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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना

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सप्तमोऽध्यायः

संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना

धृतराष्ट्र उवाच

अहोऽभिहितमाख्यानं भवता तत्त्वदर्शिना ।
भूय एव तु मे हर्षः श्रुत्वा वागमृतं तव ।। १ ।।
**धृतराष्ट्रने कहा—**विदुर! तुमने अद्भुत आख्यान सुनाया। वास्तवमें तुम तत्त्वदर्शी हो। पुनः तुम्हारी अमृतमयी वाणी सुनकर मुझे बड़ा हर्ष होगा ।। १ ।।

विदुर उवाच

शृणु भूयः प्रवक्ष्यामि मार्गस्यैतस्य विस्तरम् ।
यच्छ्रुत्वा विप्रमुच्यन्ते संसारेभ्यो विचक्षणाः ।। २ ।।
**विदुरजीने कहा—**राजन्! सुनिये। मैं पुनः विस्तार-पूर्वक इस मार्गका वर्णन करता हूँ, जिसे सुनकर बुद्धिमान् पुरुष संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ।। २ ।।

यथा तु पुरुषो राजन् दीर्घमध्वानमास्थितः ।
क्वचित् क्वचिच्छ्रमाच्छ्रान्तः कुरुते वासमेव वा ।। ३ ।।
एवं संसारपर्याये गर्भवासेषु भारत ।
कुर्वन्ति दुर्बुधा वासं मुच्यन्ते तत्र पण्डिताः ।। ४ ।।
नरेश्वर! जिस प्रकार किसी लंबे रास्तेपर चलने-वाला पुरुष परिश्रमसे थककर बीचमें कहीं-कहीं विश्रामके लिये ठहर जाता है, उसी प्रकार इस संसारयात्रामें चलते हुए अज्ञानी पुरुष विश्रामके लिये गर्भवास किया करते हैं। भारत! किंतु विद्वान् पुरुष इस संसारसे मुक्त हो जाते हैं ।। ३-४ ।।

तस्मादध्वानमेवैतमाहुः शास्त्रविदो जनाः ।
यत्तु संसारगहनं वनमाहुर्मनीषिणः ।। ५ ।।
इसीलिये शास्त्रज्ञ पुरुषोंने गर्भवासको मार्गका ही रूपक दिया है और गहन संसारको मनीषी पुरुष वन कहा करते हैं ।। ५ ।।

सोऽयं लोकसमावर्तो मर्त्यानां भरतर्षभ ।
चराणां स्थावराणां च न गृध्येत् तत्र पण्डितः ।। ६ ।।
भरतश्रेष्ठ! यही मनुष्यों तथा स्थावर-जंगम प्राणियोंका संसारचक्र है। विवेकी पुरुषको इसमें आसक्त नहीं होना चाहिये ।। ६ ।।

