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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2907)

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अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत तथा अर्जुनके संकेतके अनुसार भीमसेनका गदासे दुर्योधनकी जाँघें तोड़कर उसे धराशायी करना एवं भीषण उत्पातोंका प्रकट होना

संजय उवाच

समुदीर्णं ततो दृष्ट्वा संग्रामं कुरुमुख्ययोः ।
अथाब्रवीदर्जुनस्तु वासुदेवं यशस्विनम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! कुरुकुलके उन दोनों प्रमुख वीरोंके उस संग्रामको उत्तरोत्तर बढ़ता देख अर्जुनने यशस्वी भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा— ॥ १ ॥

अनयोर्वीर्ययोर्युद्धे को ज्यायान् भवतो मतः ।
कस्य वा को गुणो भूयानेतद् वद जनार्दन ॥ २ ॥
‘जनार्दन! आपकी रायमें इन दोनों वीरोंमेंसे इस युद्धस्थलमें कौन बड़ा है अथवा किसमें कौन-सा गुण अधिक है? यह मुझे बताइये’ ॥ २ ॥

वासुदेव उवाच

उपदेशोऽनयोस्तुल्यो भीमस्तु बलवत्तरः ।
कृती यत्नपरस्त्वेव धार्तराष्ट्रो वृकोदरात् ॥ ३ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—अर्जुन! इन दोनोंको शिक्षा तो एक-सी मिली है; परंतु भीमसेन बलमें अधिक हैं और यह दुर्योधन उनकी अपेक्षा अभ्यास और प्रयत्नमें बढ़ा-चढ़ा है ॥ ३ ॥

भीमसेनस्तु धर्मेण युद्ध्यमानो न जेष्यति ।
अन्यायेन तु युध्यन् वै हन्यादेव सुयोधनम् ॥ ४ ॥
यदि भीमसेन धर्मपूर्वक युद्ध करते रहे तो कदापि नहीं जीतेंगे और अन्यायपूर्वक युद्ध करनेपर निश्चय ही दुर्योधनका वध कर डालेंगे ॥ ४ ॥

मायया निर्जिता देवैरसुरा इति नः श्रुतम् ।
विरोचनस्तु शक्रेण मायया निर्जितः स वै ॥ ५ ॥
हमने सुना है कि देवताओंने पूर्वकालमें मायासे ही असुरोंपर विजय पायी थी और इन्द्रने मायासे ही विरोचनको परास्त किया था ॥ ५ ॥

मायया चाक्षिपत् तेजो वृत्रस्य बलसूदनः ।
तस्मान्मायामयं भीम आतिष्ठतु पराक्रमम् ॥ ६ ॥

बलसूदन इन्द्रने मायासे वृत्रासुरके तेजको नष्ट कर दिया था, इसलिये भीमसेन भी यहाँ मायामय पराक्रमका ही आश्रय लें।। ६ ।।
प्रतिज्ञातं च भीमेन द्यूतकाले धनंजय ।
ऊरू भेत्स्यामि ते संख्ये गदयेति सुयोधनम् ।। ७ ।।
धनंजय! जूएके समय भीमने प्रतिज्ञा करते हुए दुर्योधनसे यह कहा था कि 'मैं युद्धमें गदा मारकर तेरी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा' ।। ७ ।।
सोऽयं प्रतिज्ञां तां चापि पालयत्वरिकर्षणः ।
मायाविनं तु राजानं माययैव निकृन्ततु ।। ८ ।।
अतः शत्रुसूदन भीमसेन अपनी उस प्रतिज्ञाका पालन करें और मायावी राजा दुर्योधनको मायासे ही नष्ट कर डालें ।।
यद्येष बलमास्थाय न्यायेन प्रहरिष्यति ।
विषमस्थस्ततो राजा भविष्यति युधिष्ठिरः ।। ९ ।।
यदि ये बलका सहारा लेकर न्यायपूर्वक प्रहार करेंगे, तब राजा युधिष्ठिर पुनः बड़ी विषम परिस्थितिमें पड़ जायँगे ।। ९ ।।
पुनरेव तु वक्ष्यामि पाण्डवेय निबोध मे ।
धर्मराजापराधेन भयं नः पुनरागतम् ।। १० ।।
पाण्डुनन्दन! मैं पुनः यह बात कहे देता हूँ, तुम उसे ध्यान देकर सुनो। धर्मराजके अपराधसे हमलोगोंपर फिर भय आ पहुँचा है ।। १० ।।
कृत्वा हि सुमहत् कर्म हत्वा भीष्ममुखान् कुरून् ।
जयः प्राप्तो यशः प्राग्रयं वैरं च प्रतियातितम् ।। ११ ।।
तदेवं विजयः प्राप्तः पुनः संशयितः कृतः ।
महान् प्रयास करके भीष्म आदि कौरवोंको मारकर विजय एवं श्रेष्ठ यशकी प्राप्ति की गयी और वैरका पूरा-पूरा बदला चुकाया गया था। इस प्रकार जो विजय प्राप्त हुई थी, उसे उन्होंने फिर संशयमें डाल दिया है ।। ११ १/२ ।।
अबुद्धिरेषा महती धर्मराजस्य पाण्डव ।। १२ ।।
यदेकविजये युद्धं पणितं घोरमीदृशम् ।
पाण्डुनन्दन! एककी ही हार-जीतसे सबकी हार-जीतकी शर्त लगाकर जो इन्होंने इस भयंकर युद्धको जूएका दाँव बना डाला, यह धर्मराजकी बड़ी भारी नासमझी है ।। १२ १/२ ।।
सुयोधनः कृती वीर एकायनगतस्तथा ।। १३ ।।
अपि चोशनसा गीतः श्रूयतेऽयं पुरातनः ।
श्लोकस्तत्त्वार्थसहितस्तन्मे निगदतः शृणु ।। १४ ।।
दुर्योधन युद्धकी कला जानता है, वीर है और एक निश्चयपर डटा हुआ है। इस विषयमें शुक्राचार्यका कहा हुआ यह एक प्राचीन श्लोक सुननेमें आता है, जो नीतिशास्त्रके तात्त्विक

