महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1553)
वेदव्यासजीका अश्वत्थामाको आश्वासन
स तेन तपसा तात ब्रह्मभूतो यदाभवत् ।
ततो विश्वेश्वरं योनिं विश्वस्य जगतः पतिम् ॥ ६१ ॥
ददर्श भृशदुर्धर्षं सर्वदेवैरभिष्टुतम् ।
अणीयांसमणुभ्यश्च बृहद्भ्यश्च बृहत्तमम् ॥ ६२ ॥
तात! उस तपस्यासे जब वे साक्षात् ब्रह्मस्वरूपमें स्थित हो गये, तब उन्हें उन भगवान् विश्वेश्वरका दर्शन हुआ जो सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्ति-स्थान और जगत्के पालक हैं, जिन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन (असम्भव) है। सम्पूर्ण देवता जिनकी स्तुति करते हैं तथा जो सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और महान्से भी परम महान् हैं ॥ ६१-६२ ॥
रुद्रमीशानवृषभं हरं शम्भुं कपर्दिनम् ।
चेकितानं परां योनिं तिष्ठतो गच्छतश्च ह ॥ ६३ ॥
वे 'रु' अर्थात् दुःखको दूर करनेके कारण रुद्र कहलाते हैं। ब्रह्मा आदि लोकपालोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। पापहारी, कल्याणकी प्राप्ति करानेवाले तथा जटाजूटधारी हैं। वे ही सबको चेतना प्रदान करते हैं और वे ही स्थावर-जंगम प्राणियोंके परम कारण हैं ॥ ६३ ॥
दुर्वारणं दुर्द्दशं तिग्ममन्युं
महात्मानं सर्वहरं प्रचेतसम् ।
दिव्यं चापमिषुधी चाददानं
हिरण्यवर्म्माणमनन्तवीर्यम् ॥ ६४ ॥
उन्हें कहीं कोई रोक नहीं सकता, उनका दर्शन बड़ी कठिनाईसे होता है, वे दुष्टोंपर प्रचण्ड कोप करनेवाले हैं, उनका हृदय विशाल है, वे सारे क्लेशोंको हर लेनेवाले अथवा सर्वसंहारी हैं, साधु पुरुषोंके प्रति उनका हृदय अत्यन्त उदार है, वे दिव्य धनुष और दो तरकश धारण करते हैं, उनका कवच सोनेका बना हुआ है तथा वे अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं ॥ ६४ ॥
पिनाकिनं वज्रिणं दीप्तशूलं
परश्वधिं गदिनं चायतासिम् ।
शुभ्रं जटिलं मुसलिनं चन्द्रमौलिं
व्याघ्राजिनं परिघिणं दण्डपाणिम् ॥ ६५ ॥
वे अपने हाथोंमें पिनाक और वज्र धारण करते हैं, उनके एक हाथमें त्रिशूल चमकता रहता है, वे फरसा, गदा और लंबी तलवार लिये रहते हैं, मुसल, परिघ और दण्ड भी उनके हाथोंकी शोभा बढ़ाते हैं, उनकी अंगकान्ति उज्ज्वल है, वे मस्तकपर जटा और उसके ऊपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करते हैं, उनके श्रीअंगमें बाघम्बर शोभा देता है ॥ ६५ ॥
शुभाङ्गदं नागयज्ञोपवीतं
विश्वैर्गणैः शोभितं भूतसंघैः ।
एकीभूतं तपसां संनिधानं
वयोऽतिगैः सुष्टुतमिष्टवाग्भिः ॥ ६६ ॥
