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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन

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पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन

उमोवाच

किंशीलः किंसमाचारः पुरुषः कैश्च कर्मभिः ।
स्वर्गं समभिपद्येत सम्प्रदानेन केन वा ॥ १ ॥

पार्वतीने पूछा—भगवन्! मनुष्य किस प्रकारके शील, कैसे सदाचार और किन कर्मोंसे युक्त होकर अथवा किस दानके द्वारा स्वर्गमें जाता है ॥ १ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

दाता ब्राह्मणसत्कर्ता दीनार्तकृपणादिषु ।
भक्ष्यभोज्यान्नपानानां वाससां च प्रदायकः ॥ २ ॥
प्रतिश्रयान् सभाः कूपान् प्रपाः पुष्करिणीस्तथा ।
नैत्यकानि च सर्वाणि किमिच्छकमतीव च ॥ ३ ॥
आसनं शयनं यानं गृहं रत्नं धनं तथा ।
सस्यजातानि सर्वाणि गाः क्षेत्राण्यथ योषितः ॥ ४ ॥
सुप्रतीतमना नित्यं यः प्रयच्छति मानवः ।
एवंभूतो नरो देवि देवलोकेऽभिजायते ॥ ५ ॥

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो मनुष्य ब्राह्मणोंका सम्मान और दान करता है दीन, दुःखी और दरिद्र आदि मनुष्योंको भक्ष्य-भोज्य, अन्न-पान और वस्त्र प्रदान करता है, ठहरनेके स्थान, धर्मशाला, कुआँ, प्याऊ, पोखरी या बावड़ी आदि बनवाता है, लेनेवाले लोगोंकी इच्छा पूछ-पूछकर नित्य देनेयोग्य वस्तुएँ दान करता है, समस्त नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करता है, आसन, शय्या, सवारी, गृह, रत्न, धन, धान्य, गौ, खेत और कन्याओंका प्रसन्नतापूर्वक दान करता है, देवि! ऐसा मनुष्य देवलोकमें जन्म लेता है ॥ २—५ ॥

तत्रोष्य सुचिरं कालं भुक्त्वा भोगाननुत्तमान् ।
सहाप्सतेभिर्मुदितो रमते नन्दनादिषु ॥ ६ ॥

वहाँ चिरकालतक निवास करके उत्तम भोगोंका भोग करते हुए नन्दन आदि वनोंमें अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रमण करता है ॥ ६ ॥

तस्मात् स्वर्गाच्च्युतो लोकान् मानुषेषु प्रजायते ।
महाभोगकुले देवि धनधान्यसमन्वितः ॥ ७ ॥

देवि! फिर वह स्वर्गलोकसे नीचे आनेपर मनुष्य-जातिके भीतर महान् भोगोंसे सम्पन्न कुलमें जन्म लेता है और धन-धान्यसे सम्पन्न होता है॥ ७॥
तत्र कामगुणैः सर्वैः समुपेतो मुदा युतः ।
महाभोगो महाकोशो धनी भवति मानवः ॥ ८ ॥
मानवयोनिमें वह समस्त कमनीय गुणोंसे सम्पन्न एवं प्रसन्न होता है। उसके पास महान् भोगसामग्री संचित रहती है। उसका खजाना भी विशाल होता है। वह मनुष्य सभी दृष्टियोंसे धनवान् होता है॥ ८॥
एते देवि महाभागाः प्राणिनो दानशीलिनः ।
ब्रह्मणा वै पुरा प्रोक्ताः सर्वस्य प्रियदर्शनाः ॥ ९ ॥
देवि! ये दानशील प्राणी ही ऐसे महान् सौभाग्यसे सम्पन्न होते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इनका ऐसा ही परिचय दिया है। दाता मनुष्य सभीकी दृष्टिमें प्रिय होते हैं॥ ९॥
अपरे मानवा देवि प्रदानकृपणा द्विजैः ।
याचिता न प्रयच्छन्ति विद्यमानेऽप्यबुद्धयः ॥ १० ॥
देवि! दूसरे बहुत-से मनुष्य दान देनेमें कृपण होते हैं। वे मन्दबुद्धि मानव ब्राह्मणोंके माँगनेपर अपने पास धन होते हुए भी उन्हें कुछ नहीं देते॥ १०॥
दीनान्धकृपणान् दृष्ट्वा भिक्षुकानतिथीनपि ।
याच्यमाना निवर्तन्ते जिह्वालोभसमन्विताः ॥ ११ ॥
वे दीनों, अन्धों, दरिद्रों, भिखमंगों और अतिथियोंको देखते ही हट जाते हैं। उनके याचना करनेपर भी जिह्वाकी लोलुपताके कारण उन्हें अन्न नहीं देते॥ ११॥
न धनानि न वासांसि न भोगान् न च काञ्चनम् ।
न गावो नान्नविकृतिं प्रयच्छन्ति कदाचन ॥ १२ ॥
वे न धन, न वस्त्र, न भोग, न सुवर्ण, न गौ और न अन्नकी बनी हुई नाना प्रकारकी खाद्य वस्तुओंका कभी दान करते हैं॥ १२॥
अप्रवृत्ताश्च ये लुब्धा नास्तिका दानवर्जिताः ।
एवंभूता नरा देवि निरयं यान्त्यबुद्धयः ॥ १३ ॥
देवि! ऐसे अकर्मण्य, लोभी, नास्तिक तथा दानधर्मसे दूर रहनेवाले बुद्धिहीन मनुष्य नरकमें पड़ते हैं॥ १३॥
ते वै मनुष्यतां यान्ति यदा कालस्य पर्ययात् ।
धनरिक्ते कुले जन्म लभन्ते स्वल्पबुद्धयः ॥ १४ ॥
यदि कालचक्रके फेरसे वे मन्दबुद्धि मानव पुनः मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं तो निर्धन कुलमें ही उत्पन्न होते हैं॥ १४॥
क्षुत्पिपासापरीताश्च सर्वलोकबहिष्कृताः ।
निराशाः सर्वभोगेभ्यो जीवन्त्यधर्मजीविकाम् ॥ १५ ॥