अर्थसे भरा हुआ है उसे सुना रहा हूँ, मेरे कहनेसे वह श्लोक सुनो ।। १३-१४ ।।
पुनरावर्तमानानां भग्नानां जीवितैषिणाम् ।
भेतव्यमरिशेषाणामेकायनगता हिते ।। १५ ।।
‘मरनेसे बचे हुए शत्रुगण यदि युद्धमें जान बचानेकी इच्छासे भाग गये हों और पुनः युद्धके लिये लौटने लगे हों तो उनसे डरते रहना चाहिये; क्योंकि वे एक निश्चयपर पहुँचे हुए होते हैं (उस समय वे मृत्युसे भी नहीं डरते हैं)’ ।। १५ ।।
साहसोत्पतितानां च निराशानां च जीविते ।
न शक्यमग्रतः स्थातुं शक्रेणापि धनंजय ।। १६ ।।
धनंजय! जो जीवनकी आशा छोड़कर साहसपूर्वक युद्धमें कूद पड़े हों, उनके सामने इन्द्र भी नहीं ठहर सकते ।। १६ ।।
सुयोधनमिमं भग्नं हतसैन्यं हृदं गतम् ।
पराजितं वनप्रेप्सुं निराशं राज्यलम्भने ।। १७ ।।
को न्वेष संयुगे प्राज्ञः पुनर्द्वन्द्वे समाह्वयेत् ।
इस दुर्योधनकी सेना मारी गयी थी। यह परास्त हो गया था और अब राज्य पानेसे निराश हो वनमें चला जाना चाहता था; इसीलिये भागकर पोखरेमें छिपा था, ऐसे हताश शत्रुको कौन बुद्धिमान् पुरुष समरांगणमें द्वन्द्व-युद्धके लिये आमन्त्रित करेगा? ।। १७ ½ ।।
अपि नो निर्जितं राज्यं न हरेत सुयोधनः ।। १८ ।।
यस्त्रयोदशवर्षाणि गदया कृतनिश्रमः ।
चरत्यूर्ध्वं च तिर्यक् च भीमसेनजिघांसया ।। १९ ।।
कहीं ऐसा न हो कि हमारे जीते हुए राज्यको दुर्योधन फिर हड़प ले। उसने तेरह वर्षोंतक गदाद्वारा युद्ध करनेका निरन्तर श्रम एवं अभ्यास किया है। देखो, यह भीमसेनके वधकी इच्छासे इधर-उधर और ऊपरकी ओर विचर रहा है ।। १८-१९ ।।
एनं चेन्न महाबाहुरन्यायेन हनिष्यति ।
एष वः कौरवो राजा धार्तराष्ट्रो भविष्यति ।। २० ।।
यदि महाबाहु भीमसेन इसे अन्यायपूर्वक नहीं मारेंगे तो यह धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन ही आपका तथा समस्त कुरुकुलका राजा होगा ।। २० ।।
धनंजयस्तु श्रुत्वैतत् केशवस्य महात्मनः ।
प्रेक्षतो भीमसेनस्य सव्यमूरुमताडयत् ।। २१ ।।
महात्मा भगवान् केशवका यह वचन सुनकर अर्जुनने भीमसेनके देखते हुए अपनी बायीं जाँघको ठोंका ।। २१ ।।
गृह्य संज्ञां ततो भीमो गदया व्यचरद् रणे ।
मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च ।। २२ ।।

