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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

२२९-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह

मार्कण्डेय उवाच

उपविष्टं तु तं स्कन्दं हिरण्यकवचस्रजम् ।
हिरण्यचूडमुकुटं हिरण्याक्षं महाप्रभम् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! स्कन्द सोनेका कवच, सोनेकी माला और सोनेकी कलँगीसे सुशोभित मुकुट धारण किये (सुन्दर आसनपर) बैठे थे। उनके नेत्रोंसे सुवर्णकी-सी ज्योति छिटक रही थी और उनके शरीरसे महान् तेजःपुंज प्रकट हो रहा था ॥ १ ॥
लोहिताम्बरसंवीतं तीक्ष्णदंष्ट्रं मनोरमम् ।
सर्वलक्षणसम्पन्नं त्रैलोक्यस्यापि सुप्रियम् ॥ २ ॥
उन्होंने लाल रंगके वस्त्रसे अपने अंगोंको आच्छादित कर रखा था। उनके दाँत बड़े तीखे थे और उनकी आकृति मनको लुभा लेनेवाली थी। वे समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा तीनों लोकोंके लिये अत्यन्त प्रिय थे ॥ २ ॥
ततस्तं वरदं शूरं युवानं मृष्टकुण्डलम् ।
अभजत् पद्मरूपा श्रीः स्वयमेव शरीरिणी ॥ ३ ॥
तदनन्तर वर देनेमें समर्थ, शौर्यसम्पन्न, युवा अवस्थासे सुशोभित तथा सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत कुमार कार्तिकेयका कमलके समान कान्तिवाली मूर्तिमती शोभाने स्वयं ही सेवन किया ॥ ३ ॥
श्रिया जुष्टः पृथुयशाः स कुमारवरस्तदा ।
निषण्णो दृश्यते भूतैः पौर्णमास्यां यथा शशी ॥ ४ ॥
मूर्तिमती शोभासे सेवित हो वहाँ बैठे हुए महा-यशस्वी सुन्दरकुमारको उस समय सब प्राणी पूर्णमासीके चन्द्रमाकी भाँति देखते थे ॥ ४ ॥
अपूजयन् महात्मानो ब्राह्मणास्तं महाबलम् ।
इदमाहुस्तदा चैव स्कन्दं तत्र महर्षयः ॥ ५ ॥
महामना ब्राह्मणोंने महाबली स्कन्दकी पूजा की और सब महर्षियोंने वहाँ आकर उनका इस प्रकार स्तवन किया ॥ ५ ॥

ऋषय ऊचुः

हिरण्यगर्भ भद्रं ते लोकानां शङ्करो भव ।
त्वया षड्रात्रजातेन सर्वे लोका वशीकृताः ॥ ६ ॥

**ऋषि बोले—**हिरण्यगर्भ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम समस्त जगत्‌के लिये कल्याणकारी बनो। तुम्हारे पैदा हुए अभी छः रातें ही बीती होंगी। इतनेमें ही तुमने समस्त लोकोंको अपने वशमें कर लिया है ॥ ६ ॥
अभयं च पुनर्दत्तं त्वयैवैषां सुरोत्तम ।
तस्मादिन्द्रो भवानस्तु त्रैलोक्यस्याभयंकरः ॥ ७ ॥
सुरश्रेष्ठ! फिर तुम्हींने इन सब लोकोंको अभय दान दिया है। अतः आजसे तुम इन्द्र होकर रहो और तीनों लोकोंके भयका निवारण करो ॥ ७ ॥

स्कन्द उवाच

किमिन्द्रः सर्वलोकानां करोतीह तपोधनाः ।
कथं देवगणांश्चैव पाति नित्यं सुरेश्वरः ॥ ८ ॥
**स्कन्द बोले—**तपोधनो! इन्द्र इस पदपर रहकर सम्पूर्ण लोकोंके लिये क्या करते हैं तथा वे देवेश्वर सदा समस्त देवताओंकी किस प्रकार रक्षा करते हैं? ॥ ८ ॥

