम सब लोगोंके देखते-देखते केलेके पत्तेकी तरह काँपती हुई, जूएमें हारी गयी, रजस्वला और निर्दोष अंगवाली द्रौपदीको दुःशासनने मूर्खतावश जब दासीकी भाँति घसीटा था, तभी मुझे मालूम हो गया था कि अब इस कुलका पराभव होकर ही रहेगा ॥
निषण्णाः कुरवश्चैव तदा मे श्वशुरादयः ।
सा दैवं नाथमिच्छन्ती व्यलपत् कुररी यथा ॥ १२ ॥
मेरे श्वशुर आदि समस्त कौरव चुपचाप बैठे थे और द्रौपदी अपने लिये रक्षक चाहती हुई भगवान्को पुकार-पुकारकर कुररीकी भाँति विलाप कर रही थी ॥
केशपक्षे परामृष्टा पापेन हतबुद्धिना ।
यदा दुःशासनेनैषा तदा मुह्याम्यहं नृपाः ॥ १३ ॥
युष्मत्तेजोविवृद्ध्यर्थं मया ह्युद्धर्षणं कृतम् ।
तदानीं विदुलावाक्यैरिति तद् वित्त पुत्रकाः ॥ १४ ॥
राजाओ! जिसकी बुद्धि मारी गयी थी, उस पापी दुःशासनने जब मेरी इस बहूका केश पकड़कर खींचा था, तभी मैं दुःखसे मोहित हो गयी थी। यही कारण था कि उस समय विदुलाके वचनोंद्वारा मैंने तुम्हारे तेजकी वृद्धिके लिये उत्साहवर्धन किया था। पुत्रो! इस बातको अच्छी तरह समझ लो ॥ १३-१४ ॥
कथं न राजवंशोऽयं नश्येत् प्राप्य सुतान् मम ।
पाण्डोरिति मया पुत्रास्तस्मादुद्धर्षणं कृतम् ॥ १५ ॥
मेरे और पाण्डुके पुत्रोंतक पहुँचकर यह राजवंश किसी तरह नष्ट न हो जाय; इसीलिये मैंने तुम्हारे उत्साहकी वृद्धि की थी ॥ १५ ॥
न तस्य पुत्राः पौत्रा वा क्षतवंशस्य पार्थिव ।
लभन्ते सुकृताँल्लोकान् यस्माद् वंशः प्रणश्यति ॥ १६ ॥
राजन्! जिसका वंश नष्ट हो जाता है, उस कुलके पुत्र या पौत्र कभी पुण्यलोक नहीं पाते; क्योंकि उस वंशका तो नाश ही हो जाता है ॥ १६ ॥
भुक्तं राज्यफलं पुत्रा भर्तुर्मे विपुलं पुरा ।
महादानानि दत्तानि पीतः सोमो यथाविधि ॥ १७ ॥
पुत्रो! मैंने पूर्वकालमें अपने स्वामी महाराज पाण्डुके विशाल राज्यका सुख भोग लिया है, बड़े-बड़े दान दिये हैं और यज्ञमें विधिपूर्वक सोमपान भी किया है ॥ १७ ॥
नाहमात्मफलार्थं वै वासुदेवमचूचुदम् ।
विदुलायाः प्रलापैस्तैः पालनार्थं च तत् कृतम् ॥ १८ ॥
मैंने अपने लाभके लिये श्रीकृष्णको प्रेरित नहीं किया था। विदुलाके वचन सुनाकर जो उनके द्वारा तुम्हारे पास संदेश भेजा था, वह सब तुमलोगोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही किया था ॥ १८ ॥
नाहं राज्यफलं पुत्राः कामये पुत्रनिर्जितम् ।
पतिलोकानहं पुण्यान् कामये तपसा विभो ॥ १९ ॥
पुत्रो! मैं पुत्रके जीते हुए राज्यका फल भोगना नहीं चाहती। प्रभो! मैं तपस्याद्वारा पुण्यमय पतिलोकमें जानेकी कामना रखती हूँ ॥ १९ ॥
श्वश्रूश्वशुरयोः कृत्वा शुश्रूषां वनवासिनोः ।
तपसा शोषयिष्यामि युधिष्ठिर कलेवरम् ॥ २० ॥
युधिष्ठिर! अब मैं अपने इन वनवासी सास-ससुरकी सेवा करके तपके द्वारा इस शरीरको सुखा डालूँगी ॥ २० ॥
निवर्तस्व कुरुश्रेष्ठ भीमसेनादिभिः सह ।
धर्मे ते धीयतां बुद्धिर्मनस्तु महदस्तु च ॥ २१ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तुम भीमसेन आदिके साथ लौट जाओ। तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी रहे और तुम्हारा हृदय विशाल (अत्यन्त उदार) हो ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि कुन्तीवाक्ये
सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें कुन्तीका वाक्यविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