महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
विभिन्न नक्षत्रोंके योगमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके दानका माहात्म्य
चतुःषष्टितमोऽध्यायः
विभिन्न नक्षत्रोंके योगमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके दानका माहात्म्य
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं मे भवतो वाक्यमन्नदानस्य यो विधिः ।
नक्षत्रयोगस्येदानीं दानकल्पं ब्रवीहि मे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! मैंने आपका उपदेश सुना। अन्नदानका जो विधान है, वह ज्ञात हुआ। अब मुझे यह बताइये कि किस नक्षत्रका योग प्राप्त होनेपर किस-किस वस्तुका दान करना उत्तम है ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
देवक्याश्चैव संवादं महर्षेर्नारदस्य च ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार मनुष्य देवकी देवी और महर्षि नारदके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
द्वारकामनुसम्प्राप्तं नारदं देवदर्शनम् ।
पप्रच्छेदं वचः प्रश्नं देवकी धर्मदर्शनम् ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, धर्मदर्शी देवर्षि नारदजी द्वारकामें आये थे। उस समय वहाँ देवकी देवीने उनके सामने यही प्रश्न उपस्थित किया ॥ ३ ॥
तस्याः सम्पृच्छमानाया देवर्षिर्नारदस्ततः ।
आचष्ट विधिवत् सर्वं तच्छृणुष्व विशाम्पते ॥ ४ ॥
प्रजानाथ! देवकीके इस प्रकार पूछनेपर देवर्षि नारदने उस समय विधिपूर्वक सब बातें बतायीं। वे ही बातें मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
नारद उवाच
कृत्तिकासु महाभागे पायसेन ससर्पिषा ।
संतर्प्य ब्राह्मणान् साधूँल्लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ॥ ५ ॥
**नारदजीने कहा—**महाभागे! कृत्तिका नक्षत्र आनेपर मनुष्य घृतयुक्त खीरके द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त करे। इससे वह सर्वोत्तम लोकोंको प्राप्त होता है ॥
रोहिण्यां प्रसृतैर्मार्गैर्मांसैरन्नेन सर्पिषा ।
पयोऽन्नपानं दातव्यमनृणार्थं द्विजातये ॥ ६ ॥
रोहिणी नक्षत्रमें पके हुए फलके गूदे, अन्न, घी, दूध तथा पीनेयोग्य पदार्थ ब्राह्मणको दान करने चाहिये। इससे उनके ऋणसे छुटकारा मिलता है ॥ ६ ॥
दोग्ध्रीं दत्त्वा सवत्सां तु नक्षत्रे सोमदैवते ।
गच्छन्ति मानुषाल्लोकात् सर्वलोकमनुत्तमम् ॥ ७ ॥
मृगशिरा नक्षत्रमें दूध देनेवाली गौका बछड़ेसहित दान करके दाता मृत्युके पश्चात् इस लोकसे सर्वोत्तम स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ७ ॥
आर्द्रायां कृसरं दत्त्वा तिलमिश्रमुपोषितः ।
नरस्तरति दुर्गाणि क्षुरधारांश्च पर्वतान् ॥ ८ ॥
आर्द्रा नक्षत्रमें उपवासपूर्वक तिलमिश्रित खिचड़ी दान करनेवाला मनुष्य बड़े-बड़े दुर्गम संकटोंसे तथा क्षुरकी-सी धारवाले पर्वतोंसे भी पार हो जाता है ॥ ८ ॥