ऋषय ऊचुः

इन्द्रो दधाति भूतानां बलं तेजः प्रजाः सुखम् ।
तुष्टः प्रयच्छति तथा सर्वान् कामान् सुरेश्वरः ॥ ९ ॥
**ऋषि बोले—**देवराज इन्द्र संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण प्राणियोंको बल, तेज, संतान और सुखकी प्राप्ति कराते हैं तथा उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ९ ॥
दुर्वृत्तानां संहरति व्रतस्थानां प्रयच्छति ।
अनुशास्ति च भूतानि कार्येषु बलसूदनः ॥ १० ॥
वे दुष्टोंका संहार करते और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सत्पुरुषोंको जीवन दान देते हैं। बल नामक दैत्यका विनाश करनेवाले इन्द्र सभी प्राणियोंको आवश्यक कार्योंमें लगनेका आदेश देते हैं ॥ १० ॥
असूर्ये च भवेत् सूर्यस्तथाचन्द्रे च चन्द्रमाः ।
भवत्यग्निश्च वायुश्च पृथिव्यापश्च कारणैः ॥ ११ ॥
सूर्यके अभावमें वे स्वयं ही सूर्य होते हैं और चन्द्रमाके न रहनेपर स्वयं ही चन्द्रमा बनकर उनका कार्य सम्पादन करते हैं। आवश्यकता पड़नेपर वे ही अग्नि, वायु, पृथिवी और जलका स्वरूप धारण कर लेते हैं ॥ ११ ॥
एतदिन्द्रेण कर्तव्यमिन्द्रे हि विपुलं बलम् ।
त्वं च वीर बली श्रेष्ठस्तस्मादिन्द्रो भवस्व नः ॥ १२ ॥
यह सब इन्द्रका कार्य है। इन्द्रमें अपरिमित बल होता है। वीर! तुम भी श्रेष्ठ बलवान् हो। अतः तुम्हीं हमारे इन्द्र हो जाओ ॥ १२ ॥

शक्र उवाच

भवस्वेन्द्रो महाबाहो सर्वेषां नः सुखावहः ।
अभिषिञ्चस्व चैवाद्य प्राप्तरूपोऽसि सत्तम ॥ १३ ॥
**इन्द्रने कहा—**महाबाहो! तुम्हीं इन्द्र बनो और हम सबको सुख पहुँचाओ। सज्जनशिरोमणे! तुम इस पदके सर्वथा योग्य हो। अतः आज ही इस पदपर अपना अभिषेक करा लो ॥ १३ ॥

स्कन्द उवाच
शाधि त्वमेव त्रैलोक्यमव्यग्रो विजये रतः ।
अहं ते किङ्करः शक्र न ममेन्द्रत्वमीप्सितम् ॥ १४ ॥
**स्कन्द बोले—**इन्द्रदेव! आप ही स्वस्थचित्त होकर तीनों लोकोंका शासन कीजिये और विजयप्राप्तिके कार्यमें संलग्न रहिये। मैं तो आपका सेवक हूँ। मुझे इन्द्र बननेकी इच्छा नहीं है ॥ १४ ॥

शक्र उवाच
बलं तवाद्भुतं वीर त्वं देवानांमरीन् जहि ।
अवज्ञास्यन्ति मां लोका वीर्येण तव विस्मिताः ॥ १५ ॥
इन्द्रत्वे तु स्थितं वीर बलहीनं पराजितम् ।
आवयोश्च मिथो भेदे प्रयतिष्यन्त्यतन्द्रिताः ॥ १६ ॥
**इन्द्रने कहा—**वीर! तुम्हारा बल अद्भुत है, अतः तुम्हीं देव-शत्रुओंका संहार करो। वीरवर! मैं तुम्हारे सामने पराजित होकर बलहीन सिद्ध हो गया हूँ। अतः तुम्हारे पराक्रमसे चकित होकर लोग मेरी अवहेलना करेंगे। यदि मैं इन्द्र पदपर स्थित रहूँ, तो भी सब लोग मेरा उपहास करेंगे और आलस्य छोड़कर हम दोनोंमें परस्पर फूट डालनेका प्रयत्न करेंगे ॥ १५-१६ ॥
भेदिते च त्वयि विभो लोको द्वैधमुपेप्स्यति ।
द्विधाभूतेषु लोकेषु निश्चितेष्वावयोस्तथा ॥ १७ ॥
विग्रहः सम्प्रवर्तेत भूतभेदान्महाबल ।
तत्र त्वं मां रणे तात यथाश्रद्धं विजेष्यसि ॥ १८ ॥
तस्मादिन्द्रो भवानेव भविता मा विचारय ।
प्रभो! यदि तुम फूट जाओगे तो जगत्के प्राणी दो भागोंमें बट जायँगे। महाबलवान् वीर! सम्पूर्ण लोकोंके निश्चय ही दो दलोंमें बट जाने तथा लोगोंके द्वारा भेदबुद्धि उत्पन्न किये जानेपर हम लोगोंमें युद्ध प्रारम्भ हो सकता है। तात! उस युद्धमें जैसा कि मेरा विश्वास है, तुम्हीं विजयी होओगे। अतः तुम्हीं इन्द्र हो जाओ। इस विषयमें कोई दूसरी बात मत सोचो ॥ १७-१८ १/२ ॥