उनकी भुजाओंमें सुन्दर अंगद (बाजूबंद) और गलेमें नागमय यज्ञोपवीत शोभा पाते हैं, वे अपने पार्षदस्वरूप सम्पूर्ण भूतसमुदायोंसे सुशोभित हैं, उन्हें एकमात्र अद्वितीय परमेश्वर समझना चाहिये, वे तपस्याकी निधि हैं और वृद्ध पुरुष प्रिय वचनोंद्वारा उनकी स्तुति करते हैं ॥ ६६ ॥
जलं दिशं खं क्षितिं चन्द्रसूर्यौ
तथा वाय्वग्नी प्रमिमाणं जगच्च ।
नालं द्रष्टुं यं जना भिन्नवृत्ता
ब्रह्मद्विषघ्नममृतस्य योनिम् ॥ ६७ ॥
जल, दिशा, आकाश, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि तथा जगत्को माप लेनेवाला काल—ये सब उन्हींके स्वरूप हैं। वे ब्रह्मद्रोहियोंके नाशक और मोक्षके परम कारण हैं, दुराचारी मनुष्य उनका दर्शन पानेमें असमर्थ हैं ॥ ६७ ॥
यं पश्यन्ति ब्राह्मणाः साधुवृत्ताः
क्षीणे पापे मनसा वीतशोकाः ।
तं निष्पतन्तं तपसा धर्ममीड्यं
तद्भक्त्या वै विश्वरूपं ददर्श ।
दृष्ट्वा चैनं वाङ्मनोबुद्धिदेहः
संहृष्टात्मा मुमुदे वासुदेवः ॥ ६८ ॥
जिन्होंने मनसे शोक-संतापको सर्वथा दूर कर दिया है, वे सदाचारी ब्राह्मण पापोंका क्षय हो जानेपर जिनका दर्शन कर पाते हैं, यह सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, जो साक्षात् धर्म तथा स्तवन करनेयोग्य परमेश्वर हैं, वे ही महेश्वर वहाँ उनकी तपस्या और भक्तिके प्रभावसे प्रकट हो गये तथा तपस्वी नारायणने उनका दर्शन किया। उनका दर्शन करके मन, वाणी, बुद्धि और शरीरके साथ ही उनकी अन्तरात्मा हर्षसे खिल उठी। उन भगवान् वासुदेवने बड़े आनन्दका अनुभव किया ॥ ६८ ॥
अक्षमालापरिक्षिप्तं ज्योतिषां परमं निधिम् ।
ततो नारायणो दृष्ट्वा ववन्दे विश्वसम्भवम् ॥ ६९ ॥
रुद्राक्षकी मालासे विभूषित तथा तेजकी परम निधिरूप उन विश्व-विधाताका दर्शन करके भगवान् नारायणने उनकी वन्दना की ॥ ६९ ॥
वरदं पृथुचार्वङ्ग्या पार्वत्या सहितं प्रभुम् ।
क्रीडमानं महात्मानं भूतसङ्घगणैर्वृतम् ॥ ७० ॥
अजमीशानमव्यक्तं कारणात्मानमच्युतम् ।
वे वरदायक प्रभु हृष्ट-पुष्ट एवं मनोहर अंगोंवाली पार्वतीदेवीके साथ क्रीड़ा करते हुए पधारे थे। उन अजन्मा, ईशान, अव्यक्त, कारणस्वरूप और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले परमात्माको उनके पार्षदस्वरूप भूतगणोंने घेर रखा था ।। ७० १/२ ।।
(स्वजानुभ्यां महीं गत्वा कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम् ।)
अभिवाद्याथ रुद्राय सद्योऽन्धकनिपातिने ।
पद्माक्षस्तं विरूपाक्षमभितुष्टाव भक्तिमान् ।। ७१ ।।
कमलनयन भगवान् श्रीहरिने पृथ्वीपर दोनों घुटने टेककर और मस्तकपर हाथ जोड़कर अन्धकासुरका विनाश करनेवाले उन रुद्रदेवको प्रणाम किया और भक्तिभावसे युक्त हो उन भगवान् विरूपाक्षकी वे इस प्रकार स्तुति करने लगे ।। ७१ ।।
श्रीनारायण उवाच
त्वत्सम्भूता भूतकृतो वरेण्य