शारीरा मानसाश्चैव मर्त्यानां ये तु व्याधयः ।

प्रत्यक्षाश्च परोक्षाश्च ते व्यालाः कथिता बुधैः ॥ ७ ॥
मनुष्योंकी जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शारीरिक और मानसिक व्याधियाँ हैं, उन्हींको विद्वानोंने सर्प एवं हिंसक जीव बताया है ॥ ७ ॥
क्लिश्यमानाश्च तैर्नित्यं वार्यमाणाश्च भारत ।
स्वकर्मभिर्महाव्यालैर्नोद्विजन्त्यल्पबुद्धयः ॥ ८ ॥
भरतनन्दन! अपने कर्मरूपी इन महान् हिंसक जन्तुओंसे सदा सताये तथा रोके जानेपर भी मन्दबुद्धि मानव संसारसे उद्विग्न या विरक्त नहीं होते हैं ॥ ८ ॥
अथापि तैर्विमुच्येत व्याधिभिः पुरुषो नृप ।
आवृणोत्येव तं पश्चाज्जरा रूपविनाशिनी ॥ ९ ॥
शब्दरूपरसस्पर्शैर्गन्धैश्च विविधैरपि ।
मज्जमांसमहापङ्के निरालम्बे समन्ततः ॥ १० ॥
नरेश्वर! यदि शब्द, स्पर्श, रूप, रस और नाना प्रकारकी गन्धोंसे युक्त, मज्जा और मांसरूपी बड़ी भारी कीचड़से भरे हुए एवं सब ओरसे अवलम्बशून्य इस शरीररूपी कूपमें रहनेवाला मनुष्य इन व्याधियोंसे किसी तरह मुक्त हो जाय तो भी अन्तमें रूप-सौन्दर्यका विनाश करनेवाली वृद्धावस्था तो उसे घेर ही लेती है ॥
संवत्सराश्च मासाश्च पक्षाहोरात्रसंधयः ।
क्रमेणास्योपयुञ्जन्ति रूपमायुस्तथैव च ॥ ११ ॥
एते कालस्य निधयो नैतान् जानन्ति दुर्बुधाः ।
धात्राभिलिखितान्याहुः सर्वभूतानि कर्मणा ॥ १२ ॥
वर्ष, मास, पक्ष, दिन-रात और संध्याएँ क्रमशः इसके रूप और आयुका शोषण करती ही रहती हैं। ये सब कालके प्रतिनिधि हैं। मूढ़ मनुष्य इन्हें इस रूपमें नहीं जानते हैं। श्रेष्ठ पुरुषोंका कथन है कि विधाताने सम्पूर्ण भूतोंके ललाटमें कर्मके अनुसार रेखा खींच दी है (प्रारब्धके अनुसार उनकी आयु और सुख-दुःखके भोग नियत कर दिये हैं) ॥
रथः शरीरं भूतानां सत्त्वमाहुस्तु सारथिम् ।
इन्द्रियाणि हयानाहुः कर्मबुद्धिस्तु रश्मयः ॥ १३ ॥
तेषां हयानां यो वेगं धावतामनुधावति ।
स तु संसारचक्रेऽस्मिंश्चक्रवत् परिवर्तते ॥ १४ ॥
विद्वान् पुरुष कहते हैं कि प्राणियोंका शरीर रथके समान है, सत्त्व (सत्त्वगुणप्रधान बुद्धि) सारथि है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं और मन लगाम है। जो पुरुष स्वेच्छापूर्वक दौड़ते हुए उन घोड़ोंके वेगका अनुसरण करता है, वह तो इस संसारचक्रमें पहियेके समान घूमता रहता है ॥
यस्तान् संयमते बुद्ध्या संयतो न निवर्तते ।
ये तु संसारचक्रेऽस्मिंश्चक्रवत् परिवर्तते ॥ १५ ॥

भ्रममाणा न मुह्यन्ति संसारे न भ्रमन्ति ते ।
किंतु जो संयमशील होकर बुद्धिके द्वारा उन इन्द्रियरूपी अश्वोंको काबूमें रखते हैं, वे फिर इस संसारमें नहीं लौटते। जो लोग चक्रकी भाँति घूमनेवाले इस संसारचक्रमें घूमते हुए भी मोहके वशीभूत नहीं होते हैं, उन्हें फिर संसारमें नहीं भटकना पड़ता ।। १५ १/२ ।।
संसारे भ्रमतां राजन् दुःखमेतद्धि जायते ।। १६ ।।
तस्मादस्य निवृत्त्यर्थं यत्नमेवाचरेद् बुधः ।
उपेक्षा नात्र कर्तव्या शतशाखः प्रवर्धते ।। १७ ।।
राजन्! संसारमें भटकनेवालोंको यह दुःख प्राप्त होता ही है; अतः विज्ञ पुरुषको इस संसारबन्धनकी निवृत्तिके लिये अवश्य यत्न करना चाहिये। इस विषयमें कदापि उपेक्षा नहीं करनी चाहिये; नहीं तो यह संसार सैकड़ों शाखाओंमें फैलकर बहुत बड़ा हो जाता है ।। १६-१७ ।।
यतेन्द्रियो नरो राजन् क्रोधलोभनिराकृतः ।
संतुष्टः सत्यवादी यः स शान्तिमधिगच्छति ।। १८ ।।
राजन्! जो मनुष्य जितेन्द्रिय, क्रोध और लोभसे शून्य, संतोषी तथा सत्यवादी होता है, उसे शान्ति प्राप्त होती है ।। १८ ।।
याम्यमाहू रथं ह्येनं मुह्यन्ते येन दुर्बुधाः ।
स चैतत् प्राप्नुयाद् राजन् यत् त्वं प्राप्तो नराधिप ।। १९ ।।
नरेश्वर! इस संसारको याम्य (यमलोककी प्राप्ति करानेवाला) रथ कहते हैं, जिससे मूर्ख मनुष्य मोहित हो जाते हैं। राजन्! जो दुःख आपको प्राप्त हुआ है, वही प्रत्येक अज्ञानी पुरुषको उपलब्ध होता है ।। १९ ।।
अनुतर्षुलमैवैतद् दुःखं भवति मारिष ।
राज्यनाशं सुहृन्नाशं सुतनाशं च भारत ।। २० ।।
माननीय भारत! जिसकी तृष्णा बढ़ी हुई है, उसीको राज्य, सुहृद् और पुत्रोंका नाशरूपी यह महान् दुःख प्राप्त होता है ।। २० ।।
साधुः परमदुःखानां दुःखभैषज्यमाचरेत् ।
ज्ञानौषधमवाप्येह दूरपारं महौषधम् ।
छिन्द्याद् दुःखमहाव्याधिं नरः संयतमानसः ।। २१ ।।
साधु पुरुषको चाहिये कि वह अपने मनको वशमें करके ज्ञानरूपी महान् ओषधि प्राप्त करे, जो परम दुर्लभ है। उससे अपने बड़े-से-बड़े दुःखोंकी चिकित्सा करे। उस ज्ञानरूपी ओषधिसे दुःखरूपी महान् व्याधिका नाश कर डाले ।। २१ ।।
न विक्रमो न चाप्यर्थो न मित्रं न सुहृज्जनः ।
तथोन्मोचयते दुःखाद् यथाऽऽत्मा स्थिरसंयमः ।। २२ ।।

