महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१९१-
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिकी शूरवीरता और प्रशंसा
संजय उवाच
तं दृष्ट्वा परमोद्विग्नं शोकोपहतचेतसम् ।
पाञ्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युम्नः समाद्रवत् ॥ १ ॥
य इष्ट्वा मनुजेन्द्रेण द्रुपदेन महामखे ।
लब्धो द्रोणविनाशाय समिद्धाद्धव्यवाहनात् ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! राजा द्रुपदने एक महान् यज्ञमें देवाराधन करके द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये प्रज्वलित अग्निसे जिस पुत्रको प्राप्त किया था, उस पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने जब देखा कि आचार्य द्रोण बड़े उद्विग्न हैं और उनका चित्त शोकसे व्याकुल है, तब उन्होंने उनपर धावा कर दिया ॥
स धनुर्जैत्रमादाय घोरं जलदनिःस्वनम् ।
दृढज्यमजरं दिव्यं शरं चाशीविषोपमम् ॥ ३ ॥
संदधे कार्मुके तस्मिंस्ततस्तमनलोपमम् ।
द्रोणं जिघांसुः पाञ्चाल्यो महाज्वालमिवानलम् ॥ ४ ॥
उन पांचालपुत्रने द्रोणाचार्यके वधकी इच्छा रखकर सुदृढ़ प्रत्यंचासे युक्त, मेघगर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले, कभी जीर्ण न होनेवाले, भयंकर तथा विजयशील दिव्य धनुष हाथमें लेकर उसके ऊपर विषधर सर्पके समान भयदायक और प्रचण्ड लपटोंवाले अग्निके तुल्य तेजस्वी एक बाण रखा ॥ ३-४ ॥
तस्य रूपं शरस्यासीद् धनुर्ज्यामण्डलान्तरे ।
द्योततो भास्करस्येव घनान्ते परिवेषिणः ॥ ५ ॥
धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेसे जो मण्डलाकार घेरा बन गया था, उसके भीतर उस तेजस्वी बाणका रूप शरत्कालमें परिधिके भीतर प्रकाशित होनेवाले सूर्यके समान जान पड़ता था ॥ ५ ॥
पार्षतेन परामृष्टं ज्वलन्तमिव तद् धनुः ।
अन्तकालमनुप्राप्तं मेनिरे वीक्ष्य सैनिकाः ॥ ६ ॥
धृष्टद्युम्नके हाथमें आये हुए उस प्रज्वलित अग्निके सदृश तेजस्वी धनुषको देखकर सब सैनिक यह समझने लगे कि 'मेरा अन्तकाल आ पहुँचा है' ॥ ६ ॥
तमिषुं संहतं तेन भारद्वाजः प्रतापवान् ।
दृष्ट्वामन्यत देहस्य कालपर्यायमागतम् ॥ ७ ॥
द्रुपदपुत्रके द्वारा उस बाणको धनुषपर रखा गया देख प्रतापी द्रोणने भी यह मान लिया कि 'अब इस शरीरका काल आ गया' ॥ ७ ॥
ततः प्रयत्नमातिष्ठदाचार्यस्तस्य वारणे ।
न चास्यास्त्राणि राजेन्द्र प्रादुरासन्महात्मनः ॥ ८ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर आचार्यने उस अस्त्रको रोकनेका प्रयत्न किया, परंतु उन महात्माके अन्तःकरणमें वे दिव्यास्त्र पूर्ववत् प्रकट न हो सके ॥ ८ ॥
तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकास्यतो गता ।
तस्य चाह्नस्त्रिभागेन क्षयं जग्मुः पतत्त्रिणः ॥ ९ ॥