वहाँ सदा भूख-प्यासका कष्ट सहते हैं। सब लोग उन्हें समाजसे बाहर कर देते हैं तथा वे सब प्रकारके भोगोंसे निराश होकर पापाचारसे जीविका चलाते हैं ॥ १५ ॥
अल्पभोगकुले जाता अल्पभोगरता नराः ।
अनेन कर्मणा देवि भवन्त्यधनिनो नराः ॥ १६ ॥
देवि! इस पापकर्मसे ही मनुष्य अल्प भोगवाले कुलमें जन्म लेता है, थोड़े-से ही भोग भोगते और सदा निर्धन रहते हैं ॥ १६ ॥
अपरे स्तम्भिनो नित्यं मानिनः पापतो रताः ।
आसनार्हस्य ये पीठं न प्रयच्छन्त्यचेतसः ॥ १७ ॥
इनके सिवा दूसरे भी ऐसे मनुष्य हैं, जो सदा गर्व और अभिमानमें फूले तथा पापमें रत रहते हैं। वे मूर्ख आसन देनेयोग्य पूज्य पुरुषको बैठनेके लिये कोई पीढ़ा या चौकीतक नहीं देते हैं ॥ १७ ॥
मार्गार्हस्य च ये मार्गं न यच्छन्त्यल्पबुद्धयः ।
पाद्यार्हस्य च ये पाद्यं न ददत्यल्पबुद्धयः ॥ १८ ॥
वे बुद्धिहीन अथवा मन्दबुद्धि पुरुष मार्ग देनेयोग्य पुरुषोंको जानेके लिये मार्ग नहीं देते और पाद्य अर्पण करनेयोग्य पूजनीय पुरुषोंको पाद्य (पैर धोनेके लिये जल) नहीं देते हैं ॥ १८ ॥
अर्घ्यार्हान् न च सत्कारैरर्चयन्ति यथाविधि ।
अर्घ्यमाचमनीयं वा न यच्छन्त्यल्पबुद्धयः ॥ १९ ॥
इतना ही नहीं, वे अर्घ्य देनेयोग्य माननीय व्यक्तियोंका नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा विधिपूर्वक पूजन नहीं करते अथवा वे मूर्ख उन्हें अर्घ्य या आचमनीय नहीं देते हैं ॥ १९ ॥
गुरुं चाभिगतं प्रेम्णा गुरुवन्न बुभूषते ।
अभिमानप्रवृत्तेन लोभेन समवस्थिताः ॥ २० ॥
सम्मान्यांश्चावमन्यन्ते वृद्धान् परिभवन्ति च ।
एवंविधा नरा देवि सर्वे निरयगामिनः ॥ २१ ॥
गुरुके आनेपर प्रेमपूर्वक उनकी पूजा नहीं करते—उन्हें गुरुवत् सम्मान नहीं देना चाहते, अभिमान और लोभके वशीभूत होकर वे सम्माननीय मनुष्योंका अपमान और बड़े-बूढ़ोंका तिरस्कार करते हैं। देवि! ऐसा करनेवाले सभी मनुष्य नरकगामी होते हैं ॥ २०-२१ ॥
ते वै यदि नरास्तस्मान्निरयादुत्तरन्ति वै ।
वर्षपूगैस्ततो जन्म लभन्ते कुत्सिते कुले ॥ २२ ॥
श्वपाकपुल्कसादीनां कुत्सितानामचेतसाम् ।
कुलेषु तेषु जायन्ते गुरुवृद्धापचायिनः ॥ २३ ॥

