सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 573)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टाशीतितमोऽध्यायः

कौरव-सेनाके लिये अपशकुन, दुर्मर्षणका अर्जुनसे लड़नेका उत्साह तथा अर्जुनका रणभूमिमें प्रवेश एवं शंखनाद

संजय उवाच

ततो व्यूढेष्वनीकेषु समुत्कृष्टेषु मारिष ।
ताड्यमानासु भेरीषु मृदङ्गेषु नदत्सु च ॥ १ ॥
अनीकानां च संह्रादे वादित्राणां च निःस्वने ।
प्रध्मापितेषु शङ्खेषु संनादे लोमहर्षणे ॥ २ ॥
अभिहारयत्सु शनकैर्भरतेषु युयुत्सुषु ।
रौद्रे मुहूर्ते सम्प्राप्ते सव्यसाची व्यदृश्यत ॥ ३ ॥

**संजय कहते हैं—**आर्य! जब इस प्रकार कौरव-सेनाओंकी व्यूह-रचना हो गयी, युद्धके लिये उत्सुक सैनिक कोलाहल करने लगे, नगाड़े पीटे जाने लगे, मृदंग बजने लगे, सैनिकोंकी गर्जनाके साथ-साथ रणवाद्योंकी तुमुल ध्वनि फैलने लगी, शंख फूँके जाने लगे, रोमांचकारी शब्द गूँजने लगा और युद्धके इच्छुक भरतवंशी वीर जब कवच धारण करके धीरे-धीरे प्रहारके लिये उद्यत होने लगे, उस समय उग्र मुहूर्त आनेपर युद्धभूमिमें सव्यसाची अर्जुन दिखायी दिये ॥ १—३ ॥

बलानां वायसानां च पुरस्तात् सव्यसाचिनः ।
बहुलानि सहस्राणि प्राक्रीडंस्तत्र भारत ॥ ४ ॥

भारत! वहाँ सव्यसाची अर्जुनके सम्मुख आकाशमें कई हजार कौए और वायस क्रीडा करते हुए उड़ रहे थे ॥ ४ ॥

मृगाश्च घोरसंनादाः शिवाश्चाशिवदर्शनाः ।
दक्षिणेन प्रयातानामस्माकं प्राणदंस्तथा ॥ ५ ॥

और जब हमलोग आगे बढ़ने लगे, तब भयंकर शब्द करनेवाले पशु और अशुभ दर्शनवाले सियार हमारे दाहिने आकर कोलाहल करने लगे ॥ ५ ॥

(लोकक्षये महाराज यादृशास्तादृशा हि ते ।
अशिवा धार्तराष्ट्राणां शिवाः पार्थस्य संयुगे ॥)

महाराज! उस लोक-संहारकारी युद्धमें जैसे-तैसे अपशकुन प्रकट होने लगे, जो आपके पुत्रोंके लिये अमंगलकारी और अर्जुनके लिये मंगलकारी थे।

सनिर्घाता ज्वलन्त्यश्च पेतुरुल्काः सहस्रशः ।

चचाल च मही कृत्स्ना भये घोरे समुत्थिते ॥ ६ ॥
महान् भय उपस्थित होनेके कारण आकाशसे भयंकर गर्जनाके साथ सहस्रों जलती हुई उल्काएँ गिरने लगीं और सारी पृथ्वी काँपने लगी ॥ ६ ॥

विष्वग्वाताः सनिर्घाता रूक्षाः शर्करवर्षिणः ।
ववुर्रायाति कौन्तेये संग्रामे समुपस्थिते ॥ ७ ॥
अर्जुनके आने और संग्रामका अवसर उपस्थित होनेपर रेतकी वर्षा करनेवाली विकट गर्जन-तर्जनके साथ रूखी एवं चौवाई हवा चलने लगी ॥ ७ ॥

नाकुलिश्च शतानीको धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।
पाण्डवानामनीकानि प्राज्ञौ तौ व्यूहतुस्तदा ॥ ८ ॥
उस समय नकुलपुत्र शतानीक और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न—इन दोनों बुद्धिमान् वीरोंने पाण्डव सैनिकोंके व्यूहका निर्माण किया ॥ ८ ॥