उनके निरन्तर बाण चलाते चार दिन और एक रातका समय बीत चुका था। उस दिनके पंद्रह भागोंमेंसे तीन ही भागमें उनके सारे बाण समाप्त हो गये ॥ ९ ॥
स शरक्षयमासाद्य पुत्रशोकेन चार्दितः ।
विविधानां च दिव्यानामस्त्राणामप्रसादतः ॥ १० ॥
उत्स्रष्टुकामः शस्त्राणि ऋषिवाक्यप्रचोदितः ।
तेजसा पूर्यमाणश्च युयुधे न यथा पुरा ॥ ११ ॥
बाणोंके समाप्त हो जानेसे पुत्रशोकसे पीड़ित हुए द्रोणाचार्य नाना प्रकारके दिव्यास्त्रोंके प्रकट न होनेसे महर्षियोंकी आज्ञा मानकर अब हथियार डाल देनेको उद्यत हो गये; इसीलिये तेजसे परिपूर्ण होनेपर भी वे पूर्ववत् युद्ध नहीं करते थे ॥ १०-११ ॥
भूयश्चान्यत् समादाय दिव्यमाङ्गिरसं धनुः ।
शरांश्च ब्रह्मदण्डाभान् धृष्टद्युम्नमयोधयत् ॥ १२ ॥
इसके बाद द्रोणाचार्यने पुनः आंगिरस नामक दिव्य धनुष तथा ब्रह्मदण्डके समान बाण हाथमें लेकर धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ १२ ॥
ततस्तं शरवर्षेण महता समवाकिरत् ।
व्यशातयच्च संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नममर्षणम् ॥ १३ ॥
उन्होंने अत्यन्त कुपित होकर अमर्षमें भरे हुए धृष्टद्युम्नको अपनी भारी बाणवर्षासे ढक दिया और उन्हें क्षत-विक्षत कर दिया ॥ १३ ॥
शरांश्च शतधा तस्य द्रोणश्चिच्छेद सायकैः ।
ध्वजं धनुश्च निशितैः सारथिं चाप्यपातयत् ॥ १४ ॥
इतना ही नहीं, द्रोणाचार्यने अपने तीखे बाणोंद्वारा धृष्टद्युम्नके बाण, ध्वज और धनुषके सैकड़ों टुकड़े कर डाले और सारथिको भी मार गिराया ॥ १४ ॥
धृष्टद्युम्नः प्रहस्यान्यत् पुनरादाय कार्मुकम् ।
शितेन चैनं बाणेन प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ॥ १५ ॥
तब धृष्टद्युम्नने हँसकर फिर दूसरा धनुष उठाया और तीखे बाणद्वारा आचार्यकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १५ ॥
सोऽतिविद्धो महेष्वासोऽसम्भ्रान्त इव संयुगे ।
भल्लेन शितधारेण चिच्छेदास्य पुनर्धनुः ॥ १६ ॥
युद्धस्थलमें अत्यन्त घायल होकर भी महाधनुर्धर द्रोणने बिना किसी घबराहटके तीखी धारवाले भल्लसे पुनः उनका धनुष काट दिया ॥ १६ ॥
यच्चास्य बाणविकृतं धनूंषि च विशाम्पते ।
सर्वं चिच्छेद दुर्धर्षो गदां खड्गं च वर्जयन् ॥ १७ ॥
प्रजानाथ! धृष्टद्युम्नके जो-जो बाण, तरकस और धनुष आदि थे, उनमेंसे गदा और खड्गको छोड़कर शेष सारी वस्तुओंको दुर्धर्ष द्रोणाचार्यने काट डाला ॥
धृष्टद्युम्नं च विव्याध नवभिर्निशितैः शरैः ।
जीवितान्तकरैः क्रुद्धः क्रुद्धरूपं परंतपः ॥ १८ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणने कुपित होकर क्रोधमें भरे हुए धृष्टद्युम्नको नौ प्राणान्तकारी तीक्ष्ण बाणोंद्वारा बींध डाला ॥ १८ ॥
धृष्टद्युम्नोऽथ तस्याश्वान् स्वरथाश्वैर्महारथः ।
व्यामिश्रयदमेयात्मा ब्राह्ममस्त्रमुदीरयन् ॥ १९ ॥
तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न महारथी धृष्टद्युम्नने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करनेके लिये अपने रथके घोड़ोंको आचार्यके घोड़ोंसे मिला दिया ॥ १९ ॥
ते मिश्रा बह्वशोभन्त जवना वातरंहसः ।
पारावतसवर्णाश्च शोणाश्च भरतर्षभ ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! वे वायुके समान वेगशाली, कबूतरके समान रंगवाले और लाल घोड़े परस्पर मिलकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ २० ॥
यथा सविद्युतो मेघा नदन्तो जलदागमे ।
तथा रेजुर्महाराज मिश्रिता रणमूर्धनि ॥ २१ ॥
महाराज! जैसे वर्षाकालमें गर्जते हुए विद्युत्सहित मेघ सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार युद्धके मुहानेपर परस्पर मिले हुए वे घोड़े शोभा पाते थे ॥ २१ ॥
ईषाबन्धं चक्रबन्धं रथबन्धं तथैव च ।
प्रणाशयदमेयात्मा धृष्टद्युम्नस्य स द्विजः ॥ २२ ॥
उस समय अमेय बलसम्पन्न विप्रवर द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नके रथके ईषाबन्ध, चक्रबन्ध तथा रथबन्धको नष्ट कर दिया ॥ २२ ॥
स च्छिन्नधन्वा पाञ्चाल्यो निकृत्तध्वजसारथिः ।
उत्तमामापदं प्राप्य गदां वीरः परामृशत् ॥ २३ ॥
धनुष, ध्वज और सारथिके नष्ट हो जानेपर भारी विपत्तिमें पड़कर पांचालराजकुमार वीर धृष्टद्युम्नने गदा उठायी ॥ २३ ॥
तामस्य विशिखैस्तीक्ष्णैः क्षिप्यमाणां महारथः ।
निजघान शरैर्द्रोणः क्रुद्धः सत्यपराक्रमः ॥ २४ ॥
उसके द्वारा चलायी जानेवाली उस गदाको सत्यपराक्रमी महारथी द्रोणने कुपित हो बाणोंद्वारा नष्ट कर दिया ॥ २४ ॥
तां तु दृष्ट्वा नरव्याघ्रो द्रोणेन निहतां शरैः ।
विमलं खड्गमादत्त शतचन्द्रं च भानुमत् ॥ २५ ॥
उस गदाको द्रोणाचार्यके बाणोंसे नष्ट हुई देख पुरुषसिंह धृष्टद्युम्नने सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त चमकीली ढाल और चमचमाती हुई तलवार हाथमें ले ली ॥ २५ ॥
असंशयं तथाभूतः पाञ्चाल्यः साध्वमन्यत ।
वधमाचार्यमुख्यस्य प्राप्तकालं महात्मनः ॥ २६ ॥
उस अवस्थामें पांचालराजकुमारने यह निःसंदेह ठीक मान लिया कि अब आचार्यप्रवर महात्मा द्रोणके वधका समय आ पहुँचा है ॥ २६ ॥
ततः स रथनीडस्थं स्वरथस्य रथेषया ।
अगच्छदसिमुद्यम्य शतचन्द्रं च भानुमत् ॥ २७ ॥
उस समय उन्होंने तलवार और सौ चन्द्रचिह्नोंवाली ढाल लेकर अपने रथकी ईषाके मार्गसे रथकी बैठकमें बैठे हुए द्रोणपर आक्रमण किया ॥ २७ ॥
चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म धृष्टद्युम्नो महारथः ।
इयेष वक्षो भेत्तुं स भारद्वाजस्य संयुगे ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् महारथी धृष्टद्युम्नने दुष्कर कर्म करनेकी इच्छासे उस रणभूमिमें आचार्य द्रोणकी छातीमें तलवार भोंक देनेका विचार किया ॥ २८ ॥
सोऽतिष्ठद् युगमध्ये वै युगसन्नहनेषु च ।
