महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2018)
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
नकुल-सहदेवके साथ दुर्योधनका युद्ध, धृष्टद्युम्नसे दुर्योधनकी पराजय, कर्णद्वारा पांचाल-सेनासहित योद्धाओंका संहार, भीमसेनद्वारा कौरव योद्धाओंका सेनासहित विनाश, अर्जुनद्वारा संशप्तकोंका वध तथा अश्वत्थामाका अर्जुनके साथ घोर युद्ध करके पराजित होना
संजय उवाच
भीमसेनं सपाञ्चाल्यं चेदिकेकयसंवृतम् ।
वैकर्तनः स्वयं रुद्ध्वा वारयामास सायकैः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! पांचालों, चेदियों और केकयोंसे घिरे हुए भीमसेनको स्वयं वैकर्तन कर्णने बाणोंद्वारा अवरुद्ध करके उन्हें आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १ ॥
ततस्तु चेदिकारूषान् सृञ्जयांश्च महारथान् ।
कर्णो जघान समरे भीमसेनस्य पश्यतः ॥ २ ॥
तदनन्तर समरांगणमें कर्णने भीमसेनके देखते-देखते चेदि, कारूष और सृंजय महारथियोंका संहार आरम्भ कर दिया ॥ २ ॥
भीमसेनस्ततः कर्णं विहाय रथसत्तमम् ।
प्रययौ कौरवं सैन्यं कक्षमग्निरिव ज्वलन् ॥ ३ ॥
तब भीमसेनने भी रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णको छोड़कर जैसे आग घास-फूँसको जलाती है, उसी प्रकार कौरव-सेनाको दग्ध करनेके लिये उसपर आक्रमण किया ॥ ३ ॥
सूतपुत्रोऽपि समरे पञ्चालान् केकयांस्तथा ।
सृञ्जयांश्च महेष्वासान् निजघान सहस्रशः ॥ ४ ॥
सूतपुत्र कर्णने समरांगणमें सहस्रों पांचाल, केकय तथा सृंजय योद्धाओंको, जो महाधनुर्धर थे, मार डाला ॥ ४ ॥
संशप्तकेषु पार्थश्च कौरवेषु वृकोदरः ।
पञ्चालेषु तथा कर्णः क्षयं चक्रमहारथाः ॥ ५ ॥
अर्जुन संशप्तकोंकी, भीमसेन कौरवोंकी तथा कर्ण पांचालोंकी सेनामें घुसकर युद्ध करते थे! इन तीनों महारथियोंने बहुत-से शत्रुओंका संहार कर डाला ॥ ५ ॥
ते क्षत्रिया दह्यमानास्त्रिभिस्तैः पावकोपमैः ।
जगग्मुर्विनाशं समरे राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ ६ ॥
अग्निके समान तेजस्वी इन तीनों वीरोंद्वारा दग्ध होते हुए क्षत्रिय समरांगणमें विनाशको प्राप्त हो रहे थे। राजन्! यह सब आपकी कुमन्त्रणाका फल है ॥ ६ ॥
ततो दुर्योधनः क्रुद्धो नकुलं नवभिः शरैः ।
विव्याध भरतश्रेष्ठ चतुरश्चास्य वाजिनः ॥ ७ ॥
भरतश्रेष्ठ! तब दुर्योधनने कुपित होकर नौ बाणोंसे नकुल तथा उनके चारों घोड़ोंको घायल कर दिया ॥ ७ ॥
ततः पुनरमेयात्मा तव पुत्रो जनाधिप ।
क्षुरेण सहदेवस्य ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ॥ ८ ॥
जनेश्वर! इसके बाद अमेय आत्मबलसे सम्पन्न आपके पुत्रने एक क्षुरके द्वारा सहदेवकी सुवर्णमयी ध्वजा काट डाली ॥ ८ ॥
नकुलस्तु ततः क्रुद्धस्तव पुत्रं च सप्तभिः ।
जघान समरे राजन् सहदेवश्च पञ्चभिः ॥ ९ ॥
राजन्! तत्पश्चात् समरभूमिमें आपके पुत्रको क्रोधमें भरे हुए नकुलने सात और सहदेवने पाँच बाण मारे ॥ ९ ॥
तावुभौ भरतश्रेष्ठौ ज्येष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
विव्याधोरसि संक्रुद्धः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ॥ १० ॥
वे दोनों श्रेष्ठ वीर समस्त धनुर्धारियोंमें प्रधान थे। दुर्योधनने कुपित होकर उन दोनोंकी छातीमें पाँच-पाँच बाण मारे ॥ १० ॥
