महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२०२-
द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
उत्तङ्कका राजा बृहदश्वसे धुन्धुका वध करनेके लिये आग्रह
मार्कण्डेय उवाच
इक्ष्वाकौ संस्थिते राजन् शशादः पृथिवीमिमाम् ।
प्राप्तः परमधर्मात्मा सोऽयोध्यायां नृपोऽभवत् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! महाराज इक्ष्वाकुके देहावसानके पश्चात् उनके परम धर्मात्मा पुत्र शशाद इस पृथ्वीपर राज्य करने लगे। वे अयोध्यामें रहते थे ॥ १ ॥
शशादस्य तु दायादः ककुत्स्थो नाम वीर्यवान् ।
अनेनाश्चापि काकुत्स्थः पृथुश्चानेनसः सुतः ॥ २ ॥
शशादके पुत्र पराक्रमी ककुत्स्थ हुए। ककुत्स्थके पुत्र अनेना और अनेनाके पृथु हुए ॥ २ ॥
विश्वगश्वः पृथोः पुत्रस्तस्मादद्रिश्च जज्ञिवान् ।
अद्रेश्च युवनाश्वस्तु श्रावस्तस्यात्मजोऽभवत् ॥ ३ ॥
पृथुके विश्वगश्व और उनके पुत्र अद्रि हुए। अद्रिके पुत्रका नाम युवनाश्व था। युवनाश्वका पुत्र श्राव नामसे विख्यात हुआ ॥ ३ ॥
तस्य श्रावस्तको ज्ञेयः श्रावस्ती येन निर्मिता ।
श्रावस्तकस्य दायादो बृहदश्वो महाबलः ॥ ४ ॥
श्रावका पुत्र श्रावस्त हुआ, जिसने श्रावस्तीपुरी बसायी थी। श्रावस्तके ही पुत्र महाबली बृहदश्व थे ॥ ४ ॥
बृहदश्वस्य दायादः कुवलाश्व इति स्मृतः ।
कुवलाश्वस्य पुत्राणां सहस्राण्येकविंशतिः ॥ ५ ॥
बृहदश्वके ही पुत्रका नाम कुवलाश्व था। कुवलाश्वके इक्कीस हजार पुत्र हुए ॥ ५ ॥
सर्वे विद्यासु निष्णाता बलवन्तो दुरासदाः ।
कुवलाश्वश्च पितृतो गुणैरभ्यधिकोऽभवत् ॥ ६ ॥
वे सब-के-सब सम्पूर्ण विद्याओंमें पारंगत, बलवान् और दुर्धर्ष वीर थे। कुवलाश्व उत्तम गुणोंमें अपने पितासे बढ़कर निकले ॥ ६ ॥
समये तं पिता राज्ये बृहदश्वोऽभ्यषेचयत् ।
कुवलाश्वं महाराज शूरमुत्तमधार्मिकम् ॥ ७ ॥
महाराज! राजा बृहदश्वने यथासमय अपने उत्तम धर्मात्मा शूरवीर पुत्र कुवलाश्वको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ।। ७ ।।
पुत्रसंक्रामितश्रीस्तु बृहदश्वो महीपतिः ।
जगाम तपसे धीमांस्तपोवनममित्रहा ॥ ८ ॥
शत्रुओंका संहार करनेवाले बुद्धिमान् राजा बृहदश्व राजलक्ष्मीका भार पुत्रपर छोड़कर स्वयं तपस्याके लिये तपोवनमें चले गये ।। ८ ।।
अथ शुश्राव राजर्षिं तमुत्तङ्को नराधिप ।
वनं सम्प्रस्थितं राजन् बृहदश्वं द्विजोत्तमः ॥ ९ ॥
राजन्! तदनन्तर द्विजश्रेष्ठ उत्तङ्कने यह सुना कि राजर्षि बृहदश्व वनको चले जा रहे हैं ।। ९ ।।
तमुत्तङ्को महातेजाः सर्वास्त्रविदुषां वरम् ।
न्यवारयदमेयात्मा समासाद्य नरोत्तमम् ॥ १० ॥
वे नरश्रेष्ठ नरेश सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वानोंमें सर्वोत्तम थे। विशाल हृदयवाले महातेजस्वी उत्तङ्कने उनके पास जाकर उन्हें वनमें जानेसे रोका और इस प्रकार कहा ।। १० ।।
उत्तङ्क उवाच
भवता रक्षणं कार्यं तत् तावत् कर्तुमर्हसि ।
