महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
वृद्ध कन्याका चरित्र, शृंगवान्के साथ उसका विवाह और स्वर्गगमन तथा उस तीर्थका माहात्म्य
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
वृद्ध कन्याका चरित्र, शृंगवान्के साथ उसका विवाह और स्वर्गगमन तथा उस तीर्थका माहात्म्य
जनमेजय उवाच
कथं कुमारी भगवंस्तपोयुक्ता ह्यभूत् पुरा ।
किमर्थं च तपस्तेपे को वास्या नियमोऽभवत् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— भगवन्! पूर्वकालमें वह कुमारी तपस्यामें क्यों संलग्न हुई? उसने किसलिये तपस्या की और उसका कौन-सा नियम था? ॥ १ ॥
सुदुष्करमिदं ब्रह्मंस्त्वत्तः श्रुतमनुत्तमम् ।
आख्याहि तत्त्वमखिलं यथा तपसि सा स्थिता ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे यह अत्यन्त उत्तम तथा परम दुष्कर तपकी बात सुनी है। आप सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे बताइये; वह कन्या क्यों तपस्यामें प्रवृत्त हुई थी? ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
ऋषिरासीन्महावीर्यः कुणिर्गर्गो महायशाः ।
स तप्त्वा विपुलं राजंस्तपो वै तपतां वरः ॥ ३ ॥
मनसाथ सुतां सुभ्रू समुत्पादितवान् विभुः ।
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! प्राचीन कालमें एक महान् शक्तिशाली और महायशस्वी कुणिर्गर्ग नामक ऋषि रहते थे। तपस्या करनेवालोंमें श्रेष्ठ उन महर्षिने बड़ा भारी तप करके अपने मनसे एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न की ।।
तां च दृष्ट्वा मुनिः प्रीतः कुणिर्गर्गो महायशाः ॥ ४ ॥
जगाम त्रिदिवं राजन् संत्यज्येह कलेवरम् ।
नरेश्वर! उसे देखकर महायशस्वी मुनि कुणिर्गर्ग बड़े प्रसन्न हुए और कुछ कालके पश्चात् अपना यह शरीर छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ४ १/२ ॥
सुभ्रूः सा ह्यथ कल्याणी पुण्डरीकनिभेक्षणा ॥ ५ ॥
महता तपसोग्रेण कृत्वाऽऽश्रममनिन्दिता ।
उपवासैः पूजयन्ती पितॄन् देवांश्च सा पुरा ॥ ६ ॥
तदनन्तर कमलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली वह कल्याणमयी सती साध्वी सुन्दरी कन्या पूर्वकालमें अपने लिये आश्रम बनाकर बड़ी कठोर तपस्या तथा उपवासके साथ-साथ देवताओं और पितरोंका पूजन करती हुई वहाँ रहने लगी ॥ ५-६ ॥
तस्यास्तु तपसोग्रेण महान् कालोऽत्यगान्नृप ।
सा पित्रा दीयमानापि तत्र नैच्छदनिन्दिता ॥ ७ ॥
आत्मनः सदृशं सा तु भर्तारं नान्वपश्यत ।
राजन्! उग्र तपस्या करते हुए उसका बहुत समय व्यतीत हो गया। पिताने अपने जीवनकालमें उसका किसीके साथ ब्याह कर देनेका प्रयत्न किया; परंतु उस अनिन्द्य सुन्दरीने विवाहकी इच्छा नहीं की। उसे अपने योग्य कोई वर ही नहीं दिखायी देता था ॥ ७ १/२ ॥
ततः सा तपसोग्रेण पीडयित्वाऽऽत्मनस्तनुम् ॥ ८ ॥
पितृदेवार्चनरता बभूव विजने वने ।
तब वह उग्र तपस्याके द्वारा अपने शरीरको पीड़ा देकर निर्जन वनमें पितरों तथा देवताओंके पूजनमें तत्पर हो गयी ॥ ८ १/२ ॥