स्कन्द उवाच

त्वमेव राजा भद्रं ते त्रैलोक्यस्य ममैव च ।। १९ ।।
करोमि किं च ते शक्र शासनं तद् ब्रवीहि मे ।
**स्कन्द बोले—**देवेन्द्र! आप ही देवराजके पदपर प्रतिष्ठित रहें। आपका कल्याण हो। आप ही तीनों लोकोंके तथा मेरे भी स्वामी हैं। आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ—? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।। १९ १/२ ।।

इन्द्र उवाच

अहमिन्द्रो भविष्यामि तव वाक्यान्महाबल ।। २० ।।
यदि सत्यमिदं वाक्यं निश्चयाद् भाषितं त्वया ।
यदि वा शासनं स्कन्द कर्तुमिच्छसि मे शृणु ।। २१ ।।
अभिषिञ्चस्व देवानां सेनापत्ये महाबल ।
**इन्द्रने कहा—**महाबलवान् स्कन्द! मैं तुम्हारे कहनेसे इन्द्र-पदपर प्रतिष्ठित रहूँगा। यदि वास्तवमें तुम मेरी आज्ञाका पालन करना चाहते हो, यदि तुमने यह निश्चित बात कही है, अथवा यदि तुम्हारा यह कथन सत्य है तो मेरी यह बात सुनो—महावीर! तुम देवताओंके सेनापतिके पदपर अपना अभिषेक करा लो ।। २०-२१ १/२ ।।

स्कन्द उवाच

दानवानां विनाशाय देवानामर्थसिद्धये ।। २२ ।।
गोब्राह्मणहितार्थाय सेनापत्येऽभिषिञ्च माम् ।
**स्कन्द बोले—**देवराज! दानवोंके विनाश, देवताओंके कार्यकी सिद्धि तथा गौओं और ब्राह्मणोंके हितके लिये आप सेनापतिके पदपर मेरा अभिषेक कीजिये ।। २२ १/२ ।।

मार्कण्डेय उवाच

सोऽभिषिक्तो मघवता सर्वैर्देवगणैः सह ।। २३ ।।
अतीव शुशुभे तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः ।
तत्र तत् काञ्चनं छत्रं ध्रियमाणं व्यरोचत ।। २४ ।।
यथैव सुसमिद्धस्य पावकस्यात्ममण्डलम् ।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर समस्त देवताओंसहित इन्द्रने कुमारका देवसेनापतिके पदपर अभिषेक कर दिया। उस सयम वहाँ महर्षियोंद्वारा पूजित होकर स्कन्दकी बड़ी शोभा हुई। उनके ऊपर तना हुआ वह सुवर्णमय छत्र उद्भासित हो रहा था, मानो प्रज्वलित अग्निका अपना ही मण्डल प्रकाशित होता हो ।। २३-२४ १/२ ।।
विश्वकर्मकृता चास्य दिव्या माला हिरण्मयी ।। २५ ।।
आबद्धा त्रिपुरघ्नेन स्वयमेव यशस्विना ।
आगम्य मनुजव्याघ्र सह देव्या परंतप ।। २६ ।।