ततो रथसहस्रेण द्विरदानां शतेन च ।
त्रिभिश्चश्वसहस्रैश्च पदातीनां शतैः शतैः ॥ ९ ॥
अध्यर्धमात्रे धनुषां सहस्रे तनयस्तव ।
अग्रतः सर्वसैन्यानां स्थित्वा दुर्मर्षणोऽब्रवीत् ॥ १० ॥
तदनन्तर एक हजार रथी, सौ हाथीसवार, तीन हजार घुड़सवार और दस हजार पैदल सैनिकोंके साथ आकर अर्जुनसे डेढ़ हजार धनुषकी दूरीपर स्थित हो समस्त कौरव सैनिकोंके आगे होकर आपके पुत्र दुर्मर्षणने इस प्रकार कहा— ॥ ९-१० ॥

अद्य गाण्डीवधन्वानं तपन्तं युद्धदुर्मदम् ।
अहमावारयिष्यामि वेलेव मकरालयम् ॥ ११ ॥
'जिस प्रकार तटभूमि समुद्रको आगे बढ़नेसे रोकती है, उसी प्रकार आज मैं युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले शत्रु-संतापी गाण्डीवधारी अर्जुनको रोक दूँगा ॥ ११ ॥

अद्य पश्यन्तु संग्रामे धनंजयममर्षणम् ।
विषक्तं मयि दुर्धर्षमश्मकूटमिवाश्मनि ॥ १२ ॥
'आज सब लोग देखें, जैसे पत्थर दूसरे प्रस्तरसमूहसे टकराकर रह जाता है, उसी प्रकार अमर्षशील दुर्धर्ष अर्जुन युद्धस्थलमें मुझसे भिड़कर अवरुद्ध हो जायँगे ॥ १२ ॥

तिष्ठध्वं रथिनो यूयं संग्राममभिकाङ्क्षिणः ।
युध्यामि संहतानेतान् यशो मानं च वर्धयन् ॥ १३ ॥
'संग्रामकी इच्छा रखनेवाले रथियो! आपलोग चुपचाप खड़े रहें। मैं कौरवकुलके यश और मानकी वृद्धि करता हुआ आज इन संगठित होकर आये हुए शत्रुओंके साथ युद्ध करूँगा' ॥ १३ ॥

एवं ब्रुवन्महाराज महात्मा स महामतिः ।
महेष्वासैर्वृतो राजन् महेष्वासो व्यवस्थितः ॥ १४ ॥

राजन्! महाराज! ऐसा कहता हुआ वह महामनस्वी महाबुद्धिमान् एवं महाधनुर्धर दुर्मर्षण बड़े-बड़े धनुर्धरोंसे घिरकर युद्धके लिये खड़ा हो गया ॥ १४ ॥

ततोऽन्तक इव क्रुद्धः सवज्र इव वासवः ।
दण्डपाणिरिवासह्यो मृत्युः कालेन चोदितः ॥ १५ ॥
शूलपाणिरिवाक्षोभ्यो वरुणः पाशवानिव ।
युगान्ताग्निरिवार्चिष्मान् प्रधक्ष्यन् वै पुनः प्रजाः ॥ १६ ॥
क्रोधामर्षबलोद्धूतो निवातकवचान्तकः ।
जयो जेता स्थितः सत्ये पारयिष्यन् महाव्रतम् ॥ १७ ॥
आमुक्तकवचः खड्गी जाम्बूनदकिरीटभृत् ।
शुभ्रमाल्याम्बरधरः स्वङ्गदश्चारुकुण्डलः ॥ १८ ॥
रथप्रवरमास्थाय नरो नारायणानुगः ।
विधुन्वन् गाण्डिवं संख्ये बभौ सूर्य इवोदितः ॥ १९ ॥

तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए यमराज, वज्रधारी इन्द्र, दण्डधारी असह्य अन्तक, कालप्रेरक मृत्यु, किसीसे भी क्षुब्ध न होनेवाले त्रिशूलधारी रुद्र, पाशधारी वरुण तथा पुनः समस्त प्रजाको दग्ध करनेके लिये उठे हुए ज्वालाओंसे युक्त प्रलयकालीन अग्निदेवके समान दुर्धर्ष वीर अर्जुन युद्धस्थलमें अपने श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए नवोदित सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे। वे क्रोध, अमर्ष और बलसे प्रेरित होकर आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने ही पूर्वकालमें निवातकवच नामक दानवोंका संहार किया था। वे जय नामके अनुसार ही विजयी होते थे। सत्यमें स्थित होकर अपने महान् व्रतको पूर्ण करनेके लिये उद्यत थे। उन्होंने कवच बाँध रखा था। मस्तकपर जाम्बूनद सुवर्णका बना हुआ किरीट धारण किया था। उनके कमरमें तलवार लटक रही थी। वे नरस्वरूप अर्जुन नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका अनुसरण करते हुए सुन्दर अंगदों (बाजूबन्द) और मनोहर कुण्डलोंसे सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने श्वेत माला और श्वेत वस्त्र पहन रखे थे ॥ १५—१९ ॥