पूपान् पुनर्वसौ दत्त्वा तथैवान्नानि शोभने ।
यशस्वी रूपसम्पन्नो बह्वन्नो जायते कुले ॥ ९ ॥
शोभने! पुनर्वसु नक्षत्रमें पूआ और अन्न-दान करके मनुष्य उत्तम कुलमें जन्म लेता है, तथा वहाँ यशस्वी, रूपवान् एवं प्रचुर अन्नसे सम्पन्न होता है ॥ ९ ॥
पुष्येण कनकं दत्त्वा कृतं वाकृतमेव च ।
अनालोकेषु लोकेषु सोमवत् स विराजते ॥ १० ॥
पुष्य नक्षत्रमें सोनेका आभूषण अथवा केवल सोना ही दान करनेसे दाता प्रकाशशून्य लोकोंमें भी चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है ॥ १० ॥
आश्लेषायां तु यो रूप्यमृषभं वा प्रयच्छति ।
स सर्वभयनिर्मुक्तः सम्भवानधितिष्ठति ॥ ११ ॥
जो आश्लेषा नक्षत्रमें चाँदी अथवा बैल दान करता है, वह इस जन्ममें सब प्रकारके भयसे मुक्त हो दूसरे जन्ममें उत्तम कुलमें जन्म लेता है ॥ ११ ॥
मघासु तिलपूर्णानि वर्धमानानि मानवः ।
प्रदाय पुत्रपशुमानिह प्रेत्य च मोदते ॥ १२ ॥
जो मनुष्य मघा नक्षत्रमें तिलसे भरे हुए वर्धमान पात्रोंका दान करता है, वह इहलोकमें पुत्रों और पशुओंसे सम्पन्न हो परलोकमें भी आनन्दका भागी होता है ॥ १२ ॥
फाल्गुनीपूर्वसमये ब्राह्मणानामुपोषितः ।
भक्ष्यान् फाणितसंयुक्तान् दत्त्वा सौभाग्यमृच्छति ॥ १३ ॥
पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें उपवास करके जो मनुष्य ब्राह्मणोंको मक्खनमिश्रित भक्ष्य पदार्थ देता है, वह सौभाग्यशाली होता है ॥ १३ ॥
घृतक्षीरसमायुक्तं विधिवत् षष्टिकौदनम् ।
उत्तराविषये दत्त्वा स्वर्गलोके महीयते ॥ १४ ॥
उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें विधिपूर्वक घृत और दुग्धसे युक्त साठीके चावलके भातका दान करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ।। १४ ।।
यद् यत् प्रदीयते दानमुत्तराविषये नरैः ।
महाफलमनन्तं तद् भवतीति विनिश्चयः ।। १५ ।।
उत्तरा नक्षत्रमें मनुष्य जो-जो दान देते हैं, वह महान् फलसे युक्त एवं अनन्त होता है—यह शास्त्रोंका निश्चय है ।। १५ ।।
हस्ते हस्तिरथं दत्त्वा चतुर्युक्तमुपोषितः ।
प्राप्नोति परमाँल्लोकान् पुण्यकामसमन्वितान् ।। १६ ।।
हस्तनक्षत्रमें उपवास करके ध्वजा, पताका, चँदोवा और किंकिणीजाल—इन चार वस्तुओंसे युक्त हाथी जुते हुए रथका दान करनेवाला मनुष्य पवित्र कामनाओंसे युक्त उत्तम लोकोंमें जाता है ।। १६ ।।
चित्रायां वृषभं दत्त्वा पुण्यगन्धांश्च भारत ।
चरन्त्यप्सरसां लोके रमन्ते नन्दने तथा ।। १७ ।।
भारत! जो लोग चित्रा नक्षत्रमें वृषभ एवं पवित्र गन्धका दान करते हैं, वे अप्सराओंके लोकमें विचरते और नन्दनवनमें रमण करते हैं ।। १७ ।।
स्वात्यामथ धनं दत्त्वा यदिष्टममात्मनः ।
प्राप्नोति लोकान् स शुभानिह चैव महद् यशः ।। १८ ।।
स्वाती नक्षत्रमें अपनी अधिक-से-अधिक प्रिय वस्तुका दान करके मनुष्य शुभ लोकोंमें जाता है और इस जगत्में भी महान् यशका भागी होता है ।। १८ ।।
