महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
११८-
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिद्वारा सुदर्शनका वध
संजय उवाच
द्रोणं स जित्वा पुरुषप्रवीर-
स्तथैव हार्दिक्यमुखांस्त्वदीयान् ।
प्रहस्य सूतं वचनं बभाषे
शिनिप्रवीरः कुरुपुङ्गवाग्र्य ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**कुरुवंशशिरोमणे! द्रोणाचार्य तथा कृतवर्मा आदि आपके प्रमुख महारथियोंको जीतकर नरवीर सात्यकिने अपने सारथिसे हँसते हुए कहा— ॥ १ ॥
निमित्तमात्रं वयमद्य सूत
दग्धारयः केशवफाल्गुनाभ्याम् ।
हतान् निहन्मेह नरर्षभेण
वयं सुरेशात्मसमुद्भवेन ॥ २ ॥
‘सारथे! इस विजयमें आज हमलोग तो निमित्त-मात्र हो रहे हैं। वास्तवमें श्रीकृष्ण और अर्जुनने ही हमारे इन शत्रुओंको दग्ध कर दिया है। देवराजके पुत्र नरश्रेष्ठ अर्जुनके मारे हुए सैनिकोंको ही हमलोग यहाँ मार रहे हैं’ ॥ २ ॥
तमेवमुक्त्वा शिनिपुङ्गवस्तदा
महामृधे सोऽग्रयधनुर्धरोऽरिहा ।
किरन् समन्तात् सहसा शरान् बली
समापतच्छ्येन इवामिषं यथा ॥ ३ ॥
उस महासमरमें सारथिसे ऐसा कहकर धनुर्धर-शिरोमणि शत्रुसूदन शिनिप्रवर बलवान् सात्यकिने सहसा सब ओर बाणोंकी वर्षा करते हुए शत्रुओंपर उसी प्रकार आक्रमण किया, जैसे बाज मांसके टुकड़ेपर झपटता है ॥ ३ ॥
तं यान्तमश्वैः शशिशङ्खवर्णै-
र्विगाह्य सैन्यं पुरुषप्रवीरम् ।
नाशक्नुवन् वारयितुं समन्ता-
दादित्यरश्मिप्रतिमं रथाग्र्यम् ॥ ४ ॥
सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशमान रथियोंमें श्रेष्ठ नरवीर सात्यकि आपकी सेनामें घुसकर चन्द्रमा और शंखके समान श्वेतवर्णवाले घोड़ोंद्वारा आगे बढ़ते चले जा रहे थे। उस समय किसी ओरसे कोई योद्धा उन्हें रोक न सके ॥ ४ ॥
असह्यविक्रान्तमदीनसत्त्वं
सर्वे गणा भारत ये त्वदीयाः ।
सहस्रनेत्रप्रतिप्रभावं
दिवीव सूर्य जलदव्यपाये ।। ५ ।।
भारत! सात्यकिका पराक्रम असह्य था। उनका धैर्य और बल महान् था। वे इन्द्रके समान प्रभावशाली तथा आकाशमें प्रकाशित होनेवाले शरत्कालके सूर्यके समान प्रचण्ड तेजस्वी थे। आपके समस्त सैनिक मिलकर भी उन्हें रोक न सके ।। ५ ।।
अमर्षपूर्णस्त्वतिचित्रयोधी
शरासनी काञ्चनवर्मधारी ।
सुदर्शनः सात्यकिमापतन्तं
न्यवारयद् राजवरः प्रसह्य ।। ६ ।।
उस समय अत्यन्त विचित्र युद्ध करनेवाले, सुवर्ण-कवचधारी धनुर्धर नृपश्रेष्ठ सुदर्शनने अपनी ओर आते हुए सात्यकिको अमर्षमें भरकर बलपूर्वक रोका ।। ६ ।।
तयोरभूद् भारत सम्प्रहारः
सुदारुणस्तं समतिप्रशंसन् ।
योधास्त्वदीयाश्च हि सोमकाश्च
वृत्रेन्द्रयोर्युद्धमिवामरौघाः ।। ७ ।।
भारत! उन दोनों वीरोंमें बड़ा भयंकर संग्राम हुआ। जैसे देवगण वृत्रासुर और इन्द्रके युद्धकी गाथा गाते हैं, उसी प्रकार आपके योद्धाओं तथा सोमकोंने भी उन दोनोंके उस युद्धकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। ७ ।।
शरैः सुतीक्ष्णैः शतशोऽभ्यविध्यत्
सुदर्शनः सात्वतमुख्यमाजौ ।
अनागतानेव तु तान् पृषत्कां-
श्छिच्छेद राजन् शिनिपुङ्गवोऽपि ।। ८ ।।
राजन्! सुदर्शनने समरांगणमें सात्वतशिरोमणि सात्यकिपर सैकड़ों सुतीक्ष्ण बाणोंद्वारा प्रहार किया; परंतु शिनिप्रवर सात्यकिने उन बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही काट डाला ।। ८ ।।
तथैव शक्रप्रतिमोऽपि सात्यकिः
सुदर्शने यान् क्षिपति स्म सायकान् ।
द्विधा त्रिधा तानकरोत् सुदर्शनः
शरोत्तमैः स्यन्दनवर्यमास्थितः ।। ९ ।।
इसी प्रकार इन्द्रके समान पराक्रमी सात्यकि भी सुदर्शनपर जिन-जिन बाणोंका प्रहार करते थे, श्रेष्ठ रथपर बैठे हुए सुदर्शन भी अपने उत्तम बाणोंद्वारा उन सबके दो-दो तीन-तीन टुकड़े कर देते थे ।। ९ ।।
