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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

२८६-

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षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

प्रहस्त और धूम्राक्षके वधसे दुःखी हुए रावणका कुम्भकर्णको जगाना और उसे युद्धमें भेजना

मार्कण्डेय उवाच

ततः प्रहस्तः सहसा समभ्येत्य विभीषणम् ।
गदया ताडयामास विनद्य रणकर्कशः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर युद्धमें निष्ठुर पराक्रम दिखानेवाले प्रहस्तने सहसा विभीषणके पास पहुँचकर गर्जना करते हुए उनपर गदासे आघात किया ॥ १ ॥

स तयाभिहतो धीमान् गदया भीमवेगया ।
नाकम्पत महाबाहुर्हिमवानिव सुस्थिरः ॥ २ ॥
भयानक वेगवाली उस गदासे आहत होकर भी बुद्धिमान् महाबाहु विभीषण विचलित नहीं हुए। वे हिमालयके समान सुस्थिरभावसे खड़े रहे ॥ २ ॥

ततः प्रगृह्य विपुलां शतघण्टां विभीषणः ।
अनुमन्त्र्य महाशक्तिं चिक्षेपास्य शिरः प्रति ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् विभीषणने एक विशाल महाशक्ति हाथमें ली, जिसमें शोभाके लिये सौ घंटियाँ लगी हुई थीं। उसे अभिमन्त्रित करके उन्होंने प्रहस्तके मस्तकपर दे मारा ॥ ३ ॥

पतन्त्या स तया वेगाद् राक्षसोऽशनिवेगया ।
हृत्तोत्तमाङ्गो ददृशे वातरुग्ण इव द्रुमः ॥ ४ ॥
विद्युत्के समान वेगवाली उस महाशक्तिका वेगपूर्वक आघात होते ही राक्षस प्रहस्तका मस्तक धड़से अलग हो गया और वह आँधीके द्वारा उखाड़े हुए वृक्षकी भाँति धराशायी दिखायी देने लगा ॥ ४ ॥

तं दृष्ट्वा निहतं संख्ये प्रहस्तं क्षणदाचरम् ।
अभिदुद्राव धूम्राक्षो वेगेन महता कपीन् ॥ ५ ॥
निशाचर प्रहस्तको युद्धमें मारा गया देख धूम्राक्ष बड़े वेगसे वानरोंकी ओर दौड़ा ॥ ५ ॥

तस्य मेघोपमं सैन्यमापतद् भीमदर्शनम् ।
दृष्ट्वैव सहसा दीर्णा रणे वानरपुङ्गवाः ॥ ६ ॥
मेघोंकी काली घटाके समान भयानक दिखायी देनेवाली उसकी सेनाको आते देख सभी श्रेष्ठ वानर सहसा भयभीत होकर युद्धसे भाग चले ॥ ६ ॥

ततस्तान् सहसा दीर्णान् दृष्ट्वा वानरपुङ्गवान् ।
निर्ययौ कपिशार्दूलो हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ७ ॥
उन भयभीत प्रमुख वानरोंको सहसा पलायन करते देख कपिकेसरी मारुतनन्दन हनुमान्‌जी धूम्राक्षका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ७ ॥

तं दृष्ट्वावस्थितं संख्ये हरयः पवनात्मजम् ।
महत्या त्वरया राजन् संन्यवर्तन्त सर्वशः ॥ ८ ॥
राजन्! पवनकुमारको युद्धके लिये उपस्थित देख सभी वानर सब ओरसे बड़ी उतावलीके साथ लौट आये ॥ ८ ॥

ततः शब्दो महानासीत् तुमुलो लोमहर्षणः ।
रामरावणसैन्यानामन्योन्यमभिधावताम् ॥ ९ ॥
फिर तो एक-दूसरेपर धावा बोलती हुई श्रीराम तथा रावणकी सेनाओंका अत्यन्त भयंकर रोमाञ्चकारी कोलाहल आरम्भ हो गया ॥ ९ ॥

तस्मिन् प्रवृत्ते संग्रामे घोरे रुधिरकर्दमे ।
धूम्राक्षः कपिसैन्यं तद् द्रावयामास पत्रिभिः ॥ १० ॥
उस घोर संग्राममें धरतीपर रक्तकी कीच जम गयी थी। इसी समय धूम्राक्ष अपने बाणोंसे उस वानरसेनाको खदेड़ने लगा ॥ १० ॥