निरुद्विग्ना वयं राजंस्त्वत्प्रसादाद् भवेमहि ॥ ११ ॥
**उत्तङ्क बोले—**महाराज! प्रजाकी रक्षा करना आपका कर्तव्य है। अतः पहले वही आपको करना चाहिये जिससे आपके कृपाप्रसादसे हमलोग निर्भय हो जायँ ।। ११ ।।
त्वया हि पृथिवी राजन् रक्ष्यमाणा महात्मना ।
भविष्यति निरुद्विग्ना नारण्यं गन्तुमर्हसि ॥ १२ ॥
राजन्! आप-जैसे महात्मा राजासे सुरक्षित होकर ही यह पृथ्वी सर्वथा भयशून्य हो जायगी। अतः आप वनमें न जाइये ॥ १२ ॥
पालने हि महान् धर्मः प्रजानामिह दृश्यते ।
न तथा दृश्यतेऽरण्ये माभूत् ते बुद्धिरीदृशी ॥ १३ ॥
क्योंकि आपके लिये यहाँ रहकर प्रजाओंका पालन करनेमें जो महान् धर्म देखा जाता है, वैसा वनमें रहकर तपस्या करनेमें नहीं दिखायी देता। अतः आपकी ऐसी समझ नहीं होनी चाहिये ॥ १३ ॥
ईदृशो न हि राजेन्द्र धर्मः क्वचन दृश्यते ।
प्रजानां पालने यो वै पुरा राजर्षिभिः कृतः ॥ १४ ॥
राजेन्द्र! पूर्वकालके राजर्षियोंने जिस धर्मका पालन किया है, वह प्रजाजनोंके पालनमें ही सुलभ है। ऐसा धर्म और किसी कार्यमें नहीं दिखायी देता ॥ १४ ॥
रक्षितव्याः प्रजा राज्ञा तास्त्वं रक्षितुमर्हसि ।
निरुद्विग्नस्तपश्चर्तुं न हि शक्नोमि पार्थिव ॥ १५ ॥
राजाके लिये प्रजाजनोंका पालन करना ही धर्म है। अतः आपको प्रजावर्गकी रक्षा ही करनी चाहिये। भूपाल! मैं शान्तिपूर्वक तपस्या नहीं कर पा रहा हूँ ॥
ममाश्रमसमीपे वै समेषु मरुधन्वसु ।
समुद्रो बालुकापूर्ण उज्वालक इति स्मृतः ॥ १६ ॥
मेरे आश्रमके समीप समस्त मरुप्रदेशमें एक बालूसे पूर्ण अर्थात् बालुकामय समुद्र है, उसका नाम है उज्वालक ॥ १६ ॥
बहुयोजनविस्तीर्णो बहुयोजनमायतः ।
तत्र रौद्रो दानवेन्द्रो महावीर्यपराक्रमः ॥ १७ ॥
मधुकैटभयोः पुत्रो धुन्धुर्नाम सुदारुणः ।
अन्तर्भूमिगतो राजन् वसत्यमितविक्रमः ॥ १८ ॥
उसकी लंबाई-चौड़ाई कई योजनकी है। वहाँ महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न एक भयंकर दानवराज रहता है, जो मधु और कैटभका पुत्र है। वह क्रूर स्वभाववाला राक्षस धुन्धु नामसे प्रसिद्ध है। राजन्! वह अमित पराक्रमी दानव धरतीके भीतर छिपकर रहा करता है ॥ १७-१८ ॥
तं निहत्य महाराज वनं त्वं गन्तुमर्हसि ।
शेते लोकविनाशाय तप आस्थाय दारुणम् ॥ १९ ॥
त्रिदशानां विनाशाय लोकानां चापि पार्थिव ।
महाराज! उसका नाश करके ही आपको वनमें जाना चाहिये। भूपाल! वह सम्पूर्ण लोकों और देवताओंके विनाशके लिये कठोर तपस्याका आश्रय लेकर (पृथ्वीमें) शयन करता है ॥ १९ १/२ ॥
अवध्यो दैवतानां हि दैत्यानामथ रक्षसाम् ॥ २० ॥
नागानामथ यक्षाणां गन्धर्वाणां च सर्वशः ।
अवाप्य स वरं राजन् सर्वलोकपितामहात् ॥ २१ ॥
राजन्! वह सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीसे वर पाकर देवताओं, दैत्यों, राक्षसों, नागों, यक्षों और समस्त गन्धर्वोंके लिये अवध्य हो गया है ॥ २०-२१ ॥
तं विनाशय भद्रं ते मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा ।