विशाखायामनड्वाहं धेनुं दत्त्वा च दुग्धदाम् ।
सप्रासंगं च शकटं सधान्यं वस्त्रसंयुतम् ।। १९ ।।
पितॄन् देवांश्च प्रीणाति प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ।
न च दुर्गाण्यवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। २० ।।
जो विशाखा नक्षत्रमें गाड़ी ढोनेवाले बैल, दूध देनेवाली गाय, धान्य, वस्त्र और प्रासंगसहित शकट दान करता है, वह देवताओं और पितरोंको तृप्त कर देता है तथा मृत्युके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है। वह जीते जी कभी संकटमें नहीं पड़ता और मरनेके बाद स्वर्गलोकमें जाता है ।। १९-२० ।।
दत्त्वा यथोक्तं विप्रेभ्यो वृत्तिमिष्टां स विन्दति ।
नरकादींश्च संक्लेशान् नाप्नोतीति विनिश्चयः ।। २१ ।।
पूर्वोक्त वस्तुओंका ब्राह्मणोंको दान करके मनुष्य इच्छित जीविका-वृत्ति पा लेता है और नरक आदिके कष्ट भी कभी नहीं भोगता। ऐसा शास्त्रोंका निश्चय है ।।
अनुराधासु प्रावारं वरान्नं समुपोषितः ।
दत्त्वा युगशतं चापि नरः स्वर्गे महीयते ।। २२ ।।
जो मनुष्य अनुराधा नक्षत्रमें उपवास करके ओढ़नेका वस्त्र और उत्तम अन्न दान करता है, वह सौ युगोंतक स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है ॥ २२ ॥
कालशाकं तु विप्रेभ्यो दत्त्वा मर्त्यः समूलकम् ।
ज्येष्ठायामृद्धिमिष्टां वै गतिमिष्टां स गच्छति ॥ २३ ॥
जो मनुष्य ज्येष्ठा नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको समयोचित शाक और मूली दान करता है, वह अभीष्ट समृद्धि और सद्गतिको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥
मूले मूलफलं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ।
पितॄन् प्रीणयते चापि गतिमिष्टां च गच्छति ॥ २४ ॥
मूल नक्षत्रमें एकाग्रचित्त हो ब्राह्मणोंको मूल-फल दान करनेवाला मनुष्य पितरोंको तृप्त करता और अभीष्ट गतिको पाता है ॥ २४ ॥
अथ पूर्वास्वषाढासु दधिपात्राण्युपोषितः ।
कुलवृत्तोपसम्पन्ने ब्राह्मणे वेदपारगे ॥ २५ ॥
पुरुषो जायते प्रेत्य कुले सुबहुगोधने ।
पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें उपवास करके कुलीन, सदाचारी एवं वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको दहीसे भरे हुए पात्रका दान करनेवाला मनुष्य मृत्युके पश्चात् ऐसे कुलमें जन्म लेता है, जहाँ गोधनकी अधिकता होती है ॥
उदमन्थं ससर्पिष्कं प्रभूतमधिफाणितम् ।
दत्त्वोत्तरास्वषाढासु सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ २६ ॥
जो उत्तराषाढ़ा नक्षत्रमें जलपूर्ण कलशसहित सत्तूकी बनी हुई खाद्य वस्तु, घी और प्रचुर माखन दान करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंको प्राप्त कर लेता है ॥
दुग्धं त्वभिजिते योगे दत्त्वा मधुघृतप्लुतम् ।
धर्मनित्यो मनीषिभ्यः स्वर्गलोके महीयते ॥ २७ ॥