बहुत वर्षोंके बाद जब वे उस नरकसे छुटकारा पाते हैं तो श्वपाक और पुल्कस आदि निन्दित और मूढ़ मनुष्योंके कुत्सित कुलमें जन्म लेते हैं। गुरुजनों और वृद्धोंका तिरस्कार करनेवाले वे अधम मानव चाण्डालोंके उन्हीं निन्दित कुलोंमें उत्पन्न होते हैं ।। २२-२३ ।।
न स्तम्भी न च मानी यो देवताद्विजपूजकः ।
लोकपूज्यो नमस्कर्ता प्रश्रितो मधुरं वचः ।। २४ ।।
सर्ववर्णप्रियकरः सर्वभूतहितः सदा ।
अद्वेषी सुमुखः श्लक्ष्णः स्निग्धवाणीप्रदः सदा ।। २५ ।।
स्वागतेनैव सर्वेषां भूतानामविहिंसकः ।
यथार्हसत्क्रियापूर्वमर्चयन्तवतिष्ठति ।। २६ ।।
मार्गाहाय ददन्मार्गं गुरुं गुरुवदर्चयन् ।
अतिथिप्रग्रहरतस्तथाभ्यागतपूजकः ।। २७ ।।
एवंभूतो नरो देवि स्वर्गतिं प्रतिपद्यते ।
ततो मानुषतां प्राप्य विशिष्टकुलजो भवेत् ।। २८ ।।
देवि ! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोंका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात् मानव-योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है ।। २४—२८ ।।
तत्रासौ विपुलैर्भोगैः सर्वरत्नसमायुतः ।
यथार्हदाता चार्हेषु धर्मचर्यापरो भवेत् ।। २९ ।।
उस जन्ममें वह महान् भोगों और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न हो सुयोग्य ब्राह्मणोंको यथायोग्य दान देता और धर्मानुष्ठानमें तत्पर रहता है ।। २९ ।।
सम्मतः सर्वभूतानां सर्वलोकनमस्कृतः ।
स्वकर्मफलमाप्नोति स्वयमेव नरः सदा ।। ३० ।।
वहाँ सब प्राणी उसका सम्मान करते हैं और सब लोग उसके सामने नतमस्तक होते हैं। इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मोंका फल सदा स्वयं ही भोगता है ।। ३० ।।
उदात्तकुलजातीय उदात्ताभिजनः सदा ।
एष धर्मो मया प्रोक्तो विधात्रा स्वयमीरितः ।। ३१ ।।

