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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

१२४-

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चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

कौरव-पाण्डव-सेनाका घोर युद्ध तथा पाण्डवोंके साथ दुर्योधनका संग्राम

धृतराष्ट्र उवाच

किं तस्यां मम सेनायां नासन् केचिन्महारथाः ।
ये तथा सात्यकिं यान्तं नैवाघ्नन् नाप्यवारयम् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! क्या मेरी उस सेनामें कोई भी महारथी वीर नहीं थे, जिन्होंने जाते हुए सात्यकिको न तो मारा और न उन्हें रोका ही ॥ १ ॥

एको हि समरे कर्म कृतवान् सत्यविक्रमः ।
शक्रतुल्यबलो युद्धे महेन्द्रो दानवेष्विव ॥ २ ॥
जैसे देवराज इन्द्र दानवोंके साथ युद्धमें पराक्रम दिखाते हैं, उसी प्रकार इन्द्रतुल्य बलशाली सत्यपराक्रमी सात्यकिने समरांगणमें अकेले ही महान् कर्म किया ॥ २ ॥

अथवा शून्यमासीत् तत् येन यातः स सात्यकिः ।
हतभूयिष्ठमथवा येन यातः स सात्यकिः ॥ ३ ॥
अथवा जिस मार्गसे सात्यकि आगे बढ़े थे, वह वीरोंसे शून्य तो नहीं हो गया था या वहाँके अधिकांश सैनिक मारे तो नहीं गये थे ॥ ३ ॥

यत् कृतं वृष्णिवीरेण कर्म शंससि मे रणे ।
नैतदुत्सहते कर्तुं कर्म शक्रोऽपि संजय ॥ ४ ॥
संजय! तुम रणक्षेत्रमें वृष्णिवंशी वीर सात्यकिके द्वारा किये हुए जिस कर्मकी प्रशंसा कर रहे हो, वह कर्म देवराज इन्द्र भी नहीं कर सकते ॥ ४ ॥

अश्रद्धेयमचिन्त्यं च कर्म तस्य महात्मनः ।
वृष्ण्यन्धकप्रवीरस्य श्रुत्वा मे व्यथितं मनः ॥ ५ ॥
वृष्णि और अंधक वंशके प्रमुख वीर महामना सात्यकिका वह कर्म अचिन्त्य (सम्भावनासे परे) है। उसपर सहसा विश्वास नहीं किया जा सकता। उसे सुनकर मेरा मन व्यथित हो उठा है ॥ ५ ॥

न सन्ति तस्मात् पुत्रा मे यथा संजय भाषसे ।
एको वै बहुलाः सेनाः प्रामृद्नत् सत्यविक्रमः ॥ ६ ॥
संजय! जैसा कि तुम बता रहे हो, यदि एक ही सत्यपराक्रमी सात्यकिने मेरी बहुत-सी सेनाओंको धूलमें मिला दिया है, तब तो मुझे यह मान लेना चाहिये कि अब मेरे पुत्र जीवित नहीं हैं ॥ ६ ॥

कथं च युध्यमानानामपक्रान्तो महात्मनाम् ।
एको बहूनां शैनेयस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ७ ॥
संजय! जब बहुत-से महामनस्वी वीर युद्ध कर रहे थे, उस समय अकेले सात्यकि उन्हें पराजित करके कैसे आगे बढ़ गये, यह सब मुझे बताओ ॥ ७ ॥

संजय उवाच

राजन् सेनासमुद्योगो रथनागाश्वपत्तिमान् ।
तुमुलस्तव सैन्यानां युगान्तसदृशोऽभवत् ॥ ८ ॥
संजयने कहा—राजन्! रथ, हाथी, घोड़े और पैदलोंसे भरा हुआ आपका सेनासम्बन्धी उद्योग महान् था। आपके सैनिकोंका समाहार प्रलयकालके समान भयंकर जान पड़ता था ॥ ८ ॥