इससे संकेत पाकर भीमसेन रणभूमिमें गदाद्वारा यमक तथा अन्य प्रकारके विचित्र मण्डल दिखाते हुए विचरने लगे ॥ २२ ॥
दक्षिणं मण्डलं सव्यं गोमूत्रकमथापि च ।
व्यचरत् पाण्डवो राजन्नर्रिं संमोहयन्निव ॥ २३ ॥
राजन्! पाण्डुपुत्र भीमसेन आपके पुत्रको मोहित करते हुए-से दक्षिण, वाम और गोमूत्रक मण्डलसे विचरने लगे ॥ २३ ॥
तथैव तव पुत्रोऽपि गदामार्गविशारदः ।
व्यचरल्लघु चित्रं च भीमसेनजिघांसया ॥ २४ ॥
इसी प्रकार गदायुद्धकी प्रणालीका विशेषज्ञ आपका पुत्र भी भीमसेनके वधकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक विचित्र पैंतरे देता हुआ विचरने लगा ॥ २४ ॥
आधुन्वन्तो गदे घोरे चन्दनागरुरूषिते ।
वैरस्यान्तं परीप्सन्तौ रणे क्रुद्धाविवान्तकौ ॥ २५ ॥
वैरका अन्त करनेकी इच्छावाले वे दोनों वीर रणभूमिमें चन्दन और अगुरुसे चर्चित भयंकर गदाएँ घुमाते हुए कुपित कालके समान प्रतीत होते थे ॥ २५ ॥
अन्योन्यं तौ जिघांसन्तौ प्रवीरौ पुरुषर्षभौ ।
युयुधाते गरुत्मन्तौ यथा नागामिषैषिणौ ॥ २६ ॥
जैसे दो गरुड़ किसी सर्पके मांसको पानेकी इच्छासे परस्पर लड़ रहे हों, उसी प्रकार एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले वे दोनों पुरुषप्रवर प्रमुख वीर भीमसेन और दुर्योधन आपसमें जूझ रहे थे ॥ २६ ॥
मण्डलानि विचित्राणि चरतोर्नृपभीमयोः ।
गदासम्पातजास्तत्र प्रजज्ञुः पावकार्चिषः ॥ २७ ॥
विचित्र मण्डलों (पैंतरों)-से विचरते हुए राजा दुर्योधन और भीमसेनकी गदाओंके टकरानेसे वहाँ आगकी लपटें प्रकट होने लगीं ॥ २७ ॥
समं प्रहरतोस्तत्र शूरयोर्बलिनोर्मृधे ।
क्षुब्धयोर्वायुना राजन् द्वयोरिव समुद्रयोः ॥ २८ ॥
तयोः प्रहरतोस्तुल्यं मत्तकुञ्जरयोरिव ।
गदानिर्घातसंह्नादः प्रहाराणामजायत ॥ २९ ॥
राजन्! जैसे वायुसे विक्षुब्ध हुए दो समुद्र एक-दूसरेसे टकरा रहे हों अथवा दो मतवाले हाथी परस्पर चोट कर रहे हों, उसी प्रकार वहाँ एक-दूसरेपर समान रूपसे प्रहार करनेवाले दोनों बलवान् वीरोंके परस्पर चोट करनेपर गदाओंके टकरानेकी आवाज वज्रकी कड़कके समान प्रकट होती थी ॥ २८-२९ ॥
तस्मिंस्तदा सम्प्रहारे दारुणे संकुले भृशम् ।
उभावपि परिश्रान्तौ युध्यमानाव्रिंदमौ ॥ ३० ॥

उस समय उस अत्यन्त भयंकर घमासान युद्धमें शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर परस्पर युद्ध करते हुए बहुत थक गये ॥ ३० ॥