गोप्तारोऽस्य भुवनस्यादिदेव ।
आविश्येमां धरणीं येऽभ्यरक्षन्
पुरा पुराणीं तव देवसृष्टिम् ।। ७२ ।।
**श्रीनारायण बोले—**सर्वश्रेष्ठ आदिदेव! जिन्होंने इस पृथ्वीमें समाकर आपकी पुरातन दिव्य सृष्टिकी रक्षा की थी तथा जो इस विश्वकी भी रक्षा करनेवाले हैं, वे सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले प्रजापतिगण भी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं ।। ७२ ।।
सुरासुरान् नागरक्षःपिशाचान्
नरान् सुपर्णानथ गन्धर्वयक्षान् ।
पृथग्विधान् भूतसंघांश्च विश्वां-
स्त्वत्सम्भूतान् विद्म सर्वांस्तथैव ।
ऐन्द्रं याम्यं वारुणं वैत्तपाल्यं
पैत्रं त्वाष्ट्रं कर्म सौम्यं च तुभ्यम् ।। ७३ ।।
देवता, असुर, नाग, राक्षस, पिशाच, मनुष्य, गरुड़ आदि पक्षी, गन्धर्व तथा यक्ष आदि जो पृथक्-पृथक् प्राणियोंके अखिल समुदाय हैं, उन सबको हम आपसे ही उत्पन्न हुआ मानते हैं। इसी प्रकार इन्द्र, यम, वरुण और कुबेरका पद, पितरोंका लोक तथा विश्वकर्माकी सुन्दर शिल्पकला आदिका आविर्भाव भी आपसे ही हुआ है ।। ७३ ।।
रूपं ज्योतिः शब्द आकाशवायुः
स्पर्शः स्वाद्यं सलिलं गन्ध उर्वी ।
कालो ब्रह्मा ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च
त्वत्सम्भूतं स्थास्नु चरिष्णु चेदम् ।। ७४ ।।
शब्द और आकाश, स्पर्श और वायु, रूप और तेज, रस और जल तथा गन्ध और पृथ्वीकी उत्पत्ति भी आपसे ही हुई है। काल, ब्रह्मा, वेद, ब्राह्मण तथा यह सम्पूर्ण चराचर जगत् भी आपसे ही उत्पन्न हुआ है ॥ ७४ ॥
अद्भ्यः स्तोका यान्ति यथा पृथक्त्वं
ताभिश्चैक्यं संक्षये यान्ति भूयः ।
एवं विद्वान् प्रभवं चाप्ययं च
मत्वा भूतानां तव सायुज्यमेति ॥ ७५ ॥
जैसे जलसे उसकी बूँदें बिलग हो जाती हैं और क्षीण होनेपर कालक्रमसे वे पुनः जलमें मिलकर उसके साथ एकरूप हो जाती हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूत आपसे ही उत्पन्न होते और आपमें ही लीन होते हैं। ऐसा जाननेवाला विद्वान् पुरुष आपका सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ७५ ॥
दिव्यामृतौ मानसौ द्वौ सुपर्णौ
वाचा शाखाः पिप्पलाः सप्त गोपाः ।
दशाप्यन्ये ये पुरं धारयन्ति
त्वया सृष्टास्त्वं हि तेभ्यः परो हि ॥ ७६ ॥
अन्तःकरणमें निवास करनेवाले दो दिव्य एवं अमृतस्वरूप पक्षी (ईश्वर और जीव) हैं। सात धातुरूप सात पीपल हैं, जो उनकी रक्षा करनेवाले हैं। वेदवाणी ही उन वृक्षोंकी विविध शाखाएँ हैं। दूसरी भी दस वस्तुएँ (इन्द्रियाँ) हैं, जो पांचभौतिक शरीररूपी नगरको धारण करती हैं। ये सारे पदार्थ आपके ही रचे हुए हैं, तथापि आप इन सबसे परे हैं ॥ ७६ ॥
भूतं भव्यं भविता चाप्यधृष्यं