प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं शाश्वतीमव्ययां ध्रुवाम् ॥ २२ ॥
महाराज! आपका कल्याण हो। आप उस दैत्यका विनाश कीजिये। इसके विपरीत आपको कोई विचार नहीं करना चाहिये। उसका वध करके आप सदा बनी रहनेवाली अक्षय एवं महान् कीर्ति प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥
क्रूरस्य तस्य स्वपतो बालुकान्तर्हितस्य च ।
संवत्सरस्य पर्यन्ते निःश्वासः सम्प्रवर्तते ॥ २३ ॥
बालूके भीतर छिपकर रहनेवाला वह क्रूर राक्षस एक वर्षमें एक ही बार साँस लेता है ॥ २३ ॥
यदा तदा भूश्चलति सशैलवनकानना ।
तस्य निःश्वासवातेन रज उद्धूयते महत् ।। २४ ।।
आदित्यपथमाश्रित्य सप्ताहं भूमिकम्पनम् ।
सविस्फुलिङ्गं सज्ज्वलं धूममिश्रं सुदारुणम् ।। २५ ।।
जिस समय वह साँस लेता है, उस समय पर्वत, वन और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी डोलने लगती है। उसके साँसकी आँधीसे धूलका इतना ऊँचा बवंडर उठता है कि वह सूर्यके मार्गको भी ढक लेता है और सात दिनोंतक वहाँ भूकम्प होता रहता है। आगकी चिनगारियाँ, ज्वालाएँ और धूआँ उठकर अत्यन्त भयंकर दृश्य उपस्थित करते हैं ।। २४-२५ ।।
तेन राजन् न शक्नोमि तस्मिन् स्थातुं स्व आश्रमे ।
तं विनाशय राजेन्द्र लोकानां हितकाम्यया ।। २६ ।।
राजन्! इस कारण मेरा अपने आश्रममें रहना कठिन हो गया है। महाराज! सब लोगोंके हितके लिये आप उस राक्षसको नष्ट कीजिये ।। २६ ।।
लोकाः स्वस्था भविष्यन्ति तस्मिन् विनिहतेऽसुरे ।
त्वं हि तस्य विनाशाय पर्याप्त इति मे मतिः ।। २७ ।।
उस असुरके मारे जानेपर सब लोग स्वस्थ एवं सुखी हो जायँगे। मेरा विश्वास है कि आप अकेले ही उसका नाश करनेके लिये पर्याप्त हैं ।। २७ ।।
तेजसा तव तेजश्च विष्णुराप्याययिष्यति ।
विष्णुना च वरो दत्तः पूर्वं मम महीपते ।। २८ ।।
यस्तं महासुरं रौद्रं वधिष्यति महीपतिः ।
तेजस्तं वैष्णवमिति प्रवेक्ष्यति दुरासदम् ।। २९ ।।
भूपाल! भगवान् विष्णु अपने तेजसे आपके तेजको बढ़ायेंगे। उन्होंने पूर्वकालमें मुझे यह वर दिया था कि जो राजा उस भयानक एवं महान् असुरका वध करनेको उद्यत होगा, उस दुर्धर्ष वीरके भीतर मेरा वैष्णव तेज प्रवेश करेगा ।। २८-२९ ।।
तत् तेजस्त्वं समाधाय राजेन्द्र भुवि दुःसहम् ।
तं निष्षूदय राजेन्द्र दैत्यं रौद्रपराक्रमम् ।। ३० ।।
महाराज! अतः आप भगवान्का दुःसह तेज धारण करके पृथ्वीपर रहनेवाले उस भयानक पराक्रमी दैत्यको नष्ट कीजिये ।। ३० ।।
न हि धुन्धुर्महातेजास्तेजसाल्पेन शक्यते ।
निर्दग्धुं पृथिवीपाल स हि वर्षशतैरपि ।। ३१ ।।
राजन्! धुन्धु महातेजस्वी असुर है। साधारण तेजसे सौ वर्षोंमें भी कोई उसे नष्ट नहीं कर सकता ।। ३१ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने
द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें
धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०२ ॥