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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१७४-

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चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना

अर्जुन उवाच

ततो मामतिविश्वस्तं संरूढशरविक्षतम्
देवराजो विगृह्येदं काले वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
अर्जुन कहते हैं—राजन्! तदनन्तर मैं देवराजका अत्यन्त विश्वासपात्र बन गया। धीरे-धीरे मेरे शरीरके सब घाव भर गये। तब एक दिन देवराज इन्द्रने मेरा हाथ पकड़कर कहा— ॥ १ ॥

दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि त्वयि तिष्ठन्ति भारत
न त्वाभिभवितुं शक्तो मानुषो भुवि कश्चन ॥ २ ॥
‘भरतनन्दन! तुममें सब दिव्यास्त्र विद्यमान हैं। भूमण्डलका कोई भी मनुष्य तुम्हें पराजित नहीं कर सकता ॥ २ ॥

भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णः शकुनिः सह राजभिः
संग्रामस्थस्य ते पुत्र कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ३ ॥
‘बेटा! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण तथा राजाओंसहित शकुनि—ये सब-के-सब संग्राममें खड़े होनेपर तुम्हारी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते’ ॥ ३ ॥

इदं च मे तनुत्राणं प्रायच्छन्मघवान् प्रभुः
अभेद्यं कवचं दिव्यं स्रजं चैव हिरण्मयीम् ॥ ४ ॥
महाराज! उन देवेश्वर इन्द्रने स्वयं मेरे शरीरकी रक्षा करनेवाला यह अभेद्य दिव्य कवच और यह सुवर्णमयी माला मुझे दी ॥ ४ ॥

देवदत्तं च मे शङ्खं पुनः प्रादान्महारवम्
दिव्यं चेदं किरीटं मे स्वयमिन्द्रो युयोज ह ॥ ५ ॥
फिर उन्होंने बड़े जोरकी आवाज करनेवाला यह देवदत्त नामक शंख प्रदान किया। स्वयं देवराज इन्द्रने ही यह दिव्य किरीट मेरे मस्तकपर रखा था ॥ ५ ॥

ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्‍याभरणानि च
प्रादाच्छक्रो ममैतानि रुचिराणि बृहन्ति च ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् देवराजने मुझे ये मनोहर एवं विशाल दिव्य वस्त्र तथा दिव्य आभूषण दिये ॥ ६ ॥

एवं सम्पूजितस्तत्र सुखमस्म्युषितो नृप
इन्द्रस्य भवने पुण्ये गन्धर्वशिशुभिः सह ॥ ७ ॥
महाराज! इस प्रकार सम्मानित होकर मैं उस पवित्र इन्द्रभवनमें गन्धर्वकुमारोंके साथ सुखपूर्वक रहने लगा ॥ ७ ॥

ततो मामब्रवीच्छक्रः प्रीतिमानमरैः सह
समयोऽर्जुन गन्तुं ते भ्रातरो हि स्मरन्ति ते ॥ ८ ॥
तदनन्तर देवताओंसहित इन्द्रने प्रसन्न होकर मुझसे कहा—'अर्जुन! अब तुम्हारे जानेका समय आ गया है; क्योंकि तुम्हारे भाई तुम्हें बहुत याद करते हैं' ॥ ८ ॥

एवमिन्द्रस्य भवने पञ्च वर्षाणि भारत
उषितानि मया राजन् स्मरता द्यूतजं कलिम् ॥ ९ ॥
भारत! इस प्रकार द्यूतजनित कलहका स्मरण करते हुए मैंने इन्द्रभवनमें पाँच वर्ष व्यतीत किये हैं ॥ ९ ॥

ततो भवन्तमद्राक्षं भ्रातृभिः परिवारितम्
गन्धमादनपादस्य पर्वतस्यास्य मूर्धनि ॥ १० ॥
इसके बाद इस गन्धमादनकी शाखाभूत इस पर्वतके शिखरपर भाइयोंसहित आपका दर्शन किया है ॥ १० ॥

युधिष्ठिर उवाच

दिष्ट्या धनंजयास्त्राणि त्वया प्राप्तानि भारत
दिष्ट्या चाराधितो राजा देवानामीश्वरः प्रभुः ॥ ११ ॥
दिष्ट्या च भगवान् स्थाणुर्देव्या सह परंतप
साक्षाद् दृष्टः स्वयुद्धेन तोषितश्च त्वयानघ ॥ १२ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**धनंजय! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये। भारत! यह भी भाग्यकी ही बात है कि तुमने देवताओंके स्वामी राजराजेश्वर इन्द्रको आराधनाद्वारा प्रसन्न कर लिया। निष्पाप परंतप! सबसे बड़ी सौभाग्यकी बात तो यह है कि तुमने देवी पार्वतीके साथ साक्षात् भगवान् शंकरका दर्शन किया और उन्हें अपनी युद्धकलासे संतुष्ट कर लिया ॥ ११-१२ ॥

दिष्ट्या च लोकपालैस्त्वं समेतो भरतर्षभ
दिष्ट्या वर्धामहे पार्थ दिष्ट्यासि पुनरागतः ॥ १३ ॥
भरतश्रेष्ठ! समस्त लोकपालोंके साथ तुम्हारी भेंट हुई, यह भी हमारे लिये सौभाग्यका सूचक है। हमारा अहोभाग्य है कि हम उन्नतिके पथपर अग्रसर हो रहे हैं। अर्जुन! हमारे भाग्यसे ही तुम पुनः हमारे पास लौट आये ॥ १३ ॥

अद्य कृत्स्नां महीं देवीं विजितां पुरमालिनीम्

मन्ये च धृतराष्ट्रस्य पुत्रानपि वशीकृतान् ॥ १४ ॥
आज मुझे यह विश्वास हो गया कि हम नगरोंसे सुशोभित समूची वसुधादेवीको जीत लेंगे। अब हम धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भी अपने वशमें पड़ा हुआ ही मानते हैं ॥ १४ ॥
इच्छामि तानि चास्त्राणि द्रष्टुं दिव्यानि भारत
यैस्तथा वीर्यवन्तस्ते निवीतकवचा हतः ॥ १५ ॥
भारत! अब मेरी इच्छा उन दिव्यास्त्रोंको देखनेकी हो रही है, जिनके द्वारा तुमने उस प्रकारके उन महापराक्रमी निवातकवचोंका विनाश किया है ॥ १५ ॥

अर्जुन उवाच
श्वः प्रभाते भवान् द्रष्टा दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः
निवातकवचा घोरा यैर्मया विनिपातिताः ॥ १६ ॥
**अर्जुन बोले—**महाराज! कल सबेरे आप उन सब दिव्यास्त्रोंको देखियेगा जिनके द्वारा मैंने भयानक निवातकवचोंको मार गिराया है ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमागमनं तत्र कथयित्वा धनंजयः
भ्रातृभिः सहितः सर्वै रजनीं तामुवास ह ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार अपने आगमनका वृत्तान्त सुनाकर सब भाइयोंसहित अर्जुनने वहाँ वह रात व्यतीत की ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शनसंकेते
चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनके लिये संकेतविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७४ ॥