ततोऽपराभ्यां भल्लाभ्यां धनुषी समकृन्तत ।
यमयोः सहसा राजन् विव्याध च त्रिसप्तभिः ॥ ११ ॥
राजन्! फिर सहसा उसने दो भल्लोंसे नकुल और सहदेवके धनुष काट डाले तथा उन दोनोंको भी इक्कीस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ११ ॥
तावन्ये धनुषी श्रेष्ठे शक्रचापनिभे शुभे ।
प्रगृह्य रेजतुः शूरौ देवपुत्रसमौ युधि ॥ १२ ॥
फिर वे दोनों वीर इन्द्रधनुषके समान सुन्दर दूसरे श्रेष्ठ धनुष लेकर युद्धस्थलमें देवकुमारोंके समान सुशोभित होने लगे ॥ १२ ॥
ततस्तौ रभसौ युद्धे भ्रातरौ भ्रातरं युधि ।
शरैर्ववृषतुर्घोरैर्महामेघौ यथाचलम् ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् जैसे दो महामेघ किसी पर्वतपर जलकी वर्षा करते हों, उसी प्रकार दोनों वेगशाली बन्धु नकुल और सहदेव भाई दुर्योधनपर युद्धमें भयंकर बाणोंकी वृष्टि करने लगे ॥ १३ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज तव पुत्रो महारथः ।
पाण्डुपुत्रौ महेष्वासौ वारयामास पत्रिभिः ॥ १४ ॥
महाराज! तब आपके महारथी पुत्रने कुपित होकर उन दोनों महाधनुर्धर पाण्डुपुत्रोंको बाणोंद्वारा आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १४ ॥
धनुर्मण्डलमेवास्य दृश्यते युधि भारत ।
सायकाश्चैव दृश्यन्ते निश्चरन्तः समन्ततः ॥ १५ ॥
आच्छादयन् दिशः सर्वाः सूर्यस्येवांशवो यथा ।
भारत! उस समय केवल उसका मण्डलाकार धनुष ही दिखायी देता था और उससे चारों ओर छूटनेवाले बाण सूर्यकी किरणोंके समान सम्पूर्ण दिशाओंको ढके हुए दृष्टिगोचर होते थे ॥ १५ १/२ ॥
बाणभूते ततस्तस्मिन् संछन्ने च नभस्तले ॥ १६ ॥
यमाभ्यां ददृशे रूपं कालान्तकयमोपमम् ।
उस समय जब आकाश आच्छादित होकर बाणमय हो रहा था, तब नकुल और सहदेवने आपके पुत्रका स्वरूप काल, अन्तक एवं यमराजके समान भयंकर देखा ॥
पराक्रमं तु तं दृष्ट्वा तव सूनोर्महारथाः ॥ १७ ॥
मृत्योरुपान्तिकं प्राप्तौ माद्रीपुत्रौ स्म मेनिरे ।
आपके पुत्रका वह पराक्रम देखकर सब महारथी ऐसा मानने लगे कि माद्रीके दोनों पुत्र मृत्युके निकट पहुँच गये ॥ १७ १/२ ॥
ततः सेनापती राजन् पाण्डवस्य महारथः ॥ १८ ॥
पार्षतः प्रययौ तत्र यत्र राजा सुयोधनः ।
राजन्! तब पाण्डव-सेनापति द्रुपदपुत्र महारथी धृष्टद्युम्न जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ जा पहुँचे ॥ १८ १/२ ॥
माद्रीपुत्रौ ततः शूरौ व्यतिक्रम्य महारथौ ॥ १९ ॥
धृष्टद्युम्नस्तव सुतं वारयामास सायकैः ।
महारथी शूरवीर माद्रीकुमार नकुल-सहदेवको लाँघकर धृष्टद्युम्नने अपने बाणोंकी मारसे आपके पुत्रको रोक दिया ॥ १९ १/२ ॥
तमविध्यदमेयात्मा तव पुत्रो ह्यमर्षणः ॥ २० ॥
पाञ्चाल्यं पञ्चविंशत्या प्रहसन् पुरुषर्षभः ।
तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न आपके अमर्षशील पुत्र पुरुषरत्न दुर्योधनने हँसते हुए पचीस बाण मारकर धृष्टद्युम्नको घायल कर दिया ॥ २० १/२ ॥
ततः पुनरमेयात्मा तव पुत्रो ह्यमर्षणः ॥ २१ ॥
विद्ध्वा ननाद पाञ्चाल्यं षष्ट्या पञ्चभिरेव च ।
तदनन्तर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न आपके अमर्षशील पुत्रने पैंसठ बाणोंसे धृष्टद्युम्नको घायल करके बड़े जोरसे गर्जना की ॥ २१ ½ ॥
तथास्य सशरं चापं हस्तावापं च मारिष ॥ २२ ॥
