महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
विलाप करते हुए युधिष्ठिरके पास व्यासजीका आगमन और अकम्पन-नारद-संवादकी प्रस्तावना करते हुए मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग आरम्भ करना
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
विलाप करते हुए युधिष्ठिरके पास व्यासजीका आगमन और अकम्पन-नारद-संवादकी प्रस्तावना करते हुए मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग आरम्भ करना
संजय उवाच
अथैनं विलपन्तं तं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
कृष्णद्वैपायनस्तत्र आजगाम महानृषिः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार विलाप करते हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके पास वहाँ महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी आये ॥ १ ॥
अर्चयित्वा यथान्यायमुपविष्टं युधिष्ठिरः ।
अब्रवीच्छोकसंतप्तो भ्रातुः पुत्रवधेन च ॥ २ ॥
उस समय युधिष्ठिरने उनकी यथायोग्य पूजा की और जब वे बैठ गये, तब भतीजेके वधसे शोकसंतप्त हो युधिष्ठिर उनसे इस प्रकार बोले— ॥ २ ॥
अधर्मयुक्तैर्बहुभिः परिवार्य महारथैः ।
युध्यमानो महेष्वासैः सौभद्रो निहतो रणे ॥ ३ ॥
‘मुने! बहुत-से अधर्मपरायण महाधनुर्धर महारथियोंने चारों ओरसे घेरकर रणक्षेत्रमें युद्ध करते हुए सुभद्राकुमार अभिमन्युको असहायावस्थामें मार डाला है ॥ ३ ॥
बालश्च बालबुद्धिश्च सौभद्रः परवीरहा ।
अनुपायेन संग्रामे युध्यमानो विशेषतः ॥ ४ ॥
‘शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला अभिमन्यु अभी बालक था; बालोचित बुद्धिसे युक्त था। विशेषतः संग्राममें वह उपयुक्त साधनोंसे रहित होकर युद्ध कर रहा था ॥ ४ ॥
मया प्रोक्तः स संग्रामे द्वारं संजनयस्व नः ।
प्रविष्टेऽभ्यन्तरे तस्मिन् सैन्धवेन निवारिताः ॥ ५ ॥
‘मैंने युद्धस्थलमें उससे कहा था कि तुम व्यूहमें हमारे प्रवेशके लिये द्वार बना दो। तब वह द्वार बनाकर भीतर प्रविष्ट हो गया और जब हमलोग उसी द्वारसे व्यूहमें प्रवेश करने लगे, उस समय सिंधुराज जयद्रथने हमें रोक दिया ॥
ननु नाम समं युद्धमेष्टव्यं युद्धजीविभिः ।
इदं चैवासमं युद्धमीदृशं यत् कृतं परैः ॥ ६ ॥
'युद्धजीवी क्षत्रियोंको अपने समान साधनसम्पन्न वीरके साथ युद्ध करनेकी इच्छा करनी चाहिये। शत्रुओंने जो अभिमन्युके साथ इस प्रकार युद्ध किया है, यह कदापि समान नहीं है ।। ६ ।।
तेनास्मि भृशसंतप्तः शोकबाष्पसमाकुलः ।
शमं नैवाधिगच्छामि चिन्तयानः पुनः पुनः ।। ७ ।।
'इसीलिये मैं अत्यन्त संतप्त हूँ, शोकाश्रुओंसे मेरे नेत्र भरे हुए हैं। मैं बारंबार चिन्तामग्न होकर शान्ति नहीं पा रहा हूँ' ।। ७ ।।
संजय उवाच
तं तथा विलपन्तं वै शोकव्याकुलमानसम् ।
उवाच भगवान् व्यासो युधिष्ठिरमिदं वचः ।। ८ ।।
संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार शोकसे व्याकुलचित्त होकर विलाप करते हुए राजा युधिष्ठिरसे भगवान् वेदव्यासने इस प्रकार कहा ।। ८ ।।
व्यास उवाच
युधिष्ठिर महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
व्यसनेषु न मुह्यन्ति त्वादृशा भरतर्षभ ।। ९ ।।
व्यासजी बोले— सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ, परम बुद्धिमान्, भरतकुलभूषण युधिष्ठिर! तुम्हारे-जैसे पुरुष संकटके समय मोहित नहीं होते हैं ।। ९ ।।
