महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२९२-
द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
मार्कण्डेयजीके द्वारा राजा युधिष्ठिरको आश्वासन
मार्कण्डेय उवाच
एवमेतन्महाबाहो रामेणामिततेजसा ।
प्राप्तं व्यसनमत्युग्रं वनवासकृतं पुरा ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— महाबाहु युधिष्ठिर! इस प्रकार प्राचीन कालमें अमिततेजस्वी श्रीरामने वनवासजनित अत्यन्त भयंकर कष्ट भोगा था ॥ १ ॥
मा शुचः पुरुषव्याघ्र क्षत्रियोऽसि परंतप ।
बाहुवीर्याश्रिते मार्गे वर्तसे दीप्तनिर्णये ॥ २ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह! तुम क्षत्रिय हो, शोक न करो। तुम तो उस मार्गपर चल रहे हो, जहाँ केवल अपने बाहुबलका भरोसा किया जाता है तथा जहाँ अभीष्ट फलकी प्राप्ति प्रत्यक्ष एवं असंदिग्ध है ॥ २ ॥
न हि ते वृजिनं किंचिद् वर्तते परमाण्वपि ।
अस्मिन् मार्गे निषीदेयुः सेन्द्रा अपि सुरसुराः ॥ ३ ॥
श्रीरामके कष्टके सामने तुम्हारा कष्ट अणुमात्र भी नहीं है। इन्द्रसहित देवता तथा असुर भी इस क्षत्रियधर्मके मार्गपर चले हैं ॥ ३ ॥
संहत्य निहतो वृत्रो मरुद्भिर्वज्रपाणिना ।
नमुचिश्चैव दुर्धर्षो दीर्घजिह्वा च राक्षसी ॥ ४ ॥
वज्रपाणि इन्द्रने मरुद्गणोंके साथ मिलकर वृत्रासुर, दुर्धर्ष वीर नमुचि तथा दीर्घजिह्वा राक्षसीका वध किया था ॥ ४ ॥
सहायवति सर्वार्थाः संतिष्ठन्तीह सर्वशः ।
किं नु तस्याजितं संख्ये यस्य भ्राता धनंजयः ॥ ५ ॥
जो सहायकोंसे सम्पन्न है, उसके सभी मनोरथ इस जगत्में सब प्रकारसे सिद्ध होते हैं। फिर जिसे धनंजय-जैसा भाई मिला हो, वह युद्धमें किसे परास्त नहीं कर सकता ॥ ५ ॥
अयं च बलिनां श्रेष्ठो भीमो भीमपराक्रमः ।
युवानौ च महेष्वासौ वीरौ माद्रवतीसुतौ ॥ ६ ॥
ये भयंकर पराक्रमी भीमसेन बलवानोंमें श्रेष्ठ हैं। माद्रीनन्दन वीर नकुल-सहदेव भी महान् धनुर्धर तथा नवयुवक हैं ॥ ६ ॥
एभिः सहायैः कस्मात् त्वं विषीदसि परंतप ।
य इमे वज्रिणः सेनां जयेयुः समरुद्गणाम् ॥ ७ ॥
परंतप! इन सब सहायकोंके होते हुए तुम विषाद क्यों करते हो? तुम्हारे ये भाई तो मरुद्गणोंसहित वज्रधारी इन्द्रकी सेनाको भी परास्त कर सकते हैं ॥ ७ ॥
त्वमप्येभिर्महेष्वासैः सहायैर्देवरूपिभिः ।
विजेष्यसे रणे सर्वानमित्रान् भरतर्षभ ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! तुम भी इन देवस्वरूप महाधनुर्धर भाइयोंकी सहायतासे अपने समस्त शत्रुओंको युद्धमें जीत लोगे ॥ ८ ॥
इतश्च त्वमिमां पश्य सैन्धवेन दुरात्मना ।
बलिना वीर्यमत्तेन हृतामेभिर्महात्मभिः ॥ ९ ॥
आनीतां द्रौपदीं कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
जयद्रथं च राजानं विजितं वशमागतम् ॥ १० ॥
इधर इस द्रौपदीकी ओर देखो। अपने पराक्रमके मदसे उन्मत्त महाबली दुरात्मा सिन्धुराजने इसे हर लिया था; परंतु तुम्हारे इन महात्मा बन्धुओंने अत्यन्त दुष्कर कर्म करके द्रुपदकुमारी कृष्णाको पुनः लौटा लिया तथा राजा जयद्रथको भी परास्त करके अपने अधीन कर लिया था ॥ ९-१० ॥
असहायेन रामेण वैदेही पुनराहृता ।
हत्वा संख्ये दशग्रीवं राक्षसं भीमविक्रमम् ॥ ११ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके तो कोई स्वजातीय सहायक भी नहीं थे, तो भी उन्होंने युद्धमें भयंकर पराक्रमी राक्षस दशाननका वध करके विदेहनन्दिनी सीताको पुनः लौटा लिया ॥ ११ ॥
यस्य शाखामृगा मित्राण्यूक्षाः कालमुखास्तथा ।
जात्यन्तरगता राजन्नेतद् बुद्ध्यानुचिन्तय ॥ १२ ॥
राजन्! दूसरी योनिके प्राणी वानर, लंगूर तथा रीछ ही उनके मित्र अथवा सहायक थे (किंतु तुम्हारे तो चार शूरवीर भाई सहायक हैं)। इस बातपर बुद्धिद्वारा विचार करो ॥ १२ ॥
तस्मात् स त्वं कुरुश्रेष्ठ मा शुचो भरतर्षभ ।
त्वद्विधा हि महात्मानो न शोचन्ति परंतप ॥ १३ ॥
अतः कुरुश्रेष्ठ! भरतभूषण! तुम शोक न करो। क्योंकि परंतप! तुम्हारे-जैसे महात्मा पुरुष कभी शोक नहीं करते ॥ १३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमाश्वासितो राजा मार्कण्डेयेन धीमता ।
त्यक्त्वा दुःखमदीनात्मा पुनरेप्येनमब्रवीत् ॥ १४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! परम बुद्धिमान् मार्कण्डेय मुनिके इस प्रकार आश्वासन देनेपर उदार हृदयवाले राजा युधिष्ठिर दुःख-शोक छोड़कर पुनः उनसे इस प्रकार
बोले ।। १४ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि युधिष्ठिराश्वासने द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २९२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासनविषयक दो सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २९२ ।।