सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 518)

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनाशीतितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका अर्जुनकी विजयके लिये रात्रिमें भगवान् शिवका पूजन करवाना, जागते हुए पाण्डव-सैनिकोंकी अर्जुनके लिये शुभाशंसा तथा अर्जुनकी सफलताके लिये श्रीकृष्णके दारुकके प्रति उत्साहभरे वचन

संजय उवाच

ततोऽर्जुनस्य भवनं प्रविश्याप्रतिमं विभुः ।
स्पृष्ट्वाम्भः पुण्डरीकाक्षः स्थण्डिले शुभलक्षणे ॥ १ ॥
संतस्तार शुभां शय्यां दर्भैर्वैदूर्यसंनिभैः ।
ततो माल्येन विधिवल्लाजैर्गन्धैः सुमङ्गलैः ॥ २ ॥
अलंचकार तां शय्यां परिवार्यायधोत्तमैः ।
ततः स्पृष्टोदके पार्थे विनीताः परिचारकाः ॥ ३ ॥
दर्शयन्तोऽन्तिके चक्रुर्नैशं त्र्यम्बकं बलिम् ।

संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके अनुपम भवनमें प्रवेश करके जलका स्पर्श किया और शुभ लक्षणोंसे युक्त वेदीपर वैदूर्यमणिके सदृश कुशोंकी सुन्दर शय्या बिछायी। तत्पश्चात् विधिपूर्वक परम मंगलकारी अक्षत, गन्ध एवं पुष्पमाला आदिसे उस शय्याको सजाया। उसके चारों ओर उत्तम आयुध रख दिये। इसके बाद जब अर्जुन आचमन कर चुके, तब विनीत (सुशिक्षित) परिचारकोंने उन्हें दिखाते हुए उनके निकट ही भगवान् शंकरका निशीथ-पूजन किया ॥ १—३ ½ ॥

ततः प्रीतमनाः पार्थो गन्धमाल्यैश्च माधवम् ॥ ४ ॥
अलंकृत्योपहारं तं नैशं तस्मै न्यवेदयत् ।
स्मयमानस्तु गोविन्दः फाल्गुनं प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् अर्जुनने प्रसन्नचित्त होकर श्रीकृष्णको गन्ध और मालाओंसे अलंकृत करके रात्रिका वह सारा उपहार उन्हींको समर्पित किया। तब मुसकराते हुए भगवान् गोविन्द अर्जुनसे बोले— ॥ ४-५ ॥

सुप्यतां पार्थ भद्रं ते कल्याणाय व्रजाम्यहम् ।
स्थापयित्वा ततो द्वाःस्थान् गोप्तूंश्चात्तायुधान् नरान् ॥ ६ ॥
दारुकानुगतः श्रीमान् विवेश शिबिरं स्वकम् ।

