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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

१९८-

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण

धृतराष्ट्र उवाच

साङ्गा वेदा यथान्यायं येनाधीता महात्मना ।
यस्मिन् साक्षाद् धनुर्वेदो ह्रीनिषेवे प्रतिष्ठितः ॥ १ ॥
यस्य प्रसादात् कुर्वन्ति कर्माणि पुरुषर्षभाः ।
अमानुषाणि संग्रामे देवैरसुकराणि च ॥ २ ॥
तस्मिन्नाक्रुश्यति द्रोणे समक्षं पापकर्मणा ।
नीचात्मना नृशंसेन क्षुद्रेण गुरुघातिना ॥ ३ ॥
नामर्षं तत्र कुर्वन्ति धिक् क्षात्रं धिगमर्षिताम् ।

**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! जिन महात्माने विधिपूर्वक अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया था, जिन लज्जाशील सत्पुरुषमें साक्षात् धनुर्वेद प्रतिष्ठित था, जिनके कृपाप्रसादसे कितने ही पुरुषरत्न योद्धा संग्रामभूमिमें ऐसे-ऐसे अलौकिक पराक्रम कर दिखाते थे, जो देवताओंके लिये भी दुष्कर थे; उन्हीं द्रोणाचार्यकी वह पापी, नीच, नृशंस, क्षुद्र और गुरुघाती धृष्टद्युम्न सबके सामने निन्दा कर रहा था और लोग क्रोध नहीं प्रकट करते थे। धिक्कार है ऐसे क्षत्रियोंको! और धिक्कार है उनके अमर्षशील स्वभावको!! ।। १—३ ½ ।।

पार्थाः सर्वे च राजानः पृथिव्यां ये धनुर्धराः ॥ ४ ॥
श्रुत्वा किमाहुः पाञ्चाल्यं तन्ममाचक्ष्व संजय ।

संजय! भूमण्डलके जो-जो धनुर्धर नरेश वहाँ उपस्थित थे, उन सबने तथा कुन्तीके पुत्रोंने धृष्टद्युम्नकी बात सुनकर उससे क्या कहा? यह मुझे बताओ ॥ ४ ½ ॥

संजय उवाच

श्रुत्वा द्रुपदपुत्रस्य ता वाचः क्रूरकर्मणः ॥ ५ ॥
तूष्णीं बभूवू राजानः सर्व एव विशाम्पते ।
अर्जुनस्तु कटाक्षेण जिह्मं विप्रेक्ष्य पार्षतम् ॥ ६ ॥
सबाष्पमतिनिःश्वस्य धिग् धिगित्येव चाब्रवीत् ।

**संजयने कहा—**प्रजानाथ! क्रूरकर्मा द्रुपदपुत्रकी वे बातें सुनकर वहाँ बैठे हुए सभी नरेश मौन रह गये। केवल अर्जुन टेढ़ी नजरोंसे उसकी ओर देखकर आँसू बहाते हुए दीर्घ

निःश्वास ले इतना ही बोले कि—'धिक्कार है! धिक्कार है!!' ।। ५-६½ ।।
युधिष्ठिरश्च भीमश्च यमौ कृष्णस्तथापरे ।। ७ ।।
आसन् सुव्रीडिता राजन् सात्यकिस्त्वब्रवीदिदम् ।
राजन्! उस समय युधिष्ठिर, भीमसेन, नकुल, सहदेव, भगवान् श्रीकृष्ण तथा अन्य लोग भी अत्यन्त लज्जित हो चुप ही बैठे रहे, परंतु सात्यकि इस प्रकार बोल उठे— ।। ७½ ।।

नेहास्ति पुरुषः कश्चिद् य इमं पापपूरुषम् ।। ८ ।।
भाषमाणमकल्याणं शीघ्रं हन्यान्नराधमम् ।
'क्या यहाँ कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो इस प्रकार अभद्रतापूर्ण वचन बोलनेवाले इस पापी नराधमको शीघ्र ही मार डाले ।। ८½ ।।

