महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 525)
अशीतितमोऽध्यायः
अर्जुनका स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ शिवजीके समीप जाना और उनकी स्तुति करना
संजय उवाच
कुन्तीपुत्रस्तु तं मन्त्रं स्मरन्नेव धनंजयः ।
प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन् मुमोहाचिन्त्यविक्रमः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! इधर अचिन्त्य पराक्रमशाली कुन्तीपुत्र अर्जुन अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षाके लिये (वनवासकालमें व्यासजीके बताये हुए शिवसम्बन्धी) मन्त्रका चिन्तन करते-करते नींदसे मोहित हो गये ॥ १ ॥
तं तु शोकेन संतप्तं स्वप्ने कपिवरध्वजम् ।
आससाद महातेजा ध्यायन्तं गरुडध्वजः ॥ २ ॥
उस समय स्वप्नमें महातेजस्वी गरुड़ध्वज भगवान् श्रीकृष्ण शोकसंतप्त हो चिन्तामें पड़े हुए कपिध्वज अर्जुनके पास आये ॥ २ ॥
प्रत्युत्थानं च कृष्णस्य सर्वावस्थो धनंजयः ।
न लोपयति धर्मात्मा भक्त्या प्रेम्णा च सर्वदा ॥ ३ ॥
धर्मात्मा धनंजय किसी भी अवस्थामें क्यों न हों, सदा प्रेम और भक्तिके साथ खड़े होकर श्रीकृष्णका स्वागत करते थे। अपने इस नियमका वे कभी लोप नहीं होने देते थे ॥ ३ ॥
प्रत्युत्थाय च गोविन्दं स तस्मा आसनं ददौ ।
न चासने स्वयं बुद्धिं बीभत्सुर्व्यदधात् तदा ॥ ४ ॥
अर्जुनने खड़े होकर गोविन्दको बैठनेके लिये आसन दिया और स्वयं उस समय किसी आसनपर बैठनेका विचार उन्होंने नहीं किया ॥ ४ ॥
ततः कृष्णो महातेजा जानन् पार्थस्य निश्चयम् ।
कुन्तीपुत्रमिदं वाक्यमासीनः स्थितमब्रवीत् ॥ ५ ॥
तब महातेजस्वी श्रीकृष्ण पार्थके इस निश्चयको जानकर अकेले ही आसनपर बैठ गये और खड़े हुए कुन्तीकुमारसे इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥
मा विषादे मनः पार्थ कृथाः कालो हि दुर्जयः ।
कालः सर्वाणि भूतानि नियच्छति परे विधौ ॥ ६ ॥
'कुन्तीनन्दन! तुम अपने मनको विषादमें न डालो; क्योंकि कालपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। काल ही समस्त प्राणियोंको विधाताके अवश्यम्भावी विधानमें प्रवृत्त कर
देता है ।। ६ ।।
किमर्थं च विषादस्ते तद् ब्रूहि द्विपदां वर ।
न शोच्यं विदुषां श्रेष्ठ शोकः कार्यविनाशनः ।। ७ ।।
‘मनुष्योंमें श्रेष्ठ अर्जुन! बताओ तो सही, तुम्हें किसलिये विषाद हो रहा है? विद्वद्वर! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक समस्त कर्मोंका विनाश करनेवाला है ।। ७ ।।
यत् तु कार्यं भवेत् कार्यं कर्मणा तत् समाचर ।