तान् वीक्ष्य बाणान् निहतांस्तदानीं
सुदर्शनः सात्यकिबाणवेगैः ।
क्रोधाद् दिधक्षन्निव तिग्मतेजाः
शरानमुञ्चत् तपनीयचित्रान् ॥ १० ॥
उस समय सात्यकिके वेगशाली बाणोंद्वारा अपने चलाये हुए बाणोंको नष्ट हुआ देख प्रचण्ड तेजस्वी राजा सुदर्शनने क्रोधसे उन्हें जला डालनेकी इच्छा रखते हुए-से सुवर्णजटित विचित्र बाणोंका उनपर प्रहार आरम्भ किया ॥ १० ॥
पुनः स बाणैस्त्रिभिरग्निकल्पै-
राकर्णपूर्णैर्निशितैः सुपुङ्खैः ।
विव्याध देहावरणं विभिद्य
ते सात्यकेराविविशुः शरीरम् ॥ ११ ॥
फिर उन्होंने अग्निके समान तेजस्वी तथा कानतक खींचकर छोड़े हुए सुन्दर पंखवाले तीन तीखे बाणोंसे सात्यकिको बींध दिया। वे बाण सात्यकिका कवच विदीर्ण करके उनके शरीरमें समा गये ॥ ११ ॥
तथैव तस्यावनिपालपुत्रः
संधाय बाणैरपरैर्ज्वलद्भिः ।
आजघ्निवांस्तान् रजतप्रकाशां-
श्चतुर्भिरश्वांश्चतुरः प्रसह्य ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् उन राजकुमार सुदर्शनने अन्य चार तेजस्वी बाणोंका संधान करके उनके द्वारा चाँदीके समान चमकनेवाले सात्यकिके उन चारों घोड़ोंको भी बलपूर्वक घायल कर दिया ॥ १२ ॥
तथा तु तेनाभिहतस्तरस्वी
नप्ता शिनेरिन्द्रसमानवीर्यः ।
सुदर्शनस्येषुगणैः सुतीक्ष्णै-
र्हयान् निहत्याशु ननाद नादम् ॥ १३ ॥
सुदर्शनके द्वारा इस प्रकार घायल होनेपर इन्द्रके समान बलवान् और वेगशाली शिनिपौत्र सात्यकिने अपने सुतीक्ष्ण बाणसमूहोंसे सुदर्शनके अश्वोंका शीघ्र ही संहार करके उच्च स्वरसे सिंहनाद किया ॥ १३ ॥
अथास्य सूतस्य शिरो निकृत्य
भल्लेन शक्राशनिसंनिभेन ।
सुदर्शनस्यापि शिनिप्रवीरः
क्षुरेण कालानलसंनिभेन ॥ १४ ॥
सकुण्डलं पूर्णशशिप्रकाशं
भ्राजिष्णु वक्त्रं विचकर्त देहात् ।
यथा पुरा वज्रधरः प्रसह्य
बलस्य संख्येऽतिबलस्य राजन् ॥ १५ ॥
राजन्! तत्पश्चात् इन्द्रके वज्रतुल्य भल्लसे उनके सारथिका सिर काटकर शिनिवंशके प्रमुख वीर सात्यकिने कालाग्निके समान तेजस्वी छुरेसे सुदर्शनके पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशमान शोभाशाली कुण्डलमण्डित मस्तकको भी धड़से काट गिराया। ठीक उसी प्रकार, जैसे पूर्वकालमें वज्रधारी इन्द्रने समरांगणमें अत्यन्त बलवान् बलासुरका सिर बलपूर्वक काट लिया था ॥ १४-१५ ॥
निहत्य तं पार्थिवपुत्रपौत्रं
रणे यदूनामृषभस्तरस्वी ।
मुदा समेतः परया महात्मा
रराज राजन् सुरराजकल्पः ॥ १६ ॥
नरेश्वर! राजाके पुत्र एवं पौत्र सुदर्शनका रणभूमिमें वध करके यदुकुलतिलक देवेन्द्रसदृश पराक्रमी वेगशाली महामनस्वी सात्यकि अत्यन्त प्रसन्न होकर विजयश्रीसे सुशोभित होने लगे ॥ १६ ॥
ततो ययावर्जुन एव येन
निवार्य सैन्यं तव मार्गणौघैः ।
सदश्वयुक्तेन रथेन राज-
ँल्लोकँ विसिस्मापयिषुर्नृवीरः ॥ १७ ॥
राजन्! तदनन्तर लोगोंको आश्चर्यचकित करनेकी इच्छावाले नरवीर सात्यकि अपने सुन्दर अश्वोंसे जुते हुए रथके द्वारा बाणसमूहोंसे आपकी सेनाको हटाते हुए उसी मार्गसे चल दिये, जिससे अर्जुन गये थे ॥ १७ ॥
तत् तस्य विस्मापनीयमग्र्य-
मपूजयन् योधवराः समेताः ।
प्रवर्तमानानिषुगोचरेऽरीन्
ददाह बाणैर्हुतभुग् यथैव ॥ १८ ॥
उनके उस आश्चर्यजनक उत्तम पराक्रमकी वहाँ एकत्र हुए समस्त योद्धाओंने बड़ी प्रशंसा की। सात्यकि अपने बाणोंके पथमें आये हुए शत्रुओंको उन बाणोंद्वारा अग्निदेवके समान दग्ध कर रहे थे ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सुदर्शनवधे
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सुदर्शनवधविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