सोऽग्रानीकस्य महत इषुपाते धनंजयः ।
व्यवस्थाप्य रथं राजन् शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ २० ॥

राजन्! प्रतापी अर्जुनने अपने सामने खड़ी हुई विशाल शत्रुसेनाके सम्मुख, जितनी दूरसे बाण मारा जा सके उतनी ही दूरीपर अपने रथको खड़ा करके शंख बजाया ॥ २० ॥

अथ कृष्णोऽप्यसम्भ्रान्तः पार्थेन सह मारिष ।
प्राध्मापयत् पाञ्चजन्यं शङ्खं प्रवरमोजसा ॥ २१ ॥
आर्य! तब श्रीकृष्णने भी अर्जुनके साथ बिना किसी घबराहटके अपने श्रेष्ठ शंख पांचजन्यको बलपूर्वक बजाया ॥ २१ ॥
तयोः शङ्खप्रणादेन तव सैन्ये विशाम्पते ।
आसन् संहृष्टरोमाणः कम्पिता गतचेतसः ॥ २२ ॥
प्रजानाथ! उन दोनोंके शंखनादसे आपकी सेनाके समस्त योद्धाओंके रोंगटे खड़े हो गये, सब लोग काँपते हुए अचेत-से हो गये ॥ २२ ॥
यथा त्रस्यन्ति भूतानि सर्वाण्यशनिनिःस्वनात् ।
तथा शङ्खप्रणादेन वित्रेसुस्तव सैनिकाः ॥ २३ ॥
जैसे वज्रकी गड़गड़ाहटसे सारे प्राणी थर्रा उठते हैं, उसी प्रकार उन दोनों वीरोंकी शंखध्वनिसे आपके समस्त सैनिक संत्रस्त हो उठे ॥ २३ ॥
प्रसुस्रुवुः शकृन्मूत्रं वाहनानि च सर्वशः ।
एवं सवाहनं सर्वमाविग्नमभवद् बलम् ॥ २४ ॥
सेनाके सभी वाहन भयके मारे मल-मूत्र करने लगे। इस प्रकार सवारियोंसहित सारी सेना उद्विग्न हो गयी ॥

सीदन्ति स्म नरा राजन् शङ्खशब्देन मारिष ।
विसंज्ञाश्चाभवन् केचित् केचिद् राजन् वितत्रसुः ॥ २५ ॥
आदरणीय महाराज! अपनी सेनाके सब मनुष्य वह शंखनाद सुनकर शिथिल हो गये। नरेश्वर! कितने ही तो मूर्च्छित हो गये और कितने ही भयसे थर्रा उठे ॥

ततः कपिर्महानादं सह भूतैर्ध्वजालयैः ।
अकरोद् व्यादितास्यश्च भीषयंस्तव सैनिकान् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनकी ध्वजामें निवास करनेवाले भूतगणोंके साथ वहाँ बैठे हुए हनुमान्जीने मुँह बाकर आपके सैनिकोंको भयभीत करते हुए बड़े जोरसे गर्जना की ॥

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्चानकैः सह ।
पुनरेवाभ्यहन्यन्त तव सैन्यप्रहर्षणाः ॥ २७ ॥
तब आपकी सेनामें भी पुनः मृदंग और ढोलके साथ शंख तथा नगाड़े बज उठे, जो आपके सैनिकोंके हर्ष और उत्साहको बढ़ानेवाले थे ॥ २७ ॥

नानावादित्रसंह्नादैः क्ष्वेडितास्फोटिताकुलैः ।
सिंहनादैः समुत्कृष्टैः समाधूतैर्महारथैः ॥ २८ ॥
तस्मिंस्तु तुमुले शब्दे भीरूणां भयवर्धने ।
अतीव हृष्टो दाशार्हमब्रवीत् पाकशासनिः ॥ २९ ॥
नाना प्रकारके रणवाद्योंकी ध्वनिसे, गर्जन-तर्जन करनेसे, ताल ठोंकनेसे, सिंहनादसे और महारथियोंके ललकारनेसे जो शब्द होते थे, वे सब मिलकर भयंकर हो उठे और भीरु पुरुषोंके हृदयमें भय उत्पन्न करने लगे। उस समय अत्यन्त हर्षमें भरे हुए इन्द्रपुत्र अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ॥ २८-२९ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि अर्जुनरणप्रवेशे
अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें अर्जुनका रणभूमिमें प्रवेशविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं।)