त्वत्सम्भूता भुवनानीह विश्वा ।
भक्तं च मां भजमानं भजस्व
मा रीरिषो मामहिताहितेन ॥ ७७ ॥
भूत, वर्तमान, भविष्य तथा अजेय काल—ये सब आपके ही स्वरूप हैं। यहाँ सम्पूर्ण लोक आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। मैं आपका भजन करनेवाला भक्त हूँ, आप मुझे अपनाइये। अहित करनेवालोंको रखकर मेरी हिंसा न कराइये ॥ ७७ ॥
आत्मानं त्वामात्मनोऽनन्यबोधं
विद्वानेवं गच्छति ब्रह्म शुक्रम् ।
अस्तौषं त्वां तव सम्मानमिच्छन्
विचिन्वन् वै सदृशं देववर्य ।
सुदुर्लभान् देहि वरान् ममेश-
नभिष्टुतः प्रविकार्षींश्च मायाम् ॥ ७८ ॥
आप जीवात्मासे अभिन्न अनुभव किये जानेवाले सबके आत्मा हैं, ऐसा जाननेवाला विद्वान् पुरुष विशुद्ध ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। देववर्य! मैंने आपके सत्कारकी शुभ इच्छा लेकर यह स्तवन किया है। स्तुतिके सर्वथा योग्य आप परमेश्वरका मैं चिरकालसे अन्वेषण कर रहा था। जिनकी भलीभाँति स्तुति की गयी है ऐसे आप अपनी मायाको दूर कीजिये और मुझे अभीष्ट दुर्लभ वर प्रदान कीजिये ।। ७८ ।।
व्यास उवाच
तस्मै वरानचिन्त्यात्मा नीलकण्ठः पिनाकधृत् ।
अर्हते देवमुख्याय प्रायच्छदृषिसंस्तुतः ॥ ७९ ॥
व्यासजी कहते हैं—द्रोणकुमार! नारायण ऋषिके इस प्रकार स्तुति करनेपर अचिन्त्यस्वरूप, पिनाकधारी, नीलकण्ठ भगवान् शिवने वर पानेके सर्वथा योग्य उन देवप्रधान नारायणको बहुत-से वर दिये ।। ७९ ।।
श्रीभगवानुवाच
मत्प्रसादान्मनुष्येषु देवगन्धर्वयोनिषु ।
अप्रमेयबलात्मा त्वं नारायण भविष्यसि ॥ ८० ॥
श्रीभगवान् बोले—नारायण! तुम मेरे कृपा-प्रसादसे मनुष्यों, देवताओं तथा गन्धर्वोंमें भी असीम बल-पराक्रमसे सम्पन्न होओगे ।। ८० ।।
न च त्वां प्रसहिष्यन्ति देवासुरमहोरगाः ।
न पिशाचा न गन्धर्वा न यक्षा न च राक्षसाः ॥ ८१ ॥
न सुपर्णास्तथा नागा न च विश्वे वियोनिजाः ।
न कश्चित् त्वां च देवोऽपि समरेषु विजेष्यति ॥ ८२ ॥
देवता, असुर, बड़े-बड़े सर्प, पिशाच, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सुपर्ण, नाग तथा समस्त पशुयोनिके (सिंह, व्याघ्र आदि) प्राणी भी तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे। युद्धस्थलोंमें कोई देवता भी तुम्हें जीत नहीं सकेगा ।। ८१-८२ ।।
न शस्त्रेण न वज्रेण नाग्निना न च वायुना ।
न चार्द्रेण न शुष्केण त्रसेन स्थावरेण च ॥ ८३ ॥
कश्चित् तव रुजां कर्ता मत्प्रसादात् कथंचन ।
अपि वै समरं गत्वा भविष्यसि ममाधिकः ॥ ८४ ॥
शस्त्र, वज्र, अग्नि, वायु, गीले-सूखे पदार्थ और स्थावर एवं जंगम प्राणीके द्वारा भी कोई मेरी कृपासे किसी प्रकार तुम्हें चोट नहीं पहुँचा सकता। तुम समरभूमिमें पहुँचनेपर मुझसे भी अधिक बलवान् हो जाओगे ।। ८३-८४ ।।