तं स रक्षोमहामात्रमापतन्तं सपत्नजित् ।
प्रतिजग्राह हनुमांस्तरसा पवनात्मजः ॥ ११ ॥
तब शत्रुविजयी पवननन्दन हनुमान्‌ने अपनी ओर आते हुए उस विशालकाय राक्षसको बड़े वेगसे धर दबाया ॥ ११ ॥

तयोर्युद्धमभूद् घोरं हरिराक्षसवीरयोः ।
जिगीषतोर्युधान्योन्यमिन्द्रप्रह्लादयोरिव ॥ १२ ॥
उन दोनों वानर तथा राक्षसवीरोंमें भयंकर युद्ध छिड़ गया। वे इन्द्र और प्रह्लादकी भाँति युद्ध करके एक-दूसरेको जीतना चाहते थे ॥ १२ ॥

गदाभिः परिघैश्चैव राक्षसो जघ्निवान् कपिम् ।
कपिश्च जघ्निवान् रक्षः सस्कन्धविटपैर्द्रुमैः ॥ १३ ॥
निशाचर धूम्राक्षने गदाओं तथा परिघोंद्वारा कपिवर हनुमान्‌जीको चोट पहुँचायी और हनुमान्‌जीने उस राक्षसपर तने और डालियोंसहित वृक्षोंसे प्रहार किया ॥

ततस्तमतिकोपेन साश्वं सरथसारथिम् ।
धूम्राक्षमवधीत् क्रुद्धो हनूमान् मारुतात्मजः ॥ १४ ॥
तदनन्तर मारुतनन्दन हनुमान्‌जीने अत्यन्त कुपित हो घोड़े, रथ और सारथिसहित धूम्राक्षको मार डाला ॥

ततस्तं निहतं दृष्ट्वा धूम्राक्षं राक्षसोत्तमम् ।

हरयो जातविस्रम्भा जघ्नुरन्ये च सैनिकान् ।। १५ ।।
राक्षसप्रवर धूम्राक्षको मारा गया देख अन्य वानर तथा भालुओंको अपनी शक्तिपर विश्वास हुआ और वे उत्साहपूर्वक राक्षसोंको मारने लगे ।। १५ ।।
ते वध्यमाना हरिभिर्बलिभिर्जितकाशिभिः ।
राक्षसा भग्नसंकल्पा लङ्कामभ्यपतन् भयात् ।। १६ ।।
विजयसे उल्लसित हुए बलवान् वानर वीरोंकी मार खाकर राक्षस हताश हो गये और भयके मारे लंकाकी ओर भाग चले ।। १६ ।।
तेऽभिपत्य पुरं भग्ना हतशेषा निशाचराः ।
सर्वं राज्ञे यथावृत्तं रावणाय न्यवेदयन् ।। १७ ।।
मरनेसे बचे हुए उन निशाचरोंने भग्नमनोरथ होकर लङ्कापुरीमें प्रवेश किया तथा रावणके समीप जाकर युद्धका सब समाचार ज्यों-का-त्यों निवेदन कर दिया ।। १७ ।।
श्रुत्वा तु रावणस्तेभ्यः प्रहस्तं निहतं युधि ।
धूम्राक्षं च महेष्वासं ससैन्यं वानरर्षभैः ।। १८ ।।
सुदीर्घमिव निःश्वस्य समुत्पत्य वरासनात् ।
उवाच कुम्भकर्णस्य कर्मकालोऽयमागतः ।। १९ ।।
उनके मुखसे श्रेष्ठ वानर वीरोंद्वारा युद्धमें सेनासहित प्रहस्त तथा महाधनुर्धर धूम्राक्षके मारे जानेका वृत्तान्त सुनकर रावण बड़ी देरतक शोकभरे उच्छ्वास लेता रहा। फिर वह अपने श्रेष्ठ सिंहासनसे उछलकर खड़ा हो गया और बोला—'अब यह कुम्भकर्णके पराक्रम दिखलानेका समय आ गया है' ।। १८-१९ ।।
इत्येवमुक्त्वा विविधैर्वादित्रैः सुमहास्वनैः ।
शयानमतिनिद्रालुं कुम्भकर्णमबोधयत् ।। २० ।।
ऐसा कहकर रावणने अत्यन्त उच्च स्वरसे बजनेवाले भाँति-भाँतिके बाजे बजवाकर अधिक नींद लेनेवाले सोये हुए कुम्भकर्णको जगाया ।। २० ।।
प्रबोध्य महता चैनं यत्नेनागतसाध्वसः ।
स्वस्थमासीनमव्यग्रं विनिद्रं राक्षसाधिपः ।। २१ ।।
ततोऽब्रवीद् दशग्रीवः कुम्भकर्णं महाबलम् ।
धन्योऽसि यस्य ते निद्रा कुम्भकर्णेयमीदृशी ।। २२ ।।
महान् प्रयत्नद्वारा उसे जगाकर भयभीत हुए राक्षसराज रावणने, जब महाबली कुम्भकर्ण स्वस्थ, शान्त तथा निद्रारहित होकर बैठ गया, तब उससे इस प्रकार कहा—'भैया कुम्भकर्ण! तुम धन्य हो जिसे ऐसी नींद आती है ।। २१-२२ ।।
य इदं दारुणाकारं न जानीषे महाभयम् ।
एष तीर्त्वार्णवं रामः सेतुना हरिभिः सह ।। २३ ।।
अवमन्येह नः सर्वान् करोति कदनं महत् ।

