महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२०८-
अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः
धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन
मार्कण्डेय उवाच
स तु विप्रमथोवाच धर्मव्याधो युधिष्ठिर ।
यदहमाचरे कर्म घोरमेतदसंशयम् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर धर्मव्याधने कौशिक ब्राह्मणसे कहा—'मैं जो यह मांस बेचनेका व्यवसाय कर रहा हूँ, वास्तवमें यह अत्यन्त घोर कर्म है, इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥
विधिस्तु बलवान् ब्रह्मन् दुस्तरं हि पुरा कृतम् ।
पुरा कृतस्य पापस्य कर्मदोषो भवत्ययम् ॥ २ ॥
दोषस्यैतस्य वै ब्रह्मन् विघाते यत्नवानहम् ।
'किंतु ब्रह्मन्! दैव बलवान् है। पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मका ही नाम दैव है। उससे पार पाना बहुत कठिन है। यह जो कर्मदोषजनित व्याधके घर जन्म हुआ है, यह मेरे पूर्वजन्ममें किये हुए पापका ही फल है। ब्रह्मन्! मैं इस दोषके निवारणके लिये प्रयत्नशील हूँ ॥ २ १/२ ॥
विधिना हि हते पूर्वं निमित्तं घातको भवेत् ॥ ३ ॥
'क्योंकि विधाताके द्वारा पहलेसे ही जीवकी मृत्यु निश्चित की जाती है; किंतु घातक (कसाई अथवा व्याध) उसमें निमित्त बन जाता है अर्थात् जो स्वेच्छासे ज्ञानपूर्वक जीवहिंसा करता है, वह घातक व्यर्थ ही निमित्त बनकर दोषका भागी होता है ॥ ३ ॥
निमित्तभूता हि वयं कर्मणोऽस्य द्विजोत्तम ।
येषां हतानां मांसानि विक्रीणामीह वै द्विज ॥ ४ ॥
तेषामपि भवेद् धर्म उपयोगे न भक्षणे ।
देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां चापि पूजनम् ॥ ५ ॥
'द्विजश्रेष्ठ! इस कार्यमें हम निमित्तमात्र हैं। ब्रह्मन्! मैं जिन मारे गये प्राणियोंका मांस बेचता हूँ, उनके जीते-जी यदि उनका सदुपयोग किया जाता तो बड़ा धर्म होता। मांस-भक्षणमें तो धर्मका नाम भी नहीं है (उलटे महान् अधर्म होता है)। देवता, अतिथि, भरणीय कुटुम्बीजन और पितरोंका पूजन (आदर-सत्कार) अवश्य धर्म है ॥ ४-५ ॥
ओषध्यो वीरुधश्चैव पशवो मृगपक्षिणः ।
अनादिभूता भूतानामित्यपि श्रूयते श्रुतिः ॥ ६ ॥
ओषधियाँ, अन्न, तृण, लता, पशु, मृग और पक्षी आदि सभी वस्तुएँ सम्पूर्ण प्राणियोंके अनादि-कालसे उपयोगमें आती रहती हैं—ऐसी श्रुति भी सुनी जाती है ॥ ६ ॥
आत्ममांसप्रसादेन शिबिरौशीनरो नृपः ।
स्वर्गं सुदुर्गमं प्राप्तः क्षमावान् द्विजसत्तम ॥ ७ ॥
द्विजश्रेष्ठ! उशीनरके पुत्र क्षमाशील (और दयालु) राजा शिबिने (एक भूखे बाजको कबूतरके बदले) अपने शरीरका मांस अर्पित कर दिया था और उसीके प्रसादसे उन्हें परम दुर्लभ स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई थी ॥ ७ ॥
स्वधर्म इति कृत्वा तु न त्यजामि द्विजोत्तम ।
पुरा कृतमिति ज्ञात्वा जीवाम्येतेन कर्मणा ॥ ८ ॥
'विप्रवर! मैं अपना स्वधर्म समझकर यह धंधा नहीं छोड़ रहा हूँ। पहलेसे मेरे पूर्वज यही करते आये हैं, ऐसा समझकर मैं इसी कर्मसे जीवन-निर्वाह करता हूँ ॥ ८ ॥
स्वकर्म त्यजतो ब्रह्मन्नधर्म इह दृश्यते ।
स्वकर्मनिरतो यस्तु धर्मः स इति निश्चयः ॥ ९ ॥
'ब्रह्मन्! अपने कर्मका परित्याग करनेवालेको यहाँ अधर्मकी प्राप्ति देखी जाती है। जो अपने कर्ममें तत्पर है, उसीका बर्ताव धर्मपूर्ण है, ऐसा सिद्धान्त है ॥ ९ ॥
पूर्वं हि विहितं कर्म देहिनं न विमुञ्चति ।