स्वर्गमेष गतः शूरः शत्रून् हत्वा बहून् रणे ।
अबालसदृशं कर्म कृत्वा वै पुरुषोत्तमः ।। १० ।।
यह पुरुषोत्तम अभिमन्यु शूरवीर था। इसने रणक्षेत्रमें अबालोचित पराक्रम करके बहुत-से शत्रुओंको मारकर स्वर्गलोककी यात्रा की है ।। १० ।।
अनतिक्रमणीयो वै विधिरेष युधिष्ठिर ।
देवदानवगन्धर्वान् मृत्युर्हरति भारत ।। ११ ।।
भरतनन्दन युधिष्ठिर! यह विधाताका विधान है। इसका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता। मृत्यु देवताओं, दानवों तथा गन्धर्वोंके भी प्राण हर लेती है ।।
युधिष्ठिर उवाच
इमे वै पृथिवीपालाः शेरते पृथिवीतले ।
निहताः पृतनामध्ये मृतसंज्ञा महाबलाः ।। १२ ।।
युधिष्ठिर बोले— मुने! ये महाबली भूपालगण सेनाके मध्यमें मारे जाकर 'मृत' नाम धारण करके पृथ्वीपर सो रहे हैं ।। १२ ।।
नागायुतबलाश्चान्ये वायुवेगबलास्तथा ।
त एते निहताः संख्ये तुल्यरूपा नरैर्नराः ॥ १३ ॥
इनमेंसे कितने ही राजा दस हजार हाथियोंके समान बलवान् थे तथा कितनोंके वेग और बल वायुके समान थे। ये सब मनुष्य एक समान रूपवाले हैं, जो दूसरे मनुष्योंद्वारा युद्धमें मार डाले गये हैं ॥ १३ ॥
नैषां पश्यामि हन्तारं प्राणिनां संयुगे क्वचित् ।
विक्रमेणोपसम्पन्नास्तपोबलसमन्विताः ॥ १४ ॥
इन प्राणशक्तिसम्पन्न वीरोंका युद्धमें कहीं कोई वध करनेवाला मुझे नहीं दिखायी देता था; क्योंकि ये सब-के-सब पराक्रमसे सम्पन्न और तपोबलसे संयुक्त थे ॥ १४ ॥
जेतव्यमिति चान्योन्यं येषां नित्यं हृदि स्थितम् ।
अथ चेमे हताः प्राज्ञाः शेरते विगतायुषः ॥ १५ ॥
जिनके हृदयमें सदा एक-दूसरेको जीतनेकी अभिलाषा रहती थी, वे ही ये बुद्धिमान् नरेश आयु समाप्त होनेपर युद्धमें मारे जाकर धरतीपर सो रहे हैं ॥ १५ ॥
मृता इति च शब्दोऽयं वर्तते च ततोऽर्थवत् ।
इमे मृता महीपालाः प्रायशो भीमविक्रमाः ॥ १६ ॥
अतः इनके विषयमें 'मृत' शब्द सार्थक हो रहा है। ये भयंकर पराक्रमी भूमिपाल प्रायः 'मर गये' कहे जाते हैं ॥ १६ ॥
निश्चेष्टा निरभीमानाः शूराः शत्रुवशंगताः ।
राजपुत्राश्च संरब्धा वैश्वानरमुखं गताः ॥ १७ ॥
ये शूरवीर राजकुमार चेष्टा और अभिमानसे रहित हो शत्रुओंके अधीन हो गये थे। वे कुपित होकर बाणोंकी आगमें कूद पड़े थे ॥ १७ ॥
अत्र मे संशयः प्राप्तः कुतः संज्ञा मृता इति ।
कस्य मृत्युः कुतो मृत्युः केन मृत्युरिमाः प्रजाः ॥ १८ ॥
हरत्यमरसंकाश तन्मे ब्रूहि पितामह ।
मुझे संदेह होता है कि इन्हें 'मर गये' ऐसा क्यों कहा जाता है? मृत्यु किसकी होती है? किस निमित्तसे होती है? तथा वह किसलिये इन प्रजाओं (प्राणियों) का अपहरण करती है? देवतुल्य पितामह! ये सब बातें आप मुझे बताइये ॥ १८ ½ ॥
संजय उवाच
तं तथा परिपृच्छन्तं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
आश्वासनमिदं वाक्यमुवाच भगवानृषिः ॥ १९ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! इस प्रकार पूछते हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे मुनिवर भगवान् व्यासने यह आश्वासनजनक वचन कहा ॥ १९ ॥
व्यास उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
अकम्पनस्य कथितं नारदेन पुरा नृप ॥ २० ॥