धर्मात्मा मनुष्य सर्वदा उत्तम कुल, उत्तम जाति और उत्तम स्थानमें जन्म धारण करता
है। यह साक्षात् ब्रह्माजीके बताये हुए धर्मका मैंने वर्णन किया है॥ ३१॥
यस्तु रौद्रसमाचारः सर्वसत्त्वभयंकरः ।
हस्ताभ्यां यदि वा पद्भ्यां रज्ज्वा दण्डेन वा पुनः ॥ ३२॥
लोष्टैः स्तम्भैरायुधैर्वा जन्तून् बाधति शोभने ।
हिंसार्थं निकृतिप्रज्ञः प्रोद्वेजयति चैव ह ॥ ३३ ॥
उपक्रामति जन्तूंश्च उद्वेगजननः सदा ।
एवंशीलसमाचारो निरयं प्रतिपद्यते ॥ ३४ ॥
शोभने! जिस मनुष्यका आचरण क्रूरतासे भरा हुआ है, जिससे समस्त जीवोंको भय
प्राप्त होता है, जो हाथ, पैर, रस्सी, डंडे और ढेलेसे मारकर, खम्भोंमें बाँधकर तथा घातक
शस्त्रोंका प्रहार करके जीव-जन्तुओंको सताता है, छल-कपटमें प्रवीण होकर हिंसाके लिये
उन जीवोंमें उद्वेग पैदा करता है तथा उद्वेगजनक होकर सदा उन जन्तुओंपर आक्रमण
करता है, ऐसे स्वभाव और आचारवाले मनुष्यको नरकमें गिरना पड़ता है॥
स वै मनुष्यतां गच्छेद यदि कालस्य पर्ययात् ।
बह्वाबाधपरिक्लिष्टे जायते सोऽधमे कुले ॥ ३५ ॥
यदि वह कालचक्रके फेरसे फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो अनेक प्रकारकी विघ्न-
बाधाओंसे कष्ट उठानेवाले अधम कुलमें उत्पन्न होता है॥ ३५॥
लोकद्वेष्योऽधमः पुंसां स्वयं कर्मफलैः कृतैः ।
एष देवि मनुष्येषु बोद्धव्यो ज्ञातिबन्धुषु ॥ ३६॥
देवि! ऐसा मनुष्य अपने ही किये हुए कर्मोंके फलके अनुसार मनुष्योंमें तथा जाति-
बन्धुओंमें नीच समझा जाता है और सब लोग उससे द्वेष रखते हैं॥
अपरः सर्वभूतानि दयावाननुपश्यति ।
मैत्रदृष्टिः पितृसमो निर्वैरो नियतेन्द्रियः ॥ ३७ ॥
नोद्वेजयति भूतानि न विघातयते तथा ।
हस्तपादैः सुनियतैर्विश्वास्यः सर्वजन्तुषु ॥ ३८ ॥
न रज्ज्वा न च दण्डेन न लोष्टैर्नायुधेन च ।
उद्वेजयति भूतानि श्लक्ष्णकर्मा दयापरः ॥ ३९ ॥
एवंशीलसमाचारः स्वर्गे समुपजायते ।
तत्रासौ भवने दिव्ये मुदा वसति देववत् ॥ ४० ॥
इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियोंके प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता
है, सबके ऊपर पिताके समान स्नेह रखता है, किसीके साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियोंको
वशमें किये रहता है, जो हाथ-पैर आदिको अपने अधीन रखकर किसी भी जीवको न तो
उद्वेगमें डालता और न मारता ही है, जिसपर सब प्राणी विश्वास करते हैं, जो रस्सी, डंडे,

ढेले और घातक अस्त्र-शस्त्रोंसे प्राणियोंको कष्ट नहीं पहुँचाता, जिसके कर्म कोमल एवं निर्दोष होते हैं तथा जो सदा ही दयापरायण होता है, ऐसे स्वभाव और आचरणवाला पुरुष स्वर्गलोकमें दिव्य शरीर धारण करता है और वहाँके दिव्य भवनमें देवताओंके समान आनन्दपूर्वक निवास करता है ॥ ३७—४० ॥

स चेत् कर्मक्षयान्मर्त्यो मनुष्येषूपजायते ।
अल्पाबाधो निरातङ्कः स जातः सुखमेधते ॥ ४१ ॥
सुखभागी निरायासो निरुद्वेगः सदा नरः ।
एष देवि सतां मार्गो बाधा यत्र न विद्यते ॥ ४२ ॥

फिर पुण्यकर्मोंके क्षीण होनेपर यदि वह मृत्यु-लोकमें जन्म लेता है, तो उसके ऊपर बाधाओंका आक्रमण कम होता है। वह निर्भय हो सुखसे अपनी उन्नति करता है। सुखका भागी होकर आयास और उद्वेगसे रहित जीवन व्यतीत करता है। देवि! यह सत्पुरुषोंका मार्ग है, जहाँ किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा नहीं आने पाती ॥ ४१-४२ ॥

उमोवाच

इमे मनुष्या दृश्यन्ते ऊहापोहविशारदाः ।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः प्रज्ञावन्तोऽर्थकोविदाः ॥ ४३ ॥

पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! इन मनुष्योंमेंसे कुछ तो ऊहापोहमें कुशल, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, बुद्धिमान् और अर्थनिपुण देखे जाते हैं ॥ ४३ ॥

दुष्प्रज्ञाश्चापरे देव ज्ञानविज्ञानवर्जिताः ।
केन कर्मविशेषेण प्रज्ञावान् पुरुषो भवेत् ॥ ४४ ॥