धात्रा विधिरयं दृष्टो बहुधा कर्मनिर्णये ॥ १० ॥
'पहलेका किया हुआ कर्म देहधारी मनुष्यको नहीं छोड़ता है। बहुधा कर्मका निर्णय करते समय विधाताने इसी विधिको अपने सामने रखा है ॥ १० ॥
द्रष्टव्या तु भवेत् प्रज्ञा क्रूरे कर्मणि वर्तता ।
कथं कर्म शुभं कुर्यां कथं मुच्ये पराभवात् ॥ ११ ॥
'जो क्रूर कर्ममें लगा हुआ है, उसे सदा यह सोचते रहना चाहिये कि 'मैं कैसे शुभ कर्म करूँ और किस प्रकार इस निन्दित कर्मसे छुटकारा पाऊँ' ॥ ११ ॥
कर्मणस्तस्य घोरस्य बहुधा निर्णयो भवेत् ।
दाने च सत्यवाक्ये च गुरुशुश्रूषणे तथा ॥ १२ ॥
द्विजातिपूजने चाहं धर्मे च निरतः सदा ।
अभिमानातिवादाभ्यां निवृत्तोऽस्मि द्विजोत्तम ॥ १३ ॥
'बार-बार ऐसा करनेसे उस घोर कर्मसे छूटनेके विषयमें कोई निश्चित उपाय प्राप्त हो जाता है। द्विजश्रेष्ठ! मैं दान, सत्यभाषण, गुरुसेवा, ब्राह्मणपूजन तथा धर्मपालनमें सदा तत्पर रहकर अभिमान और अतिवादसे दूर रहता हूँ ॥ १२-१३ ॥
कृषिं साध्विति मन्यन्ते तत्र हिंसा परा स्मृता ।
कर्षन्तो लाङ्गलैः पुंसो घ्नन्ति भूमिशयान् बहून् ।
जीवानन्यांश्च बहुशस्तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ १४ ॥
कुछ लोग खेतीको उत्तम मानते हैं, परंतु उसमें भी बहुत बड़ी हिंसा होती है। हल चलानेवाले मनुष्य धरतीके भीतर शयन करनेवाले बहुत-से प्राणियोंकी हत्या कर डालते हैं।
इनके सिवा और भी बहुत-से जीवोंका वध वे करते रहते हैं। इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ।।
धान्यबीजानि यान्याहुर्व्रीह्यादीनि द्विजोत्तम।
सर्वाण्येतानि जीवानि तत्र किं प्रतिभाति ते ।। १५ ।।
‘द्विजश्रेष्ठ! धान आदि जितने अन्नके बीज हैं, वे सब-के-सब जीव ही हैं; अतः इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। १५ ।।
अध्याक्रम्य पशूंश्चापि घ्नन्ति वै भक्षयन्ति च ।
वृक्षांस्तथौषधींश्चापि छिन्दन्ति पुरुषा द्विज ।। १६ ।।
जीवा हि बहवो ब्रह्मन् वृक्षेषु च फलेषु च।
उदके बहवश्चापि तत्र किं प्रतिभाति ते ।। १७ ।।
‘विप्रवर! कितने ही मनुष्य पशुओंपर आक्रमण करके उन्हें मारते और खाते हैं। वृक्षों तथा ओषधियों (अन्नके पौधों)-को काटते हैं। वृक्षों और फलोंमें भी बहुत-से जीव रहते हैं। जलमें भी नाना प्रकारके जीव रहते हैं। ब्रह्मन्! उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। १६-१७ ।।
सर्वं व्याप्तमिदं ब्रह्मन् प्राणिभिः प्राणिजीवनैः।
मत्स्यान् ग्रसन्ते मत्स्याश्च तत्र किं प्रतिभाति ते ।। १८ ।।
‘जीवोंसे ही जीवन-निर्वाह करनेवाले जीवोंद्वारा यह सारा जगत् व्याप्त है। मत्स्य मत्स्योंतकको अपना ग्रास बना लेते हैं। उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। १८ ।।
सत्त्वैः सत्त्वानि जीवन्ति बहुधा द्विजसत्तम ।
प्राणिनोऽन्योन्यभक्षाश्च तत्र किं प्रतिभाति ते ।। १९ ।।
‘द्विजश्रेष्ठ! बहुधा जीव जीवोंसे ही जीवन धारण करते हैं और प्राणी स्वयं ही एक-दूसरेको अपना आहार बना लेते हैं। उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। १९ ।।
चङ्क्रम्यमाणा जीवांश्च धरणीसंश्रितान् बहून् ।
पद्भ्यां घ्नन्ति नरा विप्र तत्र किं प्रतिभाति ते ।। २० ।।
‘मनुष्य चलते-फिरते समय धरतीके बहुत-से जीव-जन्तुओंको (असावधानीपूर्वक) पैरोंसे मार देते हैं। ब्रह्मन्! उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। २० ।।