एते त्वां पाण्डवाः सर्वे कुत्सयन्ति विकुत्सया ।। ९ ।।
कर्मणा तेन पापेन श्वपाकं ब्राह्मणा इव ।
'धृष्टद्युम्न! जैसे ब्राह्मण चाण्डालकी निन्दा करते हैं, उसी प्रकार ये समस्त पाण्डव उस पाप कर्मके कारण अत्यन्त घृणा प्रकट करते हुए तेरी निन्दा कर रहे हैं ।। ९½ ।।

एतत् कृत्वा महत् पापं निन्दितः सर्वसाधुभिः ।। १० ।।
न लज्जसे कथं वक्तुं समितिं प्राप्य शोभनाम् ।
कथं च शतधा जिह्वा न ते मूर्धा च दीर्यते ।। ११ ।।
गुरुमाक्रोशतः क्षुद्र न चाधर्मेण पात्यसे ।
'यह महान् पाप करके तू समस्त श्रेष्ठ पुरुषोंकी दृष्टिमें निन्दाका पात्र बन गया है। साधु पुरुषोंकी इस सुन्दर सभामें पहुँचकर ऐसी बातें करते हुए तुझे लज्जा कैसे नहीं आती? तेरी जीभके सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते और तेरा मस्तक क्यों नहीं फट जाता? ओ नीच! गुरुकी निन्दा करते हुए तेरा इस पापसे पतन क्यों नहीं हो जाता? ।। १०-११½ ।।

वाच्यस्त्वमसि पार्थैश्च सर्वैश्चान्धकवृष्णिभिः ।। १२ ।।
यत् कर्म कलुषं कृत्वा श्लाघसे जनसंसदि ।
'तू पापकर्म करके जनसमाजमें जो इस तरह अपनी बड़ाई कर रहा है, इसके कारण तू कुन्तीके सभी पुत्रों तथा अन्धक और वृष्णिवंशके यादवोंद्वारा निन्दाके योग्य हो गया है ।। १२½ ।।

अकार्यं तादृशं कृत्वा पुनरेव गुरुं क्षिपन् ।। १३ ।।
वध्यस्त्वं न त्वयार्थोऽस्ति मुहूर्तंमपि जीवता ।
'वैसा पापकर्म करके तू पुनः गुरुपर आक्षेप कर रहा है; अतः तू वध करनेके ही योग्य है। एक मुहूर्त भी तेरे जीवित रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है ।। १३½ ।।

कस्त्वेतद् व्यवसेदार्यस्त्वदन्यः पुरुषाधम ।। १४ ।।

निगृह्य केशेषु वधं गुरोर्धर्मात्मनः सतः ।
‘पुरुषाधम! तेरे सिवा दूसरा कौन श्रेष्ठ पुरुष धर्मात्मा सज्जन गुरुके केश पकड़कर उनके वधका विचार भी मनमें लायेगा ॥ १४ १/२ ॥

सप्तावरे तथा पूर्वे बान्धवास्ते निमज्जिताः ॥ १५ ॥
यशसा च परित्यक्तास्त्वां प्राप्य कुलपांसनम् ।
‘तुझ-जैसे कुलांगारको पाकर तेरे सात पीढ़ी पहलेके और सात पीढ़ी आगे होनेवाले बन्धु-बान्धव नरकमें डूब गये तथा सदाके लिये सुयशसे वंचित हो गये ॥ १५ १/२ ॥

उक्तवांश्चापि यत् पार्थे भीष्मं प्रति नरर्षभम् ॥ १६ ॥
तथान्तो विहितस्तेन स्वयमेव महात्मना ।
तूने जो कुन्तीकुमार अर्जुनपर नरश्रेष्ठ भीष्मके वधका दोष लगाया है, वह भी व्यर्थ ही है; क्योंकि महात्मा भीष्मने स्वयं ही उसी प्रकार अपनी मृत्युका विधान किया था ॥ १६ १/२ ॥

