महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२५४-
चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
कर्णके द्वारा सारी पृथ्वीपर दिग्विजय और हस्तिनापुरमें उसका सत्कार
वैशम्पायन उवाच
ततः कर्णो महेष्वासो बलेन महता वृतः ।
द्रुपदस्य पुरं रम्यं रुरोध भरतर्षभ ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तदनन्तर महाधनुर्धर कर्णने अपनी विशाल सेनाके साथ जाकर राजा द्रुपदके रमणीय नगरको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १ ॥
युद्धेन महता चैनं चक्रे वीरं वशानुगम् ।
सुवर्णं रजतं चापि रत्नानि विविधानि च ॥ २ ॥
करं च दापयामास द्रुपदं नृपसत्तम ।
तं विनिर्जित्य राजेन्द्र राजानस्तस्य येऽनुगाः ॥ ३ ॥
तान् सर्वान् वशगांश्चक्रे करं चैनानदापयत् ।
फिर महान् युद्ध करके उसने वीर द्रुपदको अपने वशमें कर लिया और उन्हें सोना, चाँदी, भाँति-भाँतिके रत्न एवं कर देनेके लिये विवश किया। नृपश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! इस प्रकार द्रुपदको जीतकर कर्णने उनके अनुयायी नरेशोंको भी अपने अधीन कर लिया और उन सबसे भी कर वसूल किया ॥ २-३½ ॥
अथोत्तरां दिशं गत्वा वशे चक्रे नराधिपान् ॥ ४ ॥
भगदत्तं च निर्जित्य राधेयो गिरिमारुहत् ।
हिमवन्तं महाशैलं युध्यमानश्च शत्रुभिः ॥ ५ ॥
प्रययौ च दिशः सर्वान् नृपतीन् वशमानयत् ।
स हैमवतिकान् जित्वा करं सर्वानदापयत् ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् उसने उत्तर दिशामें जाकर वहाँके राजाओंको अपने वशमें कर लिया। भगदत्तको जीतकर राधानन्दन कर्ण शत्रुओंसे युद्ध करता हुआ महान् पर्वत हिमालयपर आरूढ़ हुआ। वहाँसे सब दिशाओंमें जाकर उसने समस्त राजाओंको अपने अधीन किया और हिमालयप्रदेशके समस्त भूपालोंको जीतकर उनसे कर लिया ॥ ४—६ ॥
नेपालविषये ये च राजानस्तानवाजयत् ।
अवतीर्य ततः शैलात् पूर्वा दिशमभिद्रुतः ॥ ७ ॥
तदनन्तर नेपालदेशमें जो राजा थे, उनपर भी विजय प्राप्त की, फिर हिमालय पर्वतसे उतरकर उसने पूर्व दिशाकी ओर धावा किया ॥ ७ ॥
अङ्गान् वङ्गान् कलिङ्गांश्च शुण्डिकान् मिथिलानथ ।
मागधान् कर्कखण्डांश्च निवेश्य विषयेऽऽत्मनः ॥ ८ ॥
आवशीरंश्च योध्यांश्च अहिक्षत्रं च निर्जयत् ।
पूर्वां दिशं विनिर्जित्य वत्सभूमिं तथागमत् ॥ ९ ॥
अंग, वंग, कलिंग, शुण्डिक, मिथिला, मगध और कर्कखण्ड—इन सब देशोंको अपने राज्यमें मिलाकर कर्णने आवशीर, योध्य और अहिक्षत्र देशको भी जीत लिया। इस प्रकार पूर्व दिशापर विजय प्राप्त करके उसने वत्सभूमिमें पदार्पण किया ॥ ८-९ ॥
वत्सभूमिं विनिर्जित्य केवलां मृत्तिकावतीम् ।
मोहनं पत्तनं चैव त्रिपुरीं कोसलां तथा ॥ १० ॥
एतान् सर्वान् विनिर्जित्य करमादाय सर्वशः ।
वत्सभूमिको जीतकर कर्णने केवला, मृत्तिकावती, मोहन, पत्तन, त्रिपुरी तथा कोसला—इन सब देशोंको अपने अधिकारमें किया और सबसे कर लेकर (दक्षिण दिशाकी ओर) प्रस्थान किया ॥ १० १/२ ॥
दक्षिणां दिशमास्थाय कर्णो जित्वा महारथान् ॥ ११ ॥
रुक्मिणं दाक्षिणात्येषु योधयामास सूतजः ।
स युद्धं तुमुलं कृत्वा रुक्मी प्रोवाच सूतजम् ॥ १२ ॥
दक्षिण दिशामें पहुँचकर कर्णने बड़े-बड़े महारथियोंको जीता। दाक्षिणात्योमें रुक्मीके साथ कर्णने युद्ध किया। रुक्मीने पहले तो बड़ा भयंकर युद्ध किया, फिर उसने सूतपुत्र कर्णसे कहा ॥ ११-१२ ॥
प्रीतोऽस्मि तव राजेन्द्र विक्रमेण बलेन च ।