नरश्रेष्ठ परंतप युधिष्ठिर! साक्षात् त्रिपुरनाशक यशस्वी भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीने वहाँ पधारकर स्कन्दके गलेमें विश्वकर्माकी बनायी हुई सोनेकी दिव्य माला पहनायी ॥ २५-२६ ॥
अर्चयामास सुप्रीतो भगवान् गोवृषध्वजः ।
रुद्रमग्निं द्विजाः प्राहु रुद्रसूनुस्ततस्तु सः ॥ २७ ॥
भगवान् वृषध्वज (शिव)-ने अत्यन्त प्रसन्न होकर स्कन्दका समादर किया। ब्राह्मणलोग अग्निको रुद्रका स्वरूप बताते हैं, इसलिये स्कन्द भगवान् रुद्रके ही पुत्र हैं ॥ २७ ॥
रुद्रेण शुक्रममुत्सृष्टं तच्छ्वेतः पर्वतोऽभवत् ।
पावकस्येन्द्रियं श्वेते कृत्तिकाभिः कृतं नगे ॥ २८ ॥
रुद्रने जिस वीर्यका त्याग किया था, वही श्वेत पर्वतके रूपमें परिणत हो गया। फिर कृत्तिकाओंने अग्निके वीर्यको श्वेत पर्वतपर पहुँचाया था ॥ २८ ॥
पूज्यमानं तु रुद्रेण दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः ।
रुद्रसूनुं ततः प्राहुर्गुहं गुणवतां वरम् ॥ २९ ॥
भगवान् रुद्रके द्वारा गुणवानोंमें श्रेष्ठ कुमार कार्तिकेयका सम्मान होता देख सब देवता कहने लगे, ये रुद्रके ही पुत्र हैं ॥ २९ ॥
अनुप्रविश्य रुद्रेण वह्निं जातो ह्ययं शिशुः ।
तत्र जातस्ततः स्कन्दो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ॥ ३० ॥
'रुद्रने अग्निमें प्रवेश करके इस शिशुको जन्म दिया है। रुद्रस्वरूप अग्निसे उत्पन्न होनेके कारण स्कन्द रुद्रके ही पुत्र कहलाये' ॥ ३० ॥
रुद्रस्य वह्नेः स्वाहायाः षण्णां स्त्रीणां च भारत ।
जातः स्कन्दः सुरश्रेष्ठो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ॥ ३१ ॥
भारत! सुरश्रेष्ठ स्कन्दका जन्म रुद्रस्वरूप अग्निसे, स्वाहासे तथा छः स्त्रियोंसे हुआ था। इसलिये वे भगवान् रुद्रके पुत्र हुए ॥ ३१ ॥
अरजे वाससी रक्ते वसानः पावकात्मजः ।
भाति दीप्तवपुः श्रीमान् रक्ताभ्राभ्यामिवांशुमान् ॥ ३२ ॥
अग्निनन्दन स्कन्द लाल रंगके दो स्वच्छ वस्त्र धारण किये कान्तिमान् एवं तेजस्वी शरीरसे ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो दो लाल बादलोंके साथ भगवान् अंशुमाली (सूर्य) सुशोभित हो रहे हों ॥ ३२ ॥
कुक्कुटश्चाग्निना दत्तस्तस्य केतुरलंकृतः ।
रथे समुच्छ्रितो भाति कालाग्निरिव लोहितः ॥ ३३ ॥
अग्निदेवने स्कन्दके लिये कुक्कुटके चिह्नसे अलंकृत ऊँचा ध्वज प्रदान किया था, जो रथपर अपनी अरुण प्रभासे प्रलयाग्निके समान उद्भासित होता था ॥ ३३ ॥
या चेष्टा सर्वभूतानां प्रभा शान्तिर्बलं तथा ।

