महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2251)
एकाशीतितमोऽध्यायः
अर्जुन और भीमसेनके द्वारा कौरव वीरोंका संहार तथा कर्णका पराक्रम
संजय उवाच
तं प्रयान्तं महावेगैरश्वैः कपिवरध्वजम् ।
युद्धायाभ्यद्रवन् वीराः कुरूणां नवती रथाः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! जिनकी ध्वजामें श्रेष्ठ कपिका चिह्न है, उन वीर अर्जुनको महावेगशाली अश्वोंद्वारा आगे बढ़ते देख कौरव-दलके नब्बे वीर रथियोंने युद्धके लिये धावा किया ॥ १ ॥
कृत्वा संशप्तका घोरं शपथं पारलौकिकम् ।
परिवव्रुर्नरव्याघ्रा नरव्याघ्रं रणेऽर्जुनम् ॥ २ ॥
उन नरव्याघ्र संशप्तक वीरोंने परलोकसम्बन्धी घोर शपथ खाकर पुरुषसिंह अर्जुनको रणभूमिमें चारों ओरसे घेर लिया ॥ २ ॥
कृष्णः श्वेतान् महावेगानश्वान्काञ्चनभूषणान् ।
मुक्ताजालप्रतिच्छन्नान् प्रैषीत् कर्णरथं प्रति ॥ ३ ॥
श्रीकृष्णने सोनेके आभूषणोंसे विभूषित तथा मोतीकी जालियोंसे आच्छादित श्वेत रंगके महान् वेगशाली अश्वोंको कर्णके रथकी ओर बढ़ाया ॥ ३ ॥
ततः कर्णरथं यान्तमरिघ्नं तं धनंजयम् ।
बाणवर्षैरभिघ्नन्तः संशप्तकरथा ययुः ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् कर्णके रथकी ओर जाते हुए शत्रुसूदन धनंजयको बाणोंकी वर्षासे घायल करते हुए संशप्तक रथियोंने उनपर आक्रमण कर दिया ॥ ४ ॥
त्वरमाणांस्तु तान् सर्वान् ससूतेष्वसनध्वजान् ।
जघान नवतिं वीरानर्जुनो निशितैः शरैः ॥ ५ ॥
सारथि, धनुष और ध्वजसहित उतावलीके साथ आक्रमण करनेवाले उन सभी नब्बे वीरोंको अर्जुनने अपने पैने बाणोंद्वारा मार गिराया ॥ ५ ॥
तेऽपतन्त हता बाणैर्नानारूपैः किरीटिना ।
सविमाना यथा सिद्धाः स्वर्गात् पुण्यक्षये तथा ॥ ६ ॥
किरीटधारी अर्जुनके चलाये हुए नाना प्रकारके बाणोंसे मारे जाकर वे संशप्तक रथी पुण्यक्षय होनेपर विमानसहित स्वर्गसे गिरनेवाले सिद्धोंके समान रथसे नीचे गिर पड़े ॥ ६ ॥
ततः सरथनागाश्वाः कुरवः कुरुसत्तमम् ।
निर्भया भरतश्रेष्ठमभ्यवर्तन्त फाल्गुनम् ॥ ७ ॥
तदनन्तर रथ, हाथी और घोड़ोंसहित बहुत-से कौरव वीर निर्भय हो भरतभूषण कुरुश्रेष्ठ अर्जुनका सामना करनेके लिये चढ़ आये ॥ ७ ॥
तदायस्तमनुष्याश्वमुदीर्णवरवारणम् ।
पुत्राणां ते महासैन्यं समरौत्सीद् धनंजयम् ॥ ८ ॥
आपके पुत्रोंकी उस विशाल सेनामें मनुष्य और अश्व तो थक गये थे, परंतु बड़े-बड़े हाथी उद्धत होकर आगे बढ़ रहे थे। उस सेनाने अर्जुनकी गति रोक दी ॥ ८ ॥
शक्त्यृष्टितोमरप्रासैर्गदानिस्त्रिंशसायकैः ।
प्राच्छादयन् महेष्वासाः कुरवः कुरुनन्दनम् ॥ ९ ॥
उन महाधनुर्धर कौरवोंने कुरुकुलनन्दन अर्जुनको शक्ति, ऋष्टि, तोमर, प्रास, गदा, खड्ग और बाणोंके द्वारा ढक दिया ॥ ९ ॥
तामन्तरिक्षे विततां शस्त्रवृष्टिं समन्ततः ।
व्यधमत् पाण्डवो बाणैस्तमः सूर्य इवांशुभिः ॥ १० ॥