न ते विघ्नं करिष्यामि प्रतिज्ञां समपालयम् ॥ १३ ॥
‘राजेन्द्र! मैं तुम्हारे बल और पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हारे कार्यमें विघ्न नहीं डालूँगा। थोड़ी देर युद्ध करके मैंने केवल क्षत्रियधर्मका पालन किया है ॥ १३ ॥
प्रीत्या चाहं प्रयच्छामि हिरण्यं यावदिच्छसि ।
समेत्य रुक्मिणा कर्णः पाण्ड्यंशैलं च सोऽगमत् ॥ १४ ॥
‘तुम जितना सोना ले जाना चाहो उतना मैं प्रसन्नतापूर्वक दे रहा हूँ।’ इस प्रकार रुक्मीसे मिलकर कर्णने पाण्ड्यदेश तथा श्रीशैलकी ओर प्रस्थान किया ॥
स केरलं रणे चैव नीलं चापि महीपतिम् ।
वेणुदारिसुतं चैव ये चान्ये नृपसत्तमाः ॥ १५ ॥
दक्षिणस्यां दिशि नृपान् करान् सर्वानदापयत् ।
उसने रणभूमिमें केरल नरेश, राजा नील तथा वेणुदारिपुत्रको हराया और दक्षिण दिशामें अन्य जितने प्रमुख भूपाल थे, उन सबको जीतकर उनसे कर वसूल किया ॥ १५ १/२ ॥
शैशुपालिं ततो गत्वा विजिग्ये सूतनन्दनः ।। १६ ।।
पार्श्वस्थांश्चापि नृपतीन् वशे चक्रे महाबलः ।
इसके बाद सूतपुत्र महाबली कर्णने चेदिदेशमें जाकर शिशुपालके पुत्रको हराया और उसके पार्श्ववर्ती नरेशोंको भी अपने अधीन कर लिया ।। १६½ ।।
आवन्त्यांश्च वशे कृत्वा साम्ना च भरतर्षभ ।
वृष्णिभिः सह संगम्य पश्चिमामपि निर्जयत् ।। १७ ।।
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर उसने सामनीतिके द्वारा अवन्तीदेशके राजाओंको वशमें करके वृष्णिवंशी यादवोंसे हिल-मिलकर पश्चिम दिशापर भी विजय प्राप्त की ।। १७ ।।
वारुणीं दिशमागम्य यवनान् बर्बरांस्तथा ।
नृपान् पश्चिमभूमिस्थान् दापयामास वै करान् ।। १८ ।।
इसके बाद पश्चिम दिशामें जाकर यवन तथा बर्बर राजाओंको, जो पश्चिम देशके ही निवासी थे, पराजित करके उनसे कर लिया ।। १८ ।।
विजित्य पृथिवीं सर्वां स पूर्वापरदक्षिणाम् ।
सम्लेच्छाटविकान् वीरः सपर्वतनिवासिनः ।। १९ ।।
भद्रान् रोहितकांश्चैव आग्रेयान् मालवानपि ।
गणान् सर्वान् विनिर्जित्य नीतिकृत् प्रहसन्निव ।। २० ।।
शशकान् यवनांश्चैव विजिग्ये सूतनन्दनः ।
इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सब दिशाओंकी समूची पृथ्वीको जीतकर म्लेच्छ, वनवासी, पर्वतीय, भद्र, रोहितक, आग्नेय तथा मालव आदि समस्त गणराज्योंको परास्त किया। इसके बाद नीतिके अनुसार काम करनेवाले सूतनन्दन कर्णने हँसते-हँसते शशक और यवन राजाओंको भी जीत लिया ।। १९-२०½ ।।
नग्नजित्प्रमुखांश्चैव गणान् जित्वा महारथान् ।। २१ ।।
एवं स पृथिवीं सर्वां वशे कृत्वा महारथः ।
विजित्य पुरुषव्याघ्रो नागसाह्वयमागमत् ।। २२ ।।
इस प्रकार पुरुषसिंह महारथी कर्ण नग्नजित् आदि महारथी नरेशसमुदायोंको जीतकर सारी पृथ्वीको पराजित करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात् हस्तिनापुरको लौट आया ।। २१-२२ ।।
तमागतं महेष्वासं धार्तराष्ट्रो जनाधिपः ।
प्रत्युद्गम्य महाराज सभ्रातृपितृबान्धवः ।। २३ ।।
अर्चयामास विधिना कर्णमाहवशोभिनम् ।
आश्रावयच्च तत् कर्म प्रीयमाणो जनेश्वरः ।। २४ ।।
महाराज! रणमें शोभा पानेवाले महाधनुर्धर कर्णको आया हुआ जान भाई, पिता तथा बन्धु-बान्धवोंसहित राजा दुर्योधनने उसकी अगवानी की और विधिपूर्वक उसका स्वागत-
सत्कार किया। तत्पश्चात् दुर्योधनने अत्यन्त प्रसन्न होकर कर्णके दिग्विजयकी सब ओर घोषणा करा दी ।।
यन्न भीष्मान्न च द्रोणान्न कृपान्न च बाह्लिकात् ।