तस्यापि तव सोदर्यो निहन्ता पापकृत्तमः ॥ १७ ॥
नान्यः पाञ्चाल्यपुत्रेभ्यो विद्यते भुवि पापकृत् ।
‘वास्तवमें भीष्मका वध करनेवाला भी तेरा महान् पापाचारी भाई ही है। इस पृथ्वीपर पांचालराजके पुत्रोंके सिवा दूसरा कोई ऐसा पाप करनेवाला नहीं है ॥ १७ १/२ ॥

स चापि सृष्टः पित्रा ते भीष्मस्यान्तकरः किल ॥ १८ ॥
शिखण्डी रक्षितस्तेन स च मृत्युर्महात्मनः ।
‘यह प्रसिद्ध है कि उसे भी तेरे पिताने भीष्मका अन्त करनेके लिये उत्पन्न किया था; उन्होंने महात्मा भीष्मकी मूर्तिमान् मृत्युके रूपमें ही शिखण्डीको सुरक्षित रखा था ॥ १८ १/२ ॥

पञ्चालाश्चलिता धर्मात् क्षुद्रा मित्रगुरुद्रुहः ॥ १९ ॥
त्वां प्राप्य सहसोदर्यं धिक्कृतं सर्वसाधुभिः ।
‘तू और तेरा भाई दोनों समस्त साधु पुरुषोंके धिक्कारके पात्र हैं। तुम दोनोंको पाकर सारे पांचाल धर्मभ्रष्ट, नीच, मित्रद्रोही तथा गुरुद्रोही बन गये हैं ॥

पुनश्चेदीदृशीं वाचं मत्समीपे वदिष्यसि ॥ २० ॥
शिरस्ते पोथयिष्यामि गदया वज्रकल्पया ।
‘यदि तू पुनः मेरे समीप ऐसी बात बोलेगा तो मैं अपनी इस वज्रतुल्य गदासे तेरा सिर कुचल दूँगा ॥

त्वां च ब्रह्महणं दृष्ट्वा जनः सूर्यमवेक्षते ॥ २१ ॥
ब्रह्महत्या हि ते पापं प्रायश्चित्तार्थमात्मनः ।

‘तुझे ब्रह्महत्याका पाप लगा है। तुझ ब्रह्महत्यारेको देखकर लोग अपने प्रायश्चित्तके लिये सूर्यदेवका दर्शन करते हैं।। २१ ½ ।।
पाञ्चालक सुदुर्वृत्त ममैव गुरुमग्रतः ।। २२ ।।
गुरोर्गुरुं च भूयोऽपि क्षिपन्नैव हि लज्जसे ।
‘दुराचारी पांचाल! तू मेरे आगे मेरे ही गुरु तथा मेरे गुरुके भी गुरुपर बारंबार आक्षेप कर रहा है, तो भी तुझे लज्जा नहीं आती।। २२ ½ ।।
तिष्ठ तिष्ठ सहस्वैकं गदापातमिमं मम ।। २३ ।।
तव चापि सहिष्येऽहं गदापाताननेकशः ।
‘खड़ा रह, खड़ा रह', मेरी गदाकी यह एक ही चोट सह ले, फिर मैं तेरी गदाकी भी अनेक चोटें सहन करूँगा’ ।। २३ ½ ।।
सात्वतेनैवमाक्षिप्तः पार्षतः परुषाक्षरम् ।। २४ ।।
संरब्धं सात्यकिं प्राह संक्रुद्धः प्रहसन्निव ।
सात्वतवंशी सात्यकिके इस प्रकार कठोर वचन कहकर आक्षेप करनेपर धृष्टद्युम्न अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर वे भी क्रोधमें भरे हुए सात्यकिसे हँसते हुए-से बोले।।