जो नित्य धर्मपरायण पुरुष अभिजित् नक्षत्रके योगमें मनीषी ब्राह्मणोंको मधु और घीसे युक्त दूध देता है, वह स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ॥ २७ ॥
श्रवणे कम्बलं दत्त्वा वस्त्रान्तरितमेव वा ।
श्वेतेन याति यानेन स्वर्गलोकानसंवृतान् ॥ २८ ॥
जो श्रवण नक्षत्रमें वस्त्रवेष्टित कम्बल दान करता है, वह श्वेत विमानके द्वारा खुले हुए स्वर्गलोकमें जाता है ॥
गोप्रयुक्तं धनिष्ठासु यानं दत्त्वा समाहितः ।
वस्त्रराशिधनं सद्यः प्रेत्य राज्यं प्रपद्यते ॥ २९ ॥
जो धनिष्ठा नक्षत्रमें एकाग्रचित्त होकर बैलगाड़ी, वस्त्र-समूह तथा धन दान करता है, वह मृत्युके पश्चात् शीघ्र ही राज्य पाता है ॥ २९ ॥
गन्धान् शतभिषायोगे दत्त्वा सागुरुचन्दनान् ।
प्राप्नोत्यप्सरसां संघान् प्रेत्य गन्धांश्च शाश्वतान् ॥ ३० ॥
जो शतभिषा नक्षत्रके योगमें अगुरु और चन्दन-सहित सुगन्धित पदार्थोंका दान करता है, वह परलोकमें अप्सराओंके समुदाय तथा अक्षय गन्धको पाता है ॥ ३० ॥
पूर्वाभाद्रपदायोगे राजमाषान् प्रदाय तु ।
सर्वभक्षफलोपेतः स वै प्रेत्य सुखी भवेत् ॥ ३१ ॥
पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्रके योगमें बड़ी उड़द या सफेद मटरका दान करके मनुष्य परलोकमें सब प्रकारकी खाद्य वस्तुओंसे सम्पन्न हो सुखी होता है ॥ ३१ ॥
औरभ्रमुत्तरायोगे यस्तु मांसं प्रयच्छति ।
स पितॄन् प्रीणयति वै प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥ ३२ ॥
जो उत्तराभाद्रपदा नक्षत्रके योगमें औरभ्र फलका गूदा दान करता है, वह पितरोंको तृप्त करता और परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता है ॥ ३२ ॥
कांस्योपदोहनां धेनुं रेवत्यां यः प्रयच्छति ।
सा प्रेत्य कामानादाय दातारमुपतिष्ठति ॥ ३३ ॥
जो रेवती नक्षत्रमें कांसके दुग्धपात्रसे युक्त धेनुका दान करता है वह धेनु परलोकमें सम्पूर्ण भोगोंको लेकर उस दाताकी सेवामें उपस्थित होती है ॥ ३३ ॥
रथमश्वसमायुक्तं दत्त्वाश्विन्यां नरोत्तमः ।
हस्त्यश्वरथसम्पन्ने वर्चस्वी जायते कुले ॥ ३४ ॥
जो नरश्रेष्ठ अश्विनी नक्षत्रमें घोड़े जुते हुए रथका दान करता है, वह हाथी, घोड़े और रथसे सम्पन्न कुलमें तेजस्वी पुत्ररूपसे जन्म लेता है ॥ ३४ ॥
भरणीषु द्विजातिभ्यस्तिलधेनुं प्रदाय वै ।
गाः सुप्रभूताः प्राप्नोति नरः प्रेत्य यशस्तथा ॥ ३५ ॥
जो भरणी नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको तिलमयी धेनुका दान करता है, वह इस लोकमें बहुत-सी गौओंको तथा परलोकमें महान् यशको प्राप्त करता है ॥ ३५ ॥
भीष्म उवाच
इत्येष लक्षणोद्देशः प्रोक्तो नक्षत्रयोगतः ।
देवक्या नारदेनेह सा स्नुषाभ्योऽब्रवीदिदम् ॥ ३६ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार नक्षत्रोंके योगमें किये जानेवाले विविध वस्तुओंके दानका संक्षेपसे यहाँ वर्णन किया गया है। नारदजीने देवकीसे और देवकीजीने अपनी पुत्रवधुओंसे यह विषय सुनाया था ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि नक्षत्रयोगदानं नाम
चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें नक्षत्रयोग सम्बन्धी दान नामक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 610)
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
सुवर्ण और जल आदि विभिन्न वस्तुओंके दानकी महिमा
भीष्म उवाच
सर्वान् कामान् प्रयच्छन्ति ये प्रयच्छन्ति काञ्चनम् ।
इत्येवं भगवानत्रिः पितामहसुतोऽब्रवीत् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ब्रह्माजीके पुत्र भगवान् अत्रिका प्राचीन वचन है कि 'जो सुवर्णका दान करते हैं, वे मानो याचककी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं' ॥ १ ॥
पवित्रमथ चायुष्यं पितॄणामक्षयं च तत् ।
सुवर्णं मनुजेन्द्रेण हरिश्चन्द्रेण कीर्तितम् ॥ २ ॥
राजा हरिश्चन्द्रने कहा है कि 'सुवर्ण परम पवित्र, आयु बढ़ानेवाला और पितरोंको अक्षय गति प्रदान करनेवाला है' ॥ २ ॥
पानीयं परमं दानं दानानां मनुरब्रवीत् ।
तस्मात् कूपांश्च वापींश्च तडागानि च खानयेत् ॥ ३ ॥
मनुजीने कहा है कि 'जलका दान सब दानोंसे बढ़कर है।' इसलिये कुएँ, बावड़ी और पोखरे खुदवाने चाहिये ॥ ३ ॥
अर्धं पापस्य हरति पुरुषस्येह कर्मणः ।
कूपः प्रवृत्तपानीयः सुप्रवृत्तश्च नित्यशः ॥ ४ ॥
जिसके खुदवाये हुए कुएँमें अच्छी तरह पानी निकलकर यहाँ सदा सब लोगोंके उपयोगमें आता है, वह उस मनुष्यके पापकर्मका आधा भाग हर लेता है ॥ ४ ॥
सर्वं तारयते वंशं यस्य खाते जलाशये ।
गावः पिबन्ति विप्राश्च साधवश्च नराः सदा ॥ ५ ॥
जिसके खोदवाये हुए जलाशयमें गौ, ब्राह्मण तथा श्रेष्ठ पुरुष सदा जल पीते हैं, वह जलाशय उस मनुष्यके समूचे कुलका उद्धार कर देता है ॥ ५ ॥
निदाघकाले पानीयं यस्य तिष्ठत्यवारितम् ।
स दुर्गं विषमं कृत्स्नं न कदाचिदवाप्नुते ॥ ६ ॥
जिसके बनवाये हुए तालाबमें गरमीके दिनोंमें भी पानी मौजूद रहता है, कभी घटता नहीं है, वह पुरुष कभी अत्यन्त विषम संकटमें नहीं पड़ता ॥ ६ ॥
बृहस्पतेर्भगवतः पूष्णश्चैव भगस्य च ।
अश्विनोश्चैव वह्नेश्च प्रीतिर्भवति सर्पिषा ॥ ७ ॥
घी दान करनेसे भगवान् बृहस्पति, पूषा, भग, अश्विनीकुमार और अग्निदेव प्रसन्न होते हैं ॥ ७ ॥
परमं भेषजं ह्येतद् यज्ञानामेतदुत्तमम् ।
रसानामुत्तमं चैतत् फलानां चैतदुत्तमम् ॥ ८ ॥
घी सबसे उत्तम औषध और यज्ञ करनेकी सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। वह रसोंमें उत्तम रस है और फलोंमें सर्वोत्तम फल है ॥ ८ ॥
फलकामो यशस्कामः पुष्टिकामश्च नित्यदा ।
घृतं दद्याद् द्विजातिभ्यः पुरुषः शुचिरात्मवान् ॥ ९ ॥
जो सदा फल, यश और पुष्टि चाहता हो वह पुरुष पवित्र हो मनको वशमें करके द्विजातियोंको घृत दान करे ॥ ९ ॥
