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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 3204)

त्रयोविंशोऽध्यायः

शल्य, भगदत्त, भीष्म और द्रोणको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख गान्धारीका विलाप

गान्धार्युवाच

एष शल्यो हतः शेते साक्षान्नकुलमातुलः ।
धर्मज्ञेन हतस्तात धर्मराजेन संयुगे ॥ १ ॥
गान्धारी बोलीं— तात! देखो, ये नकुलके सगे मामा शल्य मरे पड़े हैं। इन्हें धर्मके ज्ञाता धर्मराज युधिष्ठिरने युद्धमें मारा है ॥ १ ॥

यस्त्वया स्पर्धते नित्यं सर्वत्र पुरुषर्षभ ।
स एष निहतः शेते मद्रराजो महाबलः ॥ २ ॥
पुरुषोत्तम! जो सदा और सर्वत्र तुम्हारे साथ होड़ लगाये रहते थे, वे ही ये महाबली मद्रराज शल्य यहाँ मारे जाकर चिरनिद्रामें सो रहे हैं ॥ २ ॥

येन संगृह्णता तात रथमाधिरथेर्युधि ।
जयार्थं पाण्डुपुत्राणां तथा तेजोवधः कृतः ॥ ३ ॥
तात! ये वे ही शल्य हैं, जिन्होंने युद्धमें सूतपुत्र कर्णके रथकी बागडोर सँभालते समय पाण्डवोंकी विजयके लिये उसके तेज और उत्साहको नष्ट किया था ॥ ३ ॥

अहो धिक्पश्य शल्यस्य पूर्णचन्द्रसुदर्शनम् ।
मुखं पद्मपलाशाक्षं काकैरादष्टमव्रणम् ॥ ४ ॥
अहो! धिक्कार है। देखो न, शल्यके पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति दर्शनीय तथा कमलदलके सदृश नेत्रोंवाले व्रणरहित मुखको कौओंने कुछ-कुछ काट दिया है ॥ ४ ॥

अस्य चामीकराभस्य तप्तकाञ्चनप्रभा ।
आस्याद् विनिःसृता जिह्वा भक्ष्यते कृष्ण पक्षिभिः ॥ ५ ॥
श्रीकृष्ण! सुवर्णके समान कान्तिमान् शल्यके मुखसे तपाये हुए सोनेके समान कान्तिवाली जीभ बाहर निकल आयी है और पक्षी उसे नोच-नोचकर खा रहे हैं ॥ ५ ॥

युधिष्ठिरेण निहतं शल्यं समितिशोभनम् ।
रुदत्यः पर्युपासन्ते मद्रराजं कुलाङ्गनाः ॥ ६ ॥
युधिष्ठिरके द्वारा मारे गये तथा युद्धमें शोभा पानेवाले मद्रराज शल्यको ये कुलांगनाएँ चारों ओरसे घेरकर बैठी हैं और रो रही हैं ॥ ६ ॥

एताः सुसूक्ष्मवसना मद्रराजं नरर्षभम् ।
क्रोशन्त्योऽथ समासाद्य क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभम् ॥ ७ ॥