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन राजा चिच्छेद संयुगे ।
आर्य! फिर राजा दुर्योधनने युद्धस्थलमें एक तीखे क्षुरप्रसे धृष्टद्युम्नके बाणसहित धनुष और दस्तानेको भी काट दिया ॥ २२ ½ ॥
तदपास्य धनुश्छिन्नं पाञ्चाल्यः शत्रुकर्शनः ॥ २३ ॥
अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भारसहं नवम् ।
शत्रुसूदन धृष्टद्युम्नने उस कटे हुए धनुषको फेंककर वेगपूर्वक दूसरा धनुष हाथमें ले लिया, जो भार सहनेमें समर्थ और नवीन था ॥ २३ ½ ॥
प्रज्वलन्निव वेगेन संरम्भाद् रुधिरेक्षणः ॥ २४ ॥
अशोभत महेष्वासो धृष्टद्युम्नः कृतव्रणः ।
उस समय उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। सारे शरीरमें घाव हो रहे थे; अतः वे महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न वेगसे जलते हुए अग्निदेवके समान शोभा पा रहे थे ॥
स पञ्चदश नाराचाञ्श्वसतः पन्नगानिव ॥ २५ ॥
जिघांसुर्भरतश्रेष्ठं धृष्टद्युम्नो व्यपासृजत् ।
धृष्टद्युम्नने भरतश्रेष्ठ दुर्योधनको मार डालनेकी इच्छासे उसके ऊपर फुफकारते हुए सर्पोंके समान पंद्रह नाराच छोड़े ॥ २५ ½ ॥
ते वर्म हेमविकृतं भित्त्वा राज्ञः शिलाशिताः ॥ २६ ॥
विविशुर्वसुधां वेगात् कङ्कबर्हिणवाससः ।
शिलापर तेज किये हुए कंक और मयूरके पंखोंसे युक्त वे बाण राजा दुर्योधनके सुवर्णमय कवचको छेदकर बड़े वेगसे पृथ्वीमें समा गये ॥ २६ ½ ॥
सोऽतिविद्धो महाराज पुत्रस्तेऽतिव्यराजत ॥ २७ ॥
वसन्तकाले सुमहान् प्रफुल्ल इव किंशुकः ।
महाराज! उस समय अत्यन्त घायल हुआ आपका पुत्र वसन्त-ऋतुमें खिले हुए महान् पलाश वृक्षके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ २७ ½ ॥
सच्छिन्नवर्मा नाराचप्रहारैर्जर्जरीकृतः ॥ २८ ॥
धृष्टद्युम्नस्य भल्लेन क्रुद्धश्चिच्छेद कार्मुकम् ।
उसका कवच कट गया था और शरीर नाराचोंके प्रहारसे जर्जर कर दिया गया था। उस अवस्थामें उसने कुपित होकर एक भल्लसे धृष्टद्युम्नके धनुषको काट डाला ॥ २८ ½ ॥
अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महीपतिः ॥ २९ ॥
सायकैर्दशभी राजन् भ्रुवोर्मध्ये समर्पयत् ।
राजन्! धनुष कट जानेपर धृष्टद्युम्नकी दोनों भौंहोंके मध्यभागमें राजा दुर्योधनने तुरंत ही दस बाणोंका प्रहार किया ॥ २९ १/२ ॥
तस्य तेऽशोभयन् वक्त्रं कर्मारपरिमार्जिताः ॥ ३० ॥
प्रफुल्लं पङ्कजं यद्वद् भ्रमरा मधुलिप्सवः ।
कारीगरके द्वारा साफ किये गये वे बाण धृष्टद्युम्नके मुखकी ऐसी शोभा बढ़ाने लगे, मानो मधुलोभी भ्रमर प्रफुल्ल कमल-पुष्पका रसास्वादन कर रहे हों ॥ ३० १/२ ॥
तदपास्य धनुश्छिन्नं धृष्टद्युम्नो महामनाः ॥ ३१ ॥
अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भल्लांश्च षोडश ।
महामना धृष्टद्युम्नने उस कटे हुए धनुषको फेंककर बड़े वेगसे दूसरा धनुष और सोलह भल्ल हाथमें ले लिये ॥ ३१ १/२ ॥
ततो दुर्योधनस्याश्वान् हत्वा सूतं च पञ्चभिः ॥ ३२ ॥
धनुश्चिच्छेद भल्लेन जातरूपपरिष्कृतम् ।
उनमेंसे पाँच भल्लोंद्वारा दुर्योधनके सारथि और घोड़ोंको मारकर एक भल्लसे उसके सुवर्णभूषित धनुषको काट डाला ॥ ३२ १/२ ॥
रथं सोपस्करं छत्रं शक्तिं खड्गं गदां ध्वजम् ॥ ३३ ॥
भल्लैश्चिच्छेद दशभिः पुत्रस्य तव पार्वतः ।