एवमेते वरा लब्धाः पुरस्ताद् विद्धि शौरिणा ।
स एष देवश्चरति मायया मोहयज्जगत् ॥ ८५ ॥
तुझे मालूम होना चाहिये, इस प्रकार श्रीकृष्णने पहले ही भगवान् शंकरसे ये अनेक वरदान पा लिये हैं। वे ही भगवान् नारायण श्रीकृष्णके रूपमें अपनी मायासे इस संसारको मोहित करते हुए विचर रहे हैं ।। ८५ ।।
तस्यैव तपसा जातं नरं नाम महामुनिम् ।
तुल्यमेतेन देवेन तं जानीह्यर्जुनं सदा ।। ८६ ।।
नारायणके ही तपसे महामुनि नर प्रकट हुए हैं, जो इन भगवान्के ही समान शक्तिशाली हैं। तू अर्जुनको सदा उन्हीं भगवान् नरका अवतार समझ ।। ८६ ।।
तावेतौ पूर्वदेवानां परमोपचितावृषी ।
लोकयात्राविधानार्थं संजायेते युगे युगे ।। ८७ ।।
ये दोनों ऋषि प्रमुख देवता, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रमेंसे विष्णुस्वरूप हैं और तपस्यामें बहुत बढ़े-चढ़े हैं। ये लोगोंको धर्म-मर्यादामें रखकर उनकी रक्षाके लिये युग-युगमें अवतार ग्रहण करते हैं ।। ८७ ।।
तथैव कर्मणा कृत्स्नं महत्तपसोऽपि च ।
तेजो मन्युं च बिभ्रत्त्वं जातो रौद्रो महामते ।। ८८ ।।
स भवान् देववत् प्राज्ञो ज्ञात्वा भवमयं जगत् ।
अवाकर्षस्त्वमात्मानं नियमैस्तत्प्रियेप्सया ।। ८९ ।।
महामते! तू भी (अपने पूर्वजन्ममें) भगवान् नारायणके ही समान ज्ञानवान् होकर उनके ही जैसे सत्कर्म तथा बड़ी भारी तपस्या करके उसके प्रभावसे पूर्ण तेज और क्रोध धारण करनेवाला रुद्रभक्त हुआ था और सम्पूर्ण जगत्को शंकरमय जानकर उन्हें प्रसन्न करनेकी इच्छासे तूने नाना प्रकारके कठोर नियमोंका पालन करते हुए अपने शरीरको दुर्बल कर डाला था ।। ८८-८९ ।।
शुभ्रमत्र भवान् कृत्वा महापुरुषविग्रहम् ।
ईजिवांस्त्वं जपैर्होमैरुपहारैश्च मानद ।। ९० ।।
मानद! तूने यहाँ परम पुरुष भगवान् शंकरके उज्ज्वल विग्रहकी स्थापना करके होम, जप और उपहारोंद्वारा उनकी आराधना की थी ।। ९० ।।
स तथा पूज्यमानस्ते पूर्वदेहेऽप्यतूतृषत् ।
पुष्कलांश्च वरान् प्रादात् तव विद्वन् हृदि स्थितान् ।। ९१ ।।
विद्वन्! इस प्रकार पूर्वजन्मके शरीरमें तुझसे पूजित होकर भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए थे और उन्होंने तुझे बहुत-से मनोवांछित वर प्रदान किये थे ।। ९१ ।।
जन्मकर्मतपोयोगास्तयोस्तव च पुष्कलाः ।
ताभ्यां लिङ्गेऽर्चितो देवस्त्वयार्चायां युगे युगे ।। ९२ ।।
इस प्रकार तेरे और नर-नारायणके जन्म, कर्म, तप और योग पर्याप्त हैं। नर-नारायणने शिवलिंगमें तथा तूने प्रतिमामें प्रत्येक युगमें महादेवजीकी आराधना की है ।।
सर्वरूपं भवं ज्ञात्वा लिङ्गे योऽर्चयति प्रभुम् ।
आत्मयोगाश्च तस्मिन् वै शास्त्रयोगाश्च शाश्वताः ॥ ९३ ॥
