महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 531)
अर्जुनका स्वप्नदर्शन
स्तूयमानं स्तवैर्दिव्यैर्ऋषिभिर्ब्रह्मवादिभिः ।
गोप्तारं सर्वभूतानामिष्वासधरमच्युतम् ॥ ४२ ॥
ब्रह्मवादी महर्षिगण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति कर रहे थे। अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले वे समस्त प्राणियोंके रक्षक भगवान् शिव धनुष धारण किये हुए (अद्भुत शोभा पा रहे) थे ॥ ४२ ॥
वासुदेवस्तु तं दृष्ट्वा जगाम शिरसा क्षितिम् ।
पार्थेन सह धर्मात्मा गृणन् ब्रह्म सनातनम् ॥ ४३ ॥
अर्जुनसहित धर्मात्मा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने उन्हें देखते ही वहाँकी पृथ्वीपर माथा टेककर प्रणाम किया और उन सनातन ब्रह्मस्वरूप भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे ॥ ४३ ॥
लोकादिं विश्वकर्माणमजमीशानमव्ययम् ।
मनसः परमं योनिं खं वायुं ज्योतिषां निधिम् ॥ ४४ ॥
स्रष्टारं वारिधाराणां भुवश्च प्रकृतिं पराम् ।
देवदानवयक्षाणां मानवानां च साधनम् ॥ ४५ ॥
योगानां च परं धाम दृष्टं ब्रह्मविदां निधिम् ।
चराचरस्य स्रष्टारं प्रतिहर्त्तारमेव च ॥ ४६ ॥
कालकोपं महात्मानं शक्रसूर्यगुणोदयम् ।
ववन्दे तं तदा कृष्णो वाङ्मनोबुद्धिकर्मभिः ॥ ४७ ॥
वे जगत्के आदि कारण, लोकस्रष्टा, अजन्मा, ईश्वर, अविनाशी, मनकी उत्पत्तिके प्रधान कारण, आकाश एवं वायुस्वरूप, तेजके आश्रय, जलकी सृष्टि करनेवाले, पृथ्वीके भी परम कारण, देवताओं, दानवों, यक्षों तथा मनुष्योंके भी प्रधान कारण, सम्पूर्ण योगोंके परम आश्रय, ब्रह्मवेत्ताओंकी प्रत्यक्ष निधि, चराचर जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाले तथा इन्द्रके ऐश्वर्य आदि और सूर्यदेवके प्रताप आदि गुणोंको प्रकट करनेवाले परमात्मा थे। उनके क्रोधमें कालका निवास था। उस समय भगवान् श्रीकृष्णने मन, वाणी, बुद्धि और क्रियाओंद्वारा उनकी वन्दना की ॥ ४४—४७ ॥
यं प्रपद्यन्ति विद्वांसः सूक्ष्माध्यात्मपदैषिणः ।
तमजं कारणात्मानं जग्मतुः शरणं भवम् ॥ ४८ ॥
सूक्ष्म अध्यात्मपदकी अभिलाषा रखनेवाले विद्वान् जिनकी शरण लेते हैं, उन्हीं कारणस्वरूप अजन्मा भगवान् शिवकी शरणमें श्रीकृष्ण और अर्जुन भी गये ॥ ४८ ॥
अर्जुनश्चापि तं देवं भूयो भूयोऽप्यवन्दत ।
ज्ञात्वा तं सर्वभूतादिं भूतभव्यभवोद्भवम् ॥ ४९ ॥
अर्जुनने भी उन्हें समस्त भूतोंका आदि कारण और भूत, भविष्य एवं वर्तमान जगत्का उत्पादक जानकर बारंबार उन महादेवजीके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ४९ ॥
ततस्तावागतौ दृष्ट्वा नरनारायणावुभौ ।
सुप्रसन्नमनाः शर्वः प्रोवाच प्रहसन्निव ॥ ५० ॥
उन दोनों नर और नारायणको वहाँ आया देख भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए-से बोले— ॥ ५० ॥
स्वागतं वो नरश्रेष्ठावुत्तिष्ठेतां गतकल्मौ ।
किं च वामीप्सितं वीरौ मनसः क्षिप्रमुच्यताम् ॥ ५१ ॥
‘नरश्रेष्ठो! तुम दोनोंका स्वागत है। उठो, तुम्हारा श्रम दूर हो। वीरो! तुम दोनोंके मनकी अभीष्ट वस्तु क्या है? यह शीघ्र बताओ ॥ ५१ ॥
येन कार्येण सम्प्राप्तौ युवां तत् साधयामि किम् ।
ध्रियतामात्मनः श्रेयस्तत् सर्वं प्रददानि वाम् ॥ ५२ ॥
‘तुम दोनों जिस कार्यसे यहाँ आये हो, वह क्या है? मैं उसे सिद्ध कर दूँगा। अपने लिये कल्याणकारी वस्तुको माँगो। मैं तुम दोनोंको सब कुछ दे सकता हूँ’ ॥
ततस्तद् वचनं श्रुत्वा प्रत्युत्थाय कृताञ्जली ।
वासुदेवार्जुनौ शर्वं तुष्टुवाते महामती ॥ ५३ ॥
भक्त्या स्तवेन दिव्येन महात्मानावन्निन्दितौ ॥ ५४ ॥
भगवान् शंकरकी यह बात सुनकर अनिन्दित महात्मा परम बुद्धिमान् श्रीकृष्ण और अर्जुन हाथ जोड़कर खड़े हो गये और दिव्य स्तोत्रद्वारा भक्तिभावसे उन भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे ॥ ५३-५४ ॥