तत्पश्चात् दस भल्लोंसे द्रुपदकुमारने आपके पुत्रके सब सामग्रियोंसहित रथ, छत्र, शक्ति, खड्ग, गदा और ध्वज काट दिये ॥ ३३ १/२ ॥
तपनीयाङ्गदं चित्रं नागं मणिमयं शुभम् ॥ ३४ ॥
ध्वजं कुरुपतेश्छिन्नं ददृशुः सर्वपार्थिवाः ।
समस्त राजाओंने देखा कि कुरुराज दुर्योधनका सोनेके अंगदोंसे विभूषित नाग-चिह्नयुक्त विचित्र, मणिमय एवं सुन्दर ध्वज कटकर धराशायी हो गया है ॥ ३४ १/२ ॥
दुर्योधनं तु विरथं छिन्नवर्मायुधं रणे ॥ ३५ ॥
भ्रातरं पर्यरक्षन्त सोदरा भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! रणभूमिमें जिसके कवच और आयुध छिन्न-भिन्न हो गये थे, उस रथहीन दुर्योधनकी उसके सगे भाई सब ओरसे रक्षा करने लगे ॥ ३५ १/२ ॥
तमारोप्य रथे राजन् दण्डधारो नराधिपम् ॥ ३६ ॥
अपाहरदसम्भ्रान्तो धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ।
राजन्! इसी समय दण्डधार धृष्टद्युम्नके देखते-देखते राजा दुर्योधनको अपने रथपर बिठाकर बिना किसी घबराहटके रणभूमिसे दूर हटा ले गया ॥ ३६ १/२ ॥
कर्णस्तु सात्यकिं जित्वा राजगृद्धी महाबलः ॥ ३७ ॥
द्रोणहन्तारमुग्रेषुं ससाराभिमुखो रणे ।
राजा दुर्योधनका हित चाहनेवाला महाबली कर्ण सात्यकिको परास्त करके रणभूमिमें भयंकर बाण धारण करनेवाले द्रोणहन्ता धृष्टद्युम्नके सामने गया ॥ ३७ १/२ ॥
तं पृष्ठतोऽभ्ययात् तूर्णं शैनेयो वितुदञ्छरैः ॥ ३८ ॥
वारणं जघनोपान्ते विषाणाभ्यामिव द्विपः ।
उस समय शिनिपौत्र सात्यकि अपने बाणोंसे कर्णको पीड़ा देते हुए तुरंत उसके पीछे-पीछे गये, मानो कोई गजराज अपने दोनों दाँतोंसे दूसरे गजराजकी जाँघोंमें चोट पहुँचाता हुआ उसका पीछा कर रहा हो ॥ ३८ १/२ ॥
स भारत महानासीद् योधानां सुमहात्मनाम् ॥ ३९ ॥
कर्णपार्षतयोर्मध्ये त्वदीयानां महारणः ।
भारत! कर्ण और धृष्टद्युम्नके बीचमें खड़े हुए आपके महामनस्वी योद्धाओंका पाण्डव-सैनिकोंके साथ महान् संग्राम हुआ ॥ ३९ १/२ ॥
न पाण्डवानां नास्माकं योधः कश्चित् पराङ्मुखः ॥ ४० ॥
प्रत्यदृश्यत् ततः कर्णः पञ्चालांस्त्वरितो ययौ ।
उस समय पाण्डवों तथा हमलोगोंमेंसे कोई भी योद्धा युद्धसे मुँह फेरकर पीछे हटता नहीं दिखायी दिया। तब कर्णने तुरंत ही पांचालोंपर आक्रमण किया ॥ ४० १/२ ॥
तस्मिन् क्षणे नरश्रेष्ठ गजवाजिजनक्षयः ॥ ४१ ॥
प्रादुरासीदुभयतो राजन् मध्यगतेऽहनि ।
नरश्रेष्ठ नरेश्वर! मध्याह्नकी उस बेलामें दोनों पक्षोंके हाथी, घोड़ों और मनुष्योंका संहार होने लगा ॥
पञ्चालास्तु महाराज त्वरिता विजिगीषवः ॥ ४२ ॥
ते सर्वेऽभ्यद्रवन् कर्णं पतत्रिण इव द्रुमम् ।
महाराज! विजयकी इच्छा रखनेवाले समस्त पांचाल योद्धा कर्णपर उसी प्रकार टूट पड़े, जैसे पक्षी वृक्षकी ओर उड़े जाते हैं ॥ ४२ १/२ ॥
तांस्तथाधिरथिः क्रुद्धो यतमानान् मनस्विनः ॥ ४३ ॥
विचिन्वन्निव बाणौघैः समासादयदग्रगान् ।
अधिरथपुत्र कर्ण कुपित हो विजयके लिये प्रयत्नशील, मनस्वी एवं अग्रगामी वीरोंको मानो चुन-चुनकर बाणसमूहोंद्वारा मारने लगा ॥ ४३ १/२ ॥
व्याघ्रकेतुं सुशर्माणं चित्रं चोग्रायुधं जयम् ॥ ४४ ॥
शुक्लं च रोचमानं च सिंहसेनं च दुर्जयम् ।
वह व्याघ्रकेतु, सुशर्मा*, चित्र, उग्रायुध, जय, शुक्ल, रोचमान और दुर्जय वीर सिंहसेनपर जा चढ़ा ॥ ४४ १/२ ॥