धृष्टद्युम्न उवाच

श्रूयते श्रूयते चेति क्षम्यते चेति माधव ।। २५ ।।
सदानार्योऽशुभः साधुं पुरुषं क्षेप्तुमिच्छति ।
धृष्टद्युम्नने कहा—माधव! मैं तेरी यह बात सुनता हूँ, सुनता हूँ और इसके लिये तुझे क्षमा भी करता हूँ। दुष्ट और अनार्य पुरुष सदा साधु जनोंपर ऐसे ही आक्षेप करनेकी इच्छा रखते हैं।। २५ ½ ।।
क्षमा प्रशस्यते लोके न तु पापोऽर्हति क्षमाम् ।। २६ ।।
क्षमावन्तं हि पापात्मा जितोऽयमिति मन्यते ।
यद्यपि लोकमें क्षमाभावकी प्रशंसा की जाती है, तथापि पापात्मा मनुष्य कभी क्षमाके योग्य नहीं है; क्योंकि क्षमा कर देनेपर वह पापात्मा क्षमाशील पुरुषको ऐसा समझ लेता है कि ‘यह मुझसे हार गया’ ।। २६ ½ ।।
स त्वं क्षुद्रसमाचारो नीचात्मा पापनिश्चयः ।। २७ ।।
आकेशाग्रान्नखाग्राच्च वक्तव्यो वक्तुमिच्छसि ।
तू स्वयं ही दुराचारी, नीच और पापपूर्ण विचार रखनेवाला है। नखसे शिखातक पापमें डूबा होनेके कारण निन्दाके योग्य है, तथापि दूसरोंकी निन्दा करना चाहता है ।। २७ ½ ।।
यः स भूरिश्रवाश्छिन्नभुजः प्रायगतस्त्वया ।। २८ ।।
वार्यमाणेण हि हतस्ततः पापतरं नु किम् ।

भूरिश्रवाकी बाँह काट डाली गयी थी। वे आमरण उपवासका नियम लेकर चुपचाप बैठे हुए थे। उस दशामें सबके मना करनेपर भी जो तूने उनका वध किया, इससे बढ़कर महान् पापकर्म और क्या हो सकता है? ।। २८१/२ ।।

गाहमानो मया द्रोणो दिव्यैनास्त्रेण संयुगे ।। २९ ।।
विसृष्टशस्त्रो निहतः किं तत्र क्रूर दुष्कृतम् ।
ओ क्रूर! मैंने तो पहलेसे ही युद्धके मैदानमें दिव्यास्त्रद्वारा द्रोणाचार्यको मथ डाला था। फिर वे हथियार डालकर मारे गये, तो उसमें मैंने कौन-सा पाप कर डाला ।। २९१/२ ।।

अयुध्यमानं यस्त्वाजौ तथा प्रायगतं मुनिम् ।। ३० ।।
छिन्नबाहुं परैर्हन्यात् सात्यके स कथं वदेत् ।
सात्यके! जो युद्धस्थलमें मुनिवृत्तिका आश्रय ले आमरण उपवासका निश्चय लेकर बैठ गया हो, जो अपने साथ युद्ध न कर रहा हो तथा जिसकी बाँह भी शत्रुओंन्द्वारा काट डाली गयी हो, ऐसे पुरुषको जो मार सकता है, वह दूसरेकी निन्दा कैसे कर सकता है? ।।

निहत्य त्वां पदा भूमौ स विकर्षति वीर्यवान् ।। ३१ ।।
किं तदा न निहंस्येनं भूत्वा पुरुषसत्तमः ।
जिस समय पराक्रमी भूरिश्रवा तुझे लातसे मारकर धरतीपर घसीट रहे थे, तू बड़ा श्रेष्ठ पुरुष था, तो उसी समय उन्हें क्यों नहीं मार डाला? ।। ३११/२ ।।

त्वया पुनरनाय्येण पूर्वं पार्थेन निर्जितः ।। ३२ ।।
यदा तदा हतः शूरः सौमदत्तिः प्रतापवान् ।
जब अर्जुनने पहले ही प्रतापी शूरवीर सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाको परास्त कर दिया, उस समय तूने उनका वध किया। तू कितना नीच है? ।। ३२१/२ ।।