अग्रतस्तस्य सा शक्तिर्देवानां जयवर्धिनी ॥ ३४ ॥
सम्पूर्ण भूतोंमें जो चेष्टा, प्रभा, शान्ति और बल है, वही कुमार कार्तिकेयके सम्मुख शक्तिरूपमें उपस्थित है। वह देवताओंकी विजयश्रीको बढ़ानेवाली है ॥ ३४ ॥
विवेश कवचं चास्य शरीरे सहजं तथा ।
युध्यमानस्य देवस्य प्रादुर्भवति तत् सदा ॥ ३५ ॥
तथा उन स्कन्ददेवके शरीरमें सहज (स्वाभाविक) कवचका प्रवेश हो गया, जो सदा उनके युद्ध करते समय प्रकट होता था ॥ ३५ ॥
शक्तिर्धर्मो बलं तेजः कान्तत्वं सत्यमुन्नतिः ।
ब्रह्मण्यत्वमसम्मोहो भक्तानां परिरक्षणम् ॥ ३६ ॥
निकृन्तनं च शत्रूणां लोकानां चाभिरक्षणम् ।
स्कन्देन सह जातानि सर्वाण्येव जनाधिप ॥ ३७ ॥
राजन्! शक्ति, धर्म, बल, तेज, कान्ति, सत्य, उन्नति, ब्राह्मणभक्ति, असम्मोह (विवेक), भक्तजनोंकी रक्षा, सुनका संहार और समस्त लोकोंका पालन—ये सारे गुण स्कन्दके साथ ही उत्पन्न हुए थे ॥ ३६-३७ ॥
एवं देवगणैः सर्वैः सोऽभिषिक्तः स्वलंकृतः ।
बभौ प्रतीतः सुमनाः परिपूर्णेन्दुमण्डलः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार समस्त देवताओं द्वारा सेनापतिके पदपर अभिषिक्त होकर विविध आभूषणोंसे विभूषित, विशुद्ध एवं प्रसन्न हृदयवाले स्कन्द पूर्ण चन्द्रमण्डलके समान सुशोभित हुए ॥ ३८ ॥
इष्टैः स्वाध्यायघोषैश्च देवतूर्यवरैरपि ।
देवगन्धर्वगीतैश्च सर्वैरप्सरसां गणैः ॥ ३९ ॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिस्तुष्टैर्हृष्टैः स्वलंकृतैः ।
सुसंवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा ॥ ४० ॥
उस समय अत्यन्त प्रिय लगनेवाले वेदमन्त्रोंकी ध्वनि सब ओर गूँज उठी, देवताओंके उत्तम वाद्य भी बजने लगे, देव और गन्धर्व गीत गाने लगे और समस्त अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। ये तथा और भी बहुत-से देवगण एवं पिशाचसमूह विविध अलंकारोंसे अलंकृत, हर्षोत्फुल्ल और संतुष्ट हो स्कन्दको घेरकर खड़े थे ॥ ३९-४० ॥
क्रीडन् भाति तदा देवैरभिषिक्तश्च पावकिः ।
अभिषिक्तं महासेनमपश्यन्त दिवौकसः ॥ ४१ ॥
विनिहत्य तमः सूर्यं यथेहाभ्युदितं तथा ।