मया त्वपहृता भार्या सीता नामास्य जानकी ॥ २४ ॥
‘हमलोगोंपर जो यह अत्यन्त दारुण एवं महान् भय उपस्थित हुआ है, इसका तुम्हें पता ही नहीं है। यह राम सेतुद्वारा समुद्रको लाँघकर हमलोगोंकी अवहेलना करके वानरोंके साथ यहाँ आ पहुँचा है और राक्षसोंका महासंहार कर रहा है। मैंने इसकी पत्नी जनककुमारी सीताका अपहरण किया था ॥ २३-२४ ॥
तां नेतुं स इहायातो बद्ध्वा सेतुं महार्णवे ।
तेन चैव प्रहस्तादिर्महान् नः स्वजनो हतः ॥ २५ ॥
‘उसे वापस लेनेके लिये ही राम महासागरपर पुल बाँधकर यहाँ आया है। उसने हमारे प्रहस्त आदि प्रमुख स्वजनोंको मार डाला है ॥ २५ ॥
तस्य नान्यो निहन्तास्ति त्वामृते शत्रुकर्शन ।
स दंशितोऽभिनिर्याय त्वमद्य बलिनां वर ॥ २६ ॥
रामादीन् समरे सर्वाञ्जहि शत्रूनरिंदम ।
‘शत्रुसूदन! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उसको मार सके। बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर! तुम शत्रुओंका दमन करनेवाले हो। आज कवच धारण करके निकलो तथा राम आदि समस्त शत्रुओंका समरभूमिमें संहार कर डालो ॥ २६½ ॥
दूषणावरजौ चैव वज्रवेगप्रमाथिनौ ॥ २७ ॥
तौ त्वां बलेन महता सहितावनुयास्यतः ।
‘दूषणके छोटे भाई वज्रवेग और प्रमाथी अपनी विशाल सेनाके साथ तुम्हारा अनुसरण करेंगे’ ॥ २७½ ॥
इत्युक्त्वा राक्षसपतिः कुम्भकर्णं तरस्विनम् ।
संदिदेशेतिकर्तव्यं वज्रवेगप्रमाथिनौ ॥ २८ ॥
वेगशाली वीर कुम्भकर्णसे ऐसा कहकर राक्षसराज रावणने वज्रवेग और प्रमाथीको, युद्धमें क्या-क्या करना है, इन सब बातोंको समझाया और उनके पालनका आदेश दिया ॥ २८ ॥
तथेत्युक्त्वा तु तौ वीरौ रावणं दूषणानुजौ ।
कुम्भकर्णं पुरस्कृत्य तूर्णं निर्ययतुः पुरात् ॥ २९ ॥
दूषणके वे दोनों वीर भाई रावणसे ‘तथास्तु’ कहकर कुम्भकर्णको आगे करके तुरंत नगरसे बाहर निकले ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि कुम्भकर्णनिर्गमने
षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें कुम्भकर्णका युद्धके लिये प्रस्थानविषयक दो सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८६ ॥