यत्र यत्र तु पाण्डूनां द्रोणो द्रावयते चमूम् ।। ३३ ।।
किरन् शरसहस्राणि तत्र तत्र प्रयाक्यहम् ।
द्रोणाचार्य जहाँ-जहाँ पाण्डव-सेनाको खदेड़ते थे, वहीं-वहीं मैं जा पहुँचता और सहस्रों बाणोंकी वर्षा करके उनके छक्के छुड़ा देता था ।। ३३१/२ ।।

स त्वमेवंविधं कृत्वा कर्म चाण्डालवत् स्वयम् ।। ३४ ।।
वक्तुमर्हसि वक्तव्यः कस्मात् त्वं परुषाण्यथ ।
जब तू स्वयं ही चाण्डालके समान ऐसा पाप-कर्म करके निन्दाका पात्र बन गया है, तब दूसरेको कटु वचन सुनानेका कैसे अधिकारी हो सकता है? ।। ३४१/२ ।।

कर्ता त्वं कर्मणो ह्यस्य नाहं वृष्णिकुलाधम ।। ३५ ।।
पापानां च त्वमावासः कर्मणां मा पुनर्वद ।
वृष्णिकुलकलंक! तू ही ऐसे-ऐसे पाप करनेवाला और पाप-कर्मोंका भण्डार है, मैं नहीं। अतः फिर ऐसी बातें मुँहसे न निकालना ।। ३५१/२ ।।

जोषमास्स्व न मां भूयो वक्तुमर्हस्यतः परम् ।। ३६ ।।
अधरोत्तरमेतद्धि यन्मां त्वं वक्तुमर्हसि ।
चुपचाप बैठा रह; अब फिर ऐसी बातें तुझे नहीं कहनी चाहिये। तू मुझसे जो कुछ कहना चाहता है, वह तेरी बड़ी भारी नीचता है ।। ३६१/२ ।।

अथ वक्ष्यसि मां मौर्ख्याद् भूयः परुषमीदृशम् ।। ३७ ।।
गमयिष्यामि बाणैस्त्वां युधि वैवस्वतक्षयम् ।
यदि मूर्खतावश तू पुनः मुझसे ऐसी कठोर बातें कहेगा, तो युद्धमें बाणोंद्वारा मैं अभी तुझे यमलोक भेज दूँगा ।।

न चैवं मूर्ख धर्मेण केवलेनैव शक्यते ।। ३८ ।।
तेषामपि ह्यधर्मेण चेष्टितं शृणु यादृशम् ।
ओ मूर्ख! केवल धर्मसे ही युद्ध नहीं जीता जा सकता। उन कौरवोंकी भी जो अधर्मपूर्ण चेष्टाएँ हुई हैं, उन्हें सुन ले ।। ३८१/२ ।।

वञ्चितः पाण्डवः पूर्वमधर्मेण युधिष्ठिरः ।। ३९ ।।
द्रौपदी च परिक्लिष्टा तथाधर्मेण सात्यके ।
सात्यके! सबसे पहले पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको अधर्मपूर्वक छला गया। फिर अधर्मसे ही द्रौपदीको अपमानित किया गया ।। ३९१/२ ।।

प्रव्राजिता वनं सर्वे पाण्डवाः सह कृष्णया ।। ४० ।।
सर्वस्वमपकृष्टं च तथाधर्मेण बालिश ।
ओ मूर्ख! समस्त पाण्डवोंको जो द्रौपदीके साथ वनमें भेज दिया गया और उनका सर्वस्व छीन लिया गया, वह भी अधर्मका ही कार्य था ।। ४०१/२ ।।

अधर्मेणापकृष्टश्च मद्राजः परैारितः ।। ४१ ।।
अधर्मेण तथा बालः सौभद्रो विनिपातितः ।
शत्रुओंने अधर्मसे ही छलकर मद्राज शल्यको अपने पक्षमें खींच लिया और सुभद्राके बालक पुत्र अभिमन्युको भी अधर्मसे ही मार डाला था ।। ४११/२ ।।