आहूतेषु समूहेषु तव सैन्यस्य मानद ।
नाभूल्लोके समः कश्चित् समूह इति मे मतिः ॥ ९ ॥
मानद! जब आपकी सेनाके भिन्न-भिन्न समूह सब ओरसे बुलाये गये, उस समय जो महान् समुदाय एकत्र हुआ, उसके समान इस संसारमें दूसरा कोई समूह नहीं था, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ९ ॥

तत्र देवास्त्वभाषन्त चारणाश्च समागताः ।
एतदन्ताः समूहा वै भविष्यन्ति महीतले ॥ १० ॥
वहाँ आये हुए देवता तथा चारण ऐसा कहते थे कि इस भूतपर सारे समूहोंकी अन्तिम सीमा यही होगी ॥

न च वै तादृशो व्यूह आसीत् कश्चिद् विशाम्पते ।
यादृग् जयद्रथवधे द्रोणेन विहितोऽभवत् ॥ ११ ॥
प्रजानाथ! जयद्रथवधके समय द्रोणाचार्यने जैसा व्यूह बनाया था, वैसा दूसरा कोई भी व्यूह नहीं बन सका था ॥ ११ ॥

चण्डवातविभिन्नानां समुद्राणामिव स्वनः ।
रणेऽभवद् बलौघानामन्योन्यमभिधावताम् ॥ १२ ॥
प्रचण्ड वायुके थपेड़े खाकर उद्वेलित हुए समुद्रोंके जलसे जैसा भैरव गर्जन सुनायी देता है, उस रणक्षेत्रमें एक-दूसरेपर धावा करनेवाले सैन्यसमूहोंका कोलाहल भी वैसा ही भयंकर था ॥ १२ ॥

पार्थिवानां समेतानां बहून्यासन् नरोत्तम ।
तद्बले पाण्डवानां च सहस्राणि शतानि च ॥ १३ ॥
नरश्रेष्ठ! आपकी और पाण्डवोंकी सेनाओंमें सब ओरसे एकत्र हुए भूमिपालोंके सैकड़ों और हजारों दल थे ॥ १३ ॥

संरब्धानां प्रवीराणां समरे दृढकर्मणाम् ।
तत्रासीत् सुमहाशब्दस्तुमुलो लोमहर्षणः ॥ १४ ॥
वे सभी प्रमुख वीर रोषावेशसे परिपूर्ण हो समरभूमिमें सुदृढ़ पराक्रम कर दिखानेवाले थे। वहाँ उन सबका महान् एवं तुमुल कोलाहल रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ १४ ॥
(पाण्डवानां कुरूणां च गर्जतामितरेतरम् ।
क्ष्वेडाः किलकिलाशब्दास्तत्रासन् वै सहस्रशः ॥
एक-दूसरेके प्रति गर्जना करनेवाले पाण्डवों तथा कौरवोंके सिंहनाद और किलकिलाहटके शब्द वहाँ सहस्रों बार प्रकट होते थे।
भेरीशब्दाश्च तुमुला बाणशब्दाश्च भारत ।
अन्योन्यं निघ्नतां चैव नराणां शुश्रुवे स्वनः ॥)
भरतनन्दन! वहाँ नगाड़ोंकी भयानक गड़गड़ाहट, बाणोंकी सनसनाहट तथा परस्पर प्रहार करनेवाले मनुष्योंकी गर्जनाके शब्द बड़े जोरसे सुनायी दे रहे थे।
अथाक्रन्दद् भीमसेनो धृष्टद्युम्नश्च मारिष ।
नकुलः सहदेवश्च धर्मराजश्च पाण्डवः ॥ १५ ॥
माननीय नरेश! तदनन्तर भीमसेन, धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव तथा पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिरने अपने सैनिकोंसे पुकारकर कहा— ॥ १५ ॥
आगच्छत प्रहरत द्रुतं विपरिधावत ।
प्रविष्टावरिसेनां हि वीरौ माधवपाण्डवौ ॥ १६ ॥
‘वीरो! आओ, शत्रुओंपर प्रहार करो। बड़े वेगसे इनपर टूट पड़ो; क्योंकि वीर सात्यकि और अर्जुन शत्रुओंकी सेनामें घुस गये हैं ॥ १६ ॥
यथा सुखेन गच्छेतां जयद्रथवधं प्रति ।
तथा प्रकरुत क्षिप्रमिति सैन्यान्यचोदयन् ॥ १७ ॥
‘वे दोनों जयद्रथका वध करनेके लिये जैसे सुखपूर्वक आगे जा सकें, उसी प्रकार शीघ्रतापूर्वक प्रयत्न करो।' इस तरह उन्होंने सारी सेनाओंको आदेश दिया ॥ १७ ॥
तयोरभावे कुरवः कृतार्थाः स्युर्वयं जिताः ।
ते यूयं सहिता भूत्वा तूर्णमेव बलार्णवम् ॥ १८ ॥
क्षोभयध्वं महावेगाः पवनः सागरं यथा ।
(इसके बाद उन्होंने फिर कहा—) 'सात्यकि और अर्जुनके न होनेपर ये कौरव तो कृतार्थ हो जायँगे और हम पराजित होंगे। अतः तुम सब लोग एक साथ मिलकर महान् वेगका आश्रय ले तुरंत ही इस सैन्य-समुद्रमें हलचल मचा दो। ठीक वैसे ही जैसे प्रचण्ड वायु महासागरको विक्षुब्ध कर देती है' ॥ १८ १/२ ॥
भीमसेनेन ते राजन् पाञ्चाल्येन च नोदिताः ॥ १९ ॥
आजघ्नुः कौरवान् संख्ये त्यक्त्वासूनात्मनः प्रियान् ।

राजन्! भीमसेन तथा धृष्टद्युम्नके द्वारा इस प्रकार प्रेरित हुए पाण्डव-सैनिकोंने अपने प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर युद्धस्थलमें कौरवयोद्धाओंका संहार आरम्भ कर दिया ॥ १९ १/२ ॥

इच्छन्तो निधनं युद्धे शस्त्रैरुत्तमतेजसः ॥ २० ॥
स्वर्गेप्सवो मित्रकार्ये नाभ्यनन्दन्त जीवितम् ।
वे उत्तम तेजवाले नरेश स्वर्गलोक प्राप्त करना चाहते थे। अतः उन्हें युद्धमें शस्त्रोंद्वारा मृत्यु आनेकी अभिलाषा थी। इसीलिये उन्होंने मित्रका कार्य सिद्ध करनेके प्रयत्नमें अपने प्राणोंकी परवा नहीं की ॥ २० १/२ ॥

तथैव तावका राजन् प्रार्थयन्तो महत् यशः ॥ २१ ॥
आर्या युद्धे मतिं कृत्वा युद्धायैवावतस्थिरे ।
राजन्! इसी प्रकार आपके सैनिक भी महान् सुयश प्राप्त करना चाहते थे। अतः वे युद्धविषयक श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय ले वहाँ युद्धके लिये ही डँटे रहे ॥ २१ १/२ ॥

तस्मिन् सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयावहे ॥ २२ ॥
जित्वा सर्वाणि सैन्यानि प्रायात् सात्यकिरर्जुनम् ।
जिस समय वह अत्यन्त भयंकर घमासान युद्ध चल रहा था, उसी समय सात्यकि आपकी सारी सेनाओंको जीतकर अर्जुनकी ओर बढ़ चले ॥ २२ १/२ ॥