हीनचेष्टस्य यः शोकः स हि शत्रुर्धनंजय ।। ८ ।।
‘जो कार्य करना हो, उसे प्रयत्नपूर्वक करो। धनंजय! उद्योगहीन मनुष्यका जो शोक है, वह उसके लिये शत्रुके समान है ।। ८ ।।
शोचन् नन्दयते शत्रून् कर्शयत्यपि बान्धवान् ।
क्षीयते च नरस्तस्मान्न त्वं शोचितुमर्हसि ।। ९ ।।
‘शोक करनेवाला पुरुष अपने शत्रुओंको आनन्दित करता और बन्धु-बान्धवोंको दुःखसे दुर्बल बनाता है। इसके सिवा वह स्वयं भी शोकके कारण क्षीण होता जाता है। अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये’ ।। ९ ।।
इत्युक्तो वासुदेवेन बीभत्सुरपराजितः ।
आबभाषे तदा विद्वानिदं वचनमर्थवत् ।। १० ।।
वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर किसीसे पराजित न होनेवाले विद्वान् अर्जुनने यह अर्थयुक्त वचन उस समय कहा— ।। १० ।।
मया प्रतिज्ञा महती जयद्रथवधे कृता ।
श्वोऽस्मि हन्ता दुरात्मानं पुत्रघ्नमिति केशव ।। ११ ।।
‘केशव! मैंने जयद्रथ-वधके लिये यह भारी प्रतिज्ञा कर ली है कि कल मैं अपने पुत्रके घातक दुरात्मा सिंधुराजको अवश्य मार डालूँगा ।। ११ ।।
मत्प्रतिज्ञाविघातार्थं धार्तराष्ट्रैः किलाच्युत ।
पृष्ठतः सैन्धवः कार्यः सर्वैर्गुप्तो महारथैः ।। १२ ।।
‘परंतु अच्युत! धृतराष्ट्र-पक्षके सभी महारथी मेरी प्रतिज्ञा भंग करनेके लिये सिंधुराजको निश्चय ही सबसे पीछे खड़े करेंगे और वह उन सबके द्वारा सुरक्षित होगा ।।
दश चैका च ताः कृष्ण अक्षौहिण्यः सुदुर्जयाः ।
हतावशेषास्तत्रेमा हन्त माधव संख्यया ।। १३ ।।
ताभिः परिवृतः संख्ये सर्वैश्चैव महारथैः ।
कथं शक्येत संद्रष्टुं दुरात्मा कृष्ण सैन्धवः ।। १४ ।।
‘माधव! श्रीकृष्ण! कौरवोंकी वे ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ, जो अत्यन्त दुर्जय हैं और उनमें मरनेसे बचे हुए जितने सैनिक विद्यमान हैं, उनसे तथा पूर्वोक्त सभी महारथियोंसे युद्धस्थलमें घिरे होनेपर दुरात्मा सिंधुराजको कैसे देखा जा सकता है? ।। १३-१४ ।।
प्रतिज्ञापारं चापि न भविष्यति केशव ।
प्रतिज्ञायां च हीनायां कथं जीवेत् मद्विधः ॥ १५ ॥
‘केशव! ऐसी अवस्थामें प्रतिज्ञाकी पूर्ति नहीं हो सकेगी और प्रतिज्ञा भंग होनेपर मेरे-जैसा पुरुष कैसे जीवन धारण कर सकता है? ॥ १५ ॥
दुःखोपायस्य मे वीर विकाङ्क्षा परिवर्तते ।
द्रुतं च याति सविता तत एतद् ब्रवीम्यहम् ॥ १६ ॥
‘वीर! अब इस कष्टसाध्य (जयद्रथवधरूपी कार्य)-की ओरसे मेरी अभिलाषा परिवर्तित हो रही है। इसके सिवा इन दिनों सूर्य जल्दी अस्त हो जाते हैं; इसलिये मैं ऐसा कह रहा हूँ' ॥ १६ ॥
शोकस्थानं तु तच्छ्रुत्वा पार्थस्य द्विजकेतनः ।
