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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

२५५-

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पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी

वैशम्पायन उवाच

जित्वा तु पृथिवीं राजन् सूतपुत्रो जनाधिप ।
अब्रवीत् परवीरघ्नो दुर्योधनमिदं वचः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज जनमेजय! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सूतपुत्र कर्णने सारी पृथ्वीको जीतकर दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

कर्ण उवाच

दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ।
श्रुत्वा वाचं तथा सर्वं कर्तुमर्हस्यरिंदम ॥ २ ॥

**कर्ण बोला—**कुरुनन्दन दुर्योधन! मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो। शत्रुदमन! मेरी बात सुनकर उसके अनुसार सब कुछ करो ॥ २ ॥

तवाद्य पृथिवी वीर निःसपत्ना नृपोत्तम ।
तां पालय यथा शक्रो हतशत्रुर्महामनाः ॥ ३ ॥

वीर! नृपश्रेष्ठ! आज सारी पृथ्वी तुम्हारे लिये निष्कण्टक हो गयी है। जैसे महामना इन्द्र अपने शत्रुओंका संहार करके त्रिलोकीका पालन करते हैं, उसी प्रकार तुम भी इस पृथ्वीका पालन करो ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु कर्णेन कर्णं राजाब्रवीत् पुनः ।
न किंचिद् दुर्लभं तस्य यस्य त्वं पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
सहायश्चानुरक्तश्च मदर्थं च समुद्यतः ।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं वै शृणु यथातथम् ॥ ५ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कर्णके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने पुनः उससे कहा—'पुरुषश्रेष्ठ! जिसके सहायक तुम हो एवं जिसपर तुम्हारा अनुराग है, उसके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है। तुम सदा मेरे हितके लिये उद्यत रहते हो। मेरा एक मनोरथ है, जिसे यथार्थरूपसे बतलाता हूँ, सुनो' ॥ ४-५॥

राजसूयं पाण्डवस्य दृष्ट्वा क्रतुवरं महत् ।
मम स्पृहा समुत्पन्ना तां सम्पादय सूतज ॥ ६ ॥

सूतनन्दन! 'पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके उस क्रतुश्रेष्ठ महान् राजसूययज्ञको देखकर मेरे मनमें

भी उसे करनेकी इच्छा जाग उठी है। तुम इस इच्छाको पूर्ण करो' ।। ६ ।।

एवमुक्तस्ततः कर्णो राजानमिदमब्रवीत् ।

तवाद्य पृथिवीपाला वश्याः सर्वे नृपोत्तम ॥ ७ ॥

आहूयन्तां द्विजवराः सम्भाराश्च यथाविधि ।

सम्भ्रियन्तां कुरुश्रेष्ठ यज्ञोपकरणानि च ।। ८ ।।

दुर्योधनकी यह बात सुनकर कर्णने उससे यह कहा—'नृपश्रेष्ठ! इस समय भूपाल

तुम्हारे वशमें हैं। कुरुकुलश्रेष्ठ! उत्तम ब्राह्मणोंको बुलाओ और विधिपूर्वक यज्ञकी सामग्रियों

तथा उपकरणोंको जुटाओ ।। ७-८ ।।

ऋत्विजश्च समाहूता यथोक्ता वेदपारगाः ।

क्रियां कुर्वन्तु ते राजन् यथाशास्त्रमरिंदम ॥ ९ ॥

'शत्रुदमन नरेश! तुम्हारे द्वारा आमन्त्रित शास्त्रोक्त योग्यतासे सम्पन्न वेदज्ञ ऋत्विक्

विधिके अनुसार सब कार्य करें ।। ९ ।।

बह्वन्नपानसंयुक्तः सुसमृद्धगुणान्वितः ।

प्रवर्त्ततां महायज्ञस्तवापि भरतर्षभ ॥ १० ॥

'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारा महायज्ञ भी प्रचुर अन्नपानकी सामग्रीसे युक्त और अत्यन्त

समृद्धिशाली गुणोंसे सम्पन्न हो' ।। १० ।।

एवमुक्तस्तु कर्णेन धार्तराष्ट्रो विशाम्पते ।

पुरोहितं समानाय्य वचनं चेदमब्रवीत् ।। ११ ।।

राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं समाप्तवरदक्षिणम् ।

आहर त्वं मम कृते यथान्यायं यथाक्रमम् ।। १२ ।।

राजन्! कर्णके इस प्रकार अनुमोदन करनेपर दुर्योधनने अपने पुरोहितको बुलाकर यह

बात कही—'ब्रह्मन्! आप मेरे लिये उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका यथोचित

रीतिसे विधिपूर्वक अनुष्ठान करवाइये' ।। ११-१२ ।।

स एवमुक्तो नृपतिमुवाच द्विजसत्तमः ।

(ब्राह्मणैः सहितो राजन् ये तत्रासन् समागताः ।)

न स शक्यः क्रतुश्रेष्ठो जीवमाने युधिष्ठिरे ।। १३ ।।

आहर्तुं कौरवश्रेष्ठ कुले तव नृपोत्तम ।

दीर्घायुर्जीवति च ते धृतराष्ट्रः पिता नृप ।। १४ ।।

अतश्चापि विरुद्धस्ते क्रतुरेष नृपोत्तम ।

नरेश्वर! राजाके इस प्रकार आदेश देनेपर विप्रवर पुरोहितने वहाँ आये हुए अन्य

ब्राह्मणोंके साथ इस प्रकार उत्तर दिया—'कौरवश्रेष्ठ! नृपशिरोमणे! राजा युधिष्ठिरके जीते

