महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अर्जुन तथा कौरव-महारथियोंके ध्वजोंका वर्णन और नौ महारथियोंके साथ अकेले अर्जुनका युद्ध
पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुन तथा कौरव-महारथियोंके ध्वजोंका वर्णन और नौ महारथियोंके साथ अकेले अर्जुनका युद्ध
धृतराष्ट्र उवाच
ध्वजान् बहुविधाकारान् भ्राजमानानति श्रिया ।
पार्थानां मामकानां च तान् ममाचक्ष्व संजय ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! मेरे तथा कुन्तीके पुत्रोंके जो नाना प्रकारके ध्वज अत्यन्त शोभासे उद्भासित हो रहे थे, उनका मुझसे वर्णन करो ॥ १ ॥
संजय उवाच
ध्वजान् बहुविधाकारान् शृणु तेषां महात्मनाम् ।
रूपतो वर्णतश्चैव नामतश्च निबोध मे ॥ २ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! उन महामनस्वी वीरोंके जो नाना प्रकारकी आकृतिवाले ध्वज फहरा रहे थे, उनका रूप-रंग और नाम मैं बता रहा हूँ, सुनिये ॥ २ ॥
तेषां तु रथमुख्यानां रथेषु विविधा ध्वजाः ।
प्रत्यदृश्यन्त राजेन्द्र ज्वलिता इव पावकाः ॥ ३ ॥
राजेन्द्र! उन श्रेष्ठ महारथियोंके रथोंपर भाँति-भाँतिके ध्वज प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी दिखायी देते थे ॥ ३ ॥
काञ्चनाः काञ्चनापीडाः काञ्चनस्रगलंकृताः ।
काञ्चनानीव शृङ्गाणि काञ्चनस्य महागिरेः ॥ ४ ॥
वे ध्वज सोनेके बने थे। उनके ऊपरी भागको सुवर्णसे ही सजाया गया था। सोनेकी ही मालाओंसे वे अलंकृत थे। अतः सुवर्णमय महापर्वत सुमेरुके स्वर्णमय शिखरोंके समान सुशोभित होते थे ॥ ४ ॥
अनेकवर्णा विविधा ध्वजाः परमशोभनाः ।
ते ध्वजाः संवृतास्तेषां पताकाभिः समन्ततः ॥ ५ ॥
नानावर्णविरागाभिः शुशुभुः सर्वतो वृताः ।
वे परम शोभासम्पन्न अनेक प्रकारके बहुरंगे ध्वज सब ओरसे नाना रंगकी पताकाओंद्वारा घिरकर बड़ी शोभा पाते थे ॥ ५ ½ ॥
पताकाश्च ततस्तास्तु श्वसनेन समीरिताः ॥ ६ ॥
नृत्यमाना व्यदृश्यन्त रङ्गमध्ये विलासिकाः ।
उनकी वे पताकाएँ वायुसे संचालित हो रंगमंचपर नृत्य करनेवाली विलासिनियोंके समान दिखायी देती थीं ॥
इन्द्रायुधसवर्णाभाः पताका भरतर्षभ ।। ७ ।।
दोधूयमाना रथिनां शोभयन्ति महारथान् ।
भरतश्रेष्ठ! इन्द्रधनुषके समान प्रभाव़ाली फहराती हुई पताकाएँ रथियोंके विशाल रथोंकी शोभा बढ़ाती थीं ।।
सिंहलाङ्गूलमुग्रास्यं ध्वजं वानरलक्षणम् ।। ८ ।।
धनंजयस्य संग्रामे प्रत्यदृश्यत भैरवम् ।
उस संग्राममें अर्जुनका भयंकर ध्वज वानरके चिह्नसे सुशोभित दिखायी देता था। उस वानरकी पूँछ सिंहके समान थी और उसका मुख बड़ा ही उग्र था ।। ८ १/२ ।।
स वानरवरो राजन् पताकाभिरलंकृतः ।। ९ ।।
त्रासयामास तत् सैन्यं ध्वजो गाण्डीवधन्वनः ।
राजन्! श्रेष्ठ वानरसे सुशोभित तथा पताकाओंसे अलंकृत गाण्डीवधारी अर्जुनका वह ध्वज आपकी उस सेनाको भयभीत किये देता था ।। ९ १/२ ।।