इतोऽप्यधर्मेण हतो भीष्मः परपुरंजयः ।। ४२ ।।
भूरिश्रवा ह्यधर्मेण त्वया धर्मविदा हतः ।
इस पक्षसे भी अधर्मके द्वारा ही शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीष्म मारे गये हैं और तू बड़ा धर्मज्ञ बनता है पर तूने भी अधर्मसे ही भूरिश्रवाका वध किया है ।।

एवं परैराचरितं पाण्डवेयैश्च संयुगे ।। ४३ ।।
रक्षमाणैर्जयं वीरैर्धर्मज्ञैरपि सात्वत ।

सात्वत! इस प्रकार धर्मके जाननेवाले वीर पाण्डवों तथा शत्रुओंने भी युद्धके मैदानमें अपनी विजयको सुरक्षित रखनेके लिये समय-समयपर अधर्मपूर्ण बर्ताव किया है ॥ ४३ १/२ ॥

दुर्ज्ञेयः स परो धर्मस्तथाधर्मश्च दुर्विदः ॥ ४४ ॥
युध्यस्व कौरवैः सार्धं मा गा पितृनिवेशनम् ।
उत्तम धर्मका स्वरूप जानना अत्यन्त कठिन है। अधर्म क्या है? इसे समझना भी सरल नहीं है। अब तू कौरवोंके साथ पूर्ववत् युद्ध कर। मुझसे विवाद करके पितृलोकमें जानेकी तैयारी न कर ॥ ४४ १/२ ॥

संजय उवाच

एवमादीनि वाक्यानि क्रूराणि परुषाणि च ॥ ४५ ॥
श्रावितः सात्यकिः श्रीमानाकम्पित इवाभवत् ।
तच्छ्रुत्वा क्रोधताम्राक्षः सात्यकिस्त्वाददे गदाम् ॥ ४६ ॥
विनिःश्वस्य यथा सर्पः प्रणिधाय रथे धनुः ।
ततोऽभिपत्य पाञ्चाल्यं संरम्भेणेदमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
न त्वां वक्ष्यामि परुषं हनिष्ये त्वां वधक्षमम् ।
संजय कहते हैं—राजन्! इस प्रकार कितने ही क्रूर एवं कठोर वचन धृष्टद्युम्नने श्रीमान् सात्यकिको सुनाये। उन्हें सुनकर वे क्रोधसे काँपने लगे। उनकी आँखें लाल हो गयीं तथा उन्होंने सर्पके समान लंबी साँस खींचकर धनुषको तो रथपर रख दिया और हाथमें गदा उठा ली। फिर वे धृष्टद्युम्नके पास पहुँचकर बड़े रोषके साथ इस प्रकार बोले—'अब मैं तुझसे कठोर वचन नहीं कहूँगा। तू वधके ही योग्य है, अतः तुझे मार ही डालूँगा ॥ ४५—४७ १/२ ॥

तमापतन्तं सहसा महाबलममर्षणम् ॥ ४८ ॥
पाञ्चाल्यायाभिसंक्रुद्धमन्तकायान्तकोपमम् ।
चोदितो वासुदेवेन भीमसेनो महाबलः ॥ ४९ ॥
अवप्लुत्य रथात् तूर्णं बाहुभ्यां समवारयत् ।
महाबली, अमर्षशील एवं अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए यमराज-तुल्य सात्यकि जब सहसा कालस्वरूप धृष्टद्युम्नकी ओर बढ़े, तब भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महाबली भीमसेनने तुरंत ही रथसे कूदकर उन्हें दोनों हाथोंसे रोक लिया ॥ ४८-४९ १/२ ॥

द्रवमाणं तथा क्रुद्धं सात्यकिं पाण्डवो बली ॥ ५० ॥
प्रस्पन्दमानमादाय जगाम बलिनं बलात् ।
क्रोधपूर्वक आगे बढ़ते और झपटते हुए बलवान् सात्यकिको महाबली पाण्डुपुत्र भीमने थामकर साथ-साथ चलना आरम्भ किया ॥ ५० १/२ ॥