व्यासजी बोले—नरेश्वर! जानकार लोग इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया करते हैं। वह इतिहास पूर्वकालमें नारदजीने राजा अकम्पनसे कहा था ॥ २० ॥
स चापि राजा राजेन्द्र पुत्रव्यसनमुत्तमम्।
अप्रसह्यतमं लोके प्राप्तवानिति मे मतिः ॥ २१ ॥
राजेन्द्र! राजा अकम्पनको भी अपने पुत्रकी मृत्युका बड़ा भारी शोक प्राप्त हुआ था, जो मेरे विचारमें सबसे अधिक असह्य दुःख है ॥ २१ ॥
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि मृत्योः प्रभवमुत्तमम्।
ततस्त्वं मोक्ष्यसे दुःखात् स्नेहबन्धनसंश्रयात् ॥ २२ ॥
इसलिये मैं तुम्हें मृत्युकी उत्पत्तिका उत्तम वृत्तान्त बताऊँगा, उसे सुनकर तुम स्नेह-बन्धनके कारण होनेवाले दुःखसे छूट जाओगे ॥ २२ ॥
समस्तपापराशिघ्नं शृणु कीर्तयतो मम।
धन्यमाख्यानमायुष्यं शोकघ्नं पुष्टिवर्धनम् ॥ २३ ॥
पवित्रमरिसंघघ्नं मङ्गलानां च मङ्गलम्।
यथैव वेदाध्ययनमुपाख्यानमिदं तथा ॥ २४ ॥
यह उपाख्यान समस्त पापराशिका नाश करने-वाला है। मैं इसका वर्णन करता हूँ, सुनो। यह धन और आयुको बढ़ानेवाला, शोकनाशक, पुष्टिवर्धक, पवित्र, शत्रुसमूहका निवारक और मंगलकारी कार्योंमें सबसे अधिक मंगलकारक है। जैसे वेदोंका स्वाध्याय पुण्यदायक होता है, उसी प्रकार यह उपाख्यान भी है ॥
श्रवणीयं महाराज प्रातर्नित्यं नृपोत्तमैः।
पुत्रानायुष्मतो राज्यमीहमानैः श्रियं तथा ॥ २५ ॥
महाराज! दीर्घायु पुत्र, राज्य और धन-सम्पत्ति चाहनेवाले श्रेष्ठ राजाओंको प्रतिदिन प्रातःकाल इस इतिहासका श्रवण करना चाहिये ॥ २५ ॥
पुरा कृतयुगे तात आसीद् राजा ह्यकम्पनः।
स शत्रुवशमापन्नो मध्ये संग्राममूर्धनि ॥ २६ ॥
तात! प्राचीनकालकी बात है, सत्ययुगमें अकम्पन नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे। वे युद्धमें शत्रुओंके वशमें पड़ गये ॥ २६ ॥
तस्य पुत्रो हरिर्नाम नारायणसमो बले।
श्रीमान् कृतास्त्रो मेधावी युधि शक्रोपमो बली ॥ २७ ॥
राजाके एक पुत्र था, जिसका नाम था हरि। वह बलमें भगवान् नारायणके समान था। वह अस्त्रविद्यामें पारंगत, मेधावी, श्रीसम्पन्न तथा युद्धमें इन्द्रके तुल्य पराक्रमी था ॥
स शत्रुभिः परिवृतो बहुधा रणमूर्धनि।
व्यस्यन् बाणसहस्राणि योधेषु च गजेषु च ॥ २८ ॥
वह रणक्षेत्रमें शत्रुओंद्वारा घिर जानेपर शत्रुपक्षके योद्धाओं और गजारोहियोंपर बारंबार सहस्रों बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ २८ ॥
स कर्म दुष्करं कृत्वा संग्रामे शत्रुतापनः ।
शत्रुभिर्निहतः संख्ये पृतनायां युधिष्ठिर ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर! वह शत्रुओंको संताप देनेवाला वीर राजकुमार संग्राममें दुष्कर पराक्रम दिखाकर अन्तमें शत्रुओंके हाथसे वहाँ सेनाके बीचमें मारा गया ॥ २९ ॥
स राजा प्रेतकृत्यानि तस्य कृत्वा शुचान्वितः ।
शोचन्नहनि रात्रौ च नालभत् सुखमात्मनः ॥ ३० ॥
राजा अकम्पनको बड़ा शोक हुआ। वे पुत्रका अन्त्येष्टि संस्कार करके दिन-रात उसीके शोकमें मग्न रहने लगे। उनकी अन्तरात्माको (थोड़ा-सा भी) सुख नहीं मिला ॥ ३० ॥
तस्य शोकं विदित्वा तु पुत्रव्यसनसम्भवम् ।
आजगामाथ देवर्षिर्नारदोऽस्य समीपतः ॥ ३१ ॥
राजा अकम्पनको अपने पुत्रकी मृत्युसे महान् शोक हो रहा है, यह जानकर देवर्षि नारद उनके समीप आये ॥ ३१ ॥
स तु राजा महाभागो दृष्ट्वा देवर्षिसत्तमम् ।
पूजयित्वा यथान्यायं कथामकथयत् तदा ॥ ३२ ॥