संस्पृश्याम्भस्ततः कृष्णः प्राङ्मुखः समवस्थितः ॥ १७ ॥
इदं वाक्यं महातेजा बभाषे पुष्करेक्षणः ।
हितार्थं पाण्डुपुत्रस्य सैन्धवस्य वधे कृती ॥ १८ ॥
अर्जुनके शोकका आधार क्या है, यह सुनकर महातेजस्वी विद्वान् गरुड़ध्वज कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण आचमन करके पूर्वाभिमुख होकर बैठे और पाण्डुपुत्र अर्जुनके हित तथा सिंधुराज जयद्रथके वधके लिये इस प्रकार बोले— ॥ १७-१८ ॥
पार्थ पाशुपतं नाम परमास्त्रं सनातनम् ।
येन सर्वान् मृधे दैत्यान् जघ्ने देवो महेश्वरः ॥ १९ ॥
‘पार्थ! पाशुपत नामक एक परम उत्तम सनातन अस्त्र है, जिससे युद्धमें भगवान् महेश्वरने समस्त दैत्योंका वध किया था ॥ १९ ॥
यदि तद् विदितं तेऽद्य श्वो हन्तासि जयद्रथम् ।
अथाज्ञातं प्रपद्यस्व मनसा वृषभध्वजम् ॥ २० ॥
तं देवं मनसा ध्यात्वा जोषमास्व धनंजय ।
ततस्तस्य प्रसादात् त्वं भक्तः प्राप्स्यसि तन्महत् ॥ २१ ॥
‘यदि वह अस्त्र आज तुम्हें विदित हो तो तुम अवश्य कल जयद्रथको मार सकते हो और यदि तुम्हें उसका ज्ञान न हो तो मन-ही-मन भगवान् वृषभध्वज (शिव)-की शरण लो। धनंजय! तुम मनमें उन महादेवजीका ध्यान करते हुए चुपचाप बैठ जाओ। तब उनके दया-प्रसादसे तुम उनके भक्त होनेके कारण उस महान् अस्त्रको प्राप्त कर लोगे' ॥ २०-२१ ॥
ततः कृष्णवचः श्रुत्वा संस्पृश्याम्भो धनंजयः ।
भूमावासीन एकाग्रो जगाम मनसा भवम् ॥ २२ ॥
भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर अर्जुन जलका आचमन करके धरतीपर एकाग्र होकर बैठ गये और मनसे महादेवजीका चिन्तन करने लगे ॥ २२ ॥
ततः प्रणिहितो ब्राह्मे मुहूर्ते शुभलक्षणे ।
आत्मानमर्जुनोऽपश्यद् गगने सहकेशवम् ॥ २३ ॥
तब शुभ लक्षणोंसे युक्त ब्राह्म मुहूर्तमें ध्यानस्थ होनेपर अर्जुनने अपने-आपको भगवान् श्रीकृष्णके साथ आकाशमें जाते देखा ॥ २३ ॥
पुण्यं हिमवतः पादं मणिमन्तं च पर्वतम् ।
ज्योतिर्भिंश्च समाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम् ॥ २४ ॥
पवित्र हिमालयके शिखर तथा तेजःपुंजसे व्याप्त एवं सिद्धों और चारणोंसे सेवित मणिमान् पर्वतको भी देखा ॥ २४ ॥
वायुवेगगतिः पार्थः खं भेजे सहकेशवः ।
केशवेन गृहीतः स दक्षिणे विभुना भुजे ॥ २५ ॥
उस समय अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णके साथ वायुवेगके समान तीव्रगतिसे आकाशमें बहुत ऊँचे उठ गये। भगवान् केशवने उनकी दाहिनी बाँह पकड़ रखी थी ॥ २५ ॥
प्रेक्षमाणो बहून् भावान् जगामाद्भुतदर्शनान् ।