कवचानां प्रभास्तत्र सूर्यरश्मिविराजिताः ॥ २३ ॥
दृष्टीः संख्ये सैनिकानां प्रतिजघ्नुः समन्ततः ।
वहाँ वीरोंके सुवर्णमय कवचोंकी प्रभाएँ सूर्यकी किरणोंसे उद्भासित हो युद्धस्थलमें सब ओर खड़े हुए सैनिकोंके नेत्रोंमें चकाचौंध पैदा कर रही थीं ॥ २३ १/२ ॥

तथा प्रयतमानानां पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ २४ ॥
दुर्योधनो महाराज व्यगाहत महत् बलम् ।
महाराज! इस प्रकार विजयके लिये प्रयत्नशील हुए महामनस्वी पाण्डवोंकी उस विशाल वाहिनीमें राजा दुर्योधनने प्रवेश किया ॥ २४ १/२ ॥

स संनिपातस्तुमुलस्तेषां तस्य च भारत ॥ २५ ॥
अभवत् सर्वभूतानामभावकरणो महान् ।
भारत! पाण्डव-सैनिकों तथा दुर्योधनका वह भयंकर संग्राम समस्त प्राणियोंके लिये महान् संहारकारी सिद्ध हुआ ॥ २५ १/२ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

तथा यातेषु सैन्येषु तथा कृच्छ्रगतः स्वयम् ॥ २६ ॥
कच्चिद् दुर्योधनः सूत नाकार्षीत् पृष्ठतो रणम् ।

**धृतराष्ट्रने पूछा—**सूत! जब इस प्रकार सारी सेनाएँ भाग रही थीं, उस समय स्वयं भी वैसे संकटमें पड़े हुए दुर्योधनने क्या उस युद्धमें पीठ नहीं दिखायी? ।। २६१/२ ।।
एकस्य च बहूनां च संनिपातों महाहवे ।। २७ ।।
विशेषतो नरपतेर्विषमः प्रतिभाति मे ।
उस महासमरमें बहुत-से योद्धाओंके साथ किसी एक वीरका विशेषतः राजा दुर्योधनका युद्ध करना तो मुझे विषम (अयोग्य) प्रतीत हो रहा है ।। २७१/२ ।।
सोऽत्यन्तसुखसंवृद्धो लक्ष्म्या लोकस्य चेश्वरः ।। २८ ।।
एको बहून् समासाद्य कच्चिन्नासीत् पराङ्मुखः ।
अत्यन्त सुखमें पला हुआ, इस लोक तथा राजलक्ष्मीका स्वामी अकेला दुर्योधन बहुसंख्यक योद्धाओंके साथ युद्ध करके रणभूमिसे विमुख तो नहीं हुआ? ।।

संजय उवाच

राजन् संग्राममाश्चर्यं तव पुत्रस्य भारत ।। २९ ।।
एकस्य बहुभिः सार्धं शृणुष्व गदतो मम ।
**संजयने कहा—**भरतवंशी नरेश! आपके एकमात्र पुत्र दुर्योधनका शत्रुपक्षके बहुसंख्यक योद्धाओंके साथ जो आश्चर्यजनक संग्राम हुआ था, उसे मैं बताता हूँ, सुनिये ।। २९१/२ ।।
दुर्योधनेन समरे पृतना पाण्डवी रणे ।। ३० ।।
नलिनी द्विरदेनेव समन्तात् प्रतिलोडिता ।
दुर्योधनने समरांगणमें पाण्डव-सेनाको सब ओरसे उसी प्रकार मथ डाला, जैसे हाथी कमलोंसे भरे हुए किसी पोखरेको ।। ३०१/२ ।।
ततस्तां प्रहितां सेनां दृष्ट्वा पुत्रेण ते नृप ।। ३१ ।।
भीमसेनपुरोगास्तं पञ्चालाः समुपाद्रवन् ।
नरेश्वर! आपके पुत्रद्वारा आपकी सेनाको आगे बढ़नेके लिये प्रेरित हुई देख भीमसेनको अगुआ बनाकर पांचालयोद्धाओंने दुर्योधनपर आक्रमण कर दिया ।। ३११/२ ।।
स भीमसेनं दशभिः शरैर्विव्याध पाण्डवम् ।। ३२ ।।
त्रिभिस्त्रिभिर्यमौ वीरौ धर्मराजं च सप्तभिः ।
तब दुर्योधनने पाण्डुपुत्र भीमसेनको दस बाणोंसे, वीर नकुल और सहदेवको तीन-तीन बाणोंसे तथा धर्मराज युधिष्ठिरको सात बाणोंसे घायल कर दिया ।। ३२१/२ ।।
विराटद्रुपदौ षड्भिः शतेन च शिखण्डिनम् ।। ३३ ।।
धृष्टद्युम्नं च विंशत्या द्रौपदेयांस्त्रिभिस्त्रिभिः ।

