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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 3086)

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षोडशोऽध्यायः

श्रीकृष्णसे शाप पाकर अश्वत्थामाका वनको प्रस्थान तथा पाण्डवोंका मणि देकर द्रौपदीको शान्त करना

वैशम्पायन उवाच

तदाज्ञाय हृषीकेशो विसृष्टं पापकर्मणा ।
हृष्यमाण इदं वाक्यं द्रौणिं प्रत्यब्रवीत्तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! पापी अश्वत्थामाने अपना अस्त्र पाण्डवोंके गर्भपर छोड़ दिया, यह जानकर भगवान् श्रीकृष्णको बड़ी प्रसन्नता हुई। उस समय उन्होंने द्रोणपुत्रसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

विराटस्य सुतां पूर्वं स्नुषां गाण्डीवधन्वनः ।
उपप्लव्यगतां दृष्ट्वा व्रतवान् ब्राह्मणोऽब्रवीत् ॥ २ ॥
‘पहलेकी बात है, राजा विराटकी कन्या और गाण्डीवधारी अर्जुनकी पुत्रवधू जब उपप्लव्यनगरमें रहती थी, उस समय किसी व्रतवान् ब्राह्मणने उसे देखकर कहा— ॥

परिक्षीणेषु कुरुषु पुत्रस्तव भविष्यति ।
एतदस्य परिक्षित्त्वं गर्भस्थस्य भविष्यति ॥ ३ ॥
‘बेटी! जब कौरववंश परिक्षीण हो जायगा, तब तुम्हें एक पुत्र प्राप्त होगा और इसीलिये उस गर्भस्थ शिशुका नाम परीक्षित् होगा’ ॥ ३ ॥

तस्य तद् वचनं साधोः सत्यमेतद् भविष्यति ।
परिक्षिद् भविता ह्येषां पुनर्वंशकरः सुतः ॥ ४ ॥
‘उस साधु ब्राह्मणका वह वचन सत्य होगा। उत्तराका पुत्र परीक्षित् ही पुनः पाण्डववंशका प्रवर्तक होगा?’ ॥ ४ ॥

एवं ब्रुवाणं गोविन्दं सात्वतां प्रवरं तदा ।
द्रौणिः परमसंरब्धः प्रत्युवाचेदमुत्तरम् ॥ ५ ॥
सात्वतवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय द्रोणकुमार अश्वत्थामा अत्यन्त कुपित हो उठा और उन्हें उत्तर देता हुआ बोला— ॥ ५ ॥

नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं पक्षपातेन केशव ।
वचनं पुण्डरीकाक्ष न च मद्वाक्यमन्यथा ॥ ६ ॥
‘कमलनयन केशव! तुम पाण्डवोंका पक्षपात करते हुए इस समय जैसी बात कह गये हो, वह कभी हो नहीं सकती। मेरा वचन झूठा नहीं होगा ॥ ६ ॥

पतिष्यति तदस्त्रं हि गर्भे तस्या मयोद्यतम् ।

विराटदुहितुः कृष्ण यं त्वं रक्षितुमिच्छसि ॥ ७ ॥

‘श्रीकृष्ण! मेरे द्वारा चलाया गया वह अस्त्र विराटपुत्री उत्तराके गर्भपर ही, जिसकी तुम

रक्षा करना चाहते हो, गिरेगा’ ॥

श्रीभगवानुवाच

अमोघः परमास्त्रस्य पातस्तस्य भविष्यति ।

स तु गर्भो मृतो जातो दीर्घमायुरवाप्स्यति ॥ ८ ॥

श्रीभगवान् बोले—द्रोणकुमार! उस दिव्य अस्त्रका प्रहार तो अमोघ ही होगा।

उत्तराका वह गर्भ मरा हुआ ही पैदा होगा; फिर उसे लंबी आयु प्राप्त हो जायगी ॥

त्वां तु कापुरुषं पापं विदुः सर्वे मनीषिणः ।

असकृत्पापकर्माणं बालजीवितघातकम् ॥ ९ ॥

तस्मात्त्वमस्य पापस्य कर्मणः फलमाप्नुहि ।

त्रीणि वर्षसहस्राणि चरिष्यसि महीमिमाम् ॥ १० ॥

अप्राप्नुवन् क्वचित् काञ्चित् संविदं जातु केनचित् ।

निर्जनानसहायस्त्वं देशान् प्रविचरिष्यसि ॥ ११ ॥

परंतु तुझे सभी मनीषी पुरुष कायर, पापी, बारंबार पापकर्म करनेवाला और बाल-

हत्यारा समझते हैं। इसलिये तू इस पाप-कर्मका फल प्राप्त कर ले। आजसे तीन हजार

वर्षोंतक तू इस पृथ्वीपर भटकता फिरेगा। तुझे कभी कहीं और किसीके साथ भी बातचीत

करनेका सुख नहीं मिल सकेगा। तू अकेला ही निर्जन-स्थानोंमें घूमता रहेगा ॥

भवित्री न हि ते क्षुद्र जनमध्येषु संस्थितिः ।

पूयशोणितगन्धी च दुर्गकान्तारसंश्रयः ॥ १२ ॥

विचरिष्यसि पापात्मन् सर्वव्याधिसमन्वितः ।

ओ नीच! तू जनसमुदायमें नहीं ठहर सकेगा। तेरे शरीरसे पीव और लोहूकी दुर्गन्ध

निकलती रहेगी; अतः तुझे दुर्गम स्थानोंका ही आश्रय लेना पड़ेगा। पापात्मन्! तू सभी

रोगोंसे पीड़ित होकर इधर-उधर भटकेगा ॥ १२ १/२ ॥

वयः प्राप्य परिक्षित् तु वेदव्रतमवाप्य च ॥ १३ ॥

कृपाच्छारद्वताच्छूरः सर्वास्त्राण्युपपत्स्यते ।

परीक्षित् तो दीर्घ आयु प्राप्त करके ब्रह्मचर्यपालन एवं वेदाध्ययनका व्रत धारण करेगा

और वह शूरवीर बालक शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यसे ही सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त

करेगा ॥ १३ १/२ ॥

विदित्वा परमास्त्राणि क्षत्रधर्मव्रते स्थितः ॥ १४ ॥

षष्टिं वर्षाणि धर्मात्मा वसुधां पालयिष्यति ।

इस प्रकार उत्तम अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके क्षत्रियधर्ममें स्थित हो साठ वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन करेगा॥ १४ १/२ ॥

इतश्चोर्ध्वं महाबाहुः कुरुराजो भविष्यति ॥ १५ ॥
परिक्षिन्नाम नृपतिर्मिषतस्ते सुदुर्मते ।
दुर्मते! इसके बाद तेरे देखते-देखते महाबाहु कुरुराज परीक्षित् ही इस भूमण्डलका सम्राट् होगा॥ १५ १/२ ॥
अहं तं जीवयिष्यामि दग्धं शस्त्राग्नितेजसा ।
पश्य मे तपसो वीर्यं सत्यस्य च नराधम ॥ १६ ॥
नराधम! तेरी शस्त्राग्निके तेजसे दग्ध हुए उस बालकको मैं जीवित कर दूँगा। उस समय तू मेरे तप और सत्यका प्रभाव देख लेना॥ १६ ॥

व्यास उवाच

यस्मादनादृत्य कृतं त्वयास्मान् कर्म दारुणम् ।
ब्राह्मणस्य सतश्चैव यस्मात् ते वृत्तमीदृशम् ॥ १७ ॥
तस्माद् यद् देवकीपुत्र उक्तवानुत्तमं वचः ।
असंशयं ते तद् भावि क्षत्रधर्मस्त्वयाऽऽश्रितः ॥ १८ ॥
व्यासजीने कहा—द्रोणकुमार! तूने हमलोगोंका अनादर करके यह भयंकर कर्म किया है, ब्राह्मण होनेपर भी तेरा आचार ऐसा गिर गया है और तूने क्षत्रियधर्मको अपना लिया है; इसलिये देवकीनन्दन श्रीकृष्णने जो उत्तम बात कही है, वह सब तेरे लिये होकर ही रहेगी, इसमें संशय नहीं है॥

अश्वत्थामोवाच

सहैव भवता ब्रह्मन् स्थास्यामि पुरुषेष्विह ।
सत्यवागस्तु भगवानयं च पुरुषोत्तमः ॥ १९ ॥
अश्वत्थामा बोला—ब्रह्मन्! अब मैं मनुष्योंमें केवल आपके ही साथ रहूँगा। इन भगवान् पुरुषोत्तमकी बात सत्य हो॥ १९ ॥

वैशम्पायन उवाच

प्रदायाथ मणिं द्रौणिः पाण्डवानां महात्मनाम् ।
जगाम विमनास्तेषां सर्वेषां पश्यतां वनम् ॥ २० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इसके बाद महात्मा पाण्डवोंको मणि देकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा उदास मनसे उन सबके देखते-देखते वनमें चला गया॥
पाण्डवाश्चापि गोविन्दं पुरस्कृत्य हतद्विषः ।
कृष्णद्वैपायनं चैव नारदं च महामुनिम् ॥ २१ ॥

द्रोणपुत्रस्य सहजं मणिमादाय सत्वराः ।
द्रौपदीमभ्यधावन्त प्रायोपेतां मनस्विनीम् ॥ २२ ॥
इधर जिनके शत्रु मारे गये थे, वे पाण्डव भी भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास तथा महामुनि नारदजीको आगे करके द्रोणपुत्रके साथ ही उत्पन्न हुई मणि लिये आमरण अनशनका निश्चय किये बैठी हुई मनस्विनी द्रौपदीके पास पहुँचनेके लिये शीघ्रतापूर्वक चले ॥ २१-२२ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते पुरुषव्याघ्राः सदश्वैरनिलोपमैः ।
अभ्ययुः सहदाशार्हाः शिविरं पुनरेव हि ॥ २३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण-सहित वे पुरुषसिंह पाण्डव वहाँसे वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंद्वारा पुनः अपने शिविरमें आ पहुँचे ॥ २३ ॥
अवतीर्य रथेभ्यस्तु त्वरमाणा महारथाः ।
ददृशुर्द्रौपदीं कृष्णामार्तामार्ततराः स्वयंम् ॥ २४ ॥
वहाँ रथोंसे उतरकर वे महारथी वीर बड़ी उतावलीके साथ आकर शोकपीड़ित द्रुपदकुमारी कृष्णासे मिले। वे स्वयं भी शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे ॥
तामुपेत्य निरानन्दां दुःखशोकसमन्विताम् ।
परिवार्य व्यतिष्ठन्त पाण्डवाः सहकेशवाः ॥ २५ ॥
दुःख-शोकमें डूबी हुई आनन्दशून्य द्रौपदीके पास पहुँचकर श्रीकृष्णसहित पाण्डव उसे चारों ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ २५ ॥
ततो राजाभ्यनुज्ञातो भीमसेनो महाबलः ।
प्रददौ तं मणिं दिव्यं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २६ ॥
तब राजाकी आज्ञा पाकर महाबली भीमसेनने वह दिव्य मणि द्रौपदीके हाथमें दे दी और इस प्रकार कहा— ॥
अयं भद्रे तव मणिः पुत्रहन्तुर्जितः स ते ।
उत्तिष्ठ शोकमत्सृज्य क्षात्रधर्ममनुस्मर ॥ २७ ॥
‘भद्रे! यह तुम्हारे पुत्रोंका वध करनेवाले अश्वत्थामा-की मणि है। तुम्हारे उस शत्रुको हमने जीत लिया। अब शोक छोड़कर उठो और क्षत्रियधर्मका स्मरण करो ॥ २७ ॥
प्रयाणे वासुदेवस्य शमार्थमसितेक्षणे ।
यान्युक्तानि त्वया भीरु वाक्यानि मधुघातिनि ॥ २८ ॥
‘कजरारे नेत्रोंवाली भोली-भाली कृष्णे! जब मधुसूदन श्रीकृष्ण कौरवोंके पास संधि करानेके लिये जा रहे थे, उस समय तुमने इनसे जो बातें कही थीं, उन्हें याद तो करो ॥
नैव मे पतयः सन्ति न पुत्रा भ्रातरो न च ।