तथैव सिंहलाङ्गूलं द्रोणपुत्रस्य भारत ।। १० ।।
ध्वजाग्रं समपश्याम बालसूर्यसमप्रभम् ।
भारत! इसी प्रकार हमलोगोंने द्रोणपुत्र अश्वत्थामा-के श्रेष्ठ ध्वजको प्रातःकालीन सूर्यके समान अरुण कान्तिसे प्रकाशित देखा था। उसमें सिंहकी पूँछका चिह्न था ।। १० १/२ ।।
काञ्चनं पवनोद्धूतं शक्रध्वजसमप्रभम् ।। ११ ।।
नन्दनं कौरवेन्द्राणां द्रौणेर्लक्ष्म समुच्छ्रितम् ।
अश्वत्थामाका इन्द्रध्वजके समान प्रकाशमान सुवर्णमय ऊँचा ध्वज वायुकी प्रेरणासे फहराता हुआ कौरव-नरेशोंका आनन्द बढ़ा रहा था ।। ११ १/२ ।।
हस्तिकक्ष्या पुनर्हैमी बभूवाधिरथेर्ध्वजः ।। १२ ।।
आहवे खं महाराज ददृशे पूरयन्निव ।
अधिरथपुत्र कर्णका ध्वज हाथीकी सुवर्णमयी रस्सीके चिह्नसे युक्त था। महाराज! वह संग्राममें आकाशको भरता हुआ-सा दिखायी देता था ।। १२ १/२ ।।
पताका काञ्चनी स्रग्वी ध्वजे कर्णस्य संयुगे ।। १३ ।।
नृत्यतीव रथोपस्थे श्वसनेन समीरिता ।
युद्धस्थलमें कर्णके ध्वजपर सुवर्णमयी मालासे विभूषित पताका वायुसे आन्दोलित हो रथकी बैठकपर नृत्य-सा कर रही थी ।। १३ १/२ ।।
आचार्यस्य तु पाण्डूनां ब्राह्मणस्य तपस्विनः ।। १४ ।।
गोवृषो गौतमस्यासीत् कृपस्य सुपरिष्कृतः ।
स तेन भ्राजते राजन् गोवृषेण महारथः ॥ १५ ॥
त्रिपुरघ्नरथो यद्वद् गोवृषेण विराजता ।
पाण्डवोंके आचार्य, तपस्वी ब्राह्मण, गौतमगोत्रीय कृपाचार्यके ध्वजपर एक बैलका सुन्दर चिह्न अंकित था। राजन्! उनका वह विशाल रथ उस वृषभचिह्नसे बड़ी शोभा पा रहा था; ठीक उसी तरह, जैसे त्रिपुरनाशक महादेवजीका रथ सुन्दर वृषभचिह्नसे शोभायमान होता था ॥ १४-१५ १/२ ॥
मयूरो वृषसेनस्य काञ्चनो मणिरत्नवान् ॥ १६ ॥
व्याहरिष्यन्निवातिष्ठत् सेनाग्रमुपशोभयन् ।
वृषसेनका मणिरत्नविभूषित सुवर्णमय ध्वज मयूर-चिह्नसे युक्त था। वह मयूर सेनाके अग्रभागकी शोभा बढ़ाता हुआ इस प्रकार खड़ा था, मानो बोल देगा ॥ १६ १/२ ॥
तेन तस्य रथो भाति मयूरेण महात्मनः ॥ १७ ॥
यथा स्कन्दस्य राजेन्द्र मयूरेण विराजता ।
राजेन्द्र! जैसे स्वामी स्कन्दका रथ सुन्दर मयूर-चिह्नसे शोभित होता है, उसी प्रकार महामना वृषसेनका रथ उस मयूरचिह्नसे शोभा पा रहा था ॥ १७ १/२ ॥
मद्रराजस्य शल्यस्य ध्वजाग्रेऽग्निशिखामिव ॥ १८ ॥
सौवर्णीं प्रतिपश्याम सीतामप्रतिमां शुभाम् ।
मद्रराज शल्यकी ध्वजाके अग्रभागमें हमने अग्निशिखाके समान उज्ज्वल, सुवर्णमय, अनुपम तथा शुभ लक्षणोंसे युक्त एक सीता (हलसे भूमिपर खींची हुई रेखा) देखी थी ॥ १८ १/२ ॥
सा सीता भ्राजते तस्य रथमास्थाय मारिष ॥ १९ ॥
सर्वबीजविरूढेव यथा सीता श्रिया वृता ।
माननीय नरेश! जैसे खेतमें हलकी नोकसे बनी हुई रेखा सभी बीजोंके अंकुरित होनेपर शोभासम्पन्न दिखायी देती है, उसी प्रकार मद्रराजके रथका आश्रय ले वह सीता (हलद्वारा बनी हुई रेखा) बड़ी शोभा पा रही थी ॥ १९ १/२ ॥