तौ मुहूर्तं समाश्वस्य पुनरेव परंतप ।
अभ्यहारयतां क्रुद्धौ प्रगृह्य महती गदे ॥ ३१ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! तब दोनों दो घड़ीतक विश्राम करके पुनः विशाल गदाएँ हाथमें लेकर क्रोधपूर्वक एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ ३१ ॥

तयोः समभवद् युद्धं घोररूपमंसंवृतम् ।
गदानिपातै राजेन्द्र तक्षतोर्वै परस्परम् ॥ ३२ ॥
राजेन्द्र! गदाकी चोटसे एक-दूसरेको घायल करते हुए उन दोनोंमें खुले तौरपर घोर युद्ध हो रहा था ॥ ३२ ॥

समरे प्रद्रुतौ तौ तु वृषाभाक्षौ तरस्विनौ ।
अन्योन्यं जघ्नतुर्वीरौ पङ्कस्थौ महिषाविव ॥ ३३ ॥
बैलके समान विशाल नेत्रोंवाले वे दोनों वेगशाली वीर समरांगणमें परस्पर धावा करके कीचड़में खड़े हुए दो भैंसोंके समान एक-दूसरेपर चोट करते थे ॥ ३३ ॥

जर्जरीकृतसर्वाङ्गौ रुधिरेणाभिसम्प्लुतौ ।
ददृशाते हिमवति पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ३४ ॥
उन दोनोंके सारे अंग गदाके प्रहारसे जर्जर हो गये थे और दोनों ही खूनसे लथपथ हो गये थे। उस दशामें वे हिमालयपर खिले हुए दो पलाशवृक्षोंके समान दिखायी देते थे ॥ ३४ ॥

दुर्योधनस्तु पार्थेन विवरे सम्प्रदर्शिते ।
ईषद्विन्मिषमाणस्तु सहसा प्रससार ह ॥ ३५ ॥
जब अर्जुनने छिद्रकी ओर संकेत किया, तब कनखियोंसे उसे देखकर दुर्योधन सहसा भीमसेनकी ओर बढ़ा ॥ ३५ ॥

तमभ्याशगतं प्राज्ञो रणे प्रेक्ष्य वृकोदरः ।
अवाक्षिपद् गदां तस्मिन् वेगेन महता बली ॥ ३६ ॥
रणभूमिमें उसे निकट आया देख बुद्धिमान् एवं बलवान् भीमने उसपर बड़े वेगसे गदा चलायी ॥ ३६ ॥

आक्षिपन्तं तु तं दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशाम्पते ।
अवासर्पत्ततः स्थानात् सा मोघा न्यपतद् भुवि ॥ ३७ ॥
प्रजानाथ! उन्हें गदा चलाते देख आपका पुत्र सहसा उस स्थानसे हट गया और वह गदा व्यर्थ होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३७ ॥

मोक्षयित्वा प्रहारं तं सुतस्तव सुसम्भ्रमात् ।
भीमसेनं च गदया प्राहरत् कुरुसत्तम ॥ ३८ ॥

कुरुश्रेष्ठ! उस प्रहारसे अपनेको बचाकर आपके पुत्रने भीमसेनपर बड़े वेगसे गदाद्वारा आघात किया ॥ ३८ ॥

तस्य विस्यन्दमानेन रुधिरेणामितौजसः ।
प्रहारगुरुपाताच्च मूर्च्छेव समजायत ॥ ३९ ॥
उसकी चोटसे अमिततेजस्वी भीमके शरीरसे रक्तकी धारा बह चली। साथ ही उस प्रहारके गहरे आघातसे उन्हें मूर्च्छा-सी आ गयी ॥ ३९ ॥

दुर्योधनो न तं वेद पीडितं पाण्डवं रणे ।
धारयामास भीमोऽपि शरीरमतिपीडितम् ॥ ४० ॥
उस समय दुर्योधन यह न जान सका कि रणभूमिमें पाण्डुपुत्र भीमसेन अधिक पीड़ित हो गये हैं। यद्यपि उनके शरीरमें अत्यन्त वेदना हो रही थी तो भी भीमसेन उसे सँभाले रहे ॥ ४० ॥

अमन्यत स्थितं ह्येनं प्रहरिष्यन्तमाहवे ।
अतो न प्राहरत् तस्मै पुनरेव तवात्मजः ॥ ४१ ॥
उसने यही समझा कि रणक्षेत्रमें भीमसेन अब मुझपर प्रहार करनेके लिये खड़े हैं; अतः बचनेकी ही चेष्टामें संलग्न होकर आपके पुत्रने पुनः उनपर प्रहार नहीं किया ॥ ४१ ॥