देव! कुछ दूसरे मानव ज्ञान-विज्ञानसे शून्य और दुर्बुद्धि दिखायी देते हैं। ऐसी दशामें मनुष्य कौन-सा विशेष कर्म करनेसे बुद्धिमान् हो सकता है? ॥ ४४ ॥

अल्पप्रज्ञो विरूपाक्ष कथं भवति मानवः ।
एतन्मे संशयं छिन्धि सर्वधर्मविदां वर ॥ ४५ ॥

विरूपाक्ष! मनुष्य मन्दबुद्धि कैसे होता है? सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महादेव! आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये ॥ ४५ ॥

जात्यन्धाश्चापरे देव रोगार्ताश्चापरे तथा ।
नराः क्लीबाश्च दृश्यन्ते कारणं ब्रूहि तत्र वै ॥ ४६ ॥

देव! कुछ लोग जन्मान्ध, कुछ रोगसे पीड़ित और कितने ही नपुंसक देखे जाते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ॥ ४६ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ब्राह्मणान् वेदविदुषः सिद्धान् धर्मविदस्तथा ।
परिपृच्छन्त्यहरहः कुशलाः कुशलं तथा ॥ ४७ ॥

वर्जयन्तोऽशुभं कर्म सेवमानाः शुभं तथा ।
लभन्ते स्वर्गतिं नित्यमिहलोके तथा सुखम् ॥ ४८ ॥
श्रीमहादेवजीने कहा— देवि! जो कुशल मनुष्य सिद्ध, वेदवेत्ता और धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे प्रतिदिन उनकी कुशल पूछते हैं और अशुभ कर्मका परित्याग करके शुभकर्मका सेवन करते हैं, वे परलोकमें स्वर्ग और इहलोकमें सदा सुख पाते हैं ॥ ४७-४८ ॥
स चेन्मानुषतां याति मेधावी तत्र जायते ।
श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य कल्याणमुपजायते ॥ ४९ ॥
ऐसे आचरणवाला पुरुष यदि स्वर्गसे लौटकर फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो वह मेधावी होता है। शास्त्र उसकी बुद्धिका अनुसरण करता है, अतः वह सदा कल्याणका भागी होता है ॥ ४९ ॥
परदारेषु ये चापि चक्षुर्दुष्टं प्रयुञ्जते ।
तेन दुष्टस्वभावेन जात्यन्धास्ते भवन्ति ह ॥ ५० ॥
जो परायी स्त्रियोंके प्रति सदा दोषभरी दृष्टि डालते हैं, उस दुष्ट स्वभावके कारण वे जन्मान्ध होते हैं ॥
मनसा तु प्रदुष्टेन नग्नां पश्यन्ति ये स्त्रियम् ।
रोगार्तास्ते भवन्तीह नरा दुष्कृतकर्मिणः ॥ ५१ ॥
जो दूषित हृदयसे किसी नंगी स्त्रीकी ओर निहारते हैं, वे पापकर्मी मनुष्य इस लोकमें रोगसे पीड़ित होते हैं ॥ ५१ ॥
ये तु मूढा दुराचारा वियोनौ मैथुने रताः ।
पुरुषेषु सुदुष्प्रज्ञा क्लीबत्वमुपयान्ति ते ॥ ५२ ॥
जो दुराचारी, दुर्बुद्धि एवं मूढ़ मनुष्य पशु आदिकी योनिमें मैथुन करते हैं, वे पुरुषोंमें नपुंसक होते हैं ॥
पशूंश्च ये घातयन्ति ये चैव गुरुतल्पगाः ।
प्रकीर्णमैथुना ये च क्लीबा जायन्ति ते नसः ॥ ५३ ॥
जो पशुओंकी हत्या कराते, गुरुकी शय्यापर सोते और वर्णसंकर जातिकी स्त्रियोंसे समागम करते हैं, वे मनुष्य नपुंसक होते हैं ॥ ५३ ॥

उमोवाच

सावद्यं किन्नु वै कर्म निरवद्यं तथैव च ।
श्रेयः कुर्वन्नवाप्नोति मानवो देवसत्तम ॥ ५४ ॥
पार्वतीने पूछा— देवश्रेष्ठ! कौन सदोष कर्म हैं और कौन निर्दोष, कौन-सा कर्म करके मनुष्य कल्याणका भागी होता है? ॥ ५४ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