जघनार्धेषु चाश्वानां तत् सैन्याः समपूजयन् ॥ २९ ॥
वे रथके जूएके ठीक बीचमें, जूएके बन्धनोंपर और द्रोणाचार्यके घोड़ोंके पिछले भागोंपर पैर जमाकर खड़े हो गये। उनके इस कार्यकी सभी सैनिकोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २९ ॥
तिष्ठतो युगपालीषु शोणानप्यधितिष्ठतः ।
नापश्यदन्तरं द्रोणस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ३० ॥
वे जूएके मध्यभागमें और द्रोणाचार्यके लाल घोड़ोंकी पीठपर पैर रखकर खड़े थे। उस अवस्थामें द्रोणाचार्यको उनके ऊपर प्रहार करनेका कोई अवसर ही नहीं दिखायी देता था, यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥
क्षिप्रं श्येनस्य चरतो यथैवामिषगृद्धिनः ।
तद्वदासीदभीसारो द्रोणपार्षतयो रणे ।। ३१ ।।
जैसे मांसके टुकड़ेके लोभसे विचरते हुए बाजका बड़े वेगसे आक्रमण होता है, उसी प्रकार रणभूमिमें द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नके परस्पर वेगपूर्वक आक्रमण होते थे ।। ३१ ।।
तस्य पारावतानश्वान् रथशक्त्या पराभिनत् ।
सर्वानैकैकशो द्रोणो रक्तानश्वान् विवर्जयन् ।। ३२ ।।
द्रोणाचार्यने लाल घोड़ोंको बचाते हुए रथशक्तिका प्रहार करके बारी-बारीसे कबूतरके समान रंगवाले सभी घोड़ोंको मार डाला ।। ३२ ।।
ते हता न्यपतन् भूमौ धृष्टद्युम्नस्य वाजिनः ।
शोणास्तु पर्यमुच्यन्त रथबन्धाद् विशाम्पते ।। ३३ ।।
प्रजानाथ! धृष्टद्युम्नके वे घोड़े मारे जाकर पृथ्वीपर गिर पड़े और लाल रंगवाले घोड़े रथके बन्धनसे मुक्त हो गये ।। ३३ ।।
तान् हयान् निहतान् दृष्ट्वा द्विजाग्र्येण स पार्षतः ।
नामृष्यत युधां श्रेष्ठो याज्ञसेनिर्महारथः ।। ३४ ।।
विप्रवर द्रोणके द्वारा अपने घोड़ोंको मारा गया देख योद्धाओंमें श्रेष्ठ पार्षतवंशी महारथी द्रुपदकुमार सहन न कर सके ।। ३४ ।।
विरथः स गृहीत्वा तु खड्गं खड्गभृतां वर ।
द्रोणमभ्यपतद् राजन् वैनतेय इवोरगम् ।। ३५ ।।
राजन्! रथहीन हो जानेपर खड्गधारियोंमें श्रेष्ठ धृष्टद्युम्न खड्ग हाथमें लेकर द्रोणाचार्यपर उसी प्रकार टूट पड़े, जैसे गरुड़ किसी सर्पपर झपटते हैं ।। ३५ ।।
तस्य रूपं बभौ राजन् भारद्वाजं जिघांसतः ।
यथा रूपं पुरा विष्णोर्हिरण्यकशिपोर्वधे ।। ३६ ।।
नरेश्वर! द्रोणके वधकी इच्छा रखनेवाले धृष्टद्युम्नका रूप पूर्वकालमें हिरण्यकशिपुके वधके लिये उद्यत हुए नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुके समान प्रतीत होता था ।।
स तदा विविधान् मार्गान् प्रवरांश्चैकविंशतिम् ।
दर्शयामास कौरव्य पार्षतो विचरन् रणे ॥ ३७ ॥
कुरुनन्दन! रणमें विचरते हुए धृष्टद्युम्नने उस समय तलवारके इक्कीस प्रकारके विविध उत्तम हाथ दिखाये ॥ ३७ ॥
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं प्रसृतं सृतम् ।