परंतु जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा अन्धकारको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार पाण्डुपुत्र अर्जुनने आकाशमें सब ओर फैली हुई उस बाणवर्षाको छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ १० ॥
ततो म्लेच्छाः स्थिता मत्तैस्त्रयोदशशतैर्गजैः ।
पार्श्वतो व्यहनन् पार्थं तव पुत्रस्य शासनात् ॥ ११ ॥
तब आपके पुत्र दुर्योधनकी आज्ञासे म्लेच्छसैनिक तेरह सौ मतवाले हाथियोंके साथ आ पहुँचे और पार्श्वभागमें खड़े हो अर्जुनको घायल करने लगे ॥ ११ ॥
कर्णिनालीकनाराचैस्तोमरप्रासशक्तिभिः ।
मुसलैर्भिन्दिपालैश्च रथस्थं पार्थमार्दयन् ॥ १२ ॥
उन्होंने रथपर बैठे हुए अर्जुनको कर्णी, नालीक, नाराच, तोमर, मूसल, प्रास, भिंदिपाल और शक्तियोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ १२ ॥
तां शस्त्रवृष्टिमतुलां द्विपहस्तैः प्रवेरिताम् ।
चिच्छेद निशितैर्भल्लैरर्धचन्द्रैश्च फाल्गुनः ॥ १३ ॥
हाथियोंकी सूँडोंद्वारा की हुई उस अनुपम शस्त्रवर्षाको अर्जुनने तीखे भल्लों तथा अर्धचन्द्रोंसे नष्ट कर दिया ॥ १३ ॥
अथ तान् द्विरदान् सर्वान् नानालिङ्गैः शरोत्तमैः ।
सपताकध्वजारोहान् गिरीन् वज्रैरिवाहन्त् ॥ १४ ॥
फिर नाना प्रकारके चिह्नवाले उत्तम बाणोंद्वारा पताका, ध्वज और सवारोंसहित उन सभी हाथियोंको उसी तरह मार गिराया, जैसे इन्द्रने वज्रके आघातोंसे पर्वतोंको धराशायी कर दिया था ॥ १४ ॥
ते हेमपुङ्खैरिषुभिर्दिता हेममालिनः ।
हताः पेतुर्महानागाः साग्निज्वाला इवाद्रयः ॥ १५ ॥
सोनेके पंखवाले बाणोंसे पीड़ित हुए वे सुवर्ण-मालाधारी बड़े-बड़े गजराज मारे जाकर आगकी ज्वालाओंसे युक्त पर्वतोंके समान धरतीपर गिर पड़े ॥ १५ ॥
ततो गाण्डीवनिर्घोषो महानासीद् विशाम्पते ।
स्तनतां कूजतां चैव मनुष्यगजवाजिनाम् ॥ १६ ॥
प्रजानाथ! तदनन्तर गाण्डीव धनुषकी टंकारध्वनि बड़े जोर-जोरसे सुनायी देने लगी। साथ ही चिग्घाड़ते और आर्तनाद करते हुए मनुष्यों, हाथियों तथा घोड़ोंकी आवाज भी वहाँ गूँज उठी ॥ १६ ॥
कुञ्जराश्च हता राजन् दुद्रुवुस्ते समन्ततः ।
अश्वाश्च पर्यधावन्त हतारोहा दिशो दश ॥ १७ ॥
राजन्! घायल हाथी सब ओर भागने लगे। जिनके सवार मार दिये गये थे, वे घोड़े भी दसों दिशाओंमें दौड़ लगाने लगे ॥ १७ ॥
रथा हीना महाराज रथिभिर्वाजिभिस्तथा ।
गन्धर्वनगराकारा दृश्यन्ते स्म सहस्रशः ॥ १८ ॥
महाराज! गन्धर्वनगरोंके समान सहस्रों विशाल रथ रथियों और घोड़ोंसे हीन दिखायी देने लगे ॥ १८ ॥
अश्वारोहा महाराज धावमाना इतस्ततः ।
तत्र तत्रैव दृश्यन्ते निहताः पार्थसायकैः ॥ १९ ॥
राजेन्द्र! अर्जुनके बाणोंसे घायल हुए अश्वारोही भी जहाँ-तहाँ इधर-उधर भागते दिखायी दे रहे थे ॥ १९ ॥
तस्मिन् क्षणे पाण्डवस्य बाह्वोर्बलमदृश्यत ।
यत् सादिनो वारणांश्च रथांश्चैकोऽजयद् युधि ॥ २० ॥
उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुनकी भुजाओंका बल देखा गया, उन्होंने अकेले ही युद्धमें रथों, सवारों और हाथियोंको भी परास्त कर दिया ॥ २० ॥
(असंयुक्ताश्च ते राजन् परिवृत्ता रणं प्रति ।
हया नागा रथाश्चैव नदन्तोऽर्जुनमभ्ययुः ॥)
राजन्! तदनन्तर पृथक्-पृथक् वे हाथी, घोड़े और रथ पुनः युद्धस्थलमें लौट आये और अर्जुनके सामने गर्जना करते हुए डट गये।
ततस्त्र्यङ्गेण महता बलेन भरतर्षभ ।
दृष्ट्वा परिवृतं राजन् भीमसेनः किरीटिनम् ॥ २१ ॥
हतावशेषानुत्सृज्य त्वदीयान् कतिचिद् रथान् ।
जवेनाभ्यद्रवद् राजन् धनंजयरथं प्रति ॥ २२ ॥
नरेश्वर! भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर अर्जुनको तीन अंगोंवाली विशाल सेनासे घिरा देख भीमसेन मरनेसे बचे हुए आपके कतिपय रथियोंको छोड़कर बड़े वेगसे धनंजयके रथकी ओर दौड़े ॥ २१-२२ ॥
ततस्तत् प्राद्रवत् सैन्यं हतभूयिष्ठमातुरम् ।
दृष्ट्वार्जुनं तदा भीमो जगाम भ्रातरं प्रति ॥ २३ ॥
उस समय आपके अधिकांश सैनिक मारे जा चुके थे, बहुत-से घायल होकर आतुर हो गये थे। फिर तो कौरव-सेनामें भगदड़ मच गयी। यह सब देखते हुए भीमसेन अपने भाई अर्जुनके पास आ पहुँचे ॥ २३ ॥
हतावशिष्टांस्तुरगानर्जुनेन महाबलान् ।
भीमो व्यधमदश्रान्तो गदापाणिर्महाहवे ॥ २४ ॥
भीमसेन अभी थके नहीं थे, उन्होंने हाथमें गदा ले उस महासमरमें अर्जुनद्वारा मारे जानेसे बचे हुए महाबली घोड़ों और सवारोंका संहार कर डाला ॥ २४ ॥
कालरात्रिमिवात्युग्रां नरनागाश्वभोजनाम् ।
प्राकाराट्टपुरद्वारदारणीमतिदारुणाम् ॥ २५ ॥
ततो गदां नृनागाश्वेष्वाशु भीमो व्यवासृजत् ।
सा जघान बहूनश्वांश्चारोहांश्च मारिष ॥ २६ ॥
मान्यवर नरेश! तदनन्तर भीमसेनने कालरात्रिके समान अत्यन्त भयंकर, मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंको कालका ग्रास बनानेवाली, परकोटों, अट्टालिकाओं और नगरद्वारोंको भी विदीर्ण कर देनेवाली अपनी अति दारुण गदाका वहाँ मनुष्यों, गजराजों तथा अश्वोंपर तीव्रवेगसे प्रहार किया। उस गदाने बहुत-से घोड़ों और घुड़सवारोंका संहार कर डाला ॥
कार्ष्णायसतनूत्राणान् नरानश्वांश्च पाण्डवः ।
पोथयामास गदया सशब्दं तेऽपतन् हताः ॥ २७ ॥
पाण्डुपुत्र भीमने काले लोहेका कवच पहने हुए बहुत-से मनुष्यों और अश्वोंको भी गदासे मार गिराया। वे सब-के-सब आर्तनाद करते हुए प्राणशून्य होकर गिर पड़े ॥
दन्तैर्दशन्तो वसुधां शेरते क्षतजोक्षिताः ।
भग्नमूर्धास्थिचरणाः क्रव्यादगणभोजनाः ॥ २८ ॥
घायल हुए कौरव-सैनिक खूनसे नहाकर दाँतोंसे ओठ चबाते हुए धरतीपर सो गये थे, किन्हींका माथा फट गया था, किन्हींकी हड्डियाँ चूर-चूर हो गयी थीं और किन्हींके पाँव उखड़ गये थे। वे सब-के-सब मांसभक्षी पशुओंके भोजन बन गये थे ॥ २८ ॥
असृङ्मांसवसाभिश्च तृप्तिमभ्यागता गदा ।
अस्थीन्यप्यश्नती तस्थौ कालरात्रीव दुर्द्दशा ॥ २९ ॥