उदीच्यां दिशि धर्मात्मा सोऽपश्यच्छ्वेतपर्वतम् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् धर्मात्मा अर्जुनने अद्भुत दिखायी देनेवाले बहुत-से पदार्थोंको देखते हुए क्रमशः उत्तर-दिशामें जाकर श्वेत पर्वतका दर्शन किया ॥ २६ ॥
कुबेरस्य विहारे च नलिनीं पद्मभूषिताम् ।
सरिच्छ्रेष्ठां च तां गङ्गां वीक्षमाणो बहुदकाम् ॥ २७ ॥
इसके बाद उन्होंने कुबेरके उद्यानमें कमलोंसे विभूषित सरोवर तथा अगाध जलराशिसे भरी हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाका अवलोकन किया ॥ २७ ॥
सदा पुष्पफलैर्वृक्षैरुपेतं स्फटिकोपलाम् ।
सिंहव्याघ्रसमाकीर्णां नानामृगसमाकुलाम् ॥ २८ ॥
गंगाके तटपर स्फटिकमणिमय पत्थर सुशोभित होते थे। सदा फूल और फलोंसे भरे हुए वृक्षसमूह वहाँकी शोभा बढ़ा रहे थे। गंगाके उस तटप्रान्तमें बहुत-से सिंह और व्याघ्र विचरण करते थे। नाना प्रकारके मृग वहाँ सब ओर भरे हुए थे ॥ २८ ॥
पुण्याश्रमवतीं रम्यां मनोज्ञाण्डजसेविताम् ।
मन्दरस्य प्रदेशांश्च किन्नरोद्गीतनादितान् ॥ २९ ॥
अनेक पवित्र आश्रमोंसे युक्त और मनोहर पक्षियोंसे सेवित रमणीय गंगानदीका दर्शन करते हुए आगे बढ़नेपर उन्हें मन्दराचलके प्रदेश दिखायी दिये, जो किन्नरोंके उच्चस्वरसे गाये हुए मधुर गीतोंसे मुखरित हो रहे थे ॥ २९ ॥
हेमरूप्यमयैः शृङ्गर्ना नौषधिविदीपितान् ।
तथा मन्दारवृक्षैश्च पुष्पितैरुपशोभितान् ॥ ३० ॥
सोने और चाँदीके शिखर तथा फूलोंसे भरे हुए पारिजातके वृक्ष उन पर्वतीय प्रान्तोंकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा भाँति-भाँतिकी तेजोमयी ओषधियाँ वहाँ अपना प्रकाश फैला रही
थीं ।। ३० ।।
स्निग्धाञ्जनचयाकारं सम्प्राप्तः कालपर्वतम् ।
ब्रह्मतुङ्गं नदीश्चान्यास्तथा जनपदानपि ।। ३१ ।।
वे क्रमशः आगे बढ़ते हुए स्निग्ध कज्जलराशिके समान आकारवाले काल पर्वतके समीप जा पहुँचे। फिर ब्रह्मतुंग पर्वत, अन्यान्य नदियों तथा बहुत-से जनपदोंको भी उन्होंने देखा ।। ३१ ।।
स तुङ्गं शतशृङ्गं च शर्यातिवनमेव च ।
पुण्यमश्वशिरःस्थानं स्थानमाथर्वणस्य च ।। ३२ ।।
वृषदंशं च शैलेन्द्रं महामन्दरमेव च ।
अप्सरोभिः समाकीर्णं किन्नरैश्चोपशोभितम् ।। ३३ ।।
तदनन्तर क्रमशः उच्चतम शतशृंग, शर्यातिवन, पवित्र अश्वशिरःस्थान, आथर्वण मुनिका स्थान और गिरिराज वृषदंशका अवलोकन करते हुए वे महा-मन्दराचलपर जा पहुँचे, जो अप्सराओंसे व्याप्त और किन्नरोंसे सुशोभित था ।। ३२-३३ ।।
तस्मिन् शैले व्रजन् पार्थः सकृष्णः समवैक्षत ।
शुभैः प्रस्रवणैर्जुष्टां हेमधातुविभूषिताम् ।। ३४ ।।
चन्द्ररश्मिप्रकाशाङ्गीं पृथिवीं पुरमालिनीम् ।