उपविष्टाः शयानाश्च घ्नन्ति जीवाननेकशः ।
ज्ञानविज्ञानवन्तश्च तत्र किं प्रतिभाति ते ।। २१ ।।
‘ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न पुरुष भी (अनजानमें) बैठते-सोते समय अनेक जीवोंकी हिंसा कर बैठते हैं। उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। २१ ।।
जीवैर्ग्रस्तमिदं सर्वमाकाशं पृथिवी तथा।
अविज्ञानाच्च हिंसन्ति तत्र किं प्रतिभाति ते ।। २२ ।।
‘आकाशसे लेकर पृथ्वीतक यह सारा जगत् जीवोंसे भरा हुआ है। कितने ही मनुष्य अनजानमें भी जीवहिंसा करते हैं। इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। २२ ।।
अहिंसेति यदुक्तं हि पुरुषैर्विस्मितैः पुरा ।
के न हिंसन्ति जीवान् वै लोकेऽस्मिन् द्विजसत्तम ।
बहु संचित्य इति वै नास्ति कश्चिदहिंसकः ।। २३ ।।
‘पूर्वकालके अभिमानशून्य श्रेष्ठ पुरुषोंने जो अहिंसाका उपदेश किया है (उसका तत्त्व समझना चाहिये; क्योंकि) द्विजश्रेष्ठ! (स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो) इस संसारमें कौन जीवहिंसा नहीं करते हैं? बहुत सोच-विचारकर मैं इस निश्चयपर पहुँचा हूँ कि कोई भी (क्रियाशील मनुष्य) अहिंसक नहीं है ।। २३ ।।
अहिंसायां तु निरता यतयो द्विजसत्तम ।
कुर्वन्त्येव हि हिंसां ते यत्नादल्पतरा भवेत् ।। २४ ।।
‘द्विजश्रेष्ठ! यतिलोग अहिंसा-धर्मके पालनमें तत्पर होते हैं, परंतु वे भी हिंसा कर ही डालते हैं (अर्थात् उनके द्वारा भी हिंसा हो ही जाती है)। अवश्य ही यत्नपूर्वक चेष्टा करनेसे हिंसाकी मात्रा बहुत कम हो सकती है ।। २४ ।।
आलक्ष्याश्चैव पुरुषाः कुले जाता महागुणाः ।
महाघोराणि कर्माणि कृत्वा लज्जन्ति वै द्विज ।। २५ ।।
‘ब्रह्मन्! उत्तम कुलमें उत्पन्न, परम सद्गुणसम्पन्न और श्रेष्ठ माने जानेवाले पुरुष भी अत्यन्त भयानक कर्म करके लज्जाका अनुभव करते ही हैं ।। २५ ।।
सुहृदः सुहृदोऽन्यांश्च दुर्हृदश्चापि दुर्हृदः ।
सम्यक् प्रवृत्तान् पुरुषान् न सम्यगनुपश्यतः ।। २६ ।।
‘मित्र दूसरे मित्रोंको और शत्रु अपने शत्रुओंको, वे अच्छे कर्ममें लगे हुए हों तो भी अच्छी दृष्टिसे नहीं देखते ।। २६ ।।
समृद्धैश्च न नन्दन्ति बान्धवा बान्धवैरपि ।
गुरूंश्चैव विनिन्दन्ति मूढाः पण्डितमानिनः ।। २७ ।।
‘बन्धु-बान्धव अपने समृद्धिशाली बान्धवोंसे भी प्रसन्न नहीं रहते। अपनेको पण्डित माननेवाले मूढ़ मनुष्य गुरुजनोंकी भी निन्दा करते हैं ।। २७ ।।
बहु लोके विपर्यस्तं दृश्यते द्विजसत्तम ।
धर्मयुक्तमधर्मं च तत्र किं प्रतिभाति ते ।। २८ ।।
‘द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार जगत्में अनेक उलटी बातें दिखायी देती हैं। अधर्म भी धर्मसे युक्त प्रतीत होता है। इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। २८ ।।
वक्तुं बहुविधं शक्यं धर्माधर्मेषु कर्मसु ।
स्वकर्मनिरतो यो हि स यशः प्राप्नुयान्महत् ।। २९ ।।
‘धर्म और अधर्मसम्बन्धी कार्योंके विषयमें और भी बहुत-सी बातें कही जा सकती हैं। अतएव जो अपने कुलोचित कर्ममें लगा हुआ है, वही महान् यशका भागी होता है’ ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने
ब्राह्मणव्याधसंवादे अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानके प्रसंगमें ब्राह्मणव्याधसंवादविषयक दो सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०८ ॥