महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
शल्य कर्णको हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर अपमानित कर रहे हैं
शल्य कर्णको हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर अपमानित कर रहे हैं
वयं काकाः कुतो नाम चरामः काकवाशिकाः ।
हंस प्राणैः प्रपद्ये त्वामुदकान्तं नयस्व माम् ॥ ५८ ॥
‘भाई हंस! हम तो कौए हैं। व्यर्थ काँव-काँव किया करते हैं। हम उड़ना क्या जानें? मैं अपने इन प्राणोंके साथ तुम्हारी शरणमें आया हूँ। तुम मुझे जलके किनारेतक पहुँचा दो’ ॥ ५८ ॥
स पक्षाभ्यां स्पृशन्नार्तस्तुण्डेन च महार्णवे ।
काको दृढपरिश्रान्तः सहसा निपपात ह ॥ ५९ ॥
ऐसा कहकर अत्यन्त थका-मादा कौआ दोनों पाँखों और चोंचसे जलका स्पर्श करता हुआ सहसा उस महासागरमें गिर पड़ा। उस समय उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी ॥ ५९ ॥
सागराम्भसि तं दृष्ट्वा पतितं दीनचेतसम् ।
म्रियमाणमिदं काकं हंसो वाक्यमुवाच ह ॥ ६० ॥
समुद्रके जलमें गिरकर अत्यन्त दीनचित्त हो मृत्युके निकट पहुँचे हुए उस कौएसे हंसने इस प्रकार कहा— ॥ ६० ॥
शतमेकं च पातानां पताम्यहमनुस्मर ।
श्लाघमानस्त्वमात्मानं काक भाषितवानसि ॥ ६१ ॥
‘काग! तूने अपनी प्रशंसा करते हुए कहा था कि मैं एक सौ एक उड़ानोंद्वारा उड़ सकता हूँ। अब उन्हें याद कर ॥ ६१ ॥
स त्वमेकशतं पातं पतन्नभ्यधिको मया ।
कथमेवं परिश्रान्तः पतितोऽसि महार्णवे ॥ ६२ ॥
‘सौ उड़ानोंसे उड़नेवाला तू तो मुझसे बहुत बढ़ा-चढ़ा है। फिर इस प्रकार थककर महासागरमें कैसे गिर पड़ा?’ ॥ ६२ ॥
प्रत्युवाच ततः काकः सीदमान इदं वचः ।
उपरिष्टं तदा हंसमभिवीक्ष्य प्रसादयन् ॥ ६३ ॥
तब जलमें अत्यन्त कष्ट पाते हुए कौएने जलके ऊपर ठहरे हुए हंसकी ओर देखकर उसे प्रसन्न करनेके लिये कहा ॥ ६३ ॥
काक उवाच
उच्छिष्टदर्पितो हंस मन्येऽऽत्मानं सुपर्णवत् ।
अवमन्य बहूंश्चाहं काकानन्यांश्च पक्षिणः ॥ ६४ ॥
कौआ बोला—भाई हंस! मैं जूठन खा-खाकर घमंडमें भर गया था और बहुत-से कौओं तथा दूसरे पक्षियोंका तिरस्कार करके अपने-आपको गरुड़के समान शक्तिशाली समझने लगा था ॥ ६४ ॥
प्राणैर्हंस प्रपद्ये त्वां द्विपान्तं प्रापयस्व माम् ।
यद्यहं स्वस्तिमान् हंस स्वं देशं प्राप्नुयां प्रभो ।। ६५ ।।
न कंचिदवमन्येऽहमापदो मां समुद्धर ।
हंस! अब मैं अपने प्राणोंके साथ तुम्हारी शरणमें आया हूँ। तुम मुझे द्वीपके पास पहुँचा दो। शक्तिशाली हंस! यदि मैं कुशलपूर्वक अपने देशमें पहुँच जाऊँ तो अब कभी किसीका अपमान नहीं करूँगा। तुम इस विपत्तिसे मेरा उद्धार करो ।। ६५ १/२ ।।
तमेवं वादिनं दीनं विलपन्तमचेतनम् ।। ६६ ।।
काक काकेति वाशन्तं निमज्जन्तं महार्णवे ।
कृपयाऽऽदाय हंसस्तं जलक्लिन्नं सुदुर्द्दशम् ।। ६७ ।।
पद्भ्यामुत्क्षिप्य वेगेन पृष्ठमारोपयच्छनैः ।
कर्ण! इस प्रकार कहकर कौआ अचेत-सा होकर दीनभावसे विलाप करने और काँव-काँव करते हुए महासागरके जलमें डूबने लगा। उस समय उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था। वह पानीसे भीग गया था। हंसने कृपापूर्वक उसे पंजोंसे उठाकर बड़े वेगसे ऊपरको उछाला और धीरेसे अपनी पीठपर चढ़ा लिया ।। ६६-६७ १/२ ।।