जो भगवान् शंकरको सर्वस्वरूप जानकर शिवलिंगमें उनकी पूजा करता है, उसमें सनातन आत्मयोग (आत्मा-परमात्माके तत्त्वका ज्ञान) तथा शास्त्रयोग (स्वाध्यायजनित ज्ञान) प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ९३ ॥
एवं देवा यजन्तो हि सिद्धाश्च परमर्षयः ।
प्रार्थयन्ते परं लोके स्थाणुमेकं स सर्वकृत् ॥ ९४ ॥
इस प्रकार आराधना करते हुए देवता, सिद्ध और महर्षिगण लोकमें एकमात्र सर्वोत्कृष्ट भगवान् शंकरसे ही अभीष्ट वस्तुकी प्रार्थना करते हैं; क्योंकि वे ही सब कुछ करनेवाले हैं ॥ ९४ ॥
स एष रुद्रभक्तश्च केशवो रुद्रसम्भवः ।
कृष्ण एव हि यष्टव्यो यज्ञैश्चैव सनातनः ॥ ९५ ॥
ये श्रीकृष्ण भगवान् शंकरके भक्त हैं और उन्हींसे प्रकट हुए हैं; अतः यज्ञोंद्वारा सनातनपुरुष श्रीकृष्णकी ही आराधना करनी चाहिये ॥ ९५ ॥
सर्वभूतभवं ज्ञात्वा लिङ्गमर्चति यः प्रभोः ।
तस्मिन्नभ्यधिकां प्रीतिं करोति वृषभध्वजः ॥ ९६ ॥
जो भगवान् शिवके लिंगको सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका स्थान जानकर उसकी पूजा करता है, उसपर भगवान् शंकर अधिक प्रेम करते हैं ॥ ९६ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा द्रोणपुत्रो महारथः ।
नमश्चकार रुद्राय बहु मेने च केशवम् ॥ ९७ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! व्यासजीकी यह बात सुनकर द्रोणपुत्र महारथी अश्वत्थामाने मन-ही-मन भगवान् शंकरको प्रणाम किया और श्रीकृष्णकी भी महत्ता स्वीकार कर ली ॥
हृष्टरोमा च वश्यात्मा सोऽभिवाद्य महर्षये ।
वरूथिनीमभिप्रेक्ष्य ह्यावहारमकारयत् ॥ ९८ ॥
उसके शरीरमें रोमांच हो आया। उसने विनीतभावसे महर्षिको प्रणाम किया और अपनी सेनाकी ओर देखकर उसे छावनीमें लौटनेकी आज्ञा दे दी ॥ ९८ ॥
ततः प्रत्यवहारोऽभूत् पाण्डवानां विशाम्पते ।
कौरवाणां च दीनानां द्रोणे युधि निपातिते ॥ ९९ ॥
प्रजानाथ! तदनन्तर युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यके मारे जानेके बाद पाण्डवों तथा दीन कौरवोंकी सेनाएँ अपने-अपने शिविरकी ओर चल दीं ॥ ९९ ॥
युद्धं कृत्वा दिनान् पञ्च द्रोणो हत्वा वरूथिनीम् ।
ब्रह्मलोकं गतो राजन् ब्राह्मणो वेदपारगः ॥ १०० ॥
राजन्! इस प्रकार वेदोंके पारंगत विद्वान् द्रोणाचार्य पाँच दिनोंतक युद्ध तथा शत्रुसेनाका संहार करके ब्रह्मलोकको चले गये ॥ १०० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि व्यासवाक्ये शतरुद्रिये एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें व्यासवाक्य तथा शतरुद्रिय स्तुतिविषयक दो सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १०२ १/३ श्लोक हैं।)