ते वीरा रथमार्गेण परिवव्रुर्नरोत्तमम् ॥ ४५ ॥
सृजन्तं सायकान् क्रुद्धं कर्णमाहवशॊभिनम् ।
उन सभी वीरोंने रथ-मार्गसे आकर युद्धभूमिमें शोभा पाने तथा कुपित होकर बाणोंकी वर्षा करनेवाले नरश्रेष्ठ कर्णको चारों ओरसे घेर लिया ।। ४५ १/२ ।।
युध्यमानांस्तु तान् दूरान्मनुजेन्द्र प्रतापवान् ।। ४६ ।।
अष्टाभिरशौ राधेयोऽभ्यर्दयन्निशितैः शरैः ।
नरेन्द्र! प्रतापी राधापुत्र कर्णने दूरसे युद्ध करनेवाले उन आठों वीरोंको आठ पैने बाणोंसे घायल कर दिया ।। ४६ १/२ ।।
अथापरान् महाराज सूतपुत्रः प्रतापवान् ।। ४७ ।।
जघान बहुसाहस्रान् यॊधान् युद्धविशारदान् ।
महाराज! तदनन्तर प्रतापी सूतपुत्रने कई हजार युद्धकुशल योद्धाओंको मार डाला ।। ४७ १/२ ।।
जिष्णुं च जिष्णुकर्माणं देवापिं भद्रमेव च ।। ४८ ।।
दण्डं च राजन् समरे चित्रं चित्रायुधं हरिम् ।
सिंहकेतुं रोचमानं शलभं च महारथम् ।। ४९ ।।
निजघान सुसंक्रुद्धश्चेदीनां च महारथान् ।
राजन्! तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए कर्णने समरांगणमें जिष्णु, जिष्णुकर्मा, देवापि, भद्र, दण्ड, चित्र, चित्रायुध, हरि, सिंहकेतु, रोचमान तथा महारथी शलभ—इन चेदिदेशीय महारथियोंका संहार कर डाला ।। ४८-४९ १/२ ।।
तेषामाददतः प्राणानासीदाधिरथेर्वपुः ।। ५० ।।
शोणिताभ्युक्षिताङ्गस्य रुद्रस्येवोर्जितं महत् ।
इन वीरोंके प्राण लेते समय रक्तसे भीगे अंगोंवाले सूतपुत्र कर्णका शरीर प्राणियोंका संहार करनेवाले भगवान् रुद्रके विशाल शरीरकी भाँति देदीप्यमान हो रहा था ।। ५० १/२ ।।
तत्र भारत कर्णेन मातङ्गास्ताडिताः शरैः ।। ५१ ।।
सर्वतोऽभ्यद्रवन् भीताः कुर्वन्तो महदाकुलम् ।
भारत! वहाँ कर्णके बाणोंसे घायल हुए हाथी विशाल सेनाको व्याकुल करते हुए भयभीत हो चारों ओर भागने लगे ।। ५१ १/२ ।।
निपेतुरुर्व्यां समरे कर्णसायकताडिताः ।। ५२ ।।
कुर्वन्तो विविधान् नादान् वज्रनुन्ना इवाचलाः ।
कर्णके बाणोंसे आहत होकर समरांगणमें नाना प्रकारके आर्तनाद करते हुए वज्रके मारे हुए पर्वतोंके समान धराशायी हो रहे थे ।। ५२ १/२ ।।
गजवाजिमनुष्यैश्च निपतद्भिः समन्ततः ।। ५३ ।।
रथैश्चाधिरथेर्मार्गे समास्तीर्यत मेदिनी ।
सूतपुत्र कर्णके रथके मार्गमें सब ओर गिरते हुए हाथियों, घोड़ों, मनुष्यों और रथोंके द्वारा वहाँ सारी पृथ्वी पट गयी थी ।। ५३ १/२ ।।
नैवं भीष्मो न च द्रोणो नान्ये युधि च तावकाः ।। ५४ ।।
चक्रुः स्म तादृशं कर्म यादृशं वै कृतं रणे ।
कर्णने उस समय रणभूमिमें जैसा पराक्रम किया था, वैसा न तो भीष्म, न द्रोणाचार्य और न आपके दूसरे कोई योद्धा ही कर सके थे ।। ५४ १/२ ।।
सूतपुत्रेण नागेषु हयेषु च रथेषु च ।। ५५ ।।
नरेषु च महाराज कृतं स्म कदनं महत् ।
महाराज! सूतपुत्रने हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदल मनुष्योंके दलमें घुसकर बड़ा भारी संहार मचा दिया था ।। ५५ १/२ ।।
मृगमध्ये यथा सिंहो दृश्यते निर्भयश्चरन् ।। ५६ ।।
पञ्चालानां तथा मध्ये कर्णोऽचरदभीतवत् ।
जैसे सिंह मृगोंके झुंडमें निर्भय विचरता दिखायी देता है, उसी प्रकार कर्ण पांचालोंकी सेनामें निर्भीकके समान विचरण करता था ।। ५६ १/२ ।।
यथा मृगगणांस्त्रस्तान् सिंहो द्रावयते दिशः ।। ५७ ।।