ततो मुहूर्तमाश्वस्य दुर्योधनमुपस्थितम् ।
वेगेनाभ्यपतद् राजन् भीमसेनः प्रतापवान् ॥ ४२ ॥
राजन्! तदनन्तर दो घड़ी सुस्ताकर प्रतापी भीमसेनने निकट आये हुए दुर्योधनपर बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य संरब्धममितौजसम् ।
मोघमस्य प्रहारं तं चिकीर्षुर्भरतर्षभ ॥ ४३ ॥
भरतश्रेष्ठ! अमिततेजस्वी भीमको रोषपूर्वक धावा करते देख आपके पुत्रने उनके उस प्रहारको व्यर्थ कर देनेकी इच्छा की ॥ ४३ ॥

अवस्थाने मतिं कृत्वा पुत्रस्तव महामनाः ।
इयेषोत्पतितुं राजन् छलयिष्यन् वृकोदरम् ॥ ४४ ॥
राजन्! भीमसेनको छलनेके लिये आपके महामनस्वी पुत्रने पहले वहाँ स्थिरतापूर्वक खड़े रहनेका विचार करके फिर उछलकर दूर हट जानेकी इच्छा की ॥ ४४ ॥

अबुद्ध्यद् भीमसेनस्तु राज्ञस्तस्य चिकीर्षितम् ।
अथास्य समभिद्रुत्य समुत्क्रुश्य च सिंहवत् ॥ ४५ ॥
सृत्या वञ्चयतो राजन् पुनरेवोत्पतिष्यतः ।
ऊरुभ्यां प्राहिणोद् राजन् गदां वेगेन पाण्डवः ॥ ४६ ॥
भीमसेन समझ गये कि राजा दुर्योधन क्या करना चाहता है। अतः पैंतरेसे छलने और ऊपर उछलनेकी इच्छावाले दुर्योधनके ऊपर आक्रमण करके भीमसेनने सिंहके समान

गर्जना की और उसकी जाँघोंपर बड़े वेगसे गदा चलायी ॥ ४५-४६ ॥
सा वज्रनिष्पेषसमा प्रहिता भीमकर्मणा ।
ऊरू दुर्योधनस्याथ बभञ्ज प्रियदर्शनौ ॥ ४७ ॥
भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनके द्वारा चलायी हुई वह गदा वज्रपातके समान गिरी और दुर्योधनकी सुन्दर दिखायी देनेवाली जाँघोंको उसने तोड़ दिया ॥ ४७ ॥
स पपात नरव्याघ्रो वसुधामनुनादयन् ।
भग्नोरुर्भीमसेनेन पुत्रस्तव महीपते ॥ ४८ ॥
पृथ्वीनाथ! इस प्रकार जब भीमसेनने उसकी जाँघें तोड़ डालीं, तब आपका पुत्र पुरुषसिंह दुर्योधन पृथ्वीको प्रतिध्वनित करता हुआ गिर पड़ा ॥ ४८ ॥
ववुर्वाताः सनिर्घाताः पांशुवर्षं पपात च ।
चचाल पृथिवी चापि सवृक्षक्षुपपर्वता ॥ ४९ ॥
तस्मिन् निपतिते वीरे पत्यौ सर्वमहीक्षिताम् ।
फिर तो समस्त भूपालोंके स्वामी वीर राजा दुर्योधनके धराशायी होनेपर वहाँ बिजलीकी गड़गड़ाहटके साथ प्रचण्ड हवा चलने लगी, धूलिकी वर्षा होने लगी और वृक्षों, वनों एवं पर्वतोंसहित सारी पृथ्वी काँपने लगी ॥ ४९१/२ ॥
महास्वना पुनर्दीप्ता सनिर्घाता भयंकरी ॥ ५० ॥
पपात चोल्का महती पतिते पृथिवीपतौ ।
पृथिवीपति दुर्योधनके गिर जानेपर आकाशसे पुनः महान् शब्द और बिजलीकी कड़कके साथ प्रज्वलित, भयंकर एवं विशाल उल्का भूमिपर गिरी ॥ ५०१/२ ॥
तथा शोणितवर्षं च पांशुवर्षं च भारत ॥ ५१ ॥
ववर्ष मधवांस्तत्र तव पुत्रे निपातिते ।
भरतनन्दन! आपके पुत्रके धराशायी हो जानेपर इन्द्रने वहाँ रक्त और धूलिकी वर्षा की ॥ ५११/२ ॥
यक्षाणां राक्षसानां च पिशाचानां तथैव च ॥ ५२ ॥
अन्तरिक्षे महानादः श्रूयते भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! उस समय आकाशमें यक्षों, राक्षसों तथा पिशाचोंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ ५२१/२ ॥
तेन शब्देन घोरेण मृगाणामथ पक्षिणाम् ॥ ५३ ॥
जज्ञे घोरतरः शब्दो बहूनां सर्वतोदिशम् ।
उस घोर शब्दके साथ बहुत-से पशुओं और पक्षियों-की भयानक आवाज भी सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठी ॥ ५३१/२ ॥
ये तत्र वाजिनः शेषा गजाश्च मनुजैः सह ॥ ५४ ॥