श्रेयांसं मार्गमन्विच्छन् सदा यः पृच्छति द्विजान् ।
धर्मान्वेषी गुणाकांक्षी स स्वर्गं समुपानुते ॥ ५५ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— जो श्रेष्ठ मार्गको पानेकी इच्छा रखकर सदा ही ब्राह्मणोंसे उसके विषयमें पूछता है, धर्मका अन्वेषण करता और सद्गुणोंकी अभिलाषा रखता है, वही स्वर्गलोकके सुखका अनुभव करता है ॥ ५५ ॥

यदि मानुषतां देवि कदाचित् स निगच्छति ।
मेधावी धारणायुक्तः प्रायस्तत्राभिजायते ॥ ५६ ॥
देवि! ऐसा मनुष्य यदि कभी मानवयोनिको प्राप्त होता है तो वहाँ प्रायः मेधावी एवं धारण शक्तिसे सम्पन्न होता है ॥ ५६ ॥

एष देवि सतां धर्मो मन्तव्यो भूतिकारकः ।
नृणां हितार्थाय मया तव वै समुदाहृतः ॥ ५७ ॥
देवि! यह सत्पुरुषोंका धर्म है, उसे कल्याणकारी मानना चाहिये। मैंने मनुष्योंके हितके लिये इस धर्मका तुम्हें भलीभाँति उपदेश किया है ॥ ५७ ॥

उमोवाच

अपरे स्वल्पविज्ञाना धर्मविद्वेषिणो नराः ।
ब्राह्मणान् वेदविदुषो नेच्छन्ति परिसर्पितुम् ॥ ५८ ॥
पार्वतीने पूछा— भगवन्! दूसरे बहुत-से ऐसे मनुष्य हैं, जो अल्पबुद्धि होनेके कारण धर्मसे द्वेष करते हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके पास नहीं जाना चाहते हैं ॥ ५८ ॥

व्रतवन्तो नराः केचिच्छ्रद्धाधर्मपरायणाः ।
अव्रता भ्रष्टनियमास्तथान्ये राक्षसोपमाः ॥ ५९ ॥
कुछ मनुष्य व्रतधारी, श्रद्धालु और धर्मपरायण होते हैं तथा दूसरे व्रतहीन, नियमभ्रष्ट तथा राक्षसोंके समान होते हैं ॥ ५९ ॥

यज्वानश्च तथैवान्ये निर्होमाश्च तथापरे ।
केन कर्मविपाकेन भवन्तीह वदस्व मे ॥ ६० ॥
कितने ही यज्ञशील होते हैं और दूसरे मनुष्य होम और यज्ञसे दूर ही रहते हैं। किस कर्मविपाकसे मनुष्य इस प्रकार परस्परविरोधी स्वभावके हो जाते हैं? यह मुझे बताइये ॥ ६० ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

आगमा लोकधर्माणां मर्यादाः सर्वनिर्मिताः ।
प्रामाण्येनानुवर्तन्ते दृश्यन्ते च दृढव्रताः ॥ ६१ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! शास्त्र लोकधर्मोंकी उन मर्यादाओंको स्थापित करते हैं, जो सबके हितके लिये निर्मित हुई हैं। जो उन शास्त्रोंको प्रमाण मानते हैं, वे दृढ़तापूर्वक उत्तम

व्रतका पालन करते देखे जाते हैं ।।
अधर्मं धर्ममित्याहुर्ये च मोहवशं गताः ।
अव्रता नष्टमर्यादास्ते प्रोक्ता ब्रह्मराक्षसाः ।। ६२ ।।
जो मोहके वशीभूत होकर अधर्मको धर्म कहते हैं, वे व्रतहीन मर्यादाको नष्ट करनेवाले पुरुष ब्रह्मराक्षस कहे गये हैं ।। ६२ ।।
ते चेत्कालकृतोद्योगात् सम्भवन्तीह मानुषाः ।
निर्होमा निर्वषट्कारास्ते भवन्ति नराधमाः ।। ६३ ।।
वे मनुष्य यदि कालयोगसे इस संसारमें मनुष्य होकर जन्म लेते हैं तो होम और वषट्कारसे रहित तथा नराधम होते हैं ।। ६३ ।।
एष देवि मया सर्वः संशयच्छेदनाय ते ।
कुशलाकुशलो नृणां व्याख्यातो धर्मसागरः ।। ६४ ।।
देवि! यह धर्मका समुद्र, धर्मात्माओंके लिये प्रिय और पापात्माओंके लिये अप्रिय है। मैंने तुम्हारे संदेहका निवारण करनेके लिये यह सब विस्तारपूर्वक बताया है ।।