प्राप्तवानस्मि भद्रं ते त्वत्तः प्राप्तं मया हि तत् ।। २५ ।।
तत्पश्चात् उसने कर्णसे कहा—'वीरवर! तुम्हारा कल्याण हो। मुझे भीष्मजीसे, आचार्य द्रोणसे, कृपाचार्यसे तथा बाह्लिकसे भी जो वस्तु नहीं मिली थी, वह तुमसे प्राप्त हो गयी ।। २५ ।।
बहुना च किमुक्तेन शृणु कर्ण वचो मम ।
सनाथोऽस्मि महाबाहो त्वया नाथेन सत्तम ।। २६ ।।
‘महाबाहु कर्ण! अधिक कहनेसे क्या लाभ? तुम मेरी बात सुनो। सत्पुरुषरत्न! तुम्हें अपना नाथ (सहायक) पाकर ही मैं सनाथ हूँ ।। २६ ।।
न हि ते पाण्डवाः सर्वे कलामर्हन्ति षोडशीम् ।
अन्ये वा पुरुषव्याघ्र राजानोऽभ्युदितोदिताः ।। २७ ।।
‘पुरुषसिंह! वे समस्त पाण्डव अथवा अन्य श्रेष्ठतम नरेश तुम्हारी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ।। २७ ।।
स भवान् धृतराष्ट्रं तं गान्धारीं च यशस्विनीम् ।
पश्य कर्ण महेष्वास अदितिं वज्रभृद् यथा ॥ २८ ॥
‘महाधनुर्धर कर्ण! अब तुम मेरे पूज्य पिता धृतराष्ट्र तथा यशस्विनी माता गान्धारीका उसी प्रकार दर्शन करो, जैसे वज्रधारी इन्द्र माता अदितिका दर्शन करते हैं’ ॥ २८ ॥
ततो हलहलाशब्दः प्रादुरासीद् विशाम्पते ।
हाहाकाराश्च बहवो नगरे नागसाह्वये ॥ २९ ॥
जनमेजय! तदनन्तर हस्तिनापुर नगरमें सब ओर बड़ा भारी कोलाहल मच गया। अनेक प्रकारके हाहाकार सुनायी देने लगे ॥ २९ ॥
केचिदेनं प्रशंसन्ति निन्दन्ति स्म तथापरे ।
तूष्णीमासंस्तथा चान्ये नृपास्तत्र जनाधिप ॥ ३० ॥
राजन्! कोई तो कर्णकी प्रशंसा करते थे और दूसरे उसकी निन्दा। अन्य कितने ही राजा निन्दा और प्रशंसा कुछ भी न करके मौन थे ॥ ३० ॥
एवं विजित्य राजेन्द्र कर्णः शस्त्रभृतां वरः ।
सपर्वतवनाकाशां ससमुद्रां सनिष्कुटाम् ॥ ३१ ॥
देशैरुच्चावचैः पूर्णां पत्तनैर्नगरैरपि ।
द्वीपैरानूपसम्पूर्णैः पृथिवीं पृथिवीपते ॥ ३२ ॥
कालेन नातिदीर्घेण वशे कृत्वा तु पार्थिवान् ।
अक्षयं धनमादाय सूतजो नृपमभ्ययात् ॥ ३३ ॥
महाराज! इस प्रकार शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र कर्णने पर्वत, वन, खुले स्थान, समुद्र, उद्यान, ऊँचे-नीचे देश, पुर और नगर, द्वीप और जलयुक्त प्रदेशोंसे युक्त सारी पृथ्वीको जीतकर थोड़े ही समयमें समस्त राजाओंको वशमें कर लिया और उनसे अटूट धनराशि लेकर वह राजा धृतराष्ट्रके समीप आया ॥ ३१—३३ ॥
प्रविश्य च गृहं राजन्नभ्यन्तरमरिंदम ।
गान्धारीसहितं वीरो धृतराष्ट्रं ददर्श सः ॥ ३४ ॥
पुत्रवच्च नरव्याघ्र पादौ जग्राह धर्मवित् ।
धृतराष्ट्रेण चाश्लिष्य प्रेम्णा चापि विसर्जितः ॥ ३५ ॥
शत्रुसूदन जनमेजय! धर्मज्ञ वीर कर्णने अन्तःपुरमें प्रवेश करके गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका दर्शन किया और पुत्रकी भाँति उसने उनके दोनों चरण पकड़ लिये। धृतराष्ट्रने भी उसे प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर विदा किया ॥
तदा प्रभृति राजा च शकुनिश्चापि सौबलः ।
जानते निर्जितान् पार्थान् कर्णेन युधि भारत ॥ ३६ ॥
भारत! तबसे राजा दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि युद्धमें कर्णद्वारा पाण्डवोंको पराजित हुआ ही समझने लगे ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदिग्विजये
चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २५४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदिग्विजयसम्बन्धी दो सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २५४ ।।