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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकि स्तुति करना

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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकि स्तुति करना

दुर्योधन उवाच

भूय एव तु मद्रेश यत्ते वक्ष्यामि तच्छृणु ।
यथा पुरावृत्तमिदं युद्धे देवासुरे विभो ॥ १ ॥
यदुक्तवान् पितुर्मह्यं मार्कण्डेयो महानृषिः ।
तदशेषेण ब्रुवतो मम राजर्षिसत्तम ॥ २ ॥
निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा ।
**दुर्योधन बोला—**मद्रराज! मैं पुनः आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ १-२ १/२ ॥

देवानामसुर्राणां च परस्परजिगीषया ॥ ३ ॥
बभूव प्रथमो राजन् संग्रामस्तारकामयः ।
राजन्! देवताओं और असुरोंमें परस्पर विजय पानेकी इच्छासे सर्वप्रथम तारकामय संग्राम हुआ था ॥

निर्जिताश्च तदा दैत्या दैवतैरिति नः श्रुतम् ॥ ४ ॥
निर्जितेषु च दैत्येषु तारकस्य सुतास्त्रयः ।
ताराक्षः कमलाक्षश्च विद्युन्माली च पार्थिव ॥ ५ ॥
तप उग्रं समास्थाय नियमे परमे स्थिताः ।
उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन्! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे ॥ ४-५ १/२ ॥

तपसा कर्शयामासुर्देहान् स्वान् शत्रुतापन ॥ ६ ॥
दमेन तपसा चैव नियमेन समाधिना ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! उन तीनोंने तपस्याके द्वारा अपने शरीरोंको सुखा दिया। वे इन्द्रिय-संयम, तप, नियम और समाधिसे संयुक्त रहने लगे ॥ ६ १/२ ॥

तेषां पितामहः प्रीतो वरदः प्रददौ वरम् ॥ ७ ॥
अवध्यत्वं च ते राजन् सर्वभूतस्य सर्वदा ।
सहिता वरयामासुः सर्वलोकपितामहम् ॥ ८ ॥
राजन्! उनपर प्रसन्न होकर वरदायक भगवान् ब्रह्मा उन्हें वर देनेको उद्यत हुए। उस समय उन तीनोंने एक साथ होकर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मासे यह वर माँगा कि ‘हम सदा सम्पूर्ण भूतोंसे अवध्य हों’ ॥
तानब्रवीत्तदा देवो लोकानां प्रभुरीश्वरः ।
नास्ति सर्वामरत्वं वै निवर्तध्वमितोऽसुराः ॥ ९ ॥
अन्यं वरं वृणीध्वं वै यादृशं सम्प्ररोचते ।
तब लोकनाथ भगवान् ब्रह्माने उनसे कहा—‘असुरो! सबके लिये अमरत्व सम्भव नहीं है। तुम इस तपस्यासे निवृत्त हो जाओ और दूसरा कोई वर जैसा तुम्हें रुचे माँग लो’ ॥ ९ १/२ ॥
ततस्ते सहिता राजन् सम्प्रधार्यासकृत् प्रथम् ॥ १० ॥
सर्वलोकेश्वरं वाक्यं प्रणम्येदमथाब्रुवन् ।
राजन्! तब उन सबने एक साथ बारंबार विचार करके सर्वलोकेश्वर भगवान् ब्रह्माको शीश नवाकर उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १० १/२ ॥
अस्मभ्यं त्वं वरं देव सम्प्रयच्छ पितामह ॥ ११ ॥
(वस्तुमिच्छाम नगरं कृत्वा कामगमं शुभम् ।
सर्वकामसमृद्धार्थमवध्यं देवदानवैः ॥
यक्षरक्षोरगगणैर्नानाजातिभिरेव च ।
न कृत्याभिर्न शस्त्रैश्च न शापैर्ब्रह्मवादिनाम् ॥
वध्येत त्रिपुरं देव प्रसन्ने त्वयि सादरम् ॥
‘पितामह! देव! हम सबको आप वर प्रदान कीजिये। हमलोग इच्छानुसार चलनेवाला नगराकार सुन्दर विमान बनाकर उसमें निवास करना चाहते हैं। हमारा वह पुर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंसे सम्पन्न तथा देवताओं और दानवोंके लिये अवध्य हो। देव! आपके सादर प्रसन्न होनेसे हमारे तीनों पुर यक्ष, राक्षस, नाग तथा नाना जातिके अन्य प्राणियोंद्वारा भी विनष्ट न हों। उन्हें न तो कृत्याएँ नष्ट कर सकें, न शस्त्र छिन्न-भिन्न कर सकें और न ब्रह्मवादियोंके शापोंद्वारा ही इनका विनाश हो’ ॥ ११ ॥

ब्रह्मोवाच
विलयः समयस्यान्ते मरणं जीवितस्य च ।
इति वित्त वधोपायं कञ्चिदेव निशाम्यत ॥)

**ब्रह्माजीने कहा—**दैत्यो! समय पूरा होनेपर सबका लय होता है। जो आज जीवित है, उसकी भी एक दिन मृत्यु होती है। इस बातको अच्छी तरह समझ लो और इन तीनों पुरोंके वधका कोई निमित्त कह सुनाओ।

दैत्या ऊचुः
वयं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय महीमिमाम् ।
विचरिष्याम लोकेऽस्मिंस्त्वत्प्रसादपुरस्कृताः ॥ १२ ॥
**दैत्य बोले—**भगवन्! हम तीनों पुरोंमें ही रहकर इस पृथ्वीपर एवं इस जगत्में आपके कृपा-प्रसादसे विचरेंगे ॥ १२ ॥
ततो वर्षसहस्रे तु समेष्यामः परस्परम् ।
एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येत़ानि चानघ ॥ १३ ॥
समागतानि चैतानि यो हन्याद् भगवंस्तदा ।
एकेषुणा देववरः स नो मृत्युर्भविष्यति ॥ १४ ॥
अनघ! तदनन्तर एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर हमलोग एक-दूसरेसे मिलेंगे। भगवन्! ये तीनों पुर जब एकत्र होकर एकीभावको प्राप्त हो जायँ, उस समय जो एक ही बाणसे इन तीनों पुरोंको नष्ट कर सके, वही देवेश्वर हमारी मृत्युका कारण होगा ॥ १३-१४ ॥
एवमस्त्विति तान् देवः प्रत्युक्त्वा प्राविशद् दिवम् ।
ते तु लब्धवराः प्रीताः सम्प्रधार्य परस्परम् ॥ १५ ॥
पुरत्रयविसृष्ट्यर्थं मयं वव्रेर्महासुरम् ।
विश्वकर्माणमजरं दैत्यदानवपूजितम् ॥ १६ ॥
‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) यों कहकर भगवान् ब्रह्मा अपने धामको चले गये। वरदान पाकर वे तीनों असुर बड़े प्रसन्न हुए और परस्पर विचार करके उन्होंने दैत्य-दानव-पूजित, अजर-अमर विश्वकर्मा महान् असुर मयका तीन पुरोंके निर्माणके लिये वरण किया ॥ १५-१६ ॥
ततो मयः स्वतपसा चक्रे धीमान् पुराणि च ।
त्रीणि काञ्चनमेकं वै रौप्यं कार्ष्णायसं तथा ॥ १७ ॥
तब बुद्धिमान् मयासुरने अपनी तपस्याद्वारा तीन पुरोंका निर्माण किया। उनमेंसे एक सोनेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा पुर लोहेका बना था ॥ १७ ॥
काञ्चनं दिवि तत्रासीदन्तरिक्षे च राजतम् ।
आयसं चाभवद् भौमं चक्रस्थं पृथिवीपते ॥ १८ ॥
पृथिवीपते! सोनेका बना हुआ पुर स्वर्गलोकमें स्थित हुआ। चाँदीका अन्तरिक्षलोकमें और लोहेका भूलोकमें स्थित हुआ; जो आज्ञाके अनुसार सर्वत्र विचरनेवाला था ॥
एकैकं योजनशतं विस्तारायामतः समम् ।

गृहाट्टालकसंयुक्तं बहुप्राकारतोरणम् ॥ १९ ॥
प्रत्येक नगरकी लंबाई-चौड़ाई बराबर-बराबर सौ योजनकी थी। सबमें बड़े-बड़े महल और अट्टालिकाएँ थीं। अनेकानेक प्राकार (परकोटे) और तोरण (फाटक) सुशोभित थे ॥ १९ ॥

गृहप्रवरसम्बाधमसम्बाधमहापथम् ।
प्रासादैर्विविधैश्चापि द्वारैश्चैवोपशोभितम् ॥ २० ॥
बड़े-बड़े घरोंसे वह नगर भरा था। उसकी विशाल सड़कें संकीर्णतासे रहित एवं विस्तृत थीं। नाना प्रकारके प्रासाद और द्वार उन पुरोंकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २० ॥

पुरेषु चाभवन् राजन् राजानो वै पृथक् पृथक् ।
काञ्चनं तारकाक्षस्य चित्रमासीन्महात्मनः ॥ २१ ॥
राजन्! उन तीनों पुरोंके राजा अलग-अलग थे। सुवर्णमय विचित्र पुर महामना तारकाक्षके अधिकारमें था ॥ २१ ॥

रजतं कमलाक्षस्य विद्युन्मालिन आयसम् ।
त्रयस्ते दैत्यराजानस्त्रींल्लोकानस्त्रतेजसा ॥ २२ ॥
आक्रम्य तस्थुरुचुश्च कश्च नाम प्रजापतिः ।
चाँदीका बना हुआ पुर कमलाक्षके और लोहेका विद्युन्मालीके अधिकारमें था। वे तीनों दैत्यराज अपने अस्त्रोंके तेजसे तीनों लोकोंको दबाकर रहते और कहते थे कि 'प्रजापति कौन है?' ॥ २२ १/२ ॥

तेषां दानवमुख्यानां प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥ २३ ॥
कोट्यश्चाप्रतिवीराणां समाजग्मुस्तस्ततः ।
उन दानवशिरोमणियोंके पास लाखों, करोड़ों और अरबों अप्रतिम वीर दैत्य इधर-उधरसे आ गये थे ॥

मांसाशिनः सुदृप्ताश्च सुरैर्विप्रकृताः पुरा ॥ २४ ॥
महदैश्वर्यमिच्छन्तस्त्रिपुरं दुर्गमाश्रिताः ।
वे सब-के-सब मांसभक्षी और अत्यन्त अभिमानी थे। पूर्वकालमें देवताओंने उनके साथ बहुत छल-कपट किया था। अतः वे महान् ऐश्वर्यकी इच्छा रखते हुए त्रिपुर-दुर्गके आश्रयमें आये थे ॥ २४ १/२ ॥

सर्वेषां च पुनश्चैषां सर्वयोगवहो मयः ॥ २५ ॥
तमाश्रित्य हि ते सर्वे वर्तयन्तेऽकुतोभयाः ।
मयासुर इन सबको सब प्रकारकी अप्राप्त वस्तुएँ प्राप्त कराता था। उसका आश्रय लेकर वे सम्पूर्ण दैत्य निर्भय होकर रहते थे ॥ २५ १/२ ॥

यो हि यन्मनसा कामं दध्यौ त्रिपुरसंश्रयः ॥ २६ ॥
तस्मै कामं मयस्तं वै विदधे मायया तदा ।

उक्त तीनों पुरोंमें निवास करनेवाला जो भी असुर अपने मनसे जिस अभीष्ट भोगका चिन्तन करता था, उसके लिये मयासुर अपनी मायासे वह-वह भोग तत्काल प्रस्तुत कर देता था ।। २६ १/२ ।।
तारकाक्षसुतो वीरो हरिर्नाम महाबलः ।। २७ ।।
तपस्तेपे परमकं येनातुष्यत् पितामहः ।
तारकाक्षका महाबली वीर पुत्र 'हरि' नामसे प्रसिद्ध था, उसने बड़ी भारी तपस्या की, जिससे ब्रह्माजी उसपर संतुष्ट हो गये ।। २७ १/२ ।।
संतुष्टमवृणोद् देवं वापी भवतु नः पुरे ।। २८ ।।
शस्त्रैर्विनिहता यत्र क्षिप्ताः स्युर्बलवत्तराः ।
संतुष्ट हुए ब्रह्माजीसे उसने यह वर माँगा कि 'हमारे पुरोंमें एक-एक ऐसी बावड़ी हो जाय, जिसके भीतर डाल दिये जानेपर शस्त्रोंके आघातसे मरे हुए दैत्य वीर और भी प्रबल होकर जीवित हो उठें' ।। २८ १/२ ।।
स तु लब्ध्वा वरं वीरस्तारकाक्षसुतो हरिः ।। २९ ।।
ससृजे तत्र वापीं तां मृतानां जीवनीं प्रभो ।
प्रभो! वह वरदान पाकर तारकाक्षके वीर पुत्र हरिने उन पुरोंमें एक-एक बावड़ीका निर्माण किया, जो मृतकोंको जीवन प्रदान करनेवाली थी ।। २९ १/२ ।।
येन रूपेण दैत्यस्तु येन वेषेण चैव ह ।। ३० ।।
मृतस्तस्यां परिक्षिप्तस्तादृशेनैव जज्ञिवान् ।
जो दैत्य जिस रूप और जैसे वेषमें रहता था, मरनेपर उस बावड़ीमें डालनेके पश्चात् वैसे ही रूप और वेषसे सम्पन्न होकर प्रकट हो जाता था ।। ३० १/२ ।।
तां प्राप्य ते पुनस्तांस्तु लोकान् सर्वान् बबाधिरे ।। ३१ ।।
महता तपसा सिद्धाः सुराणां भयवर्धनाः ।
न तेषामभवद् राजन् क्षयो युद्धे कदाचन ।। ३२ ।।
उस वापीमें पहुँच जानेपर नया जीवन धारण करके वे दैत्य पुनः उन सभी लोकोंको बाधा पहुँचाने लगते थे। राजन्! वे महान् तपसे सिद्ध हुए असुर देवताओंका भय बढ़ा रहे थे। युद्धमें कभी उनका विनाश नहीं होता था ।। ३१-३२ ।।
ततस्ते लोभमोहाभ्यामभिभूता विचेतसः ।
निर्ह्रीकाः संस्थिताः सर्वे स्थापिताः समलुलुपन् ।। ३३ ।।
उन पुरोंमें बसाये गये सभी दैत्य लोभ और मोहके वशीभूत हो विवेकहीन और निर्लज्ज होकर सब ओर लूटपाट करने लगे ।। ३३ ।।
विद्राव्य सगणान् देवांस्तत्र तत्र तदा तदा ।
विचेरुः स्वेन कामेन वरदानेन दर्पिताः ।। ३४ ।।

वरदान पानेके कारण उनका घमंड बढ़ गया था। वे विभिन्न स्थानोंमें देवताओं और उनके गणोंको भगाकर वहाँ अपनी इच्छाके अनुसार विचरते थे॥ ३४॥
देवोद्यानानि सर्वाणि प्रियाणि च दिवौकसाम्।
ऋषीणामाश्रमान् पुण्यान् रम्याञ्जनपदांस्तथा ॥ ३५ ॥
व्यनाशयन्मर्यादा दानवा दुष्टचारिणः।
स्वर्गवासियोंके परम प्रिय समस्त देवोद्यानों, ऋषियोंके पवित्र आश्रमों तथा रमणीय जनपदोंको भी वे मर्यादाशून्य दुराचारी दानव नष्ट-भ्रष्ट कर देते थे॥ ३५ १/२॥
(निःस्थानाश्च कृता देवा ऋषयः पितृभिः सह।
दैत्यैस्त्रिभिस्त्रयो लोका ह्याक्रान्तास्तैः सुरेतरैः ॥)
उन देवविरोधी तीनों दैत्योंने देवताओं, पितरों और ऋषियोंको भी उनके स्थानोंसे हटाकर निराश्रय कर दिया। वे ही नहीं, तीनों लोकोंके निवासी उनके द्वारा पददलित हो रहे थे॥
पीड्यमानेषु लोकेषु ततः शक्रो मरुद्वृतः ॥ ३६ ॥
पुराण्यायोधयांचक्रे वज्रपातैः समन्ततः।
जब सम्पूर्ण लोकोंके प्राणी पीड़ित होने लगे, तब देवताओंसहित इन्द्र चारों ओरसे वज्रपात करते हुए उन तीनों पुरोंके साथ युद्ध करने लगे॥ ३६ १/२॥
नाशकत् तान्यभेद्यानि यदा भेत्तुं पुरंदरः ॥ ३७ ॥
पुराणि वरदत्तानि धात्रा तेन नराधिप।
तदा भीतः सुरपतिर्मुक्त्वा तानि पुराण्यथ ॥ ३८ ॥
तैरेव विबुधैः सार्धं पितामहमरिंदम।
जगामाथ तदाख्यातुं विप्रकारं सुरेतरैः ॥ ३९ ॥
शत्रुदमननरेश्वर! जब देवराज इन्द्र ब्रह्माजीका वर पाये हुए उन अभेद्य पुरोंका भेदन न कर सके, तब वे भयभीत हो उन पुरोंको छोड़कर उन्हीं देवताओंके साथ ब्रह्माजीके पास उन दैत्योंका अत्याचार बतानेके लिये गये॥ ३७—३९॥
ते तत्त्वं सर्वमाख्याय शिरोभिः सम्प्रणम्य च।
वधोपायमपृच्छन्त भगवन्तं पितामहम् ॥ ४० ॥
उन्होंने मस्तक झुकाकर भगवान् ब्रह्माजीको प्रणाम किया और सारी बातें ठीक-ठीक बताकर उनसे उन दैत्योंके वधका उपाय पूछा॥ ४०॥
श्रुत्वा तद् भगवान् देवो देवानिदमुवाच ह।
ममापि सोऽपराध्नोति यो युष्माकमसौम्यकृत् ॥ ४१ ॥
वह सब सुनकर भगवान् ब्रह्माने उन देवताओंसे इस प्रकार कहा—'देवगण! जो तुम्हारी बुराई करता है, वह मेरा भी अपराधी है॥ ४१॥
असुरा हि दुरात्मानः सर्व एव सुरद्विषः।

अपराध्यन्ति सततं ये युष्मान् पीडयन्त्युत ॥ ४२ ॥
‘वे समस्त देवद्रोही दुरात्मा असुर, जो सदा तुम्हें पीड़ा देते रहते हैं, निश्चय ही मेरा भी महान् अपराध करते हैं’॥ ४२ ॥
अहं हि तुल्यः सर्वेषां भूतानां नात्र संशयः ।
अधार्मिकास्तु हन्तव्या इति मे वतमाहितम् ॥ ४३ ॥
‘इसमें संशय नहीं कि समस्त प्राणियोंके प्रति मेरा समान भाव है, तथापि मैंने यह व्रत ले रखा है कि पापात्माओंका वध कर दिया जाय’॥ ४३ ॥
एकेषुणा विभेद्यानि तानि दुर्गाणि नान्यथा ।
न च स्थाणुमृते शक्तो भेत्तुमेकेषुणा पुरः ॥ ४४ ॥
‘वे तीनों पुर एक ही बाणसे वेध दिये जायँ तो नष्ट हो सकते हैं, अन्यथा नहीं; परंतु महादेवजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उन तीनोंको एक साथ एक ही बाणसे वेध सके’॥ ४४ ॥
ते यूयं स्थाणुमीशानं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् ।
योद्धारं वृणुतादित्याः स तान् हन्ता सुरेतरान् ॥ ४५ ॥
‘अतः अदितिकुमारो! तुमलोग अनायास ही महान् कर्म करनेवाले, विजयशील, ईश्वर, महादेवजीका योद्धाके रूपमें वरण करो। वे ही उन दैत्योंको मार सकते हैं’॥ ४५ ॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा देवाः शक्रपुरोगमाः ।
ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा वृषाङ्कं शरणं ययुः ॥ ४६ ॥
उनकी यह बात सुनकर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता ब्रह्माजीको आगे करके महादेवजीकी शरणमें गये ॥ ४६ ॥
तपो नियममास्थाय गृणन्तो ब्रह्म शाश्वतम् ।
ऋषिभिः सह धर्मज्ञा भवं सर्वात्मना गताः ॥ ४७ ॥
तप और नियमका आश्रय ले ऋषियोंसहित धर्मज्ञ देवता सनातन ब्रह्मस्वरूप महादेवजीकी स्तुति करते हुए सम्पूर्ण हृदयसे उनकी शरणमें गये ॥ ४७ ॥
तुष्टुवुर्वाग्भिरिष्टाभिर्भयेष्वभयदं नृप ।
सर्वात्मानं महात्मानं येनाप्तं सर्वमात्मना ॥ ४८ ॥
नरेश्वर! जिन्होंने आत्मस्वरूपसे सबको व्याप्त कर रखा है तथा जो भयके अवसरोंपर अभय प्रदान करनेवाले हैं, उन सर्वात्मा, महात्मा भगवान् शिवकी उन देवताओंने अभीष्ट वाणीद्वारा स्तुति की ॥ ४८ ॥
तपोविशेषैर्विविधैर्यौगं यो वेद चात्मनः ।
यः सांख्यमात्मनो वेत्ति यस्य चात्मा वशे सदा ॥ ४९ ॥
तं ते ददृशुरीशानं तेजोराशिमुमापतिम् ।
अनन्यसदृशं लोके भगवन्तमकल्मषम् ॥ ५० ॥

जो नाना प्रकारकी विशेष तपस्याओंद्वारा मनकी सम्पूर्ण वृत्तियोंके निरोधका उपाय जानते हैं, जिन्हें अपनी ज्ञानस्वरूपताका बोध नित्य बना रहता है, जिनका अन्तःकरण सदा अपने वशमें रहता है, जगत्में जिनकी कहीं भी तुलना नहीं है, उन निष्पाप, तेजोराशि, महेश्वर भगवान् उमापतिका उन देवताओंने दर्शन किया ॥ ४९-५० ॥

एकं च भगवन्तं ते नानारूपमकल्पयन् ।
आत्मनः प्रतिरूपाणि रूपाण्यथ महात्मनि ॥ ५१ ॥
परस्परस्य चापश्यन् सर्वे परमविस्मिताः ।
उन्होंने एक ही भगवान् शिवको अपनी भावनाके अनुसार अनेक रूपोंमें कल्पित किया। उन परमात्मामें अपने तथा दूसरोंके प्रतिबिम्ब देखे। यह सब देखकर परस्पर दृष्टिपात करके वे सब-के-सब अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ५१ ½ ॥

सर्वभूतमयं दृष्ट्वा तमजं जगतः प्रतिम् ॥ ५२ ॥
देवा ब्रह्मर्षयश्चैव शिरोभिर्धरणीं गताः ।
उन सर्वभूतमय अजन्मा जगदीश्वरको देखकर सम्पूर्ण देवताओं तथा ब्रह्मर्षियोंने धरतीपर मस्तक टेक दिये ॥ ५२ ½ ॥

तान् स्वस्तिवादेनाभ्यर्च्य समुत्थाप्य च शङ्करः ॥ ५३ ॥
ब्रूत ब्रूतेति भगवान् स्मयमानोऽभ्यभाषत ।
तब भगवान् शंकरने 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा कहकर उनका समादर करते हुए उनको उठाया और मुसकराते हुए कहा—'बोलो, बोलो; क्या है?' ॥ ५३ ½ ॥

त्र्यम्बकेणाभ्यनुज्ञातास्ततस्ते स्वस्थचेतसः ॥ ५४ ॥
नमो नमो नमस्तेऽस्तु प्रभो इत्यब्रुवन् वचः ।
भगवान् त्रिलोचनकी आज्ञा पाकर स्वस्थचित्त हुए वे देवगण इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे—'प्रभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ५४ ½ ॥

नमो देवाधिदेवाय धन्विने वनमालिने ॥ ५५ ॥
प्रजापतिमखघ्नाय प्रजापतिभिरीड्यते ।
नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तूयमानाय शम्भवे ॥ ५६ ॥
'आप देवताओंके अधिदेवता, धनुर्धर और वनमालाधारी हैं। आपको नमस्कार है। आप दक्षप्रजापतिके यज्ञका विध्वंस करनेवाले हैं, प्रजापति भी आपकी स्तुति करते हैं, सबके द्वारा आपकी ही स्तुति की गयी है, आप ही स्तुतिके योग्य हैं तथा सब लोग आपकी ही स्तुति करते हैं। आप कल्याणस्वरूप शम्भुको नमस्कार है ॥ ५५-५६ ॥

विलोहिताय रुद्राय नीलग्रीवाय शूलिने ।
अमोघाय मृगाक्षाय प्रवरायुधयोधिने ॥ ५७ ॥
'आप विशेषतः लाल वर्णके हैं, पापियोंको रुलानेवाले रुद्र हैं, नीलकण्ठ और त्रिशूलधारी हैं, आपका दर्शन अमोघ फल देनेवाला है, आपके नेत्र मृगोंके समान हैं तथा

आप श्रेष्ठ आयुधोंद्वारा युद्ध करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ ५७ ॥
अर्हाय चैव शुद्धाय क्षयाय क्रथनाय च ।
दुर्वारणाय शुक्राय ब्रह्मणे ब्रह्मचारिणे ॥ ५८ ॥
ईशानायाप्रमेयाय नियन्त्रे चर्मवाससे ।
तपोरताय पिङ्गाय व्रतिने कृत्तिवाससे ॥ ५९ ॥
‘आप पूजनीय, शुद्ध, प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले हैं। आपको रोकना या पराजित करना सर्वथा कठिन है। आप शुक्लवर्ण, ब्रह्म, ब्रह्मचारी, ईशान, अप्रमेय, नियन्ता तथा व्याघ्रचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले हैं। आप सदा तपस्यामें तत्पर रहनेवाले, पिंगलवर्ण, व्रतधारी और कृत्तिवासा हैं। आपको नमस्कार है ॥ ५८-५९ ॥
कुमारपित्रे त्र्यक्षाय प्रवरायुधधारिणे ।
प्रपन्नार्तिविनाशाय ब्रह्मद्विट्संघघातिने ॥ ६० ॥
‘आप कुमार कार्तिकेयके पिता, त्रिनेत्रधारी, उत्तम आयुध धारण करनेवाले शरणागतदुःखभंजन तथा ब्रह्मद्रोहियोंके समुदायका विनाश करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ ६० ॥
वनस्पतीनां पतये नराणां पतये नमः ।
गवां च पतये नित्यं यज्ञानां पतये नमः ॥ ६१ ॥
‘आप वनस्पतियोंके पालक और मनुष्योंके अधिपति हैं। आप ही गौओंके स्वामी और सदा यज्ञोंके अधीश्वर हैं। आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ६१ ॥
नमोऽस्तु ते ससैन्याय त्र्यम्बकायामितौजसे ।
मनोवाक्कर्मभिर्देव त्वां प्रपन्नान् भजस्व नः ॥ ६२ ॥
‘सेनासहित आप अमिततेजस्वी भगवान् त्र्यम्बकको नमस्कार है। देव! हम मन, वाणी और क्रियाद्वारा आपकी शरणमें आये हैं। आप हमें अपनाइये’ ॥ ६२ ॥
ततः प्रसन्नो भगवान् स्वागतेनाभिनन्द्य च ।
प्रोवाच व्येतु वस्त्र्रासो ब्रूत किं करवाणि वः ॥ ६३ ॥
तब भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर स्वागत-सत्कारके द्वारा देवताओंको आनन्दित करके कहा—‘देवगण! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये; बोलो, मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ?’ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि त्रिपुराख्याने त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें त्रिपुराख्यानविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६७ १/३ श्लोक हैं)