उस पर्वतके ऊपरसे जाते हुए श्रीकृष्णसहित अर्जुनने नीचे देखा कि नगरों एवं गाँवोंके समुदायसे सुशोभित, सुवर्णमय धातुओंसे विभूषित तथा सुन्दर झरनोंसे युक्त पृथ्वीके सम्पूर्ण अंग चन्द्रमाकी किरणोंसे प्रकाशित हो रहे हैं ।। ३४ १/२ ।।
समुद्रांश्चाद्भुताकारानपश्यद् बहुलाकरान् ।। ३५ ।।
वियद् द्यां पृथिवीं चैव तथा विष्णुपदं व्रजन् ।
विस्मितः सह कृष्णेन क्षिप्तो बाण इवाभ्यगात् ।। ३६ ।।
बहुत-से रत्नोंकी खानोंसे युक्त समुद्र भी अद्भुत आकारमें दृष्टिगोचर हो रहे थे। इस प्रकार पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आकाशका एक साथ दर्शन करके आश्चर्यचकित हुए अर्जुन श्रीकृष्णके साथ विष्णुपद (उच्चतम आकाश)-में यात्रा करने लगे। वे धनुषसे चलाये हुए बाणके समान आगे बढ़ रहे थे ।। ३५-३६ ।।
ग्रहनक्षत्रसोमानां सूर्याग्न्योश्च समत्विषम् ।
अपश्यत तदा पार्थो ज्वलन्तमिव पर्वतम् ।। ३७ ।।
तदनन्तर कुन्तीकुमार अर्जुनने एक पर्वतको देखा, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। ग्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य और अग्निके समान उसकी प्रभा सब ओर फैल रही थी ।। ३७ ।।
समासाद्य तु तं शैलं शैलाग्रे समवस्थितम् ।
तपोनित्यं महात्मानमपश्यद् वृषभध्वजम् ।। ३८ ।।
उस पर्वतपर पहुँचकर अर्जुनने उसके एक शिखरपर खड़े हुए नित्य तपस्यापरायण परमात्मा भगवान् वृषभध्वजका दर्शन किया ॥ ३८ ॥
सहस्रमिव सूर्याणां दीप्यमानं स्वतेजसा ।
शूलिनं जटिलं गौरं वल्कलाजिनवाससम् ॥ ३९ ॥
वे अपने तेजसे सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशित हो रहे थे। उनके हाथमें त्रिशूल, मस्तकपर जटा और श्रीअंगोंपर वल्कल एवं मृगचर्मके वस्त्र शोभा पा रहे थे। उनकी कान्ति गौरवर्णकी थी ॥ ३९ ॥
नयनानां सहस्रश्च विचित्राङ्गं महौजसम् ।
पार्वत्या सहितं देवं भूतसंघैश्च भास्वरैः ॥ ४० ॥
सहस्रों नेत्रोंसे युक्त उनके श्रीविग्रहकी विचित्र शोभा हो रही थी। वे तेजस्वी महादेव अपनी धर्मपत्नी पार्वतीजीके साथ विराजमान थे और तेजोमय शरीरवाले भूतोंके समुदाय उनकी सेवामें उपस्थित थे ॥ ४० ॥
गीतवादित्रसंनादैर्हास्यलास्यसमन्वितम् ।
वल्गितास्फोटितोत्क्रुष्टैः पुण्यैर्गन्धैश्च सेवितम् ॥ ४१ ॥
उनके सम्मुख गीतों और वाद्योंकी मधुर ध्वनि हो रही थी। हास्य-लास्य (नृत्य)-का प्रदर्शन किया जा रहा था। प्रमथगण उछल-कूदकर बाहें फैलाकर और उच्चस्वरसे बोल-बोलकर अपनी कलाओंसे भगवान्का मनोरंजन करते थे। उनकी सेवामें पवित्र, सुगन्धित पदार्थ प्रस्तुत किये गये थे ॥ ४१ ॥