साऽऽत्मानं मन्यमानापि कृतकृत्यं श्रमान्विता ॥ ९ ॥
वार्धकेन च राजेन्द्र तपसा चैव कर्शिता ।
राजेन्द्र! परिश्रमसे थक जानेपर भी वह अपने-आपको कृतार्थ मानती रही। धीरे-धीरे बुढ़ापा और तपस्याने उसे दुर्बल बना दिया ॥ ९ १/२ ॥
सा नाशकद् यदा गन्तुं पदात् पदमपि स्वयम् ॥ १० ॥
चकार गमने बुद्धिं परलोकाय वै तदा ।
जब वह स्वयं एक पग भी चलनेमें असमर्थ हो गयी, तब उसने परलोकमें जानेका विचार किया ॥ १० १/२ ॥
मोक्तुकामां तु तां दृष्ट्वा शरीरं नारदोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥
असंस्कृतायाः कन्यायाः कुतो लोकास्तवानघे ।
एवं तु श्रुतमस्माभिर्देवलोके महाव्रते ॥ १२ ॥
तपः परमकं प्राप्तं न तु लोकास्त्वया जिताः ।
उसकी देहत्यागकी इच्छा देख देवर्षि नारदने उससे कहा—'महान् व्रतका पालन करनेवाली निष्पाप नारी! तुम्हारा तो अभी विवाह-संस्कार भी नहीं हुआ, तुम तो अभी कन्या हो। फिर तुम्हें पुण्यलोक कैसे प्राप्त हो सकते हैं? तुम्हारे सम्बन्धमें ऐसी बात मैंने देवलोकमें सुनी है। तुमने तपस्या तो बहुत बड़ी की है; परंतु पुण्य-लोकोंपर अधिकार नहीं प्राप्त किया है' ॥ ११-१२ १/२ ॥
तन्नारदवचः श्रुत्वा साब्रवीदृषिसंसदि ॥ १३ ॥
तपसोऽर्धं प्रयच्छामि पाणिग्राहस्य सत्तम ।
नारदजीकी यह बात सुनकर वह ऋषियोंकी सभामें उपस्थित होकर बोली—'साधुशिरोमणे! आपमें-से जो कोई मेरा पाणिग्रहण करेगा, उसे मैं अपनी तपस्याका आधा भाग दे दूँगी' ॥ १३ १/२ ॥
इत्युक्ते चास्या जग्राह पाणिं गालवसम्भवः ।। १४ ।।
ऋषिः प्राक् शृङ्गवान्नाम समयं चेममब्रवीत् ।
समयेन तवाद्याहं पाणिं स्प्रक्ष्यामि शोभने ।। १५ ।।
यद्येकरात्रं वस्तव्यं त्वया सह मयेति ह ।
उसके ऐसा कहनेपर सबसे पहले गालवके पुत्र शृंगवान् ऋषिने उसका पाणिग्रहण करनेकी इच्छा प्रकट की और सबसे पहले उसके सामने यह शर्त रखी—'शोभने! मैं एक शर्तके साथ आज तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा। विवाहके बाद तुम्हें एक रात मेरे साथ रहना होगा। यदि यह स्वीकार हो तो मैं तैयार हूँ' ।। १४-१५ १/२ ।।
तथेति सा प्रतिश्रुत्य तस्मै पाणिं ददौ तदा ।। १६ ।।
यथादृष्टेन विधिना हुत्वा चाग्निं विधानतः ।
चक्रे च पाणिग्रहणं तस्योद्वाहं च गालविः ।। १७ ।।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर उसने मुनिके हाथमें अपना हाथ दे दिया। फिर गालवपुत्रने शास्त्रोक्त रीतिसे विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके उसका पाणिग्रहण और विवाह-संस्कार किया ।। १६-१७ ।।
सा रात्रावभवद् राजंस्तरुणी वरवर्णिनी ।
दिव्याभरणवस्त्रा च दिव्यगन्धानुलेपना ।। १८ ।।
राजन्! रात्रिमें वह दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और दिव्य गन्धयुक्त अंगरागसे अलंकृत परम सुन्दरी तरुणी हो गयी ।। १८ ।।
तां दृष्ट्वा गालविः प्रीतो दीपयन्तीमिव श्रिया ।