न वै त्वमिति गोविन्द शममिच्छति राजनि ॥ २९ ॥
उक्तवत्यसि तीव्राणि वाक्यानि पुरुषोत्तमम् ।
क्षत्रधर्मानुरूपाणि तानि संस्मर्तुमर्हसि ॥ ३० ॥
'जब राजा युधिष्ठिर शान्तिके लिये संधि कर लेना चाहते थे, उस समय तुमने पुरुषोत्तम श्रीकृष्णसे बड़े कठोर वचन कहे थे—'गोविन्द! (मेरे अपमानको भुलाकर शत्रुओंके साथ संधि की जा रही है, इसलिये मैं समझती हूँ कि) न मेरे पति हैं, न पुत्र हैं, न भाई हैं और न तुम्हीं हो'। क्षत्रियधर्मके अनुसार कहे गये उन वचनोंको तुम्हें आज स्मरण करना चाहिये ॥ २९-३० ॥

हतो दुर्योधनः पापो राज्यस्य परिपन्थिकः ।
दुःशासनस्य रुधिरं पीतं विस्फुरतो मया ॥ ३१ ॥
वैरस्य गतमानृण्यं न स्म वाच्या विवक्षताम् ।
जित्वा मुक्तो द्रोणपुत्रो ब्राह्मण्यद् गौरवेण च ॥ ३२ ॥
'हमारे राज्यका लुटेरा पापी दुर्योधन मारा गया और छटपटाते हुए दुःशासनका रक्त भी मैंने पी लिया। वैरका भरपूर बदला चुका लिया गया। अब कुछ कहनेकी इच्छावाले लोग हमलोगोंकी निन्दा नहीं कर सकते। हमने द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको जीतकर केवल ब्राह्मण और गुरुपुत्र होने-के कारण ही उसे जीवित छोड़ दिया है ॥ ३१-३२ ॥

यशोऽस्य पतितं देवि शरीरं त्ववशेषितम् ।
वियोजितश्च मणिना भ्रंशितश्चायुधं भुवि ॥ ३३ ॥
'देवि! उसका सारा यश धूलमें मिल गया। केवल शरीर शेष रह गया है। उसकी मणि भी छीन ली गयी और उससे पृथ्वीपर हथियार डलवा दिया गया है' ॥

द्रौपद्युवाच

केवलानृण्यमाप्तास्मि गुरुपुत्रो गुरुर्मम ।
शिरस्येतं मणिं राजा प्रतिबध्नातु भारत ॥ ३४ ॥
द्रौपदी बोली—भरतनन्दन! गुरुपुत्र तो मेरे लिये भी गुरुके ही समान हैं। मैं तो केवल पुत्रोंके वधका प्रतिशोध लेना चाहती थी, वह पा गयी। अब महाराज इस मणिको अपने मस्तकपर धारण करें ॥ ३४ ॥

तं गृहीत्वा ततो राजा शिरस्येवाकरोत् तदा ।
गुरोरुच्छिष्टमित्येव द्रौपद्या वचनादपि ॥ ३५ ॥
तब राजा युधिष्ठिरने वह मणि लेकर द्रौपदीके कथनानुसार उसे अपने मस्तकपर ही धारण कर लिया। उन्होंने उस मणिको गुरुका प्रसाद ही समझा ॥ ३५ ॥

ततो दिव्यं मणिवरं शिरसा धारयन् प्रभुः ।
शुशुभे स तदा राजा सचन्द्र इव पर्वतः ॥ ३६ ॥

उस दिव्य एवं उत्तम मणिको मस्तकपर धारण करके शक्तिशाली राजा युधिष्ठिर चन्द्रोदयकी शोभासे युक्त उदयाचलके समान सुशोभित हुए ॥ ३६ ॥

उत्तस्थौ पुत्रशोकार्ता ततः कृष्णा मनस्विनी ।
कृष्णं चापि महाबाहुः परिपप्रच्छ धर्मराट् ॥ ३७ ॥

तब पुत्रशोकसे पीड़ित हुई मनस्विनी कृष्णा अनशन छोड़कर उठ गयी और महाबाहु धर्मराजने भगवान् श्रीकृष्णसे एक बात पूछी ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि द्रौपदीसान्त्वनायां षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें द्रौपदीकी सान्त्वनाविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