कृष्णार्जुनोवाचतुः
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च ।
पशूनां पतये नित्यमुग्राय च कपर्दिने ॥ ५५ ॥
**श्रीकृष्ण और अर्जुन बोले—**भव (सबकी उत्पत्ति करनेवाले), शर्व (संहारकारी), रुद्र (दुःख दूर करनेवाले*), वरदाता, पशुपति (जीवोंके पालक), सदा उग्ररूपमें रहनेवाले और जटाजूटधारी भगवान् शिवको नमस्कार है ॥ ५५ ॥
महादेवाय भीमाय त्र्यम्बकाय च शान्तये ।
ईशानाय मखघ्नाय नमोऽस्त्वन्धकघातिने ॥ ५६ ॥
महान् देवता, भयंकर रूपधारी, तीन नेत्र धारण करनेवाले, शान्तिस्वरूप, सबका शासन करनेवाले, दक्षयज्ञनाशक तथा अन्धकासुरका विनाश करनेवाले भगवान् शंकरको प्रणाम है ॥ ५६ ॥
कुमारगुरवे तुभ्यं नीलग्रीवाय वेधसे ।
पिनाकिने हविष्याय सत्याय विभवे सदा ॥ ५७ ॥
प्रभो! आप कुमार कार्तिकेयके पिता, कण्ठमें नील चिह्न धारण करनेवाले, लोकस्रष्टा, पिनाकधारी, हविष्यके अधिकारी, सत्यस्वरूप और सर्वत्र व्यापक हैं, आपको सदैव नमस्कार है ॥ ५७ ॥
विलोहिताय धूम्राय व्याधायानपराजिते ।
नित्यनीलशिखण्डाय शूलिने दिव्यचक्षुषे ॥ ५८ ॥
हन्त्रे गोप्त्रे त्रिनेत्राय व्याधाय वसुरेतसे ।
अचिन्त्यायाम्बिकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय च ॥ ५९ ॥
वृषध्वजाय मुण्डाय जटिने ब्रह्मचारिणे ।
तप्यमानाय सलिले ब्रह्मण्ययाजिताय च ॥ ६० ॥
विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते ।
नमो नमस्ते सेव्याय भूतानां प्रभवे सदा ॥ ६१ ॥
विशेष लोहित एवं धूम्रवर्णवाले, मृगव्याधस्वरूप, समस्त प्राणियोंको पराजित करनेवाले, सर्वदा नीलकेश धारण करनेवाले, त्रिशूलधारी, दिव्यलोचन, संहारक, पालक, त्रिनेत्रधारी, पापरूपी मृगोंके बधिक, हिरण्यरेता (अग्नि), अचिन्त्य, अम्बिकापति, सम्पूर्ण देवताओंद्वारा प्रशंसित, वृषभ-चिह्नसे युक्त ध्वजा धारण करनेवाले, मुण्डित मस्तक, जटाधारी, ब्रह्मचारी, जलमें तप करनेवाले, ब्राह्मणभक्त, अपराजित, विश्वात्मा, विश्वस्रष्टा, विश्वको व्याप्त करके स्थित, सबके सेवन करनेयोग्य तथा सदा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिके कारणभूत आप भगवान् शिवको बारंबार नमस्कार है ॥ ५८—६१ ॥
ब्रह्मवक्त्राय सर्वाय शङ्कराय शिवाय च ।
नमोऽस्तु वाचस्पतये प्रजानां पतये नमः ॥ ६२ ॥
ब्राह्मण जिनके मुख हैं, उन सर्वस्वरूप कल्याणकारी भगवान् शिवको नमस्कार है। वाणीके अधीश्वर और प्रजाओंके पालक आपको नमस्कार है ॥ ६२ ॥
नमो विश्वस्य पतये महतां पतये नमः ।
नमः सहस्रशिरसे सहस्रभुजमृत्युवे ॥ ६३ ॥
सहस्रनेत्रपादाय नमोऽसंख्येयकर्मणे ।
विश्वके स्वामी और महापुरुषोंके पालक भगवान् शिवको नमस्कार है, जिनके सहस्रों सिर और सहस्रों भुजाएँ हैं, जो मृत्युस्वरूप हैं, जिनके नेत्र और पैर भी सहस्रोंकी संख्यामें हैं तथा जिनके कर्म असंख्य हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है ॥ ६३ १/२ ॥
नमो हिरण्यवर्णाय हिरण्यकवचाय च ।
भक्तानुकम्पिने नित्यं सिध्यतां नो वरः प्रभो ॥ ६४ ॥
सुवर्णके समान जिनका रंग है, जो सुवर्णमय कवच धारण करते हैं, उन आप भक्तवत्सल भगवान्को मेरा नित्य नमस्कार है। प्रभो! हमारा अभीष्ट वर सिद्ध हो ॥
संजय उवाच
एवं स्तुत्वा महादेवं वासुदेवः सहार्जुनः ।
प्रसादयामास भवं तदा ह्यस्त्रोपलब्धये ॥ ६५ ॥
संजय कहते हैं— इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके उस समय अर्जुनसहित भगवान् श्रीकृष्णने पाशुपतास्त्रकी प्राप्तिके लिये भगवान् शंकरको प्रसन्न किया ॥ ६५ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि अर्जुनस्वप्ने अशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें अर्जुनस्वप्नविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥
* रुर्दुःखं तद् द्रावयति इति रुद्रः ।