परिवृत्तं निवृत्तं च खड्गं चर्म च धारयन् ॥ ३८ ॥
सम्पातं समुदीर्णं च दर्शयामास पार्षतः।
भारतं कौशिकं चैव सात्वतं चैव शिक्षया ॥ ३९ ॥
उन्होंने ढाल-तलवार लेकर भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, प्रसृत, सृत, परिवृत्त, निवृत्त, सम्पात, समुदीर्ण, भारत, कौशिक तथा सात्वत आदि मार्गोंको* अपनी शिक्षाके अनुसार दिखलाया ॥ ३८-३९ ॥
दर्शयन् व्यचरद् युद्धे द्रोणस्यान्तचिकीर्षया ।
चरतस्तस्य तान् मार्गान् विचित्रान् खड्गचर्मिणः ॥ ४० ॥
व्यस्मयन्त रणे योधा देवताश्च समागताः।
वे द्रोणाचार्यका अन्त करनेकी इच्छासे युद्धमें तलवारके उपर्युक्त हाथ दिखाते हुए विचर रहे थे। ढाल-तलवार लेकर विचरते हुए धृष्टद्युम्नके उन विचित्र पैंतरोंको देखकर रणभूमिमें आये हुए योद्धा और देवता आश्चर्यचकित हो उठे थे ।। ४० १/२ ।।
ततः शरसहस्रेण शतचन्द्रमपातयत् ।। ४१ ।।
चर्म खड्गं च सम्बाधे धृष्टद्युम्नस्य स द्विजः ।
ये तु वैतस्तिका नाम शरा आसन्नयोधिनः ।। ४२ ।।
निकृष्टयुद्धे द्रोणस्य नान्येषां सन्ति ते शराः ।
तदनन्तर, उस युद्ध-संकटके समय विप्रवर द्रोणाचार्यने एक हजार बाणोंसे धृष्टद्युम्नकी सौ चाँदवाली ढाल और तलवार काट गिरायी। निकटसे युद्ध करते समय उपयोगमें आनेवाले जो एक बित्तेके बराबर वैतस्तिक नामक बाण होते हैं, वे समीपसे भी युद्ध करनेमें कुशल द्रोणाचार्यके ही पास थे, दूसरोंके नहीं ।। ४१-४२ १/२ ।।
ऋते शारद्वतात् पार्थाद् द्रौणेर्वैकर्तनात् तथा ।। ४३ ।।
प्रद्युम्नयुयुधानाभ्यामभिमन्योश्च भारत ।
भारत! कृपाचार्य, अर्जुन, अश्वत्थामा, वैकर्तन, कर्ण, प्रद्युम्न, सात्यकि और अभिमन्युको छोड़कर और किसीके पास वैसे बाण नहीं थे ।। ४३ १/२ ।।
अथास्येषुं समाधत्त दृढं परमसम्मतम् ।। ४४ ।।
अन्तेवासिनमाचार्यो जिघांसुः पुत्रसम्मितम् ।
तत्पश्चात् पुत्रतुल्य शिष्यको मार डालनेकी इच्छासे आचार्यने धनुषपर परम उत्तम सुदृढ़ बाण रखा ।। ४४ १/२ ।।
तं शरैर्दशभिस्तीक्ष्णैश्छच्छेद शिनिपुङ्गवः ।। ४५ ।।
पश्यतस्तव पुत्रस्य कर्णस्य च महात्मनः ।
ग्रस्तमाचार्यमुख्येन धृष्टद्युम्नममोचयत् ।। ४६ ।।
परंतु उस बाणको शिनिप्रवर सात्यकिने महामना कर्ण और आपके पुत्रके देखते-देखते दस तीखे बाणोंसे काट डाला और आचार्यप्रवरके द्वारा प्राणसंकटमें पड़े हुए धृष्टद्युम्नको छुड़ा लिया ।। ४५-४६ ।।
चरन्तं रथमार्गेषु सात्यकिं सत्यविक्रमम् ।
द्रोणकर्णान्तरगतं कृपस्यापि च भारत ।। ४७ ।।
अपश्येतां महात्मानौ विष्वक्सेनधनंजयौ ।
अपूजयतां वार्ष्णेयं ब्रुवाणौ साधु साध्विति ।। ४८ ।।
दिव्यान्यस्त्राणि सर्वेषां युधि निघ्नन्तमच्युतम् ।