अत्यन्त महीन वस्त्र पहने हुए ये क्षत्राणियाँ क्षत्रिय-शिरोमणि नरश्रेष्ठ मद्रराजके पास आकर कैसा करुण क्रन्दन कर रही हैं ॥ ७ ॥
शल्यं निपतितं नार्यः परिवार्थ्याभितः स्थिताः ।
वासिता गृष्ट्यः पङ्के परिमग्नमिव द्विपम् ॥ ८ ॥
रणभूमिमें गिरे हुए राजा शल्यको उनकी स्त्रियाँ उसी तरह सब ओरसे घेरे हुए हैं, जैसे एक बारकी ब्यायी हुई हथिनियाँ कीचड़में फँसे हुए गजराजको घेरकर खड़ी हों ॥ ८ ॥
शल्यं शरणदं शूरं पश्येमं वृष्णिनन्दन ।
शयानं वीरशयने शरैर्विशकलीकृतम् ॥ ९ ॥
वृष्णिनन्दन! देखो, ये दूसरोंको शरण देनेवाले शूरवीर शल्य बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर वीरशय्यापर सो रहे हैं ॥ ९ ॥
एष शैलालयो राजा भगदत्तः प्रतापवान् ।
गजाङ्कुशधरः श्रीमान् शेते भुवि निपातितः ॥ १० ॥
ये पर्वतीय, तेजस्वी एवं प्रतापी राजा भगदत्त हाथमें हाथीका अंकुश लिये पृथ्वीपर सो रहे हैं। इन्हें अर्जुनने मार गिराया था ॥ १० ॥
यस्य रुक्ममयी माला शिरस्येषा विराजते ।
श्वापदैर्भक्ष्यमाणस्य शोभयन्तीव मूर्धजान् ॥ ११ ॥
इन्हें हिंसक जीव-जन्तु खा रहे हैं। इनके सिरपर यह सोनेकी माला विराज रही है, जो केशोंकी शोभा बढ़ाती-सी जान पड़ती है ॥ ११ ॥
एतेन किल पार्थस्य युद्धमासीत् सुदारुणम् ।
रोमहर्षणमत्युग्रं शक्रस्य त्वहिना यथा ॥ १२ ॥
जैसे वृत्रासुरके साथ इन्द्रका अत्यन्त भयंकर संग्राम हुआ था, उसी प्रकार इन भगदत्तके साथ कुन्तीकुमार अर्जुनका अत्यन्त दारुण एवं रोमांचकारी युद्ध हुआ था ॥ १२ ॥
योधयित्वा महाबाहुरेष पार्थं धनंजयम् ।
संशयं गमयित्वा च कुन्तीपुत्रेण पातितः ॥ १३ ॥
उन महाबाहुने कुन्तीकुमार धनंजयके साथ युद्ध करके उन्हें संशयमें डाल दिया था; परंतु अन्तमें ये उन कुन्तीकुमारके ही हाथसे मारे गये ॥ १३ ॥
यस्य नास्ति समो लोके शौर्ये वीर्ये च कश्चन ।
स एष निहतः शेते भीष्मो भीष्मकृताहवे ॥ १४ ॥
संसारमें शौर्य और बलमें जिनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, वे ही ये युद्धमें भयंकर कर्म करनेवाले भीष्मजी घायल हो बाणशय्यापर सो रहे हैं ॥ १४ ॥
पश्य शान्तनवं कृष्ण शयानं सूर्यवर्चसम् ।
युगान्त इव कालेन पतितं सूर्यमम्बरात् ॥ १५ ॥

श्रीकृष्ण! देखो, ये सूर्यके समान तेजस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म कैसे सो रहे हैं, ऐसा जान पड़ता है, मानो प्रलयकालमें कालसे प्रेरित हो सूर्यदेव आकाशसे भूमिपर गिर पड़े हैं॥ १५ ॥
एष तप्त्वा रणे शत्रून् शस्त्रतापेन वीर्यवान् ।
नरसूर्योऽस्तमभ्येति सूर्योऽस्तमिव केशव ॥ १६ ॥
केशव! जैसे सूर्य सारे जगत्‌को ताप देकर अस्ताचलको चले जाते हैं, उसी तरह ये पराक्रमी मानवसूर्य रणभूमिमें अपने शस्त्रोंके प्रतापसे शत्रुओंको संतप्त करके अस्त हो रहे हैं॥ १६ ॥
शरतल्पगतं भीष्ममूर्ध्वरेतसमच्युतम् ।
शयानं वीरशयने पश्य शूरनिषेविते ॥ १७ ॥
जो ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी रहकर कभी मर्यादासे च्युत नहीं हुए हैं, उन भीष्मको शूरसेवित वीरोचित शयन बाणशय्यापर सोते हुए देख लो ॥ १७ ॥
कर्णिनालीकनाराचैरास्तीर्य शयनोत्तमम् ।
आविश्य शेते भगवान् स्कन्दः शरवणं यथा ॥ १८ ॥
जैसे भगवान् स्कन्द सरकण्डोंके समूहपर सोये थे, उसी प्रकार ये भीष्मजी कर्णी, नालीक और नाराच आदि बाणोंकी उत्तम शय्या बिछाकर उसीका आश्रय ले सो रहे हैं॥ १८ ॥
अतूलपूर्ण गाङ्गेयस्त्रिभिर्बाणैः समन्वितम् ।
उपधायोपधानाग्र्यं दत्तं गाण्डीवधन्वना ॥ १९ ॥
इन गङ्गानन्दन भीष्मने रूई भरा हुआ तकिया नहीं लिया है। इन्होंने तो गाण्डीवधारी अर्जुनके दिये हुए तीन बाणोंद्वारा निर्मित श्रेष्ठ उपधान (तकिये)-को ही स्वीकार किया है॥ १९ ॥
पालयानः पितुः शास्त्रमूर्ध्वरेता महायशाः ।
एष शान्तनवः शेते माधवाप्रतिमो युधि ॥ २० ॥
माधव! पिताकी आज्ञाका पालन करते हुए महायशस्वी नैष्ठिक ब्रह्मचारी ये शान्तनुनन्दन भीष्म जिनकी युद्धमें कहीं तुलना नहीं है, यहाँ सो रहे हैं॥ २० ॥
धर्मात्मा तात सर्वज्ञः पारावर्य्येण निर्णये ।
अमर्त्य इव मर्त्यः सन्नैष प्राणानधारयत् ॥ २१ ॥
तात! ये धर्मात्मा और सर्वज्ञ हैं। परलोक और इहलोकसम्बन्धी ज्ञानद्वारा सभी आध्यात्मिक प्रश्नोंका निर्णय करनेमें समर्थ हैं तथा मनुष्य होनेपर भी देवताके तुल्य हैं; इन्होंने अभीतक अपने प्राण धारण कर रखे हैं॥ २१ ॥
नास्ति युद्धे कृती कश्चिन्न विद्वान् न पराक्रमी ।
यत्र शान्तनवो भीष्मः शेतेऽद्य निहतः शरैः ॥ २२ ॥