तत्पश्चात् उसने राजा विराट और द्रुपदको छः-छः बाणोंसे बींध डाला, फिर शिखण्डीको सौ, धृष्टद्युम्नको बीस और द्रौपदीपुत्रोंको तीन-तीन बाणोंसे घायल किया ॥ ३३ ½ ॥
शतशश्चापरान् योधान् सद्विपांश्च रथान् रणे ॥ ३४ ॥
शरैरवचकर्तोग्रैः क्रुद्धोऽन्तक इव प्रजाः ।
तदनन्तर उस रणक्षेत्रमें उसने अपने भयंकर बाणोंद्वारा दूसरे-दूसरे सैकड़ों योद्धाओं, हाथियों और रथोंको उसी प्रकार काट डाला, जैसे क्रोधमें भरा हुआ यमराज समस्त प्राणियोंका विनाश करता है ॥ ३४ ½ ॥
न संदधन् विमुञ्चन् वा मण्डलीकृतकार्मुकः ॥ ३५ ॥
अदृश्यत रिपून् निघ्नन् शिक्षयास्त्रबलेन च ।
दुर्योधनने अपने धनुषको खींचकर मण्डलाकार बना दिया था। वह अपनी शिक्षा और अस्त्र-बलसे इतनी शीघ्रताके साथ बाणोंको धनुषपर रखता, चलाता तथा शत्रुओंका वध करता था कि कोई उसके इस कार्यको देख नहीं पाता था ॥ ३५ ½ ॥
तस्य तान् निघ्नतः शत्रून् हेमपृष्ठं महत् धनुः ॥ ३६ ॥
अजस्रं मण्डलीभूतं ददृशुः समरे जनाः ।
शत्रुओंके संहारमें लगे हुए दुर्योधनके सुवर्णमय पृष्ठवाले विशाल धनुषको सब लोग समरांगणमें सदा मण्डलाकार हुआ ही देखते थे ॥ ३६ ½ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा भल्लाभ्यामच्छिनद् धनुः ॥ ३७ ॥
तव पुत्रस्य कौरव्य यतमानस्य संयुगे ।
कुरुनन्दन! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने दो भल्ल मारकर युद्धमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले आपके पुत्रके धनुषको काट दिया ॥ ३७ ½ ॥
विव्याध चैनं दशभिः सम्यगस्तैः शरोत्तमैः ॥ ३८ ॥
वर्म चाशु समासाद्य ते भित्त्वा क्षितिमाविशन् ।
और उसे विधिपूर्वक चलाये हुए उत्तम दस बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। वे बाण तुरंत ही उसके कवचमें जा लगे और उसे छेदकर धरतीमें समा गये ॥
ततः प्रमुदिताः पार्थाः परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् ॥ ३९ ॥
यथा वृत्रवधे देवाः पुरा शक्रं महर्षयः ।
इससे कुन्तीकुमारोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। जैसे पूर्वकालमें वृत्रासुरका वध होनेपर सम्पूर्ण देवताओं और महर्षियोंने इन्द्रको सब ओरसे घेर लिया था, उसी प्रकार पाण्डव भी युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥
ततोऽन्यद् धनुरदाय तव पुत्रः प्रतापवान् ॥ ४० ॥
तिष्ठ तिष्ठेति राजानं ब्रुवन् पाण्डवमभ्ययात् ।