उस समय इन सबसे घिरे हुए अग्निनन्दन कार्तिकेय देवताओंद्वारा अभिषिक्त हो भाँति-भाँतिकी क्रीडाएँ करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। देवताओंने सेनापति पदपर अभिषिक्त हुए कुमार महासेनको इस प्रकार देखा, मानो सूर्यदेव अन्धकारका नाश करके उदित हुए हों॥ ४१ १/२॥
अथैनमभ्ययुः सर्वा देवसेनाः सहस्रशः ॥ ४२ ॥
अस्माकं त्वं पतिरिति ब्रुवाणाः सर्वतो दिशः ।
तदनन्तर सारी देवसेनाएँ सहस्रोंकी संख्यामें सब दिशाओंसे उनके पास आयीं और कहने लगीं—'आप ही हमारे पति हैं'॥ ४२ १/२॥
ताः समासाद्य भगवान् सर्वभूतगणैर्वृतः ॥ ४३ ॥
अर्चितस्तु स्तुतश्चैव सान्त्वयामास ता अपि ।
समस्त भूतगणोंसे घिरे हुए भगवान् स्कन्दने उन देवसेनाओंको अपने समीप पाकर उन्हें सान्त्वना दी और स्वयं भी उनके द्वारा पूजित तथा प्रशंसित हुए॥ ४३ १/२॥
शतक्रतुश्चाभिषिच्य स्कन्दं सेनापतिं तदा ॥ ४४ ॥
सस्मार तां देवसेनां या सा तेन विमोक्षिता ।
उस समय इन्द्रने स्कन्दको सेनापति पदपर अभिषिक्त करनेके पश्चात् उस कुमारी देवसेनाका स्मरण किया, जिसका उन्होंने केशीके हाथसे उद्धार किया था॥ ४४ १/२॥
अयं तस्याः पतिर्नूनं विहितो ब्रह्मणा स्वयम् ॥ ४५ ॥
विचिन्त्येत्यानयामास देवसेनां ह्यलंकृताम् ।
उन्होंने सोचा, स्वयं ब्रह्माजीने निश्चय ही कुमार कार्तिकेयको ही उसका पति नियत किया है। यह सोचकर वे देवसेनाको वस्त्राभूषणोंसे भूषित करके ले आये॥
स्कन्दं प्रोवाच बलभिदियं कन्या सुरोत्तम ॥ ४६ ॥
अजाते त्वयि निर्दिष्टा तव पत्नी स्वयम्भुवा ।
तस्मात् त्वमस्या विधिवत् पाणिं मन्त्रपुरस्कृतम् ॥ ४७ ॥
गृहाण दक्षिणं देव्याः पाणिना पद्मवर्चसा ।
एवमुक्तः स जग्राह तस्याः पाणिं यथाविधि ॥ ४८ ॥
फिर बलसंहारक इन्द्रने स्कन्दसे कहा—'सुरश्रेष्ठ! तुम्हारे जन्म लेनेके पहलेसे ही ब्रह्माजीने इस कन्याको तुम्हारी पत्नी नियत की है, अतः तुम वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक इसका विधिवत् पाणिग्रहण करो। अपने कमलकी-सी कान्तिवाले हाथसे इस देवीका दायाँ हाथ पकड़ो।' इन्द्रके ऐसा कहनेपर स्कन्दने विधिपूर्वक देवसेनाका पाणिग्रहण किया॥ ४६—४८॥

बृहस्पतिर्मन्त्रविद्धि जजाप च जुहाव च ।
एवं स्कन्दस्य महिषीं देवसेनां विदुर्जनाः ॥ ४९ ॥
उस समय मन्त्रवेत्ता बृहस्पतिजीने वेदमन्त्रोंका जप और होम किया। इस प्रकार सब लोग यह जान गये कि देवसेना कुमार कार्तिकेयकी पटरानी है ॥ ४९ ॥
षष्ठीं यां ब्राह्मणाः प्राहुर्लक्ष्मीमाशां सुखप्रदाम् ।
सिनीवालीं कुहूं चैव सद्वृत्तिमपराजिताम् ॥ ५० ॥
उसीको ब्राह्मणलोग षष्ठी, लक्ष्मी, आशा, सुखप्रदा, सिनीवाली, कुहू, सद्वृत्ति तथा अपराजिता कहते हैं ॥
यदा स्कन्दः पतिर्लब्धः शाश्वतो देवसेनया ।
तदा तमाश्रयल्लक्ष्मीः स्वयं देवी शरीरिणी ॥ ५१ ॥
जब देवसेनाने स्कन्दको अपने सनातन पतिके रूपमें प्राप्त कर लिया, तब (शोभास्वरूपा) लक्ष्मीदेवीने स्वयं मूर्तिमती होकर उनका आश्रय लिया ॥ ५१ ॥
श्रीजुष्टः पञ्चमीं स्कन्दस्तस्माच्छ्रीपञ्चमी स्मृता ।
षष्ठ्यां कृतार्थोऽभूद् यस्मात् तस्मात् षष्ठी महातिथिः ॥ ५२ ॥
पंचमी तिथिको स्कन्ददेव श्री अर्थात् शोभासे सेवित हुए, इसलिये उस तिथिको श्रीपञ्चमी कहते हैं और षष्ठीको कृतार्थ हुए थे, इसलिये षष्ठी महातिथि मानी गयी ॥ ५२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे स्कन्दोपाख्याने
एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दोपाख्यानसम्बन्धी दो सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२९ ॥