जब ये शान्तनुनन्दन भीष्म भी आज शत्रुओंके बाणोंसे मारे जाकर सो रहे हैं तो यही कहना पड़ता है कि 'युद्धमें न कोई कुशल है, न विद्वान् है और न पराक्रमी ही है' ।। २२ ।।
स्वयमेतेन शूरेण पृच्छ्यमानेन पाण्डवैः ।
धर्मज्ञेनाहवे मृत्युरादिष्टः सत्यवादिना ।। २३ ।।
पाण्डवोंके पूछनेपर इन धर्मज्ञ एवं सत्यवादी शूरवीरने स्वयं ही अपनी मृत्युका उपाय बता दिया था ।। २३ ।।
प्रणष्टः कुरुवंशश्च पुनर्येन समुद्धृतः ।
स गतः कुरुभिः सार्धं महाबुद्धिः पराभवम् ।। २४ ।।
जिन्होंने नष्ट हुए कुरुवंशका पुनः उद्धार किया था, वे ही परम बुद्धिमान् भीष्म इन कौरवोंके साथ परास्त हो गये ।। २४ ।।
धर्मेषु कुरवः कं नु परिप्रक्ष्यन्ति माधव ।
गते देवव्रते स्वर्गं देवकल्पे नरर्षभे ।। २५ ।।
माधव! इन देवतुल्य नरश्रेष्ठ देवव्रतके स्वर्गलोकमें चले जानेपर अब कौरव किसके पास जाकर धर्मविषयक प्रश्न करेंगे ।। २५ ।।
अर्जुनस्य विनेतारमाचार्यं सात्यकेस्तथा ।
तं पश्य पतितं द्रोणं कुरूणां गुरुमुत्तमम् ।। २६ ।।
जो अर्जुनके शिक्षक, सात्यकिके आचार्य तथा कौरवोंके श्रेष्ठ गुरु थे, वे द्रोणाचार्य रणभूमिमें गिरे हुए हैं, उन्हें भी देख लो ।। २६ ।।
अस्त्रं चतुर्विधं वेद यथैव त्रिदशेश्वरः ।
भार्गवो वा महावीर्यस्तथा द्रोणोऽपि माधव ।। २७ ।।
माधव! जैसे देवराज इन्द्र अथवा महापराक्रमी परशुरामजी चार प्रकारकी अस्त्रविद्याको जानते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्य भी जानते थे ।। २७ ।।
यस्य प्रसादाद् वीभत्सुः पाण्डवः कर्म दुष्करम् ।
चकार स हतः शेते नैनमस्त्राण्यपालयन् ।। २८ ।।
जिनके प्रसादसे पाण्डुनन्दन अर्जुनने दुष्कर कर्म किया है, वे ही आचार्य यहाँ मरे पड़े हैं। उन अस्त्रोंने इनकी रक्षा नहीं की ।। २८ ।।
यं पुरोधाय कुरव आह्वयन्ति स्म पाण्डवान् ।
सोऽयं शस्त्रभृतां श्रेष्ठो द्रोणः शस्त्रैः परिक्षतः ।। २९ ।।
जिनको आगे रखकर कौरव पाण्डवोंको ललकारा करते थे, वे ही शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हो गये हैं ।। २९ ।।
यस्य निर्दहतः सेनां गतिरग्नेरिवाभवत् ।
स भूमौ निहतः शेते शान्तार्चिरिव पावकः ।। ३० ।।