‘कुन्तीकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। अब शयन करो। मैं तुम्हारे कल्याण-साधनके लिये ही जा रहा हूँ’ ऐसा कहकर वहाँ अस्त्र-शस्त्र लिये हुए मनुष्योंको द्वारपाल एवं रक्षक नियुक्त करके भगवान् श्रीकृष्ण दारुकके साथ अपने शिविरमें चले गये॥ ६१/२॥
शिश्ये च शयने शुभ्रे बहुकृत्यं विचिन्तयन् ॥ ७ ॥
पार्थाय सर्वं भगवान् शोकदुःखपहं विधिम् ।
व्यदधात् पुण्डरीकाक्षस्तेजोद्युतिविवर्धनम् ॥ ८ ॥
योगमास्थाय युक्तात्मा सर्वेषामीश्वरेश्वरः ।
श्रेयस्कामः पृथुयशा विष्णुर्जिष्णुप्रियंकरः ॥ ९ ॥
वहाँ बहुत-से कार्योंका चिन्तन करते हुए उन्होंने शुभ्र शय्यापर शयन किया। कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण सबके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं। उनका यश महान् है। वे विष्णुरूप गोविन्द अर्जुनका प्रिय करनेवाले हैं और सदा उनके कल्याणकी कामना रखते हैं। उन युक्तात्मा श्रीहरिने उत्तम योगका आश्रय ले अर्जुनके लिये वह सारा विधि-विधान सम्पन्न किया, जो उनके शोक और दुःखको दूर करनेवाला तथा तेज और कान्तिको बढ़ानेवाला था॥ ७—९॥
न पाण्डवानां शिबिरे कश्चित् सुष्वाप तां निशाम् ।
प्रजागरः सर्वजनं ह्याविवेश विशाम्पते ॥ १० ॥
राजन्! उस रातमें पाण्डवोंके शिविरमें कोई नहीं सोया। सब लोगोंमें जागरणका आवेश हो गया था॥ १०॥
पुत्रशोकाभितप्तेन प्रतिज्ञातो महात्मना ।
सहसा सिन्धुराजस्य वधो गाण्डीवधन्वना ॥ ११ ॥
तत् कथं नु महाबाहुर्वासविः परवीरहा ।
प्रतिज्ञां सफलां कुर्यादिति ते समचिन्तयन् ॥ १२ ॥
सब लोग इसी चिन्तामें पड़े थे कि पुत्रशोकसे संतप्त हुए गाण्डीवधारी महामना अर्जुनने सहसा सिंधुराज जयद्रथके वधकी प्रतिज्ञा कर ली है। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वे महाबाहु इन्द्रकुमार अपनी उस प्रतिज्ञाको कैसे सफल करेंगे? ॥ ११-१२॥
कष्टं हीदं व्यवसितं पाण्डवेन महात्मना ।
पुत्रशोकाभितप्तेन प्रतिज्ञा महती कृता ॥ १३ ॥
स च राजा महावीर्यः पारयत्वर्जुनः स ताम् ।
भ्रातरश्चापि विक्रान्ता बहुलानि बलानि च ॥ १४ ॥
महामना पाण्डवने यह बड़ा कष्टप्रद निश्चय किया है। उन्होंने पुत्रशोकसे संतप्त होकर बड़ी भारी प्रतिज्ञा कर ली है। उधर राजा जयद्रथका पराक्रम भी महान् है। तथापि अर्जुन अपनी उस प्रतिज्ञाको पूरी कर लेंगे; क्योंकि उनके भाई भी बड़े पराक्रमी हैं और उनके पास सेनाएँ भी बहुत हैं॥ १३-१४॥

धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण सर्वं तस्मै निवेदितम् ।
स हत्वा सैन्धवं संख्ये पुनरेतु धनंजयः ॥ १५ ॥
धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने जयद्रथको सब बातें बता दी होंगी। अर्जुन युद्धमें सिंधुराज जयद्रथको मारकर पुनः सकुशल लौट आवें (यही हमारी शुभ कामना है) ॥ १५ ॥

जित्वा रिपुगणांश्चैव पारयत्वर्जुनो व्रतम् ।
श्वोऽहत्वा सिन्धुराजं वै धूमकेतुं प्रवेक्ष्यति ॥ १६ ॥
न ह्यसावनृतं कर्तुमलं पार्थो धनंजयः ।
धर्मपुत्रः कथं राजा भविष्यति मृतेऽर्जुने ॥ १७ ॥
अर्जुन शत्रुओंको जीतकर अपना व्रत पूरा करें। यदि वे कल सिंधुराजको न मार सके तो अग्निमें प्रवेश कर जायेंगे। कुन्तीकुमार धनंजय अपनी बात झूठी नहीं कर सकते। यदि अर्जुन मर गये तो धर्मपुत्र युधिष्ठिर कैसे राजा होंगे? ॥ १६-१७ ॥