उवास च क्षपामेकां प्रभाते साब्रवीच्च तम् ।। १९ ।।
उसे अपनी कान्तिसे सब ओर प्रकाश फैलाती देख गालवकुमार बड़े प्रसन्न हुए और उसके साथ एक रात निवास किया। सबेरा होते ही वह मुनिसे बोली— ।। १९ ।।
यस्त्वया समयो विप्र कृतो मे तपतां वर ।
तेनोषितास्मि भद्रं ते स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ।। २० ।।
'तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! आपने जो शर्त की थी, उसके अनुसार मैं आपके साथ रह चुकी। आपका मंगल हो, कल्याण हो। अब आज्ञा दीजिये, मैं जाती हूँ' ।। २० ।।
सा निर्गताब्रवीद् भूयो योऽस्मिंस्तीर्थे समाहितः ।
वसते रजनीमेकां तर्पयित्वा दिवौकसः ।। २१ ।।
चत्वारिंशतमष्टौ च द्वौ चाष्टौ सम्यगाचरेत् ।
यो ब्रह्मचर्यं वर्षाणि फलं तस्य लभेत सः ।। २२ ।।
यों कहकर वह वहाँसे चल दी। जाते-जाते उसने फिर कहा—'जो अपने चित्तको एकाग्र कर इस तीर्थमें स्नान और देवताओंका तर्पण करके एक रात निवास करेगा, उसे अट्ठावन वर्षोंतक विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य पालन करनेका फल प्राप्त होगा' ।। २१-२२ ।।
एवमुक्त्वा ततः साध्वी देहं त्यक्त्वा दिवं गता ।
ऋषिरप्यभवद् दीनस्तस्या रूपं विचिन्तयन् ॥ २३ ॥
ऐसा कहकर वह साध्वी तपस्विनी देह त्यागकर स्वर्गलोकमें चली गयी और मुनि उसके दिव्यरूपका चिन्तन करते हुए बहुत दुःखी हो गये ॥ २३ ॥
समयेन तपोऽर्धं च कृच्छ्रात् प्रतिगृहीतवान् ।
साधयित्वा तदाऽऽत्मानं तस्याः स गतिमन्वियात् ॥ २४ ॥
दुःखितो भरतश्रेष्ठ तस्या रूपबलात्कृतः ।
उन्होंने शर्तके अनुसार उसकी तपस्याका आधा भाग बड़े कष्टसे स्वीकार किया। फिर वे भी अपने शरीरका परित्याग करके उसीके पथपर चले गये। भरतश्रेष्ठ! वे उसके रूपपर बलात् आकृष्ट होकर अत्यन्त दुःखी हो गये थे ॥
एतत्ते वृद्धकन्याया व्याख्यातं चरितं महत् ॥ २५ ॥
तथैव ब्रह्मचर्यं च स्वर्गस्य च गतिः शुभा ।
यह मैंने तुमसे वृद्ध कन्याके महान् चरित्र, ब्रह्मचर्य-पालन तथा स्वर्गलोककी प्राप्तिरूप सद्गतिका वर्णन किया ॥
तत्रस्थश्चापि शुश्राव हतं शल्यं हलायुधः ॥ २६ ॥
तत्रापि दत्त्वा दानानि द्विजातिभ्यः परंतपः ।
शुश्राव शल्यं संग्रामे निहतं पाण्डवैस्तदा ॥ २७ ॥
समन्तपञ्चकद्वारात् ततो निष्क्रम्य माधवः ।
पप्रच्छर्षिगणान् रामः कुरुक्षेत्रस्य यत् फलम् ॥ २८ ॥
वहीं रहकर शत्रुओंको संताप देनेवाले बलरामजीने शल्यके मारे जानेका समाचार सुना था। वहाँ भी मधुवंशी बलरामने ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दे समन्तपंचक द्वारसे निकलकर ऋषियोंसे कुरुक्षेत्रके सेवनका फल पूछा ॥ २६—२८ ॥
ते पृष्टा यदुसिंहेन कुरुक्षेत्रफलं विभो ।
समाचख्युर्महात्मानस्तस्मै सर्वं यथातथम् ॥ २९ ॥
प्रभो! उस यदुसिंहके द्वारा कुरुक्षेत्रके फलके विषयमें पूछे जानेपर वहाँ रहनेवाले महात्माओंने उन्हें सब कुछ यथावत् रूपसे बताया ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