महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 373)
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका विलाप
संजय उवाच
हते तस्मिन् महावीर्ये सौभद्रे रथयूथपे ।
विमुक्तरथसंनाहाः सर्वे निक्षिप्तकार्मुकाः ॥ १ ॥
उपोपविश राजानं परिवार्य युधिष्ठिरम् ।
तदेव युद्धं ध्यायन्तः सौभद्रगतमानसाः ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! महापराक्रमी रथयूथपति सुभद्रकुमार अभिमन्युके मारे जानेपर समस्त पाण्डव महारथी रथ और कवचका त्याग कर और धनुषको नीचे डालकर राजा युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर उनके पास बैठ गये। उन सबका मन सुभद्रकुमार अभिमन्युमें ही लगा था और वे उसी युद्धका चिन्तन कर रहे थे ॥ १-२ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा विललाप सुदुःखितः ।
अभिमन्यौ हते वीरे भ्रातुः पुत्रे महारथे ॥ ३ ॥
उस समय राजा युधिष्ठिर अपने भाईके वीर पुत्र महारथी अभिमन्युके मारे जानेके कारण अत्यन्त दुःखी हो विलाप करने लगे— ॥ ३ ॥
(एष जित्वा कृपं शल्यं राजानं च सुयोधनम् ।
द्रोणं द्रौणिं महेष्वासं तथैवान्यान् महारथान् ॥)
द्रोणानीकमसम्बाधं मम प्रियचिकीर्षया ।
(हत्वा शत्रुगणान् वीरानेष शेते निपातितः ।
कृतास्त्रान् युद्धकुशलान् महेष्वासान् महारथान् ॥
कुलशीलगुणैर्युक्ताञ्छूरान् विख्यातपौरुषान् ।
द्रोणेन विहितं व्यूहमभेद्यममरैरपि ॥
अदृष्टपूर्वमस्माभिः चक्रं चक्रायुधप्रियः ।)
भित्त्वा व्यूहं प्रविष्टोऽसौ गोमध्यमिव केसरी ॥ ४ ॥
'अहो! कृपाचार्य, शल्य, राजा दुर्योधन, द्रोणाचार्य, महाधनुर्धर अश्वत्थामा तथा अन्य महारथियोंको जीतकर, मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे द्रोणाचार्यके निर्बाध सैन्यव्यूहको विनष्ट करके वीर शत्रुसमूहोंका संहार करनेके पश्चात् यह पुत्र अभिमन्यु मार गिराया गया और अब रणक्षेत्रमें सो रहा है! जो अस्त्रविद्याके विद्वान्, युद्धकुशल, कुल-शील और गुणोंसे युक्त, शूरवीर तथा अपने पराक्रमके लिये प्रसिद्ध थे, उन महाधनुर्धर महारथियोंको परास्त करके देवताओंके लिये भी जिसका भेदन करना असम्भव है तथा हमने जिसे पहले कभी देखाूतक नहीं था, उस द्रोणनिर्मित चक्रव्यूहका भेदन करके चक्रधारी श्रीकृष्णका प्यारा
भानजा वह अभिमन्यु उसके भीतर उसी प्रकार प्रवेश कर गया, जैसे सिंह गौओंके झुंडमें घुस जाता है ।। ४ ।।
(विक्रीडितं रणे तेन निघ्नता वै परान् वरान् ।)
यस्य शूरा महेष्वासाः प्रत्यनीकगता रणे ।
प्रभग्ना विनिवर्तन्ते कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ।। ५ ।।
'उसने रणक्षेत्रमें प्रमुख-प्रमुख शत्रुवीरोंका वध करते हुए अद्भुत रणक्रीडा की थी। युद्धमें उसके सामने जानेपर शत्रुपक्षके अस्त्रविद्याविशारद युद्धदुर्मद और महान् धनुर्धर शूरवीर भी हतोत्साह हो भाग खड़े होते थे ।। ५ ।।
अत्यन्तशत्रुरस्माकं येन दुःशासनः शरैः ।
क्षिप्रं ह्यभिमुखः संख्ये विसंज्ञो विमुखीकृतः ।। ६ ।।
स तीर्त्वा दुस्तरं वीरो द्रोणानीकमहार्णवम् ।
प्राप्य दौःशासनिं कार्ष्णिः प्राप्तो वैवस्वतक्षयम् ।। ७ ।।
'जिस वीर अर्जुनकुमारने युद्धस्थलमें हमारे अत्यन्त शत्रु दुःशासनको सामने आनेपर शीघ्र ही अपने बाणोंसे अचेत करके भगा दिया, वही महासागरके समान दुस्तर द्रोणसेनाको पार करके भी दुःशासनपुत्रके पास जाकर यमलोकमें पहुँच गया ।। ६-७ ।।
कथं द्रक्ष्यामि कौन्तेयं सौभद्रे निहतेऽर्जुनम् ।
सुभद्रां वा महाभागां प्रियं पुत्रमपश्यतीम् ।। ८ ।।
'सुभद्राकुमार अभिमन्युके मार दिये जानेपर अब मैं कुन्तीकुमार अर्जुनकी ओर आँख उठाकर कैसे देखूँगा? अथवा अपने प्रियपुत्रको अब नहीं देख पानेवाली महाभागा सुभद्राके सामने कैसे जाऊँगा? ।। ८ ।।
किंस्विद् वयमपेतार्थमश्लिष्टमसमञ्जसम् ।
तावुभौ प्रतिवक्ष्यामो हृषीकेशधनंजयौ ।। ९ ।।
'हाय! हमलोग भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंके सामने किस प्रकार यह अनर्थपूर्ण, असंगत और अनुचित वृत्तान्त कह सकेंगे ।। ९ ।।
अहमेव सुभद्रायाः केशवार्ज्जुनयोरपि ।
प्रियकामो जयाकाङ्क्षी कृतवानिदमप्रियम् ।। १० ।।
'मैंने ही अपने प्रिय कार्यकी इच्छा, विजयकी अभिलाषा रखकर सुभद्रा, श्रीकृष्ण और अर्जुनका यह अप्रिय कार्य किया है ।। १० ।।
न लुब्धो बुध्यते दोषाँल्लोभान्मोहात् प्रवर्तते ।
मधुलिप्सुर्हि नापश्यं प्रपातमहमीदृशम् ।। ११ ।।
'लोभी मनुष्य किसी कार्यके दोषको नहीं समझता।' वह लोभ और मोहके वशीभूत होकर उसमें प्रवृत्त हो जाता है। मैंने मधुके समान मधुर लगनेवाले राज्यको पानेकी लालसा रखकर यह नहीं देखा कि इसमें ऐसे भयंकर पतनका भय है ।। ११ ।।
यो हि भोज्ये पुरस्कार्यो यानेषु शयनेषु च ।
भूषणेषु च सोऽस्माभिर्बालो युधि पुरस्कृतः ॥ १२ ॥
‘हाय! जिस सुकुमार बालकको भोजन और शयन करने, सवारीपर चलने तथा भूषण, वस्त्र पहननेमें आगे रखना चाहिये था, उसे हमलोगोंने युद्धमें आगे कर दिया ॥
कथं हि बालस्तरुणो युद्धानामविशारदः ।
सदश्व इव सम्बाधे विषमे क्षेममर्हति ॥ १३ ॥
‘वह तरुणकुमार अभी बालक था। युद्धकी कलामें पूरा प्रवीण नहीं हुआ था। फिर गहन वनमें फँसे हुए सुन्दर अश्वकी भाँति वह उस विषम संग्राममें कैसे सकुशल रह सकता था? ॥ १३ ॥
नो चेद्धि वयमप्येनं महीमनु शयीमहि ।
बीभत्सोः कोपदीप्तस्य दग्धाः कृपणचक्षुषा ॥ १४ ॥
‘यदि हमलोग अभिमन्युके साथ ही उस रण-क्षेत्रमें शयन न कर सके तो अब क्रोधसे उत्तेजित हुए अर्जुनके शोकाकुल नेत्रोंसे हमें अवश्य दग्ध होना पड़ेगा ॥ १४ ॥
अलुब्धो मतिमान् ह्रीमान् क्षमावान् रूपवान् बली ।
वपुष्मान् मानकृद् वीरः प्रियः सत्यपराक्रमः ॥ १५ ॥
यस्य श्लाघन्ति विबुधाः कर्माण्यूर्जितकर्मणः ।
निवातकवचाञ्जघ्ने कालकेयांश्च वीर्यवान् ॥ १६ ॥
महेन्द्रशत्रवो येन हिरण्यपुरवासिनः ।
अक्ष्णोर्निमेषमात्रेण पौलोमाः सगणा हताः ॥ १७ ॥
परेभ्योऽप्यभयार्थिभ्यो यो ददात्यभयं विभुः ।
तस्यास्माभिर्न शक्तितस्त्रातुमप्यात्मजो बली ॥ १८ ॥
‘जो लोभरहित, बुद्धिमान्, लज्जाशील, क्षमावान्, रूपवान्, बलवान्, सुन्दर शरीरधारी, दूसरोंको मान देनेवाले, प्रीतिपात्र, वीर तथा सत्यपराक्रमी हैं, जिनके कर्मोंकी देवतालोग भी प्रशंसा करते हैं, जिनके कर्म सबल एवं महान् हैं, जिन पराक्रमी वीरने निवातकवचों तथा कालकेय नामक दैत्योंका विनाश किया था, जिन्होंने आँखोंकी पलक मारते-मारते हिरण्यपुरनिवासी इन्द्रशत्रु पौलोम नामक दानवोंका उनके गणोंसहित संहार कर डाला था तथा जो सामर्थ्यशाली अर्जुन अभयकी इच्छा रखनेवाले शत्रुओंको भी अभयदान देते हैं, उन्हींके बलवान् पुत्रकी भी हमलोग रक्षा नहीं कर सके ॥ १५–१८ ॥
भयं तु सुमहत् प्राप्तं धार्तराष्ट्रान् महाबलान् ।
पार्थः पुत्रवधात् क्रुद्धः कौरवाञ्शोषयिष्यति ॥ १९ ॥
‘अहो! महाबली धृतराष्ट्रपुत्रोंपर बड़ा भारी भय आ पहुँचा है; क्योंकि अपने पुत्रके वधसे कुपित हुए कुन्तीकुमार अर्जुन कौरवोंको सोख लेंगे—उनका मूलोच्छेद कर डालेंगे ॥ १९ ॥
क्षुद्रः क्षुद्रसहायश्च स्वपक्षक्षयमातुरः ।
व्यक्तं दुर्योधनो दृष्ट्वा शोचन् हास्यति जीवितम् ॥ २० ॥
‘दुर्योधन नीच है। उसके सहायक भी ओछे स्वभावके हैं, अतः वह निश्चय ही (अर्जुनके हाथों) अपने पक्षका विनाश देखकर शोकसे व्याकुल हो जीवनका परित्याग कर देगा ।। २० ।।
न मे जयः प्रीतिकरो न राज्यं
न चामरत्वं न सुरैः सलोकता ।
इमं समीक्ष्याप्रतिवीर्यपौरुषं
निपातितं देववरात्मजात्मजम् ॥ २१ ॥
‘जिसके बल और पुरुषार्थकी कहीं तुलना नहीं थी, देवेन्द्रकुमार अर्जुनके पुत्र इस अभिमन्युको रणक्षेत्रमें मारा गया देख अब मुझे विजय, राज्य, अमरत्व तथा देवलोककी प्राप्ति भी प्रसन्न नहीं कर सकती’ ।। २१ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि युधिष्ठिरप्रलापे
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें युधिष्ठिरप्रलापविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५१ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)