पञ्चालानां रथव्रातान् कर्णो व्यद्रावयत् तथा ।
जैसे भयभीत हुए मृगसमूहोंको सिंह सब ओर खदेड़ता है, उसी प्रकार कर्ण पांचालोंके रथसमूहोंको भगा रहा था ।। ५७ १/२ ।।
सिंहास्यं च यथा प्राप्य न जीवन्ति मृगाः क्वचित् ।। ५८ ।।
तथा कर्णमनुप्राप्य न जिजीवुर्महारथाः ।
जैसे मृग सिंहके मुखके समीप पहुँचकर जीवित नहीं बचते, उसी प्रकार पांचाल महारथी कर्णके निकट पहुँचकर जीवित नहीं रह पाते थे ।। ५८ १/२ ।।
वैश्वानरं यथा प्राप्य प्रतिदह्यन्ति वै जनाः ।। ५९ ।।
कर्णाग्निना रणे तद्वद् दग्धा भारत सृञ्जयाः ।
भरतनन्दन! जैसे जलती आगमें पड़ जानेपर सभी मनुष्य दग्ध हो जाते हैं, उसी प्रकार सृंजय-सैनिक रणभूमिमें कर्णरूपी अग्निसे जलकर भस्म हो गये ।।
कर्णेन चेदिकैकेयपाञ्चालेषु च भारत ।। ६० ।।
विश्राव्य नाम निहता बहवः शूरसम्मताः ।
भारत! कर्णने चेदि, केकय और पांचाल योद्धाओंमेंसे बहुत-से शूरसम्मत रथियोंको नाम सुनाकर मार डाला ।।
मम चासीन्मती राजन् दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ।। ६१ ।।
नैकोऽप्याधिरथेर्जीवन् पाञ्चाल्यो मोक्ष्यते युधि ।
पञ्चालान् व्यधमत् संख्ये सूतपुत्रः पुनः पुनः ॥ ६२ ॥
राजन्! कर्णका पराक्रम देखकर मेरे मनमें यही निश्चय हुआ कि युद्धस्थलमें एक भी पांचाल योद्धा सूतपुत्रके हाथसे जीवित नहीं छूट सकता; क्योंकि सूतपुत्र बारंबार युद्धस्थलमें पांचालोंका ही विनाश कर रहा था ॥ ६१-६२ ॥
पञ्चालानथ निघ्नन्तं कर्णं दृष्ट्वा महारणे ।
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ६३ ॥
उस महासमरमें कर्णको पांचालोंका संहार करते देख धर्मराज युधिष्ठिरने अत्यन्त कुपित होकर उसपर धावा बोल दिया ॥ ६३ ॥
धृष्टद्युम्नश्च राधेयं द्रौपदेयाश्च मारिष ।
परिवव्रुरमित्रघ्नं शतशश्चापरे जनाः ॥ ६४ ॥
आर्य! धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पुत्र तथा दूसरे सैकड़ों मनुष्य शत्रुनाशक राधापुत्र कर्णको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ६४ ॥
शिखण्डी सहदेवश्च नकुलो नाकुलिस्तथा ।
जनमेजयः शिनेर्नप्ता बहवश्च प्रभद्रकाः ॥ ६५ ॥
एते पुरोगमा भूत्वा धृष्टद्युम्नस्य संयुगे ।
कर्णमस्यन्तमिश्वस्त्रैर्विचेरुरमितौजसः ॥ ६६ ॥
शिखण्डी, सहदेव, नकुल, शतानीक, जनमेजय, सात्यकि तथा बहुत-से प्रभद्रकगण—ये सभी अमिततेजस्वी वीर युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नके आगे होकर बाण बरसानेवाले कर्णपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए विचरने लगे ॥ ६५-६६ ॥
तांस्तत्राधिरथिः संख्ये चेदिपाञ्चालपाण्डवान् ।
एको बहूनभ्यपतद् गरुत्मान् पन्नगानिव ॥ ६७ ॥
सूतपुत्रने समरांगणमें अकेला होनेपर भी जैसे गरुड़ अनेक सर्पोंपर एक साथ आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार बहुसंख्यक चेदि, पांचाल और पाण्डवोंपर आक्रमण किया ॥ ६७ ॥
तैः कर्णस्याभवद् युद्धं घोररूपं विशाम्पते ।
तादृग् यादृक् पुरा वृत्तं देवानां दानवैः सह ॥ ६८ ॥
प्रजानाथ! उन सबके साथ कर्णका वैसा ही भयानक युद्ध हुआ, जैसा पूर्वकालमें देवताओंका दानवोंके साथ हुआ था ॥ ६८ ॥
तान् समेतान् महेष्वासान् शरवर्षौघवर्षिणः ।
एको व्यधमदव्यग्रस्तमांसीव दिवाकरः ॥ ६९ ॥
जैसे एक ही सूर्य सम्पूर्ण अन्धकार-राशिको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार एक ही कर्णने ढेर-के-ढेर बाण-वर्षा करनेवाले उन समस्त महाधनुर्धरोंको बिना किसी व्यग्रताके नष्ट कर दिया ॥ ६९ ॥
भीमसेनस्तु संसक्ते राधेये पाण्डवैः सह ।
सर्वतोऽभ्यहनत् क्रुद्धो यमदण्डनिभैः शरैः ।
वाह्लीकान् केकयान् मत्स्यान् वासात्यान् मद्रसैन्धवान् ।। ७० ।।
एकः संख्ये महेष्वासो योधयन् बहुशोभत ।
जिस समय राधापुत्र कर्ण पाण्डवोंके साथ उलझा हुआ था, उसी समय महाधनुर्धर भीमसेन क्रोधमें भरकर यमदण्डके समान भयंकर बाणोंद्वारा बाह्लीक, केकय, मत्स्य, वसातीय, मद्र तथा सिंधुदेशीय सैनिकोंका सब ओरसे संहार कर रहे थे। वे युद्धभूमिमें अकेले ही इन सबके साथ युद्ध करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ।।
तत्र मर्मसु भीमेन नाराचैस्ताडिता गजाः ।। ७१ ।।
प्रपतन्तो हतारोहाः कम्पयन्ति स्म मेदिनीम् ।
वहाँ भीमसेनके नाराचोंद्वारा मर्मस्थानोंमें घायल हुए हाथी सवारोंसहित धराशायी हो इस पृथ्वीको कम्पित कर देते थे ।। ७१ १/२ ।।
वाजिनश्च हतारोहाः पत्तयश्च गतासवः ।। ७२ ।।
शेरते युधि निर्भिन्ना वमन्तो रुधिरं बहु ।
जिनके सवार मारे गये थे, वे घोड़े और पैदल सैनिक भी युद्धस्थलमें छिन्न-भिन्न हो मुँहसे बहुत-सा रक्त वमन करते हुए प्राणशून्य होकर पड़े थे ।। ७२ १/२ ।।
सहस्रशश्च रथिनः पातिताः पतितायुधाः ।। ७३ ।।
ते क्षताः समदृश्यन्त भीतभीता गतासवः ।
सहस्रों रथी रथसे नीचे गिरा दिये गये थे। उनके अस्त्र-शस्त्र भी गिर चुके थे। वे सब-के-सब क्षत-विक्षत हो भीमसेनके भयसे भीत एवं प्राणहीन दिखायी दे रहे थे ।। ७३ १/२ ।।
रथिभिः सादिभिः सूतैः पादातैर्वाजिभिर्गजैः ।। ७४ ।।
भीमसेन शरैश्छिन्नैराच्छन्ना वसुधाभवत् ।
भीमसेनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हुए रथियों, घुड़सवारों, सारथियों, पैदलों, घोड़ों और हाथियोंकी लाशोंसे वहाँकी धरती आच्छादित हो गयी थी ।। ७४ १/२ ।।
तत् स्तम्भितमिवातिष्ठद् भीमसेनभयार्दितम् ।। ७५ ।।
दुर्योधनबलं सर्वं निरुत्साहं कृतव्रणम् ।
निश्चेष्टं तुमुलं दीनं बभौ तस्मिन् महारण् ।। ७६ ।।
उस महासमरमें दुर्योधनकी सारी सेना भीमसेनके भयसे पीड़ित हो स्तब्ध-सी खड़ी थी। उत्साहशून्य, घायल, निश्चेष्ट, भयंकर और अत्यन्त दीन-सी प्रतीत होती थी ।। ७५-७६ ।।
प्रसन्नसलिले काले यथा स्यात् सागरो नृप ।
तद्वत् तव बलं तद् वै निश्चलं समवस्थितम् ।। ७७ ।।
नरेश्वर! जिस समय ज्वार न उठनेसे जल स्वच्छ एवं शान्त हो, उस समय जैसे समुद्र निश्चल दिखायी देता है, उसी प्रकार आपकी सारी सेना निश्चेष्ट खड़ी थी॥
मन्युवीर्यबलोपेतं दर्पात् प्रत्यवरोपितम् ।
अभवत् तव पुत्रस्य तत् सैन्यं निष्प्रभं तदा ॥ ७८ ॥
यद्यपि आपके सैनिकोंमें क्रोध, पराक्रम और बलकी कमी नहीं थी तो भी उनका घमंड चूर-चूर हो गया था; इसलिये उस समय आपके पुत्रकी वह सारी सेना तेजोहीन-सी प्रतीत होती थी ॥ ७८ ॥
तद् बलं भरतश्रेष्ठ वध्यमानं परस्परम् ।
रुधिरौघपरिक्लिन्नं रुधिरार्द्रं बभूव ह ॥ ७९ ॥
जगाम भरतश्रेष्ठ वध्यमानं परस्परम् ।
भरतश्रेष्ठ! परस्पर मार खाती हुई वह सेना रक्तके प्रवाहमें डूबकर खूनसे लथपथ हो गयी थी और एक-दूसरेकी चोट खाकर विनाशको प्राप्त हो रही थी ॥ ७९ ½ ॥
सूतपुत्रो रणे क्रुद्धः पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ८० ॥
भीमसेनः कुरूंश्चापि द्रावयन्तौ विरेजतुः ।
सूतपुत्र कर्ण रणभूमिमें कुपित हो पाण्डव-सेनाको और भीमसेन कौरव-सैनिकोंको खदेड़ते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ८० ½ ॥
वर्तमाने तथा रौद्रे संग्रामेऽद्भुतदर्शने ॥ ८१ ॥
निहत्य पृतनामध्ये संशप्तकगणान् बहून् ।
अर्जुनो जयतां श्रेष्ठो वासुदेवमथाब्रवीत् ॥ ८२ ॥
जब इस प्रकार अद्भुत दिखायी देनेवाला वह भयंकर संग्राम चल ही रहा था, उस समय दूसरी ओर विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुन सेनाके मध्यभागमें बहुत-से संशप्तकोंका संहार करके भगवान् श्रीकृष्णसे बोले— ॥ ८१-८२ ॥
प्रभग्नं बलमेतद्धि योत्स्यमानं जनार्दन ।
एते द्रवन्ति सगणाः संशप्तकमहारथाः ॥ ८३ ॥
अपारयन्तो मद्बाणान् सिंहशब्दं मृगा इव ।
'जनार्दन! युद्ध करती हुई इस संशप्तक-सेनाके पाँव उखड़ गये हैं। ये संशप्तक महारथी अपने-अपने दलके साथ भागे जा रहे हैं। जैसे मृग सिंहकी गर्जना सुनकर हतोत्साह हो जाते हैं, उसी प्रकार ये लोग मेरे बाणोंकी चोट सहन करनेमें असमर्थ हो गये हैं ॥ ८३ ½ ॥
दीर्यते च महत् सैन्यं सृञ्जयानां महारणे ॥ ८४ ॥
हस्तिकक्षो ह्यसौ कृष्ण केतुः कर्णस्य धीमतः ।
दृश्यते राजसैन्यस्य मध्ये विचरतो मुदा ॥ ८५ ॥
‘उधर वह संजयोंकी विशाल सेना भी महासमरमें विदीर्ण हो रही है। श्रीकृष्ण! वह हाथीकी रस्सीके चिह्नसे युक्त बुद्धिमान् कर्णका ध्वज दिखायी दे रहा है। वह राजाओंकी सेनाके बीच सानन्द विचरण कर रहा है ।। ८४-८५ ।।
न च कर्णं रणे शक्ता जेतुमन्ये महारथाः ।
जानीते हि भवान् कर्णं वीर्यवन्तं पराक्रमे ।। ८६ ।।
‘जनार्दन! आप तो जानते ही हैं कि कर्ण कितना बलवान् तथा पराक्रम प्रकट करनेमें समर्थ है। अतः रणभूमिमें दूसरे महारथी उसे जीत नहीं सकते हैं ।। ८६ ।।
तत्र याहि यतः कर्णो द्रावयत्येष नो बलम् ।
वर्जयित्वा रणे याहि सूतपुत्रं महारथम् ।। ८७ ।।
एतन्मे रोचते कृष्ण यथा वा तव रोचते ।
‘श्रीकृष्ण! जहाँ यह कर्ण हमारी सेनाको खदेड़ रहा है, वहीं चलिये। रणभूमिमें संशप्तकोंको छोड़कर अब महारथी सूतपुत्रके ही पास रथ ले चलिये। ‘मुझे यही ठीक जान पड़ता है अथवा आपको जैसा जँचे, वैसा कीजिये’ ।।
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य गोविन्दः प्रहसन्निव ।। ८८ ।।
अब्रवीदर्जुनं तूर्णं कौरवाञ्जहि पाण्डव ।
अर्जुनकी यह बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने उनसे हँसते हुए-से कहा—‘पाण्डुनन्दन! तुम शीघ्र ही कौरव-सैनिकोंका संहार करो’ ।। ८८ १/२ ।।
ततस्तव महासैन्यं गोविन्दप्रेरिता हयाः ।। ८९ ।।
हंसवर्णाः प्रविविशुर्वहन्तः कृष्णपाण्डवौ ।
राजन्! तदनन्तर श्रीकृष्णके द्वारा हाँके गये हंसके समान श्वेत रंगवाले घोड़े श्रीकृष्ण और अर्जुनको लेकर आपकी विशाल सेनामें घुस गये ।। ८९ १/२ ।।
केशवप्रेरितैरश्वैः श्वेतैः काञ्चनभूषणैः ।। ९० ।।
प्रविशद्भिस्तव बलं चतुर्दिशमभिद्यत ।
श्रीकृष्णद्वारा संचालित हुए उन सुवर्णभूषित श्वेत अश्वोंके प्रवेश करते ही आपकी सेनामें चारों ओर भगदड़ मच गयी ।। ९० १/२ ।।