स्थित्वा विष्टभ्य चरणौ भीमेन शिनिपुङ्गवः ॥ ५१ ॥
निगृहीतः पदे षष्ठे बलेन बलिनां वरः ।
फिर भीमने खड़े होकर अपने दोनों पैर जमा दिये और बलवानोंमें श्रेष्ठ शिनिप्रवर सात्यकिको छठे कदमपर बलपूर्वक काबूमें कर लिया ॥ ५१ १/२ ॥

अवरुह्य रथात् तूर्णं ध्रियमाणं बलीयसा ॥ ५२ ॥
उवाच श्लक्ष्णया वाचा सहदेवो विशाम्पते ।
प्रजानाथ! इतनेहीमें सहदेव भी तुरंत ही रथसे उतर पड़े और महाबली भीमसेनके द्वारा पकड़े गये सात्यकिसे मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले— ॥ ५२ १/२ ॥

अस्माकं पुरुषव्याघ्र मित्रमन्यन्न विद्यते ॥ ५३ ॥
परमन्धकवृष्णिभ्यः पञ्चालेभ्यश्च मारिष ।
तथैवान्धकवृष्णीनां तथैव च विशेषतः ॥ ५४ ॥
कृष्णस्य च तथास्मत्तो मित्रमन्यन्न विद्यते ।
‘माननीय पुरुषसिंह! अन्धक और वृष्णिवंशके यादवों तथा पांचालोंसे बढ़कर दूसरा कोई हमलोगोंका मित्र नहीं है। इसी प्रकार अन्धक और वृष्णिवंशके लोगोंका तथा विशेषतः श्रीकृष्णका हमलोगोंसे बढ़कर दूसरा कोई मित्र नहीं है ॥ ५३-५४ १/२ ॥

पञ्चालानां च वार्ष्णेय समुद्रान्तां विचिन्वताम् ॥ ५५ ॥
नान्यदस्ति परं मित्रं यथा पाण्डववृष्णयः ।
‘वार्ष्णेय! पांचाल लोग भी यदि समुद्रतककी सारी पृथ्वी खोज डालें, तो भी उन्हें दूसरा कोई वैसा मित्र नहीं मिलेगा, जैसे उनके लिये पाण्डव और वृष्णिवंशके लोग हैं ॥ ५५ १/२ ॥

स भवानीदृशं मित्रं मन्यते च यथा भवान् ॥ ५६ ॥
भवन्तश्च यथास्माकं भवतां च तथा वयम् ।
‘आप भी हमारे ऐसे ही मित्र हैं, जैसा कि आप स्वयं भी मानते हैं। आपलोग जैसे हमारे मित्र हैं, वैसे ही हम भी आपके हैं ॥ ५६ १/२ ॥

स एवं सर्वधर्मज्ञ मित्रधर्ममनुस्मरन् ॥ ५७ ॥
नियच्छ मन्युं पाञ्चाल्यात् प्रशाम्य शिनिपुङ्गव ।
पार्षतस्य क्षम त्वं वै क्षमतां पार्षतश्च ते ॥ ५८ ॥
वयं क्षमयितारश्च किमन्यत्र शमाद् भवेत् ।
‘सब धर्मोंके ज्ञाता शिनिप्रवर! इस प्रकार मित्रधर्मका विचार करके आप धृष्टद्युम्नकी ओरसे अपने क्रोधको रोकें और शान्त हो जायँ, आप धृष्टद्युम्नके और धृष्टद्युम्न आपके अपराधको क्षमा कर लें। हमलोग केवल क्षमा-प्रार्थना करनेवाले हैं; शान्तिसे बढ़कर श्रेष्ठ वस्तु और क्या हो सकती है?’ ॥ ५७-५८ १/२ ॥