आपके कुलमें इस उत्तम क्रतु राजसूयका अनुष्ठान नहीं किया जा सकता। महाराज! अभी

आपके दीर्घायु पिता धृतराष्ट्र भी जीवित हैं, इसलिये भी यह यज्ञ आपके लिये अनुकूल नहीं पड़ता ।।

अस्ति त्वन्यन्महत् सत्रं राजसूयसमं प्रभो ॥ १५ ॥
प्रभो! एक-दूसरा महान् यज्ञ है, जो राजसूयकी समानता रखता है ॥ १५ ॥

तेन त्वं यज राजेन्द्र शृणु चेदं वचो मम ।
य इमे पृथिवीपालाः करदास्तव पार्थिव ॥ १६ ॥
ते करान् सम्प्रयच्छन्तु सुवर्णं च कृताकृतम् ।
तेन ते क्रियतामद्य लाङ्गलं नृपसत्तम ॥ १७ ॥
‘राजेन्द्र! आप उसीके द्वारा भगवान्‌का यजन कीजिये और इसके सम्बन्धमें मेरी यह बात सुनिये। पृथ्वीनाथ! ये जो सब भूपाल आपको कर देते हैं, इन्हें आज्ञा दीजिये—ये लोग आपको सुवर्णके बने हुए आभूषण तथा सुवर्ण ‘कर’ के रूपमें अर्पण करें। नृपश्रेष्ठ! उसी सुवर्णसे आप एक हल तैयार करवाइये ॥ १६-१७ ॥

यज्ञवाटस्य ते भूमिः कृष्यतां तेन भारत ।
तत्र यज्ञो नृपश्रेष्ठ प्रभूतान्नः सुसंस्कृतः ॥ १८ ॥
प्रवर्ततां यथान्यायं सर्वतो ह्यनिवारितः ।
‘भारत! उसी हलसे आपके यज्ञमण्डपकी भूमि जोती जाय। नृपश्रेष्ठ! उस जोती हुई भूमिमें ही उत्तम संस्कारसे सम्पन्न, प्रचुर अन्नपानसे युक्त और सबके लिये खुला हुआ यज्ञ यथोचितरूपसे प्रारम्भ किया जाय ॥ १८ १/२ ॥

एष ते वैष्णवो नाम यज्ञः सत्पुरुषोचितः ॥ १९ ॥
एतेन नेष्टवान् कश्चिदृते विष्णुं पुरातनम् ।
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं स्पर्धत्येष महाक्रतुः ॥ २० ॥
‘यह मैंने आपको वैष्णव नामक यज्ञ बताया है जिसका अनुष्ठान सत्पुरुषोंके लिये सर्वथा उचित है। पुरातन पुरुष भगवान् विष्णुके सिवा और किसीने अबतक इस यज्ञका अनुष्ठान नहीं किया है। यह महायज्ञ क्रतुश्रेष्ठ राजसूयसे टक्कर लेनेवाला है ॥ १९-२० ॥

अस्माकं रोचते चैव श्रेयश्च तव भारत ।
निर्विघ्नश्च भवत्येष सफला स्यात् स्पृहा तव ॥ २१ ॥
‘भारत! हमलोगोंको तो यही यज्ञ पसंद है और यही आपके लिये कल्याणकारी होगा। यह यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधाके सम्पन्न हो जाता है; अतः तुम्हारी यह यज्ञविषयक अभिलाषा भी इसीसे सफल होगी ॥ २१ ॥

(तस्मादेष महाबाहो तव यज्ञः प्रवर्तताम् ।)
एवमुक्तस्तु तैर्विप्रैर्धार्तराष्ट्रो महीपतिः ।
कर्णं च सौबलं चैव भ्रातॄंश्चैवेदमब्रवीत् ॥ २२ ॥

‘इसलिये महाबाहो! तुम्हारा यह यज्ञ आरम्भ होना चाहिये।’ उन ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने कर्ण, शकुनि तथा अपने भाइयोंसे इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥
रोचते मे वचः कृत्स्नं ब्राह्मणानां न संशयः ।
रोचते यदि युष्माकं तस्मात् प्रब्रूत मा चिरम् ॥ २३ ॥
‘बन्धुओ! मुझे तो इन ब्राह्मणोंकी सारी बातें रुचिकर जान पड़ती हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यदि तुमलोगोंको भी यह बात अच्छी लगे तो शीघ्र अपनी सम्मति प्रकट करो’ ॥ २३ ॥
एवमुक्तास्तु ते सर्वे तथेत्यूचुर्नराधिपम् ।
संदिदेश ततो राजा व्यापारस्थान् यथाक्रमम् ॥ २४ ॥
हलस्य करणे चापि व्यादिष्टाः सर्वशिल्पिनः ।
यथोक्तं च नृपश्रेष्ठ कृतं सर्वं यथाक्रमम् ॥ २५ ॥
यह सुनकर उन सबने राजासे ‘तथास्तु’ कहकर उसकी हाँ-में-हाँ मिला दी। तदनन्तर राजा दुर्योधनने काममें लगे हुए सब शिल्पियोंको क्रमशः हल बनानेकी आज्ञा दी। नृपश्रेष्ठ! राजाकी आज्ञा पाकर सब शिल्पियोंने तदनुसार सारा कार्य क्रमशः सम्पन्न किया ॥ २४-२५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनयज्ञसमारम्भे पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनयज्ञसमारम्भविषयक दो सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं)