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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1544)

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अश्वत्थामाके द्वारा अर्जुनपर आग्नेयास्त्रका प्रयोग एवं उसके द्वारा पाण्डव-सेनाका संहार

अस्त्रतेजोऽभिसंतप्ता नागा भूमिशयास्तथा ।
निःश्वसन्तः समुत्पेतुस्तेजो घोरं मुमुक्षवः ॥ २४ ॥
पृथ्वीपर पड़े रहनेवाले नाग भी उस अस्त्रके तेजसे संतप्त हो भयंकर आगसे छुटकारा पानेके लिये फुफकारते हुए ऊपर उछलने लगे ॥ २४ ॥

जलजानि च सत्त्वानि दह्यमानानि भारत ।
न शान्तिमुपजग्मुर्हि तप्यमानैर्जलाशयैः ॥ २५ ॥
भारत! जलाशय भी तप गये थे, जिससे दग्ध होनेवाले जलचर प्राणियोंको भी शान्ति नहीं मिल पाती थी ॥ २५ ॥

दिग्भ्यः प्रदिग्भ्यः खाद् भूमेः सर्वतः शरवृष्टयः ।
उच्चावचा निपेतुर्वै गरुडानिलरंहसः ॥ २६ ॥
दिशा, विदिशा, आकाश और पृथ्वी सब ओरसे छोटे-बड़े नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा होने लगी, वे सभी बाण गरुड़ और वायुके समान वेगशाली थे ॥ २६ ॥

तैः शरैर्द्रोणपुत्रस्य वज्रवेगैः समाहताः ।
प्रदग्धा रिपवः पेतुरग्निदग्धा इव द्रुमाः ॥ २७ ॥
द्रोणपुत्रके चलाये हुए उन वज्रके समान वेगशाली बाणोंसे घायल हुए शत्रुसैनिक आगके जलाये हुए वृक्षोंके समान दग्ध होकर गिरने लगे ॥ २७ ॥

दह्यमाना महानागाः पेतुरुर्व्यां समन्ततः ।
नदन्तो भैरवान् नादाञ्जलदोपमनिःस्वनान् ॥ २८ ॥
विशालकाय गजराज दग्ध हो-होकर मेघकी गर्जनाके समान भयंकर चीत्कार करते हुए सब ओर धराशायी होने लगे ॥ २८ ॥

अपरे प्रद्रुता नागा भयत्रस्ता विशाम्पते ।
भ्रेमुर्दिशो यथा पूर्वं वने दावाग्निसंवृताः ॥ २९ ॥
प्रजानाथ! भयभीत होकर भागे हुए दूसरे बहुत-से हाथी सम्पूर्ण दिशाओंमें उसी प्रकार चक्कर काटने लगे, जैसे पहले वनमें दावानलसे घिर जानेपर वे चारों ओर चक्कर लगाते थे ॥ २९ ॥

द्रुमाणां शिखराणीव दावदग्धानि मारिष ।
अश्ववृन्दान्यदृश्यन्त रथवृन्दानि भारत ॥ ३० ॥
अपतन्त रथौघाश्च तत्र तत्र सहस्रशः ।
माननीय नरेश! भारत! अश्वसमूह तथा रथवृन्द दावानलसे दग्ध हुए वृक्षोंके अग्रभागके समान दिखायी दे रहे थे और जहाँ-तहाँ सहस्रों रथसमूह गिरे पड़े थे ॥ ३० १/२ ॥

तत् सैन्यं भयसंविग्नं ददाह युधि भारत ॥ ३१ ॥
युगान्ते सर्वभूतानि संवर्तक इवानलः ।
भरतनन्दन! जैसे प्रलयकालमें संवर्तक अग्नि सब प्राणियोंको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार उस आग्नेयास्त्रने पाण्डवोंकी उस भयभीत सेनाको युद्धस्थलमें जलाना आरम्भ कर दिया ॥ ३१ १/२ ॥

दृष्ट्वा तु पाण्डवीं सेनां दह्यमानां महाहवे ॥ ३२ ॥
प्रहृष्टास्तावका राजन् सिंहनादान् विनेदिरे ।
राजन्! उस महासमरमें पाण्डव-सेनाको दग्ध होती देख आपके सैनिक अत्यन्त प्रसन्न हो जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ३२ १/२ ॥