प्रशाम्यमाने शैनेये सहदेवेन मारिष ॥ ५९ ॥

पाञ्चालराजस्य सुतः प्रहसन्निदमब्रवीत् ।
माननीय नरेश! जब सहदेव सात्यकिको इस प्रकार शान्त कर रहे थे, उस समय पांचालराजके पुत्रने हँसकर इस प्रकार कहा— ॥ ५९ १/२ ॥
मुञ्च मुञ्च शिनेः पौत्रं भीम युद्धमदान्वितम् ॥ ६० ॥
आसादयतु मामेष धराधरमिवानिलः ।
यावदस्य शितैर्बाणैः संरम्भं विनयाम्यहम् ॥ ६१ ॥
युद्धश्रद्धां च कौन्तेय जीवितं चास्य संयुगे ।
‘भीमसेन! शिनिके इस पौत्रको अपने युद्ध-कौशलपर बड़ा घमंड है। तुम इसे छोड़ दो, छोड़ दो। जैसे हवा पर्वतसे आकर टकराती है, उसी प्रकार यह मुझसे आकर भिड़े तो सही। कुन्तीनन्दन! मैं अभी तीखे बाणोंसे इसका क्रोध उतार देता हूँ। साथ ही इसका युद्धका हौसला और जीवन भी समाप्त किये देता हूँ ॥ ६०-६१ १/२ ॥
किं नु शक्यं मया कर्तुं कार्यं यदिदमुद्यतम् ॥ ६२ ॥
सुमहत् पाण्डुपुत्राणामायान्त्येते हि कौरवाः ।
‘परंतु मैं इस समय क्या कर सकता हूँ। पाण्डवोंका यह दूसरा ही महान् कार्य उपस्थित हो गया। ये कौरव बढ़े चले आ रहे हैं ॥ ६२ १/२ ॥
अथवा फाल्गुनः सर्वान् वारयिष्यति संयुगे ॥ ६३ ॥
अहमप्यस्य मूर्धानं पातयिष्यामि सायकैः ।
मन्यते छिन्नबाहुं मां भूरिश्रवसमाहवे ॥ ६४ ॥
उत्सृजैनमहं चैनमेष वा मां हनिष्यति ।
‘अथवा केवल अर्जुन युद्धके मैदानमें इन समस्त कौरवोंको रोकेंगे, तबतक मैं भी अपने बाणोंद्वारा इस सात्यकिका मस्तक काट गिराऊँगा। यह मुझे भी रणभूमिमें कटी हुई बाँहवाला भूरिश्रवा समझता है। तुम छोड़ दो इसे। या तो मैं इसे मार डालूँगा या यह मुझे’ ॥
शृण्वन् पाञ्चालवाक्यानि सात्यकिः सर्पवच्छ्वसन् ॥ ६५ ॥
भीमबाह्वन्तरे सक्तो विस्फुरत्यनिशं बली ।
भीमसेनकी भुजाओंमें फँसे हुए बलवान् सात्यकि धृष्टद्युम्नकी बातें सुनकर फुफकारते हुए सर्पके समान लंबी साँस खींचते हुए निरन्तर छूटनेकी चेष्टा कर रहे थे ॥ ६५ १/२ ॥
तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ बाहुशालिनौ ॥ ६६ ॥
त्वरया वासुदेवश्च धर्मराजश्च मारिष ।
यत्नेन महता वीरौ वारयामासतुस्ततः ॥ ६७ ॥
अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले वे दोनों वीर दो साँड़ोंके समान गरज रहे थे। माननीय नरेश! उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरने शीघ्रतापूर्वक महान् प्रयत्न करके उन दोनों वीरोंको रोका ॥ ६६-६७ ॥

निवार्य परमेष्वासौ कोपसंरक्तलोचनौ ।
युयुत्सुनपरान् संख्ये प्रतीयुः क्षत्रियर्षभाः ॥ ६८ ॥
क्रोधसे लाल आँखें किये उन दोनों महान् धनुर्धरोंको रोककर वे क्षत्रियशिरोमणि वीर समरभूमिमें युद्धकी इच्छासे आते हुए शत्रुओंका सामना करनेके लिये चल दिये ॥ ६८ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि धृष्टद्युम्नसात्यकि-
क्रोधेऽष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें धृष्टद्युम्न और सात्यकिका क्रोधविषयक एक सौ अठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९८ ॥