घृतं मासे आश्वयुजि विप्रेभ्यो यः प्रयच्छति ।
तस्मै प्रयच्छतो रूपं प्रीतौ देवाविहाश्विनौ ॥ १० ॥
जो आश्विन मासमें ब्राह्मणोंको घृत दान करता है, उसपर देववैद्य अश्विनीकुमार प्रसन्न होकर यहाँ उसे रूप प्रदान करते हैं ॥ १० ॥
पायसं सर्पिषा मिश्रं द्विजेभ्यो यः प्रयच्छति ।
गृहं तस्य न रक्षांसि धर्षयन्ति कदाचन ॥ ११ ॥
जो ब्राह्मणोंको घृतमिश्रित खीर देता है, उसके घरपर कभी राक्षसोंका आक्रमण नहीं होता ॥ ११ ॥
पिपासया न म्रियते सोपच्छन्दश्च जायते ।
न प्राप्नुयाच्च व्यसनं करकान् यः प्रयच्छति ॥ १२ ॥
जो पानीसे भरा हुआ कमण्डलु दान करता है, वह कभी प्याससे नहीं मरता। उसके पास सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री मौजूद रहती है और वह संकटमें नहीं पड़ता ॥ १२ ॥
प्रयतो ब्राह्मणाग्रे यः श्रद्धया परया युतः ।
उपस्पर्शनषड्भागं लभते पुरुषः सदा ॥ १३ ॥
जो पुरुष सदा एकाग्रचित्त हो ब्राह्मणके आगे बड़ी श्रद्धाके साथ विनययुक्त व्यवहार करता है, वह पुरुष सदा दानके छठे भागका पुण्य प्राप्त कर लेता है ॥ १३ ॥
यः साधनार्थं काष्ठानि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति ।
प्रतापनार्थं राजेन्द्र वृत्तवद्द्भ्यः सदा नरः ॥ १४ ॥
सिद्ध्यन्त्यर्थाः सदा तस्य कार्याणि विविधानि च ।
उपर्युपरि शत्रूणां वपुषा दीप्यते च सः ॥ १५ ॥
राजेन्द्र! जो मनुष्य सदाचारसम्पन्न ब्राह्मणोंको भोजन बनाने और तापनेके लिये सदा लकड़ियाँ देता है, उसकी सभी कामनाएँ तथा नाना प्रकारके कार्य सदा ही सिद्ध होते रहते हैं और वह शत्रुओंके ऊपर-ऊपर रहकर अपने तेजस्वी शरीरसे देदीप्यमान होता है ॥ १४-१५ ॥
भगवांश्चापि सम्प्रीतो वह्निर्भवति नित्यशः ।
न तं त्यजन्ति पशवः संग्रामे च जयत्यपि ॥ १६ ॥
इतना ही नहीं, उसके ऊपर सदा भगवान् अग्निदेव प्रसन्न रहते हैं। उसके पशुओंकी हानि नहीं होती तथा वह संग्राममें विजयी होता है ॥ १६ ॥
पुत्राञ्छ्रियं च लभते यश्छत्रं सम्प्रयच्छति ।
न चक्षुर्व्याधिं लभते यज्ञभागमथाश्नुते ॥ १७ ॥
जो पुरुष छाता दान करता है उसे पुत्र और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। उसके नेत्रमें कोई रोग नहीं होता और उसे सदा यज्ञका भाग मिलता है ॥ १७ ॥
निदाघकाले वर्षे वा यश्छत्रं सम्प्रयच्छति ।
नास्य कश्चिन्मनोदाहः कदाचिदपि जायते ।
कृच्छ्रात् स विषमाच्चैव क्षिप्रं मोक्षमवाप्नुते ॥ १८ ॥
जो गर्मी और बरसातके महीनोंमें छाता दान करता है, उसके मनमें कभी संताप नहीं होता। वह कठिन-से-कठिन संकटसे शीघ्र ही छुटकारा पा जाता है ॥ १८ ॥
प्रदानं सर्वदानानां शकटस्य विशाम्पते ।
एवमाह महाभागः शाण्डिल्यो भगवानृषिः ॥ १९ ॥
प्रजानाथ! महाभाग भगवान् शाण्डिल्य ऋषि ऐसा कहते हैं कि 'शकट (बैलगाड़ी) का दान उपर्युक्त सब दानोंके बराबर है' ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