तस्मिन् हि विजयः कृत्स्नः पाण्डवेन समाहितः ।
यदि नोऽस्ति कृतं किञ्चिद् यदि दत्तं हुतं यदि ॥ १८ ॥
फलेन तस्य सर्वस्य सव्यसाची जयत्वरीन् ।
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अर्जुनपर ही सारा विजयका भार रख दिया। यदि हमलोगोंका किया हुआ कुछ भी सत्कर्म शेष हो, यदि हमने दान और होम किये हों तो हमारे उन सभी शुभकर्मोंके फलसे सव्यसाची अर्जुन अपने शत्रुओंपर विजय प्राप्त करें ॥ १८ १/२ ॥

एवं कथयतां तेषां जयमाशंसतां प्रभो ॥ १९ ॥
कृच्छ्रेण महता राजन् रजनी व्यत्यवर्तत ।
राजन्! प्रभो! इस प्रकार बातें करते और अर्जुनकी विजय चाहते हुए उन सभी सैनिकोंकी वह रात्रि महान् कष्टसे बीती थी ॥ १९ १/२ ॥

तस्यां रजन्यां मध्ये तु प्रतिबुद्धो जनार्दनः ॥ २० ॥
स्मृत्वा प्रतिज्ञां पार्थस्य दारुकं प्रत्यभाषत ।
भगवान् श्रीकृष्ण उस रात्रिके मध्यकालमें जाग उठे और अर्जुनकी प्रतिज्ञाको स्मरण करके दारुकसे बोले— ॥ २० १/२ ॥

अर्जुनेन प्रतिज्ञातमार्तेन हतबन्धुना ॥ २१ ॥
जयद्रथं वधिष्यामि श्वोभूत इति दारुक ।
‘दारुक! अपने पुत्र अभिमन्युके मारे जानेसे शोकार्त होकर अर्जुनने यह प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं कल जयद्रथका वध कर डालूँगा' ॥ २१ १/२ ॥

तत्तु दुर्योधनः श्रुत्वा मन्त्रिभिर्मन्त्रयिष्यति ॥ २२ ॥
यथा जयद्रथं पार्थो न हन्यादिति संयुगे ।

'यह सब सुनकर दुर्योधन अपने मन्त्रियोंके साथ ऐसी मन्त्रणा करेगा' जिससे अर्जुन समरभूमिमें जयद्रथको मार न सकें ।। २२ १/२ ।।
अक्षौहिण्यो हि ताः सर्वा रक्षिष्यन्ति जयद्रथम् ।। २३ ।।
द्रोणश्च सह पुत्रेण सर्वास्त्रविधिपारगः ।
'वे सारी अक्षौहिणी सेनाएँ जयद्रथकी रक्षा करेंगी तथा सम्पूर्ण अस्त्र-विधिके पारंगत विद्वान् द्रोणाचार्य भी अपने पुत्र अश्वत्थामाके साथ उसकी रक्षामें रहेंगे ।। २३ १/२ ।।
एको वीरः सहस्राक्षो दैत्यदानवदर्पहा ।। २४ ।।
सोऽपि तं नोत्सहेताजौ हन्तुं द्रोणेन रक्षितम् ।
'त्रिलोकीके एकमात्र वीर हैं सहस्रनेत्रधारी इन्द्र, जो दैत्यों और दानवोंके भी दर्पका दलन करनेवाले हैं; परंतु वे भी द्रोणाचार्यसे सुरक्षित जयद्रथको युद्धमें मार नहीं सकते ।। २४ १/२ ।।
सोऽहं श्वस्तत् करिष्यामि यथा कुन्तीसुतोऽर्जुनः ।। २५ ।।
अप्राप्तेऽस्तं दिनकरे हनिष्यति जयद्रथम् ।
'अतः मैं कल वह उद्योग करूँगा, जिससे कुन्तीपुत्र अर्जुन सूर्यदेवके अस्त होनेसे पहले जयद्रथको मार डालेंगे ।। २५ १/२ ।।
न हि दारा न मित्राणि ज्ञातयो न च बान्धवाः ।। २६ ।।
कश्चिदन्यः प्रियतरः कुन्तीपुत्रान्ममार्जुनत् ।
'मुझे स्त्री, मित्र, कुटुम्बीजन, भाई-बन्धु तथा दूसरा कोई भी कुन्तीपुत्र अर्जुनसे अधिक प्रिय नहीं है ।। २६ १/२ ।।
अनर्जुनमिमं लोकं मुहूर्तमाप दारुक ।। २७ ।।
उदीक्षितुं न शक्तोऽहं भविता न च तत् तथा ।
'दारुक! मैं अर्जुनसे रहित इस संसारको दो घड़ी भी नहीं देख सकता। ऐसा हो ही नहीं सकता (कि मेरे रहते अर्जुनका कोई अनिष्ट हो) ।। २७ १/२ ।।
अहं विजित्य तान् सर्वान् सहसा सहयद्विपान् ।। २८ ।।
अर्जुनार्थे हनिष्यामि सकर्णान् ससुयोधनान् ।
'मैं अर्जुनके लिये हाथी, घोड़े, कर्ण और दुर्योधनसहित उन समस्त शत्रुओंको जीतकर सहसा उनका संहार कर डालूँगा ।। २८ १/२ ।।
श्वो निरीक्षन्तु मे वीर्यं त्रयो लोका महाहवे ।। २९ ।।
धनंजयार्थे समरे पराक्रान्तस्य दारुक ।
'दारुक! कलके महासमरमें तीनों लोक धनंजयके लिये युद्धमें पराक्रम प्रकट करते हुए मेरे बल और प्रभावको देखें ।। २९ १/२ ।।
श्वो नरेन्द्रसहस्राणि राजपुत्रशतानि च ।। ३० ।।