शत्रुओंकी सेनाको दग्ध करते समय जिनकी गति अग्निके समान होती थी, वे ही बुझी हुई लपटोंवाली आगके समान मरकर पृथ्वीपर पड़े हैं ।। ३० ।।
धनुर्मुष्टिरशीर्णाश्च हस्तावापश्च माधव ।
द्रोणस्य निहतस्याजौ दृश्यते जीवतो यथा ।। ३१ ।।
माधव! युद्धमें मारे जानेपर भी द्रोणाचार्यके धनुषके साथ जुड़ी हुई मुट्ठी ढीली नहीं हुई है। दस्ताना भी ज्यों-का-त्यों दिखायी देता है, मानो वह जीवित पुरुषके हाथमें हो ।। ३१ ।।
वेदा यस्माच्च चत्वारः सर्वाण्यस्त्राणि केशव ।
अनपेतानि वै शूराद् यथैवादौ प्रजापतेः ।। ३२ ।।
वन्दनार्हाविमौ तस्य बन्दिभिर्वन्दितौ शुभौ ।
गोमायवो विकर्षन्ति पादौ शिष्यशतार्चितौ ।। ३३ ।।
केशव! जैसे पूर्वकालसे ही प्रजापति ब्रह्मासे वेद कभी अलग नहीं हुए, उसी प्रकार जिन शूरवीर द्रोणसे चारों वेद और सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र कभी दूर नहीं हुए, उन्हींके बन्दीजनोंद्वारा वन्दित इन दोनों सुन्दर एवं वन्दनीय चरणारविन्दोंको जिनकी सैकड़ों शिष्य पूजा कर चुके हैं, गीदड़ घसीट रहे हैं ।। ३२-३३ ।।
द्रोणं द्रुपदपुत्रेण निहतं मधुसूदन ।
कृपी कृपणमन्वास्ते दुःखोपहतचेतना ।। ३४ ।।
मधुसूदन! द्रुपदपुत्रके द्वारा मारे गये द्रोणाचार्यके पास उनकी पत्नी कृपी बड़े दीनभावसे बैठी है। दुःखसे उसकी चेतना लुप्त-सी हो गयी है ।। ३४ ।।
तां पश्य रुदतीमार्ता मुक्तकेशीमधोमुखीम् ।
हतं पतिमुपासन्तीं द्रोणं शस्त्रभृतां वरम् ।। ३५ ।।
देखो, कृपी केश खोले नीचे मुँह किये रोती हुई अपने मारे गये पति शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यकी उपासना कर रही है ।। ३५ ।।
बाणैर्भिन्नतनुत्राणं धृष्टद्युम्नेन केशव ।
उपास्ते वै मृधे द्रोणं जटिला ब्रह्मचारिणी ।। ३६ ।।
केशव! धृष्टद्युम्नने अपने बाणोंसे जिन आचार्य द्रोणका कवच छिन्न-भिन्न कर दिया है, उन्हींके पास युद्धस्थलमें वह जटाधारिणी ब्रह्मचारिणी कृपी बैठी हुई है ।। ३६ ।।
प्रेतकृत्यं च यतते कृपी कृपणमातुरा ।
हतस्य समरे भर्तुः सुकुमारी यशस्विनी ।। ३७ ।।
शोकसे दीन और आतुर हुई यशस्विनी सुकुमारी कृपी समरमें मारे गये पतिदेवका प्रेतकर्म करनेकी चेष्टा कर रही है ।। ३७ ।।
अग्नीनाधाय विधिवच्चितां प्रज्वाल्य सर्वतः ।
द्रोणमाधाय गायन्ति त्रीणि सामानि सामगाः ।। ३८ ।।

विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करके चिताको सब ओरसे प्रज्वलित कर दिया गया है और उसपर द्रोणाचार्यके शरीरको रखकर सामगान करनेवाले ब्राह्मण त्रिविध सामका गान करते हैं॥ ३८॥

कुर्वन्ति च चितामेते जटिला ब्रह्मचारिणः ।
धनुर्भिः शक्तिभिश्चैव रथनीडैश्च माधव ॥ ३९ ॥
शरैश्च विविधैरन्यैर्धक्ष्यते भूरितेजसम् ।
इति द्रोणं समाधाय शंसन्ति च रुदन्ति च ॥ ४० ॥
सामभिस्त्रिभिरन्तस्थैरनुशंसन्ति चापरे ।
माधव! इन जटाधारी ब्रह्मचारियोंने धनुष, शक्ति, रथकी बैठक और नाना प्रकारके बाण तथा अन्य आवश्यक वस्तुओंसे उस चिताका निर्माण किया है। वे उसीपर महातेजस्वी द्रोणको जलाना चाहते थे; इसलिये द्रोणको चितापर रखकर वे वेदमन्त्र पढ़ते और रोते हैं, कुछ लोग अन्त समयमें उपयोगी त्रिविध सामोंका गान करते हैं॥ ३९-४० १/२ ॥

अग्नावग्निं समाधाय द्रोणं हुत्वा हुताशने ॥ ४१ ॥
गच्छन्त्यभिमुखा गङ्गां द्रोणशिष्या द्विजातयः ।
अपसव्यां चितिं कृत्वा पुरस्कृत्य कृपीं च ते ॥ ४२ ॥
चिताकी अग्निमें अग्निहोत्रसहित द्रोणाचार्यको रखकर उनकी आहुति दे उन्हींके शिष्य द्विजातिगण कृपीको आगे और चिताको दायें करके गंगाजीके तटकी ओर जा रहे हैं॥ ४१-४२ ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि गान्धारीवचने त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें गान्धारीवचनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३॥