भारत! उस समय सत्यपराक्रमी सात्यकि द्रोण, कर्ण और कृपाचार्यके बीचमें होकर रथके मागोंपर विचर रहे थे। उन्हें उस अवस्थामें महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनने देखा और ‘साधु-साधु’ कहकर सात्यकिकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। वे युद्धमें अविचलभावसे डटे रहकर समस्त विरोधियोंके दिव्यास्त्रोंका निवारण कर रहे थे॥ ४७-४८ १/२॥
अभिपत्य ततः सेनां विष्वक्सेनधनंजयौ ॥ ४९ ॥
धनंजयस्ततः कृष्णमब्रवीत् पश्य केशव ।
आचार्यरथमुख्यानां मध्ये क्रीडन् मधूद्वहः ॥ ५० ॥
तदनन्तर श्रीकृष्ण और अर्जुन शत्रुसेनापर टूट पड़े। उस समय अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा—‘केशव! देखिये, यह मधुवंशशिरोमणि सात्यकि आचार्यकी रक्षा करनेवाले मुख्य महारथियोंके बीचमें खेल रहा है॥ ४९-५०॥
आनन्दयति मां भूयः सात्यकिः परवीरहा ।
माद्रीपुत्रौ च भीमं च राजानं च युधिष्ठिरम् ॥ ५१ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला सात्यकि मुझे बारंबार आनन्द दे रहा है और नकुल, सहदेव, भीमसेन तथा राजा युधिष्ठिरको भी आनन्दित कर रहा है॥ ५१॥
यच्छिक्षयानुद्धतः सन् रणे चरति सात्यकिः ।
महारथानुपक्रीडन् वृष्णीनां कीर्तिवर्धनः ॥ ५२ ॥
तमेते प्रतिनन्दन्ति सिद्धाः सैन्याश्च विस्मिताः ।
अजय्यं समरे दृष्ट्वा साधु साध्विति सात्यकिम् ।
योधाश्चोभयतः सर्वे कर्मभिः समपूजयन् ॥ ५३ ॥
‘वृष्णिवंशका यश बढ़ानेवाला सात्यकि उत्तम शिक्षासे युक्त होनेपर भी अभिमानशून्य हो महारथियोंके साथ क्रीड़ा करता हुआ रणभूमिमें विचर रहा है। इसलिये ये सिद्धगण और सैनिक आश्चर्यचकित हो समरांगणमें परास्त न होनेवाले सात्यकिकी ओर देखकर ‘साधु-साधु’ कहते हुए इसका अभिनन्दन करते हैं और दोनों दलोंके समस्त योद्धाओंने इसके वीरोचित कर्मोंसे प्रभावित हो इसकी बड़ी प्रशंसा की है’॥ ५२-५३॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि संकुलयुद्धे
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९१॥
* तलवारको मण्डलाकार घुमाना ‘भ्रान्त’ कहलाता है। वही कार्य बाँह ऊपर उठाकर किया जाय तो उसे ‘उद्भ्रान्त’ कहा गया है। अपने चारों ओर तलवारको घुमाया जाय तो उसे ‘आविद्ध’ कहते हैं। ये तीन कार्य शत्रुके चलाये हुए शस्त्रका निवारण करनेके लिये किये जाते हैं, शत्रुपर आक्रमण करनेके लिये जाना ‘आप्लुत’ माना गया है। तलवारकी
नोकसे शत्रुके शरीरका स्पर्श करना ‘प्रसृत’ कहा गया है। चकमा देकर शत्रुपर शस्त्रका आघात करना ‘सृत’ बताया गया है। शत्रुके दायें-बायें तलवार चलाना ‘परिवृत्त’ कहा गया है। पीछे हटना ‘निवृत्त’ है। दोनों योद्धाओंका परस्पर आघात-प्रत्याघात ‘सम्पात’ कहलाता है। अपनी विशेषता स्थापित करना ‘समुदीर्ण’ है। अंग-प्रत्यंगमें तलवार भाँजना ‘भारत’ माना गया है। विचित्र रीतिसे तलवार चलानेकी कला दिखाना ‘कौशिक’ कहा गया है। अपनेको ढालकी आड़में छिपाकर तलवार चलानेका नाम ‘सात्वत’ है।