ततस्तूर्यसहस्राणि नानालिङ्गानि भारत ॥ ३३ ॥
तूर्णमाजघ्निरे हृष्टास्तावका जितकाशिनः ।
भारत! तदनन्तर हर्षसे उल्लसित और विजयसे सुशोभित होनेवाले आपके सैनिक नाना प्रकारके सहस्रों बाजे बजाने लगे ॥ ३३ १/२ ॥

कृत्स्ना ह्यक्षौहिणी राजन् सव्यसाची च पाण्डवः ॥ ३४ ॥
तमसा संवृते लोके नादृश्यन्त महाहवे ।
नरेश्वर! उस महासमरमें सब लोग अन्धकारसे आच्छन्न हो गये थे। पाण्डवोंकी सारी अक्षौहिणी सेना और सव्यसाची अर्जुन भी नहीं दिखायी देते थे ॥ ३४ १/२ ॥

नैव नस्तादृशं राजन् दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् ॥ ३५ ॥
यादृशं द्रोणपुत्रेण सृष्टमस्त्रममर्षिणा ।
राजन्! अमर्षमें भरे हुए द्रोणपुत्रने जैसे अस्त्रकी सृष्टि की थी, वैसा हमलोगोंने पहले न तो कभी देखा था और न सुना ही था ॥ ३५ १/२ ॥

अर्जुनस्तु महाराज ब्राह्ममस्त्रमुदैरयत् ॥ ३६ ॥
सर्वास्त्रप्रतिघातार्थं विहितं पद्मयोनिना ।
महाराज! उस समय अर्जुनने ब्रह्मास्त्रको प्रकट किया; जिसे ब्रह्माजीने सम्पूर्ण अस्त्रोंके विनाशके लिये बनाया है ॥

ततो मुहूर्तादिव तत् तमो व्युपशशाम ह ॥ ३७ ॥
प्रववौ चानिलः शीतो दिशश्च विमला बभुः ।
फिर तो दो घड़ीमें वह सारा अन्धकार दूर हो गया, शीतल वायु बहने लगी और सारी दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं ॥ ३७ १/२ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम कृत्स्नामक्षौहिणीं हताम् ॥ ३८ ॥
अनभिज्ञेयरूपां च प्रदग्धामस्त्रतेजसा ।
वहाँ हमलोगोंने अद्भुत दृश्य देखा। पाण्डवोंकी वह सारी अक्षौहिणी उस अस्त्रके तेजसे इस प्रकार दग्ध एवं नष्ट हो गयी थी कि उसे पहचानना असम्भव हो गया ॥ ३८ १/२ ॥

ततो वीरौ महेष्वासौ विमुक्तौ केशवार्जुनौ ॥ ३९ ॥
सहितौ प्रत्यदृश्येतां नभसीव तमोनुदौ ।
तदनन्तर उस अस्त्रसे मुक्त हुए महाधनुर्धर वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन एक साथ दिखायी दिये, मानो आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य प्रकट हो गये हों ॥ ३९ १/२ ॥

ततो गाण्डीवधन्वा च केशवश्चाक्षतावुभौ ॥ ४० ॥
सपताकध्वजहयः सानुकर्षवरायुधः ।
प्रबभौ स रथो मुक्तस्तावकानां भयंकरः ॥ ४१ ॥
उस समय गाण्डीवधारी अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण दोनोंके शरीरपर आँच नहीं आने पायी थी। पताका, ध्वज, अश्व, अनुकर्ष और श्रेष्ठ आयुधोंसहित मुक्त हुआ उनका वह रथ आपके सैनिकोंको भयभीत करता हुआ चमक उठा ॥ ४०-४१ ॥

ततः किलकिलाशब्दः शङ्खभेरीस्वनैः सह ।
पाण्डवानां प्रहृष्टानां क्षणेन समजायत ॥ ४२ ॥
तब पाण्डव हर्षसे खिल उठे और क्षणभरमें शंख तथा भेरियोंकी ध्वनिके साथ उनका आनन्दमय कोलाहल गूँज उठा ॥ ४२ ॥
हताविति तयोरासीत् सेनयोरुभयोर्मतिः ।
तरसाभ्यागतौ दृष्ट्वा सहितौ केशवार्जुनौ ॥ ४३ ॥
श्रीकृष्ण और अर्जुनके सम्बन्धमें उन दोनों ही सेनाओंको यह विश्वास हो गया था कि वे मारे गये। फिर उन दोनोंको एक साथ वेगपूर्वक निकट आया देख सबको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४३ ॥

तावक्षतौ प्रमुदितौ दध्यतुर्वारिजोत्तमौ ।
दृष्ट्वा प्रमुदितान् पार्थांस्त्वदीया व्यथिता भृशम् ॥ ४४ ॥
उन दोनोंके शरीरमें क्षति नहीं पहुँची थी। वे दोनों वीर आनन्दमग्न हो अपने उत्तम शंख बजाने लगे। कुन्तीके पुत्रोंको प्रसन्न देखकर आपके पुत्रोंके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ४४ ॥

विमुक्तौ च महात्मानौ दृष्ट्वा द्रौणिः सुदुःखितः ।
मुहूर्तं चिन्तयामास किं त्वेतदिति मारिष ॥ ४५ ॥
माननीय नरेश! महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनको आग्नेयास्त्रसे मुक्त देख अश्वत्थामाको बड़ा दुःख हुआ। वह दो घड़ीतक इसी चिन्तामें डूबा रहा कि ‘यह क्या हो गया?’ ॥ ४५ ॥

चिन्तयित्वा तु राजेन्द्र ध्यानशोकपरायणः ।
निःश्वसन् दीर्घमुष्णं च विमनाश्चाभवत् ततः ॥ ४६ ॥
राजेन्द्र! चिन्ता और शोकमें मग्न होकर कुछ देरतक विचार करनेके पश्चात् अश्वत्थामा गरम-गरम दीर्घ उच्छ्वास लेने लगा और मन-ही-मन उदास हो गया ॥

ततो द्रौणिर्धनुस्त्यक्त्वा रथात् प्रस्कन्द्य वेगितः ।
धिग् धिक् सर्वमिदं मिथ्येत्युक्त्वा सम्प्राद्रवद् रणात् ॥ ४७ ॥
तत्पश्चात् द्रोणकुमार धनुष त्यागकर रथसे कूद पड़ा और ‘धिक्कार है! धिक्कार है!! यह सब मिथ्या है’ ऐसा कहकर वह रणभूमिसे वेगपूर्वक भाग चला ॥

ततः स्निग्धाम्बुदाभासं वेदावासमकल्मषम् ।
वेदव्यासं सरस्वत्यावासं व्यासं ददर्श ह ॥ ४८ ॥
इतनेमेंही उसे स्निग्ध मेघके समान श्याम कान्तिवाले, वेद और सरस्वतीके आवास-स्थान तथा वेदोंका विस्तार करनेवाले, पापशून्य महर्षि व्यास वहाँ दिखायी दिये ॥ ४८ ॥

तं द्रौणिरग्रतो दृष्ट्वा स्थितं कुरुकुलोद्वह ।
सन्नकण्ठोऽब्रवीद् वाक्यमभिवाद्य सुदीनवत् ॥ ४९ ॥
कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष! महर्षि व्यासको सामने खड़ा देख द्रोणकुमारका गला आँसुओंसे भर आया। उसने अत्यन्त दीनभावसे प्रणाम करके उनसे इस प्रकार पूछा — ॥ ४९ ॥

भो भो माया यदृच्छा वा न विद्मः किमिदं भवेत् ।
अस्त्रं त्विदं कथं मिथ्या मम कश्च व्यतिक्रमः ॥ ५० ॥
'महर्षे! यह माया है या दैवेच्छा। मेरी समझमें नहीं आता कि यह क्या है? यह अस्त्र झूठा कैसे हो गया? मुझसे कौन-सी गलती हो गयी? ।। ५० ।।

अधरोत्तरमेतद् वा लोकानां वा पराभवः ।
यदिमौ जीवतः कृष्णौ कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ५१ ॥
'इस (आग्नेय) अस्त्रके प्रभावमें कोई उलट-फेर तो नहीं हो गया अथवा सम्पूर्ण लोकोंका पराभव होनेवाला है, जिससे ये दोनों कृष्ण जीवित बच गये। निश्चय ही कालका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है ।। ५१ ।।

नासुरा न च गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः ।
न सर्पा यक्षपतगा न मनुष्याः कथंचन ॥ ५२ ॥
उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुमेतदस्त्रं मयेरितम् ।
तदिदं केवलं हत्वा शान्तमक्षौहिणीं ज्वलत् ॥ ५३ ॥
'मेरे द्वारा प्रयोग किये हुए इस अस्त्रको असुर, गन्धर्व, पिशाच, राक्षस, सर्प, यक्ष, पक्षी और मनुष्य किसी तरह भी व्यर्थ नहीं कर सकते थे, तो भी यह प्रज्वलित अस्त्र केवल एक

अक्षौहिणी सेनाको जलाकर शान्त हो गया ।। ५२-५३ ।।
सर्वघाति मया मुक्तमस्त्रं परमदारुणम् ।
केनेमौ मर्त्यधर्माणौ नावधीत् केशवार्जुनौ ।। ५४ ।।
'मैंने तो अत्यन्त भयंकर एवं सर्वसंहारक अस्त्रका प्रयोग किया था; फिर उसने किस कारणसे इन मर्त्यधर्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध नहीं किया? ।।
एतत् प्रब्रूहि भगवन् मया पृष्टो यथातथम् ।
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन सर्वमेतन्महामुने ।। ५५ ।।
'भगवन्! महामुने! मैंने जो आपसे यह प्रश्न किया है, इसका मुझे यथार्थ उत्तर दीजिये। मैं यह सब कुछ ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ' ।। ५५ ।।

व्यास उवाच

महान्तमेवमथ मां यं त्वं पृच्छसि विस्मयात् ।
तं प्रवक्ष्यामि ते सर्वं समाधाय मनः शृणु ।। ५६ ।।
**व्यासजी बोले—**तू जिसके सम्बन्धमें आश्चर्यके साथ प्रश्न कर रहा है, उस महत्त्वपूर्ण विषयको मैं तुझसे बता रहा हूँ। तू अपने मनको एकाग्र करके सब कुछ सुन ।।
योऽसौ नारायणो नाम पूर्वेषामपि पूर्वजः ।
(आदिदेवो जगन्नाथो लोककर्ता स्वयं प्रभुः ।
आद्यः सर्वस्य लोकस्य अनादिनिधनोऽच्युतः ।।
जो हमारे पूर्वजोंके भी पूर्वज भगवान् नारायण हैं, वे ही आदिदेव, जगन्नाथ, लोककर्ता और स्वयं ही सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। वे सम्पूर्ण जगत्के आदिकारण तथा स्वयं आदि-अन्तसे रहित हैं। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेके कारण वे अच्युत कहलाते हैं।
व्याकुर्वते यस्य तत्त्वं श्रुतयो मुनयश्च ह ।
अतोऽजय्यः सर्वभूतैर्मनसापि जगत्पतिः ।।)
श्रुतियाँ और महर्षिगण उन्हींके तत्त्वका विवेचन करते हैं। अतः उन जगदीश्वरको समस्त प्राणी मनसे भी जीतनेमें असमर्थ हैं।
अजायत च कार्यार्थं पुत्रो धर्मस्य विश्वकृत् ।। ५७ ।।
वे विश्वविधाता भगवान् एक समय किसी विशेष कार्यके लिये धर्मके पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए थे ।। ५७ ।।
स तपस्तीव्रमातस्थे शिशिरं गिरिमास्थितः ।
ऊर्ध्वबाहुर्महातेजा ज्वलनादित्यसंनिभः ।। ५८ ।।
अग्नि और सूर्यके समान महातेजस्वी उन भगवान् नारायणने हिमालय पर्वतपर रहकर अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये हुए बड़ी कठोर तपस्या की थी ।। ५८ ।।
षष्टिं वर्षसहस्राणि तावन्त्येव शतानि च ।

अशोषयत् तदाऽऽत्मानं वायुभक्षोऽम्बुजेक्षणः ॥ ५९ ॥
उन कमलनयन श्रीहरिने छाछठ हजार वर्षोंतक केवल वायु पीकर उन दिनों अपने शरीरको सुखाया ।।

अथापरं तपस्तप्त्वा द्विस्ततोऽन्यत् पुनर्महत् ।
द्यावापृथिव्योर्विवरं तेजसा समपूरयत् ॥ ६० ॥
तदनन्तर उससे दुगुने कालतक फिर भारी तपस्या करके उन्होंने अपने तेजसे पृथ्वी और आकाशके मध्यवर्ती आकाशको भर दिया ।। ६० ।।