आरोप्य पृष्ठं हंसस्तं काकं तूर्णं विचेतनम् ।। ६८ ।।
आजगाम पुनर्द्वीपं स्पर्धया पेततुर्यतः ।
अचेत हुए कौएको पीठपर बिठाकर हंस तुरंत ही फिर उसी द्वीपमें आ पहुँचा, जहाँसे होड़ लगाकर दोनों उड़े थे ।। ६८ १/२ ।।
संस्थाप्य तं चापि पुनः समाश्वास्य च खेचरम् ।। ६९ ।।
गतो यथेप्सितं देशं हंसो मन इवाशुगः ।
उस कौएको उसके स्थानपर रखकर उसे आश्वासन दे मनके समान शीघ्रगामी हंस पुनः अपने अभीष्ट देशको चला गया ।। ६९ १/२ ।।
एवमुच्छिष्टपुष्टः स काको हंसपराजितः ।। ७० ।।
बलवीर्यमदं कर्ण त्यक्त्वा क्षान्तिमुपागतः ।
कर्ण! इस प्रकार जूठन खाकर पुष्ट हुआ कौआ उस हंससे पराजित हो अपने महान् बल-पराक्रमका घमंड छोड़कर शान्त हो गया ।। ७० १/२ ।।
उच्छिष्टभोजनः काको यथा वैश्यकुले पुरा ।। ७१ ।।
एवं त्वमुच्छिष्टभृतो धार्तराष्ट्रैर्न संशयः ।
सदृशान् श्रेयसश्चापि सर्वान् कर्णावमन्यसे ।। ७२ ।।
पूर्वकालमें वह कौआ जैसे वैश्यकुलमें सबकी जूठन खाकर पला था, उसी प्रकार धृतराष्ट्रके पुत्रोंने तुम्हें जूठन खिला-खिलाकर पाला है, इसमें संशय नहीं है। कर्ण! इसीसे तुम अपने समान तथा अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषोंका भी अपमान करते हो ।। ७१-७२ ।।
द्रोणद्रौणिकृपैर्गुप्तो भीष्मेणान्यैश्च कौरवैः ।
विराटनगरे पार्थमेकं किं नावधीस्तदा ॥ ७३ ॥
विराटनगरमें तो द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, भीष्म तथा अन्य कौरव वीर भी तुम्हारी रक्षा कर रहे थे। फिर उस समय तुमने अकेले सामने आये हुए अर्जुनका वध क्यों नहीं कर डाला? ॥ ७३ ॥
यत्र व्यस्ताः समस्ताश्च निर्जिताः स्थ किरीटिना ।
शृगाला इव सिंहेन क्व ते वीर्यमभूत् तदा ॥ ७४ ॥
वहाँ तो किरीटधारी अर्जुनने अलग-अलग और सब लोगोंसे एक साथ लड़कर भी तुमलोगोंको उसी प्रकार परास्त कर दिया था, जैसे एक ही सिंहने बहुत-से सियारोंको मार भगाया हो। कर्ण! उस समय तुम्हारा पराक्रम कहाँ था? ॥ ७४ ॥
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा समरे सव्यसाचिना ।
पश्यतां कुरुवीराणां प्रथमं त्वं पलायितः ॥ ७५ ॥
सव्यसाची अर्जुनके द्वारा समरांगणमें अपने भाईको मारा गया देखकर कौरव वीरोंके समक्ष सबसे पहले तुम्हीं भागे थे ॥ ७५ ॥
तथा द्वैतवने कर्ण गन्धर्वैः समभिद्रुतः ।
कुरून् समग्रानुत्सृज्य प्रथमं त्वं पलायितः ॥ ७६ ॥
कर्ण! इसी प्रकार जब द्वैतवनमें गन्धर्वोंने आक्रमण किया था, उस समय समस्त कौरवोंको छोड़कर पहले तुमने ही पीठ दिखायी थी ॥ ७६ ॥
हत्वा जित्वा च गन्धर्वांश्चित्रसेनमुखान् रणे ।
कर्ण दुर्योधनं पार्थः सभार्यं सममोक्षयत् ॥ ७७ ॥
कर्ण! वहाँ कुन्तीकुमार अर्जुनने ही रणभूमिमें चित्रसेन आदि गन्धर्वोंको मार-पीटकर उनपर विजय पायी थी और स्त्रियोंसहित दुर्योधनको उनकी कैदसे छुड़ाया था ॥ ७७ ॥
पुनः प्रभावः पार्थस्य पौराणः केशवस्य च ।
कथितः कर्ण रामेण सभायां राजसंसदि ॥ ७८ ॥
कर्ण! पुनः तुम्हारे गुरु परशुरामजीने भी उस दिन राजसभामें अर्जुन और श्रीकृष्णके पुरातन प्रभावका वर्णन किया था ॥ ७८ ॥
सततं च त्वमश्रौषीर्वचनं द्रोणभीष्मयोः ।
अवध्यौ वदतः कृष्णौ संनिधौ च महीक्षिताम् ॥ ७९ ॥
तुमने समस्त भूपालोंके समीप द्रोणाचार्य और भीष्मकी कही हुई बातें सदा सुनी हैं। वे दोनों श्रीकृष्ण और अर्जुनको अवध्य बताया करते थे ॥ ७९ ॥
कियत् तत् तत् प्रवक्ष्यामि येन येन धनंजयः ।
त्वत्तोऽतिरिक्तः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ब्राह्मणो यथा ॥ ८० ॥
मैं कहाँतक गिन-गिनकर बताऊँ कि किन-किन गुणोंके कारण अर्जुन तुमसे बढ़े-चढ़े हैं। जैसे ब्राह्मण समस्त प्राणियोंसे श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार अर्जुन तुमसे श्रेष्ठ हैं ॥ ८० ॥
इदानीमेव द्रष्टासि प्रधाने स्यन्दने स्थितौ ।
पुत्रं च वसुदेवस्य कुन्तीपुत्रं च पाण्डवम् ॥ ८१ ॥
तुम इसी समय प्रधान रथपर बैठे हुए वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण तथा कुन्तीकुमार पाण्डुपुत्र अर्जुनको देखोगे ॥ ८१ ॥
यथाश्रयत चक्राङ्गं वायसो बुद्धिमास्थितः ।
तथाश्रयस्व वार्ष्णेयं पाण्डवं च धनंजयम् ॥ ८२ ॥
जैसे कौआ उत्तम बुद्धिका आश्रय लेकर चक्रांगकी शरणमें गया था, उसी प्रकार तुम भी वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुनकी शरण लो ॥ ८२ ॥
यदा त्वं युधि विक्रान्तौ वासुदेवधनंजयौ ।
द्रष्टास्येकरथे कर्ण तदा नैवं वदिष्यसि ॥ ८३ ॥
कर्ण! जब तुम युद्धस्थलमें पराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुनको एक रथपर बैठे देखोगे, तब ऐसी बातें नहीं बोल सकोगे ॥ ८३ ॥
यदा शरशतैः पार्थो दर्पं तव वधिष्यति ।
तदा त्वमन्तरं द्रष्टा आत्मनश्चार्जुनस्य च ॥ ८४ ॥
जब अर्जुन अपने सैकड़ों बाणोंद्वारा तुम्हारा घमंड चूर-चूर कर देंगे, तब तुम स्वयं ही देख लोगे कि तुममें और अर्जुनमें कितना अन्तर है? ॥ ८४ ॥
देवासुरमनुष्येषु प्रख्यातौ यौ नरोत्तमौ ।
तौ मावमंस्था मौर्ख्यात् त्वं खद्योत इव रोचनौ ॥ ८५ ॥
जैसे जुगनू प्रकाशमान सूर्य और चन्द्रमाका तिरस्कार करे, उसी प्रकार तुम देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें भी विख्यात उन दोनों नरश्रेष्ठ वीर श्रीकृष्ण और अर्जुनका मूर्खतावश अपमान न करो ॥ ८५ ॥
सूर्याचन्द्रमसौ यद्वत् तद्वदर्जुनकेशवौ ।
प्रकाशयेनाभिविख्यातौ त्वं तु खद्योतवन्नृषु ॥ ८६ ॥
जैसे सूर्य और चन्द्रमा हैं, वैसे श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं। वे दोनों अपने तेजसे सर्वत्र विख्यात हैं; परंतु तुम तो मनुष्योंमें जुगनूके ही समान हो ॥ ८६ ॥
एवं विद्वान् मावमंस्थाः सूतपुत्राच्युतार्जुनौ ।
नृसिंहौ तौ महात्मानौ जोषमास्व विकत्थने ॥ ८७ ॥
सूतपुत्र! तुम महात्मा पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुनको ऐसा जानकर उनका अपमान न करो। बढ़-बढ़कर बातें बनाना बंद करके चुपचाप बैठे रहो ॥ ८७ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे हंसकाकीयोपाख्याने
एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण-शल्य-संवादके अन्तर्गत हंसकाकीयोपाख्यान-
विषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४१ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ८८ श्लोक हैं)
* महाडीनके सिवा, जो अन्य पचीस उड़ानें कही गयी हैं, उन सबका पृथक्-पृथक् एक-एक संपात (पंख फड़फड़ानेकी क्रिया) भी है, ये पचीस संपात जोड़नेसे एक सौ एक संख्याकी पूर्ति होती है।