मुमुचुस्ते महानादं तव पुत्रे निपातिते ।
वहाँ जो घोड़े, हाथी और मनुष्य शेष रह गये थे, वे सभी आपके पुत्रके मारे जानेपर महान् कोलाहल करने लगे ।।
भेरीशङ्खमृदङ्गानामभवच्च स्वनो महान् ॥ ५५ ॥
अन्तर्भूमिगतश्चैव तव पुत्रे निपातिते ।
राजन्! जब आपका पुत्र मार गिराया गया, उस समय इस भूतलपर भेरी, शंखों और मृदंगोंका गम्भीर घोष होने लगा ।। ५५ १/२ ।।
बहुपादैर्बहुभुजैः कबन्धैर्घोरदर्शनैः ॥ ५६ ॥
नृत्यद्भिर्भयदैर्व्याप्ता दिशस्तत्राभवन् नृप ।
नरेश्वर! वहाँ सम्पूर्ण दिशाओंमें नाचते हुए अनेक पैर और अनेक बाँहवाले घोर एवं भयंकर कबन्ध व्याप्त हो रहे थे ।। ५६ १/२ ।।
ध्वजवन्तोऽस्त्रवन्तश्च शस्त्रवन्तस्तथैव च ॥ ५७ ॥
प्राकम्पन्त ततो राजंस्तव पुत्रे निपातिते ।
राजन्! आपके पुत्रके धराशायी हो जानेपर वहाँ अस्त्र-शस्त्र और ध्वजावाले सभी वीर काँपने लगे ।। ५७ १/२ ।।
ह्रदाः कूपाश्च रुधिरमुद्वेमुर्नृपसत्तम ॥ ५८ ॥
नद्यश्च सुमहावेगाः प्रतिस्रोतोवहाभवन् ।
नृपश्रेष्ठ! तालाबों और कूपोंमें रक्तका उफान आने लगा और महान् वेगशालिनी नदियाँ उलटी अपने उद्गमकी ओर बहने लगीं ।। ५८ १/२ ।।
पुँल्लिङ्गा इव नार्यस्तु स्त्रीलिङ्गा पुरुषाभवन् ॥ ५९ ॥
दुर्योधने तदा राजन् पतिते तनये तव ।
राजन्! आपके पुत्र दुर्योधनके धराशायी होनेपर स्त्रियोंमें पुरुषत्व और पुरुषोंमें स्त्रीत्वके सूचक लक्षण प्रकट होने लगे ।। ५९ १/२ ।।
दृष्ट्वा तानद्भुतोत्पातान् पञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥ ६० ॥
आविग्नमनसः सर्वे बभूवुर्भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! उन अद्भुत उत्पातोंको देखकर पाण्डवोंसहित समस्त पाञ्चाल मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठे ।। ६० १/२ ।।
ययुर्देवा यथाकामं गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ६१ ॥
कथयन्तोऽद्भुतं युद्धं सुतयोस्तव भारत ।
भारत! तदनन्तर देवता, गन्धर्व और अप्सराओंके समूह आपके दोनों पुत्रोंके अद्भुत युद्धकी चर्चा करते हुए अपने अभीष्ट स्थानको चले गये ।। ६१ १/२ ।।
तथैव सिद्धा राजेन्द्र तथा वातिकचारणाः ।

नरसिंहौ प्रशंसन्तौ विप्रजग्मुर्यथागतम् ॥ ६२ ॥
राजेन्द्र! उसी प्रकार सिद्ध, वातिक (वायुचारी) और चारण उन दोनों पुरुषसिंहोंकी प्रशंसा करते हुए जैसे आये थे, वैसे चले गये ॥ ६२ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि दुर्योधनवधेऽष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें दुर्योधनका वधविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