वह गदा दुर्लक्ष्य कालरात्रिके समान शत्रुओंके रक्त, मांस और चर्बीसे तृप्त होकर उनकी हड्डियोंको भी चबाये जा रही थी ॥ २९ ॥
सहस्राणि दशाश्वानां हत्वा पत्तींश्च भूयसा ।
भीमोऽभ्यधावत् संक्रुद्धो गदापाणिरितस्ततः ॥ ३० ॥
दस हजार घोड़ों और बहुसंख्यक पैदलोंका संहार करके क्रोधमें भरे हुए भीमसेन हाथमें गदा लेकर इधर-उधर दौड़ने लगे ॥ ३० ॥
गदापाणिं ततो भीमं दृष्ट्वा भारत तावकाः ।
मेनिरे समनुप्राप्तं कालदण्डोद्यतं यमम् ॥ ३१ ॥
भरतनन्दन! भीमसेनको गदा हाथमें लिये देख आपके सैनिक कालदण्ड लेकर आया हुआ यमराज मानने लगे ॥
स मत्त इव मातङ्गः संक्रुद्धः पाण्डुनन्दनः ।
प्रविवेश गजानीकं मकरः सागरं यथा ॥ ३२ ॥
मतवाले हाथीके समान अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए पाण्डुनन्दन भीमसेनने शत्रुओंकी गजसेनामें प्रवेश किया, मानो मगर समुद्रमें जा घुसा हो ॥ ३२ ॥
विगाह्य च गजानीकं प्रगृह्य महतीं गदाम् ।
क्षणेन भीमः संक्रुद्धस्तन्निन्ये यमसादनम् ॥ ३३ ॥
विशाल गदा हाथमें ले अत्यन्त कुपित हो भीमसेनने हाथियोंकी सेनामें घुसकर उसे क्षणभरमें यमलोक पहुँचा दिया ॥ ३३ ॥
गजान् सकङ्कटान् मत्तान् सारोहान् सपताकिनः ।
पततः समपश्याम सपक्षाव् पर्वतानिव ॥ ३४ ॥
कवचों, सवारों और पताकाओंसहित मतवाले हाथियोंको हमने पंखधारी पर्वतोंके समान धराशायी होते देखा था ॥
हत्वा तु तद् गजानीकं भीमसेनो महाबलः ।
पुनः स्वरथमास्थाय पृष्ठतोऽर्जुनमभ्ययात् ॥ ३५ ॥
महाबली भीमसेन उस गजसेनाका संहार करके पुनः अपने रथपर आ बैठे और अर्जुनके पीछे-पीछे चलने लगे ॥
ततः पराङ्मुखप्रायं निरुत्साहं बलं तव ।
व्यालम्बत महाराज प्रायशः शस्त्रवेष्टितम् ॥ ३६ ॥
महाराज! उस समय भीमसेन और अर्जुनके अस्त्र-शस्त्रोंसे घिरी हुई आपकी अधिकांश सेना उत्साहशून्य, विमुख और जडवत् हो गयी ॥ ३६ ॥
विलम्बमानं तत् सैन्यमप्रगल्भमवस्थितम् ।
दृष्ट्वा प्राच्छादयद् बाणैरर्जुनः प्राणतापनैः ॥ ३७ ॥
उस सेनाको जडवत्, उद्योगशून्य हुई देख अर्जुनने प्राणोंको संतप्त कर देनेवाले बाणोंद्वारा उसे आच्छादित कर दिया ॥ ३७ ॥
नराश्वरथमातङ्गा युधि गाण्डीवधन्वना ।
शरव्रातैश्चिता रेजुः कदम्बा इव केसरैः ॥ ३८ ॥
युद्धस्थलमें गाण्डीवधारी अर्जुनके बाणोंसे छिदे हुए मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथी केसरयुक्त कदम्बपुष्पोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ३८ ॥
ततः कुरूणामभवदार्तनादो महान् नृप ।
नराश्वनागासुहरैर्वध्यतामर्जुनेषुभिः ॥ ३९ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके प्राण लेनेवाले अर्जुनके बाणोंद्वारा हताहत होते हुए कौरवोंका महान् आर्तनाद प्रकट होने लगा ॥ ३९ ॥
हाहाकृतं भृशं त्रस्तं लीयमानं परस्परम् ।
अलातचक्रवत् सैन्यं तदाभ्रमत तावकम् ॥ ४० ॥