वराहः सिन्धुराजस्य राजतोऽभिविराजते ॥ २० ॥
ध्वजाग्रेऽलोहितार्काभो हेमजालपरिष्कृतः ।
सिन्धुराज जयद्रथकी ध्वजाके अग्रभागमें उज्ज्वल सूर्यके समान श्वेत कान्तिमान् और सोनेकी जालीसे विभूषित चाँदीका बना हुआ वराहचिह्न अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ २० १/२ ॥
शुशुभे केतुना तेन राजतेन जयद्रथः ॥ २१ ॥
यथा देवासुरे युद्धे पुरा पूषा स्म शोभते ।
जैसे पूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें पूषा शोभा पाते थे, उसी प्रकार उस रजतनिर्मित ध्वजसे जयद्रथकी शोभा हो रही थी॥ २११/२॥
सौमदत्तेः पुनर्यूपो यज्ञशीलस्य धीमतः॥ २२॥
ध्वजः सूर्य इवाभाति सोमश्चात्र प्रदृश्यते।
सदा यज्ञमें लगे रहनेवाले बुद्धिमान् भूरिश्रवाके रथमें यूपका चिह्न बना था। वह ध्वज सूर्यके समान प्रकाशित होता था और उसमें चन्द्रमाका चिह्न भी दृष्टिगोचर होता था॥ २२१/२॥
स यूपः काञ्चनो राजन् सौमदत्तेर्विराजते॥ २३॥
राजसूये मखश्रेष्ठे यथा यूपः समुच्छ्रितः।
राजन्! जैसे यज्ञोंमें श्रेष्ठ राजसूयमें ऊँचा यूप सुशोभित होता है, भूरिश्रवाका वह सुवर्णमय यूप वैसे ही शोभा पा रहा था॥ २३१/२॥
शल्यस्य तु महाराज राजतो द्विरदो महान्॥ २४॥
केतुः काञ्चनचित्राङ्गैर्मयूरैरुपशोभितः।
स केतुः शोभयामास सैन्यं ते भरतर्षभ॥ २५॥
महाराज! शल्यके ध्वजमें चाँदीका महान् गजराज बना हुआ था। भरतश्रेष्ठ! वह ध्वज सुवर्णनिर्मित विचित्र अंगोंवाले मयूरोंसे सुशोभित था और आपकी सेनाकी शोभा बढ़ा रहा था॥ २४-२५॥
यथा श्वेतो महानागो देवराजचमूं तथा।
नागो मणिमयो राज्ञो ध्वजः कनकंसंवृतः॥ २६॥
जैसे श्वेत वर्णका महान् ऐरावत हाथी देवराजकी सेनाको सुशोभित करता है, उसी प्रकार राजा दुर्योधनका सुवर्णमण्डित ध्वज मणिमय गजराजके चिह्नसे उपलक्षित होता था॥ २६॥
किंकिणीशतसंह्लादो भ्राजंश्चित्रो रथोत्तमे।
व्यभ्राजत भृशं राजन् पुत्रस्तव विशाम्पते॥ २७॥
ध्वजेन महता संख्ये कुरूणामृषभस्तदा।
प्रजानाथ! वह विचित्र ध्वज दुर्योधनके उत्तम रथपर सैकड़ों क्षुद्रघंटिकाओंकी ध्वनिसे शोभायमान था। उस महान् ध्वजसे युद्धस्थलमें आपके पुत्र कुरुश्रेष्ठ दुर्योधनकी उस समय बड़ी शोभा हो रही थी॥ २७१/२॥
नवैते तव वाहिन्यामुच्छ्रिताः परमध्वजाः॥ २८॥
व्यदीपयंस्ते पृतनां युगान्तादित्यसंनिभाः।
ये नौ उत्तम ध्वज आपकी सेनामें बहुत ऊँचे थे और प्रलयकालके सूर्यके समान अपना प्रकाश फैलाते हुए आपकी सेनाको उद्भासित कर रहे थे॥ २८१/२॥
दशमस्त्वर्जुनस्यासीदेक एव महाकपिः ॥ २९ ॥
अदीप्यतार्जुनो येन हिमवानिव वह्निना ।
दसवाँ ध्वज एकमात्र अर्जुनका ही था, जो विशाल वानरचिह्नसे सुशोभित था। उससे अर्जुन उसी प्रकार देदीप्यमान हो रहे थे, जैसे अग्निसे हिमालय पर्वत उद्भासित होता है ॥ २९ १/२ ॥
ततश्चित्राणि शुभ्राणि सुमहान्ति महारथाः ॥ ३० ॥