साश्वद्विपरथान्याजौ विद्रविष्यमि दारुक।
‘दारुक! कल युद्धमें मैं सहस्रों राजाओं तथा सैकड़ों राजकुमारोंको उनके घोड़े, हाथी एवं रथोंसहित मार भगाऊँगा।। ३० १/२ ।।
श्वस्तां चक्रप्रमथितां द्रक्ष्यसे नृपवाहिनीम्।। ३१।।
मया क्रुद्धेन समरे पाण्डवार्थे निपातिताम्।
‘तुम कल देखोगे कि मैंने समरांगणमें कुपित होकर पाण्डुपुत्र अर्जुनके लिये सारी राजसेनाको चक्रसे चूर-चूर करके धरतीपर मार गिराया है।। ३१ १/२ ।।
श्वः सदेवाः सगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः।। ३२।।
ज्ञास्यन्ति लोकाः सर्वे मां सुहृदं सव्यसाचिनः।
‘कल देवता, गन्धर्व, पिशाच, नाग तथा राक्षस आदि समस्त लोक यह अच्छी तरह जान लेंगे कि मैं सव्यसाची अर्जुनका हितैषी मित्र हूँ।। ३२ १/२ ।।
यस्तं द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्तं चानु स मामनु।। ३३।।
इति संकल्प्यतां बुद्ध्या शरीरार्द्धं ममार्जुन्ः।
‘जो अर्जुनसे द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है और जो अर्जुनका अनुगामी है, वह मेरा अनुगामी है, तुम अपनी बुद्धिसे यह निश्चय कर लो कि अर्जुन मेरा आधा शरीर है।। ३३ १/२ ।।
यथा त्वं मे प्रभातायामस्यां निशि रथोत्तमम्।। ३४।।
कल्पयित्वा यथाशास्त्रमादाय व्रज संयतः।
‘कल प्रातःकाल तुम शास्त्रविधिके अनुसार मेरे उत्तम रथको सुसज्जित करके सावधानीके साथ लेकर युद्धस्थलमें चलना।। ३४ १/२ ।।
गदां कौमोदकीं दिव्यां शक्तिं चक्रं धनुः शरान्।। ३५।।
आरोप्य वै रथे सूत सर्वोपकरणानि च।
स्थानं च कल्पयित्वाथ रथोपस्थे ध्वजस्य मे।। ३६।।
वैनतेयस्य वीरस्य समरे रथशोभिनः।
‘सूत! कौमोदकी गदा, दिव्य शक्ति, चक्र, धनुष, बाण तथा अन्य सब आवश्यक सामग्रियोंको रथपर रखकर उसके पिछले भागमें समरांगणमें रथपर शोभा पानेवाले वीर विनतानन्दन गरुड़के चिह्नवाले ध्वजके लिये भी स्थान बना लेना।। ३५-३६ १/२ ।।
छत्रं जाम्बूनदैर्जालैरर्कज्वलनसप्रभैः।। ३७।।
विश्वकर्मकृतैर्दिव्यैरश्वानपि विभूषितान्।
बलाहकं मेघपुष्पं शैब्यं सुग्रीवमेव च।। ३८।।
युक्तान् वाजिवरान् यत्तः कवची तिष्ठ दारुक।