तत्पश्चात् आपके प्रतापी पुत्रने दूसरा धनुष लेकर 'खड़ा रह, खड़ा रह' ऐसा कहते हुए वहाँ पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरपर आक्रमण किया॥ ४० १/२॥
तमायान्तमभिप्रेक्ष्य तव पुत्रं महामृधे॥ ४१॥
प्रत्युद्ययुः समुदिताः पञ्चाला जयगृद्धिनः।
उस महासमरमें आपके पुत्रको आते देख विजयकी अभिलाषा रखनेवाले पांचाल सैनिक संघबद्ध हो उसका सामना करनेके लिये आगे बढ़े॥ ४१ १/२॥
तान् द्रोणः प्रतिजग्राह परीप्सन् युधि पाण्डवम्॥ ४२॥
चण्डवातोद्धुतान् मेघान् गिरिरम्बुमुचो यथा।
उस समय युद्धमें युधिष्ठिरको पकड़नेकी इच्छावाले द्रोणाचार्यने उन सब योद्धाओंको उसी प्रकार रोक दिया, जैसे प्रचण्ड वायुद्वारा उड़ाये गये जलवर्षी मेघोंको पर्वत रोक देता है॥ ४२ १/२॥
तत्र राजन् महानासीत् संग्रामो लोमहर्षणः॥ ४३॥
पाण्डवानां महाबाहो तावकानां च संयुगे।
रुद्रस्याक्रीडसदृशः संहारः सर्वदेहिनाम्॥ ४४॥
राजन्! महाबाहो! फिर तो वहाँ युद्धस्थलमें पाण्डवों तथा आपके सैनिकोंमें महान् रोमांचकारी संग्राम होने लगा। जो रुद्रकी क्रीडाभूमि (श्मशानके सदृश) सम्पूर्ण देहधारियोंके लिये संहारका स्थान बन गया था॥ ४३-४४॥
ततः शब्दो महानासीत् पुनर्येन धनंजयः।
अतीव सर्वशब्देभ्यो लोमहर्षकरः प्रभो॥ ४५॥
प्रभो! तदनन्तर जिधर अर्जुन गये थे, उसी ओर बड़े जोरका कोलाहल होने लगा, जो सम्पूर्ण शब्दोंसे ऊपर उठकर सुननेवालोंके रोंगटे खड़े किये देता था॥
अर्जुनस्य महाबाहो तावकानां च धन्विनाम्।
मध्ये भारतसैन्यस्य माधवस्य महारणे॥ ४६॥
महाबाहो! उस महासमरमें कौरवी सेनाके भीतर आपके धनुर्धरोंकी तथा अर्जुन और सात्यकिकी भीषण गर्जना सुनायी देती थी॥ ४६॥
द्रोणस्यापि परैः सार्धं व्यूहद्वारे महारणे।
एवमेष क्षयो वृत्तः पृथिव्यां पृथिवीपते।
क्रुद्धेऽर्जुने तथा द्रोणे सात्वते च महारथे॥ ४७॥
पृथिवीपते! उस महायुद्धमें व्यूहके द्वारपर शत्रुओंके साथ जूझते हुए द्रोणाचार्यका भी सिंहनाद प्रकट हो रहा था। इस प्रकार अर्जुन, द्रोणाचार्य तथा महारथी सात्यकिके कुपित होनेपर युद्धभूमिमें यह भयंकर विनाशका कार्य सम्पन्न हुआ॥ ४७॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे संकुलयुद्धे
चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका प्रवेश और दोनों सेनाओंका घमासान युद्धविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ४९ श्लोक हैं।)