कार्मुकाण्याददुस्तूर्णमर्जुनार्थे परंतपाः ।
तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले उन सब महारथियोंने अर्जुनको मारनेके लिये तुरंत ही विचित्र, चमकीले और विशाल धनुष हाथमें ले लिये ॥ ३० १/२ ॥
तथैव धनुरारयच्छत् पार्थः शत्रुविनाशनः ॥ ३१ ॥
गाण्डीवं दिव्यकर्मा तद् राजन् दुर्मन्त्रिते तव ।
राजन्! उसी प्रकार दिव्य कर्म करनेवाले शत्रुनाशन पार्थने भी आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप अपने गाण्डीव धनुषको खींचा ॥ ३१ १/२ ॥
तवापराधाद् राजानो निहता बहुशो युधि ॥ ३२ ॥
नानादिग्भ्यः समाहूताः सहयाः सरथद्विपाः ।
महाराज! आपके अपराधसे उस युद्धस्थलमें अनेक दिशाओंसे आमन्त्रित होकर आये हुए बहुत-से राजा अपने घोड़ों, रथों और हाथियोंसहित मारे गये हैं ॥ ३२ १/२ ॥
तेषामासीद् व्यतिक्षेपो गर्जतामितरेतरम् ॥ ३३ ॥
दुर्योधनमुखानां च पाण्डूनामृषभस्य च ।
उस समय एक-दूसरेको लक्ष्य करके गर्जना करनेवाले दुर्योधन आदि महारथियों तथा पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनमें परस्पर आघात-प्रतिघात होने लगा ॥ ३३ १/२ ॥
तत्राद्भुतं परं चक्रे कौन्तेयः कृष्णसारथिः ॥ ३४ ॥
यदेको बहुभिः सार्धं समागच्छदभीतवत् ।
वहाँ श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं, उन कुन्तीकुमार अर्जुनने यह अत्यन्त अद्भुत पराक्रम किया कि अकेले ही बहुतोंके साथ निर्भय होकर युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ ३४ १/२ ॥
अशोभत महाबाहुर्गाण्डीवं विक्षिपन् धनुः ॥ ३५ ॥
जिगीषूस्तान् नरव्याघ्रो जिघांसुश्च जयद्रथम् ।
उनपर विजय पानेकी इच्छा रखकर जयद्रथके वधकी अभिलाषासे गाण्डीव धनुषको खींचते हुए पुरुषसिंह महाबाहु अर्जुनकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ३५ १/२ ॥
तत्रार्जुनो नरव्याघ्रः शरैर्मुक्त्तैः सहस्रशः ॥ ३६ ॥
अदृश्यांस्तावकान् योधन् प्रचक्रे शत्रुतापनः ।
उस समय शत्रुओंको संताप देनेवाले नरव्याघ्र अर्जुनने अपने छोड़े हुए सहस्रों बाणोंद्वारा आपके योद्धाओंको अदृश्य कर दिया ।। ३६½ ।।
ततस्तेऽपि नरव्याघ्राः पार्थं सर्वे महारथाः ।। ३७ ।।
अदृश्यं समरे चक्रुः सायकौघैः समन्ततः ।
तब उन सभी पुरुषसिंह महारथियोंने भी समरांगणमें सब ओरसे बाणसमूहोंकी वर्षा करके अर्जुनको अदृश्य कर दिया ।। ३७½ ।।
संवृते नरसिंहैस्तु कुरूणामृषभेऽर्जुने ।
महानासीत् समुद्भूतस्तस्य सैन्यस्य निःस्वनः ।। ३८ ।।
जब कुरुश्रेष्ठ अर्जुन उन पुरुषसिंहोंद्वारा घेर लिये गये, तब उस सेनामें महान् कोलाहल प्रकट हुआ ।। ३८ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि ध्वजवर्णने
पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें ध्वजवर्णनविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०५ ।।