महाराज! उस समय अत्यन्त भयभीत हो हाहाकार मचाती और एक-दूसरेकी आड़में छिपती हुई आपकी सेना अलातचक्रके समान वहाँ चक्कर काटने लगी ॥ ४० ॥
ततस्तद् युद्धमभवत् कुरूणां सुमहद् बलैः ।
न ह्यत्रासीदनिर्भिन्नो रथः सादी हयो गजः ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् कौरवोंकी सेनाके साथ महान् युद्ध होने लगा। उसमें कोई भी ऐसा रथ, सवार, घोड़ा अथवा हाथी नहीं था, जो अर्जुनके बाणोंसे विदीर्ण न हो गया हो ॥ ४१ ॥
आदीप्तमिव तत् सैन्यं शरैश्छिन्नतनुच्छदम् ।
आसीत् सुशोणितक्लिन्नं फुल्लाशोकवनं यथा ॥ ४२ ॥
उस समय सारी सेना जलती हुई-सी दिखायी देती थी। बाणोंसे उसके कवच छिन्न-भिन्न हो गये थे तथा वह खूनसे लथपथ हो खिले हुए अशोकवनके समान प्रतीत होती थी ॥ ४२ ॥
(तत् सैन्यं भरतश्रेष्ठ वध्यमानं शितैः शरैः ।
न जहौ समरं प्राप्य फाल्गुनं शत्रुतापनम् ॥
तत्राद्भुतमपश्याम कौरवाणां पराक्रमम् ।
वध्यमानापि यत् पार्थं न जहुर्भरतर्षभ ॥)
भरतश्रेष्ठ! शत्रुओंको तपानेवाले अर्जुनको सामने पाकर तीखे बाणोंसे मारी जाती हुई आपकी उस सेनाने युद्ध नहीं छोड़ा। भरतभूषण! वहाँ हमलोगोंने कौरवयोध्दाओंका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि वे मारे जानेपर भी अर्जुनको छोड़ नहीं रहे थे।
तं दृष्ट्वा कुरवस्तत्र विक्रान्तं सव्यसाचिनम् ।
निराशाः समपद्यन्त सर्वे कर्णस्य जीविते ॥ ४३ ॥
सव्यसाची अर्जुनको इस प्रकार पराक्रम प्रकट करते देख समस्त कौरव-सैनिक कर्णके जीवनसे निराश हो गये ॥ ४३ ॥
अविषह्यं तु पार्थस्य शरसम्पातमाहवे ।
मत्वा न्यवर्तन् कुरवो जिता गाण्डीवधन्वना ॥ ४४ ॥
गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा परास्त हुए कौरव-योद्धा समरांगणमें उनकी बाण-वर्षाको अपने लिये असह्य मानकर युद्धसे पीछे हटने लगे ॥ ४४ ॥
ते हित्वा समरे कर्णं वध्यमानाश्च सायकैः ।
प्रदुद्रुवुर्दिशो भीताश्चक्रुशुश्चापि सूतजम् ॥ ४५ ॥
बाणोंसे बिंध जानेके कारण वे भयभीत हो रणभूमिमें कर्णको अकेला ही छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चले; किंतु अपनी रक्षाके लिये सूतपुत्र कर्णको ही पुकारते रहे ॥ ४५ ॥
अभ्यद्रवत तान् पार्थः किरन् शरशतान् बहून् ।
हर्षयन् पाण्डवान् योधान् भीमसेनपुरोगमान् ॥ ४६ ॥
कुन्तीकुमार अर्जुन सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करते और भीमसेन आदि पाण्डव-योद्धाओंका हर्ष बढ़ाते हुए आपके उन सैनिकोंको खदेड़ने लगे ॥ ४६ ॥
पुत्रास्तु ते महाराज जग्मुः कर्णरथं प्रति ।
अगाधे मज्जतां तेषां द्वीपः कर्णोऽभवत्तदा ॥ ४७ ॥
महाराज! इसके बाद आपके पुत्र भागकर कर्णके रथके पास गये। वे संकटके अगाध समुद्रमें डूब रहे थे। उस समय कर्ण ही द्वीपके समान उनका रक्षक हुआ ॥ ४७ ॥
कुरवो हि महाराज निर्विषाः पन्नगा इव ।