‘दारुक! साथ ही उसमें छत्र लगाकर अग्नि और सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले तथा विश्वकर्माके बनाये हुए दिव्य सुवर्णमय जालोंसे विभूषित मेरे चारों श्रेष्ठ घोड़ों—बलाहक, मेघपुष्प, शैब्य तथा सुग्रीवको जोत लेना और स्वयं भी कवच धारण करके तैयार रहना ।। ३७-३८ १/२ ।।

पाञ्चजन्यस्य निर्घोषमार्षभेणैव पूरितम् ।। ३९ ।।
श्रुत्वा च भैरवं नादमुपेयास्त्वं जवेन माम् ।

‘पाञ्चजन्य शंखका ऋषभ स्वरसे बजाया हुआ शब्द और भयंकर कोलाहल सुनते ही तुम बड़े वेगसे मेरे पास पहुँच जाना ।। ३९ १/२ ।।

एकाह्नाहममर्षं च सर्वदुःखानि चैव ह ।। ४० ।।
भ्रातुः पैतृष्वसेयस्य व्यपनेष्यामि दारुक ।

‘दारुक! मैं अपनी बुआजीके पुत्र भाई अर्जुनके सारे दुःख और अमर्षको एक ही दिनमें दूर कर दूँगा ।। ४० १/२ ।।

सर्वोपायैर्यतिष्यामि यथा बीभत्सुराहवे ।। ४१ ।।
पश्यतां धार्तराष्ट्राणां हनिष्यति जयद्रथम् ।

‘सभी उपायोंसे ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे अर्जुन युद्धमें धृतराष्ट्रपुत्रोंके देखते-देखते जयद्रथको मार डालें’ ।।

यस्य यस्य च बीभत्सुर्वधे यत्नं करिष्यति ।
आशंसे सारथे तत्र भवितास्य ध्रुवो जयः ।। ४२ ।।

‘सारथे! कल अर्जुन जिस-जिस वीरके वधका प्रयत्न करेंगे, मैं आशा करता हूँ, वहाँ-वहाँ उनकी निश्चय ही विजय होगी’ ।। ४२ ।।

दारुक उवाच

जय एव ध्रुवस्तस्य कुत एव पराजयः ।
यस्य त्वं पुरुषव्याघ्र सारथ्यमुपजग्मिवान् ।। ४३ ।।

दारुक बोला— पुरुषसिंह! आप जिनके सारथि बने हुए हैं, उनकी विजय तो निश्चित है ही। उनकी पराजय कैसे हो सकती है? ।। ४३ ।।

एवं चैतत् करिष्यामि यथा मामनुशाससि ।
सुप्रभातामिमां रात्रिं जयाय विजयस्य हि ।। ४४ ।।

अर्जुनकी विजयके लिये कल सबेरे जो कुछ करनेकी आप मुझे आज्ञा देते हैं, उसे उसी रूपमें मैं अवश्य पूर्ण करूँगा ।। ४४ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि कृष्णदारुकसम्भाषणे एकोनाशीतितमोऽध्यायः ।। ७९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें श्रीकृष्ण और दारुककी बातचीतविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७९ ।।