पराक्रम, धन, मित्र और सुहृद् भी उस तरह दुःखसे छुटकारा नहीं दिला सकते, जैसा कि दृढ़तापूर्वक संयममें रहनेवाला अपना मन दिला सकता है ॥ २२ ॥
तस्मान्मैत्रं समास्थाय शीलमापद्य भारत ।
दमस्त्यागोऽप्रमादश्च ते त्रयो ब्रह्मणो हयाः ॥ २३ ॥
शीलरश्मिसमायुक्तः स्थितो यो मानसे रथे ।
त्यक्त्वा मृत्युभयं राजन् ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥ २४ ॥
भरतनन्दन! इसलिये सर्वत्र मैत्रीभाव रखते हुए शील प्राप्त करना चाहिये। दम, त्याग और अप्रमाद—ये तीन परमात्माके धाममें ले जानेवाले घोड़े हैं। जो मनुष्य शीलरूपी लगामको पकड़कर इन तीनों घोड़ोंसे जुते हुए मनरूपी रथपर सवार होता है, वह मृत्युका भय छोड़कर ब्रह्मलोकमें चला जाता है ॥ २३-२४ ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो यो ददाति महीपते ।
स गच्छति परं स्थानं विष्णोः पदमनामयम् ॥ २५ ॥
भूपाल! जो सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान देता है, वह भगवान् विष्णुके अविनाशी परमधाममें चला जाता है ॥ २५ ॥
न तत् क्रतुसहस्रेण नोपवासैश्च नित्यशः ।
अभयस्य च दानेन यत् फलं प्राप्नुयान्नरः ॥ २६ ॥
अभयदानसे मनुष्य जिस फलको पाता है, वह उसे सहस्रों यज्ञ और नित्यप्रति उपवास करनेसे भी नहीं मिल सकता है ॥ २६ ॥
न ह्यात्मनः प्रियतरं किंचिद् भूतेषु निश्चितम् ।
अनिष्टं सर्वभूतानां मरणं नाम भारत ॥ २७ ॥
तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दया कार्या विपश्चिता ।
भारत! यह बात निश्चितरूपसे कही जा सकती है कि प्राणियोंको अपने आत्मासे अधिक प्रिय कोई भी वस्तु नहीं है; इसीलिये मरना किसी भी प्राणीको अच्छा नहीं लगता; अतः विद्वान् पुरुषको सभी प्राणियोंपर दया करनी चाहिये ॥ २७ १/२ ॥
नानामोहसमायुक्ता बुद्धिजालेन संवृताः ॥ २८ ॥
असूक्ष्मदृष्टयो मन्दा भ्राम्यन्ते तत्र तत्र ह ।
जो मूढ़ नाना प्रकारके मोहमें डूबे हुए हैं, जिन्हें बुद्धिके जालने बाँध रखा है और जिनकी दृष्टि स्थूल है, वे भिन्न-भिन्न योनियोंमें भटकते रहते हैं ॥ २८ १/२ ॥
सुसूक्ष्मदृष्टयो राजन् व्रजन्ति ब्रह्म शाश्वतम् ॥ २९ ॥
(एवं ज्ञात्वा महाप्राज्ञ स तेषामौर्ध्वदेहिकम् ।
कर्तुमर्हसि तेनैव फलं प्राप्स्यति वै भवान् ॥)
राजन्! महाप्राज्ञ! सूक्ष्मदर्शी ज्ञानी पुरुष सनातन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं, ऐसा जानकर आप अपने मरे हुए सगे-सम्बन्धियोंका और्ध्वदेहिक संस्कार कीजिये। इसीसे आपको उत्तम

फलकी प्राप्ति होगी ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रशोककरणे
सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका
निवारणविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं।)