कर्णमेवोपलीयन्त भयाद् गाण्डीवधन्वनः ॥ ४८ ॥
महाराज! कौरव विषरहित सर्पोंके समान गाण्डीवधारी अर्जुनके भयसे कर्णके ही पास छिपने लगे ॥ ४८ ॥
यथा सर्वाणि भूतानि मृत्योर्भीतानि मारिष ।
धर्ममेवोपलीयन्ते कर्मवन्ति हि यानि च ॥ ४९ ॥
तथा कर्णं महेष्वासं पुत्रास्तव नराधिप ।
उपालीयन्त संत्रासात् पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ५० ॥
माननीय नरेश! जैसे कर्म करनेवाले सब जीव मृत्युसे डरकर धर्मकी ही शरण लेते हैं, उसी प्रकार आपके पुत्र महामना पाण्डुपुत्र अर्जुनके भयसे महाधनुर्धर कर्णकी ही ओटमें छिपने लगे थे ॥ ४९-५० ॥
तान् शोणितपरिक्लिन्नान् विषमस्थान् शरातुरान् ।
मा भैष्टेत्यब्रवीत् कर्णो ह्यभीतो मामितेति च ॥ ५१ ॥
कर्णने उन्हें खूनसे लथपथ, संकटमें मग्न और बाणोंकी चोटसे व्याकुल देखकर कहा—‘वीरो! डरो मत। तुम सब लोग निर्भय होकर मेरे पास आ जाओ' ॥ ५१ ॥
सम्भग्नं हि बलं दृष्ट्वा बलात् पार्थेन तावकम् ।
धनुर्विस्फारयन् कर्णस्तस्थौ शत्रुजिघांसया ॥ ५२ ॥
अर्जुनने बलपूर्वक आपकी सेनाको भगा दिया है—यह देखकर कर्ण शत्रुओंका वध करनेकी इच्छासे धनुष तानकर खड़ा हो गया ।। ५२ ।।
तान् प्रद्रुतान् कुरून् दृष्ट्वा कर्णः शस्त्रभृतां वरः ।
संचिन्त्ययित्वा पार्थस्य वधे दध्रे मनःश्वसन् ।। ५३ ।।
शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्णने कौरव-सैनिकोंको भागते देख खूब सोच-विचारकर लंबी साँस लेते हुए मन-ही-मन अर्जुनके वधका निश्चय किया ।। ५३ ।।
विस्फार्य सुमहच्चापं ततश्चाधिरथिर्वृषः ।
पञ्चालान् पुनराधावत् पश्यतः सव्यसाचिनः ।। ५४ ।।
तत्पश्चात् धर्मात्मा अधिरथपुत्र कर्णने अपने विशाल धनुषको फैलाकर अर्जुनके देखते-देखते पुनः पांचाल-योद्धाओंपर धावा किया ।। ५४ ।।
ततः क्षणेन क्षितिपाः क्षतजप्रतिमेक्षणाः ।
कर्णं ववर्षुर्बाणौघैर्यथा मेघा महीधरम् ।। ५५ ।।
यह देख पांचालनरेशोंके नेत्र रोषसे लाल हो गये। जैसे बादल पर्वतपर पानी बरसाते हैं, उसी प्रकार वे क्षणभरमें कर्णपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ।। ५५ ।।
ततः शरसहस्राणि कर्णमुक्तानि मारिष ।
व्ययोजयन्त पञ्चालान् प्राणैः प्राणभृतां वर ।। ५६ ।।
प्राणधारियोंमें श्रेष्ठ मान्यवर नरेश! तदनन्तर कर्णके छोड़े हुए सहस्रों बाण पांचालोंको प्राणहीन करने लगे ।। ५६ ।।
तत्र शब्दो महानासीत् पञ्चालानां महामते ।
वध्यतां सूतपुत्रेण मित्रार्थे मित्रगृद्धिना ।। ५७ ।।
महामते! वहाँ मित्रका हित चाहनेवाले सूतपुत्र कर्णके द्वारा मित्रकी ही भलाईके लिये मारे जानेवाले पांचालोंका महान् आर्तनाद होने लगा ।। ५७ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकाशीतितमोऽध्यायः ।। ८१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८१ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६० श्लोक हैं।)